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Taj Mahal-One of Seven Wonders

Taj Mahal: मोहब्बत और तहज़ीब की अनोखी विरासत – ताज महल

by Pardeep Kumar

दुनिया में कितनी ही अनगिनत जगह हैं जिन्हें ज़िंदग़ी में एक बार देख लेना भी किसी सपने के मुक़्क़मल होने से कम नहीं लगता। ऐसी ही नायाब जगहों में से एक है ताज महल।(Taj mahal)

देश की राजधानी से मात्र 234 किलोमीटर की दूरी पर बसा आगरा शहर न केवल ऐतिहासिक है बल्कि सदैव देश की सियासत का अहम् केंद्र भी रहा है। और आगरा को दुनिया भर में शौहरत दिलाने का काम किया है ताजमहल ने। जब  माँ बाप अपने बच्चों के नाम से जाने जाएँ तब उन्हें बेहद सुखद अहसास होता है और ऐसे ही ताजमहल के नाम से अपनी विशेष पहचान बनाने में निसंदेह आगरा फ़क़्र महसूस करता होगा।

दरअसल जब भी हम कहीं घूमने का कार्यक्रम बनाते हैं तो ज़हन में सबसे पहले नाम आता है, ताजमहल इक़लौती ऐसी कविता जिसे संगमरमर से तराशा गया है। जिसका ऑरा कुछ ऐसा है कि सामने पाकर भी विश्वास कर पाना मुश्क़िल लगता है।

बात कुछ ऐसी थी कि एक शाम जब परिवार के साथ बैठकर चाय का लुत्फ़ उठाया जा रहा था तो ख़्याल आया क्यूं न कहीं घूमने जाया जाए। आमतौर पर मध्यवर्गीय परिवारों में थोड़ा क्वालिटी टाइम बिताने के लिए ही हम कहीं आउट ऑफ़ स्टेशन जाते हैं। किसी ने सुझाया ताजमहल। तो इस सुझाव को फाइनल होने में जरा भी समय नहीं लगा। बस फिर क्या, यहीं से जाने की तैयारियां शुरू हुई और क्योंकि सफ़र लंबा था तो यकीनन मज़ा भी बहुत आने वाला था। खाने-पीने की चीज़ें सबसे पहले पैक की गई, साथ ही चाय का एक बड़ा थर्मस। यूं तो रास्ते में ढ़ेरों ढ़ाबों ने रूकने का इशारा दिया लेकिन जब रास्ता इतना आरामदायक हो तो कहां कहीं रूकने का दिल करता है। बस तमाम सफर के दौरान यमुना एक्सप्रेस वे के बिलकुल मिडल में ही एक जगह रुक कर अपने घर की बनी चाय का मजा लिया गया। एक प्याला चाय सारी थकान दूर भगाय।

यमुना एक्सप्रेसवे से हम आगरा की तरफ बढ़ते जा रहे थे। क्या सुहाना सफ़र था। उगते सूरज को सलाम कर हम निकले और भरी दोपहरी में आगरा पहुंचे, जहां का तापमान उबाल मार रहा था। इतनी गर्मी कि कोई हद-हिसाब नहीं इसीलिए सबसे पहले हमने होटल बुक करना ज़्यादा बेहतर समझा। सोचा पहले थोड़ा आराम फ़रमा लिया जाए फिर निकलेंगे ताजमहल के दीदार के लिए। दो-तीन घंटे आराम कर हल्की शाम होते ही हमने ताजमहल जाने की तैयारी की। संकरी गलियों से होकर ट्र्ैफिक की जद्दोजहद से निकलकर आख़िरकार हम उस अविश्वसनीय मीनार के क्षेत्र में पहुंच गए।

ताजमहल परिसर और ऊंट गाड़ी

ताजमहल परिसर में प्रवेश करते ही ताज से लगभग एक डेढ़ किलोमीटर दूर आपको अपनी कार पार्क करनी पड़ेगी। प्रदूषण के मध्यनज़र पार्किंग क्षेत्र को परिसर से थोड़ा दूर बनाया गया है। अच्छी बात ये है कि पार्किंग से ताज तक पैदल जाने के अलावा आपको मिलेगी ऊंट गाड़ी। आप आराम से ऊंट गाड़ी की सवारी करते हुए टिकट खिड़की तक पहुँच सकते हैं।  हमने थोड़ा समय बचाते हुए ऊंट गाड़ी की सवारी का भी आनंद उठाया।

जैसे ही ताज के पास पहुंचे महसूस हुआ जैसे मोहब्बत का नूर टपक रहा हो, वहां के हर एक पत्थर में, फूलों में, पत्तों में। जैसे रूहानियत का अलग ही जहां हो। सारी विशेष चीज़ें मानो एक ही थाली में परोस दी गईं हो। मुग़ल सम्राट शाहजहां के अरमानों को पूरा करता यह अद्भुत स्मारक बेग़म मुमताज़ के लिए बनाई गई अविश्वास्य इमारत जिसे हम मुमताज़ महल के नाम से भी जानते हैं। अकेले मक़बरे को बनने में क़रीब 11 वर्ष का समय लगा। ज़ाहिर है, इतनी ख़ूबसूरत इमारत जिसकी एक-एक ईंट अकल्पनीय कला की ग़वाही दे रही हों, चार दिन में तो बनकर तैयार हो नहीं सकती। इसीलिए समय तो लगना ही था और परिसर में मौजूद बाक़ी की इमारतों को भी तक़रीबन 21 से 22 वर्ष लगे।

ताज को यमुना का स्पर्श

ताजमहल केवल पर्यटक स्थल ही नहीं बल्क़ि कई प्रकार की कारीगरी का खज़ाना भी है। जैसे-जैसे आप इसके नज़दीक़ जाएंगे तो पाएंगे कि सिर्फ ताज ही नहीं, उसके आसपास बनाई गई सभी इमारतें अपने आप में बेमिसाल कारीगरी का नमूना है। वैसे यह झूठ नहीं है जिसे आर्किटेक्चर में दिलचस्पी है उसके लिए तो ताजमहल की यात्रा सोने की ख़दान से कम नहीं है। हिमालय की गोद से निकलती यमुना अपने 1370 कि.मी. के लंबे सफ़र में कई मोड़ और ठिकानों से होकर ग़ुज़रती है। उन्हीं ठिकानों में से एक है ताजमहल। वैसे शाहजहां ने भी क्या ख़ूब दिमाग़ दौड़ाया, सोचा अगर ताज को यमुना का स्पर्श मिल जाए तो क्या बात होगी, ताज की ख़ूबसूरती दोगुनी हो जाएगी और देखिए ऐसा ही हुआ।

यमुना नदी पर ख़ासा ध्यान देते हुए मक़बरे तक जाने से पहले यह विशाल बालकनी बनाई गई है जहां खड़े होकर आप यमुना नदी को निहार सकते हैं और नदी की ओर से आने वाली ठंडी हवाएं आपको एकदम तरोताज़ा कर देती हैं। बेशक़ यह दृश्य आपको आश्चर्यचकित करने में ज़रा भी विफल नहीं होगा। ताजमहल को ग़ौर से देख लेने के बाद आपका दिल चाहेगा कि यहां बैठकर मन मोह लेने वाले गीत सुनते रहें और बस यहां की हवा में खो जाएं। कुछ ऐसा ही जादू है इस जगह में।

दरवाज़ा ए रोज़ा

बहरहाल, आइए इतिहास को थोड़ा खंगालते हुए मुग़लों के दौर में एक बार फिर चलते हैं और शुरूआत करते हैं दरवाज़ा ए रोज़ा से। आप जैसे ही ताजमहल के अंदर प्रवेश करते हैं तब आपको सबसे पहले दिखाई देता है एक विशाल दरवाज़ा जो दूर से ही ताज की अद्भुत झलक पेश करता है। ये इमारतें महज़ ख़ूबसूरती ही नहीं बल्क़ि मज़बूत इरादों की भी मिसाल क़ायम करती हैं। ताजमहल को अपने इतना नज़दीक पाना वाक़ई में सपने सा लग रहा था। ज़ाहिर है जिसे लोग देशभर से निहारने आते हैं, जिसकी सुंदरता की दुनियाभर में प्रशंसा की जाती है उससे भला हम कैसे अछूते रह जाते।

दरवाज़ा ए रोज़ा ताजमहल परिसर के महत्वपूर्ण भागों में से एक है। जहां पहुंचने के लिए हमें कई पड़ाव पार करने होते हैं। वो कहते हैं ना किसी भी सुंदर चीज़ को देखने के लिए कुछ क़ीमत तो चुकानी पड़ती है। लिहाज़ा हमने भी टिकट ली और आगे बढ़े।

दरवाज़े की बात की जाए तो उसके बाहरी छोर पर बहुत बड़ा आंगन है जिसे जिलाउख़ाना कहते हैं, हरे भरे पौधों से सुसज्जित यह जगह, जहां छोटे छोटे कमरे बनाए गए हैं जिसे हुज्रा कहा जाता है। इस जगह को  औपचारिक उद्देश्यों के लिए काम में लिया जाता था। यह शुरूआती दौर के मुग़ल सम्राटों की वास्तुकला का एक स्मारक है। क्योंकि दरवाज़े की बनावट ऐसी है कि उसके उपर की ओर चारों तरफ छतरियां बनाई गई है जिसे दूर से देखने पर यह दरवाज़ा आपको रक्षात्मक इमारत की तरह लगेगा जहां आप कल्पना कर सकते हैं कि सैनिक खड़े होकर अपने महल की रक्षा कर रहे हैं। दरवाज़ा ए रोज़ा चारों तरफ से आने वाली हवाओं को दिशा देने के लिए माक़ूल साबित होता है। इसलिए जब आप इस दरवाज़े से ग़ुज़रेंगे तो बंद इमारत कि बजाए यह आपको ग़लियारे-सा प्रतीत होगा। वैसे किसने सोचा था कि महज़ एक दरवाज़ा भी इतना आलीशान हो सकता है।

कहा जाता है कि हुज्रा में बनाए गए छोटे कमरे उस दौर में ग़रीब लोगों को अपना सामान बेचने के लिए दिए जाते थे। यह एक बहुत बड़े चौक जैसा है जहां आप बैठकर विश्राम भी कर सकते हैं।

जैसे ही आप इस आलिशान दरवाज़े के बीच खड़े होंगे तो आपको ताज की अद्भुत झलक मिलेगी।

इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताजमहल

सारी दुनिया को मोहब्बत की निशानी दी है

– शकील बदायूंनी

ताज की बनावट

जब भी हम कभी ऐतिहासिक इमारतों को देखते हैं तो मन में ये ख़्याल ज़रूर आता है कि आख़िर कोई ढ़ांचा इतने सालों तक मज़बूती के साथ कैसे टिका रह सकता है। अगर हम थोड़ा इतिहास के पन्नों को पलटें तो भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था इसलिए इसका एक जवाब यह भी हो सकता है कि पुराने समय में जब राजा महाराजा किसी भी चीज़ का निर्माण करवाते थे तो अव्वल दर्जे का कच्चा माल दुनिया भर से मंगवाया जाता था। अपने काम में माहिर क़ारीग़रों को भी देश विदेश से बुलवाया जाता था। अतः इस दरवाज़े के लिए रेड सैंड स्टोन का इस्तेमाल किया गया है जिसमें संगमरमर से आकर्षक रूप दिया गया है। क्योंकि द्वार के उपर का अर्धमंडलाकार या मेहराब ताजमहल के मेहराब की ही अनुकृति है तो जब आप दरवाज़े के बीच खड़े होकर ताज को देखेंगे तो एकाएक महसूस करेंगे कि दोनों इमारतें एक दूसरे में सटीक रूप से फिट हो सकती है। हैरानग़ी होती है, उस ज़माने में जहां कला तो अपने चरम पर थी ही साथ ही पैमाइशों में भी कोई कमी नहीं बरती गई। मेहराब को नज़दीक़ से देखने पर आप पाएंगे कि उसे सजाने के लिए उस पर सुलेख अलंकृत किए गए हैं जो बेहद ही ख़ूबसूरत दिखाई पड़ते हैं। अलग-अलग जगहों से मंगवाए गए क़ीमती पत्थरों को रचनात्मक ढ़ंग से चित्रों का आकार देकर जड़ा गया है, बता दें कि इस तरह की क़ारीग़री को पिएत्रा दूरा कहा जाता है। काले रंग के चमकदार पत्थरों से लिखी गई क़ुरान की आयतें, ज्यामितीय और फूल पत्तियों की बनी आकृति आपको मंत्रमुग्ध कर देंगी। एक बात यहां समझने वाली यह है कि इस्लाम धर्म में बहुत सी मान्यताएं हैं जिनका बड़ी ही निष्ठा से पालन किया जाता रहा है। मुग़लों द्वारा जिन भी इमारतों का निर्माण किया गया उन्हें कहीं न कहीं क़ुरान से भी जोड़ा गया है। जिसकी बदौलत ये सभी जगहें और भी ज़्यादा पाक़ और पवित्र हो जाती हैं। ये पूरी बनावट इस दरवाज़े की शोभा को जितना हो सके उतना ख़ूबसूरत बनाती है।

मुग़ल वास्तुकला का सबसे बेहतरीन उदाहरण

कहते हैं कि अगर क़लाकार को आज़ाद छोड़ दिया जाए तो ऐसा कौन सा जादू है जो वो कर नहीं सकता। दरवाज़ा ए रोज़ा से होकर जैसे ही आप भीतर की तरफ आते हैं तो आपको बेहद ख़ूबसूरत बाग़ नज़र आएगा। बेशक़ ताज सामने हो तो ध्यान कहीं और लगना तो मुमक़िन नहीं। लेकिन यक़ीन जानिए ये बाग़ आपके मन को प्रफुल्लित करने में कोई क़सर नहीं छोड़ेंगे।

यह संकल्पना ईरानी या पर्शियन बाग़ों से ली गई है जिसका अर्थ है स्वर्ग उद्यान। पेड़ पौधों और रंग बिरंगे फूलों से इस बाग़ीचे की सुंदरता को बढ़ाया गया है। ये ग़ज़ब का नज़ारा हमें अपनी बाहों में समेट अविश्वसनीय सा एहसास तोहफें के रूप में देता है। इस बाग़ में खड़े यदि आपकी तबीयत बाग़-बाग़ ना हो जाए तो ऐसा संभव नहीं है।

चारबाग़ के बीचों-बीच हमें संगमरमर के पत्थरों से बना तालाब नज़र आएगा जिसमें लगे फव्वारे बहुत ही शानदार लगते हैं। ज़रा ग़ौर कीजिए इस बात पर कि जब आप एक निश्चित जगह पर खड़े होकर पानी को देखेंगे तो उसमें ताज का प्रतिबिंब दिखाई देगा।

भले ही यह सिर्फ एक बार का अनुभव हो लेकिन मेरा विश्वास है कि तमाम ज़िंदग़ी में पछतावा करने की कोई ग़ुंजाइश बाक़ी ना रहेगी। साहिर लुधियानवी कहते हैं कि-

‘ले दे के अपने पास फ़क़त इक नज़र तो है

क्यूं देखें ज़िंदग़ी को किसी की नज़र से हम’

जब आप ताजमहल को अपनी नज़र से देखेंगे तो यक़ीन करेंगे कि असल ख़ूबसूरती क्या होती है। ज़ाहिर है जब मोहब्बत परवान चढ़ती है तो क्या कुछ नहीं किया जा सकता महबूब के लिए।

42 एकड़ में फैला यह पूरा परिसर जिसके मध्य में ऐतिहासिक मक़बरे का निर्माण किया गया। मक़बरे के बाइं ओर मेहमानख़ाना और दाइं ओर मस्जिद बनाई गई। दोनों इमारतें एक दूसरे की दर्पण छवि दिखाई पड़ती है। मानो दो सैनिक अपने प्रिय राजा की रक्षा के लिए हमेशा तैयार है। केवल मक़बरे की बात करें तो यह अद्भुत स्मारक 1632 ई. में निर्मित होनी शुरू हुई और बनते बनते इसे पूरे 11 वर्ष का समय लगा। 1983 में ताजमहल को यूनेस्को के द्वारा विश्व धरोहर का दर्जा दिया गया जो भारत के लिए बड़ी ही गर्व की बात है। भारत में ताजमहल को मुग़ल वास्तुकला का सबसे बेहतरीन उदाहरण माना गया है।

ताजमहल में आपको मुग़ल वास्तुकला के साथ-साथ इंडो-इस्लामिक परंपराएं भी देखने को मिलेंगी। जहां बाक़ी  मुग़ल वास्तुकलाओं को लाल बलुआ पत्थरों से बनाया गया है वहीं शाहजहां ने ताजमहल के लिए ख़ास संगमरमर के पत्थर का इस्तेमाल किया और उसमें क़ीमती पत्थरों को भी जड़ा गया। सम्पूर्ण ताजमहल में मक़बरा ध्यान का केन्द्र बना जो एक चौकोर चबूतरे पर खड़ी ख़ूबसूरत संरचना है। मुख्य कक्ष में सामने की ओर बनाए गए मक़बरे कृत्रिम हैं जो कि असली मक़बरों की हुबहू नक़ल है।

असल मक़बरों को देख पाना आम व्यक्ति के लिए नामुमकिन है। इस पूरी इमारत पर अलग-अलग तरीक़े की बारीक़ डिज़ाइन की गई है जिसमें ज्यामितीय, पुष्प संबंधी टाइलें, जालीनुमा डिज़ाइन और क़ुरान की आयतें यहां भी लिखी गई हैं। इन सभी ख़ूबसूरत कलाकृतियों की वजह से यह पूरी संरचना बेहद ही आकर्षक दिखाई देती है।

कैसी जादुई जगह है ना ताजमहल। भारत की संस्कृति और परंपराओं में मुग़लों के बड़े योगदान से हमारा देश और अधिक धनी हो जाता है। क्योंकि बात ताजमहल की हो रही है तो थोड़ा सा इसके इतिहास को समझना ज़रूरी है। जिसके कारण यहां घूमने में और अधिक मज़ा आता है।

ताजमहल के दोनों छोर पर बनी इमारतों के आकार भले ही एक से नज़र आते हैं लेकिन उनकी डिज़ाइन में महीन अंतर है जो आपको देखने से ही पता चल जाएगा। ताजमहल की ही तरह इनका इतिहास भी हम हमेशा पढ़ते रहेंगे। ख़ैर अब ताजमहल के इतिहास से ज़रा बाहर आते हैं और सीधा चलते हैं मीना बाज़ार की ओर। अब क्योंकि मीना बाज़ार भी क़ाफ़ी लोकप्रिय है तो ज़रा सा उसके इतिहास को भी छू लिया जाए।

ये समझने वाली बात है कि जब भी हम किसी ऐतिहासिक धरोहर पर घूमने निकलते हैं तो उसके इतिहास की बुनियादी समझ हमें होनी ही चाहिए जो उस जगह को और भी ज़्यादा दिलचस्प बना देती है। और यक़ीन मानिए ऐसी जगहों पर जाने के बाद हमारी कल्पनाओं के घोड़े भी तेज़ी से दौड़ने लगते है।

प्रसिद्ध मीना बाज़ार

बहरहाल, बात करते हैं प्रसिद्ध मीना बाज़ार की तो इसे क़ुह्स रूज़ यानी हर्षाल्लास का दिन भी कहा जाता था। यह बाज़ार विशेष रूप से महिलाओं के लिए सजाया जाता था और पुरूषों में केवल सम्राट और कुछ राजकुमार ही मौजूद हुआ करते थे। नौरोज़ यानी नए साल के उत्सव के दौरान बाज़ार केवल 5 से 8 दिन के लिए लगाया जाता था। सम्राट हुंमायूं ने इसे सबसे पहले संगठित किया लेकिन अक़बर और उनके उत्तराधिकारियों ने इसे और विस्तृत बना दिया। उत्सव के दौरान बाज़ार को आम जनता कि लिए बंद कर दिया जाता था जबकि हरम की महिलाएं, दरबार के कुलीनों की पत्नियां और बेटियां कपड़ा, हस्तशिल्प, आभूषण आदि के अपने स्वयं के स्टॉल लगाया करती थीं। और इन्हीं सामानों को ख़रीदने के लिए केवल सम्राट, राजकुमारों और कुछ रईस लोगों को ही अनुमति दी जाती थी। यह सारा माल उंचे दामों पर बेचा जाता था और कमाई हुई रक़म को बाद में दान में दे दिया जाता था।

आज यह बाज़ार चहल-पहल और लुत्फ़ उठाने वाली जगहों में से एक है। ताजमहल को बारीक़ी से देख लेने के बाद आप यहां आकर अपनी यात्रा को और मज़ेदार बना सकते हैं। ताजमहल परिसर के साथ में ही आप तरह-तरह का लज़ीज़ खाना, हाथ से बनी साज-सज्जा की चीज़ें ख़रीद सकते हैं। ताजमहल के मुख्य दरवाजे के बाहर साथ में पूरा पुराना शहर बसा हुआ है।  आपको ताज से निकलते ही शानदार और लज़ीज़ बिरयानी की बहुत सारी पुरानी और परम्परागत दुकानें दिखाई देंगी। आप थोड़ा सा रिसर्च करके ही बिरयानी का आनंद ले तो बेहतर रहेगा।  क्योंकि जितनी प्रसिद्ध जगह उतना नक्कालों से सावधान रहने की आवश्यकता पड़ती है।

one of seven wonders

हालांकि मैंने पहले भी ऐतिहासिक धरोहरें देखी हैं पर बचपन की यादों को क़ाग़ज़ पर उकेरना ज़रा मुश्किल सा लगता है। अपने हवासों को सही दिशा देने के बाद अगर किसी धरोहर से रूबरू होना हुआ है तो वो है ताजमहल। हो सकता है ताज को लेकर मेरे एहसासों को ज्यों का त्यों मेरी क़लम ना समेट पाए लेकिन यादें आज भी बख़ूबी साथ निभाती हैं। और क़लम बस लिखती चली जाती है।

ताजमहल का अनुभव तो ग़ज़ब का रहा, अगले कोरे क़ाग़ज़ का प्रतिनिधित्व किस सफ़र के हिस्से में लिखा जाता है, ये जानना क़ाफ़ी दिलचस्प होगा

Research: Sonia Naval

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