गोवर्धन जहां के कण-कण में श्री कृष्ण का वास है
बहुत दिनों के बाद आज मैं और मेरी टीम निकल पड़े हैं एक और आध्यात्मिक जगह जहां मन के सारे पाप धुल जाते हैं। जहां आप कर सकते हैं अहसास भगवान के अस्तित्व का। भगवान की लीलाओं का। जहां मिट्टी की सौंधी खुशबू आपका मन मोह लेगी। आपको अपना बनाने में कोई भी कसर नहीं छोड़ेगी। मैं बात कर रहा हूँ, भारत की प्राचीन और सबसे पुरानी एवं आध्यात्मिक जगहों में से एक, माखन चोर की लीलाओं का गढ़ गोवर्धन की। जिस गोवर्धन को श्री कृष्ण ने इन्द्र देवता को सबक सिखाने के लिए अपनी सबसे छोटी उंगली पर उठा लिया था।

इसी पवित्र भूमि पर है, भारत की सबसे पुरानी गौशालाओं में एक
भारत में गौसेवा की परंपरा गहरी और बहुत पुरानी है। इस परंपरा के केंद्र में ब्रज‑प्रदेश का गोवर्धन क्षेत्र आता है, जहाँ धार्मिक, सामाजिक और पशुपालन‑परंपराओं का एक अनूठा संगम मिला हुआ है। इस ब्लॉग में हम उन पहलुओं को शोध‑परक तरीके से देखेंगे, जो बताते हैं कि क्यों कहा जाता है कि गोवर्धन को “प्राचीनतम गौशाला” का आश्रय स्थल. आपको पूरे बृज क्षेत्र में सेंकडों गौशालाएं दिखाई देंगी लेकिन गोवर्धन में कुछ प्राचीन गौशालाएं भी हैं जो सदियों से आज भी अस्तित्त्व में हैं. (भारत की सबसे पुरानी गौशालाओं में एक)

भारत की सबसे पुरानी गौ-शाला
ब्रजभूमि की पवित्र धरती गोवर्धन में गौ‑सेवा केवल एक धार्मिक कृत्य नहीं, बल्कि समय के साथ विकसित हुई जीवन‑शैली का हिस्सा रही है। गोवर्धन पहुँच कर जब हमने इस प्राचीन गौशाला में प्रवेश किया तो वहां हमें बरसों से रख रखाव कर रहे गौ-सेवक से बात की, उन्होंने हमें बताया की यह गौशाला 150 साल से भी पुरानी गौशाला है। गोवर्धन का क्षेत्र धार्मिक तीर्थस्थल होने के कारण बड़ी संख्या में पर्यटक/भक्त आते हैं जिनके दान और भक्तिभाव से यह गौशाला चल रही है — यह गौ‑सेवा को एक सामाजिक‑सांस्कृतिक आयाम देता है। ।
इस गौ-शाला के सेवक दीवान जी ने क्या कहा?

दीवान जी ने हमें बताया की गाय की सेवा करना उसी समान है जैसे हम भगवान की सेवा कर रहे हैं। उनकी तीन पीढ़ियां इसी गौशाला में गाय सेवक के तौर पर सेवा कार्य करती रही हैं। क्योंकि गाय माता में भगवान का वास होता है। उन्होंने कहा कि गाय सेवा ही परम धर्म है। दीवान जी ने हमें बताया कि वह सुबह शाम सभी गायों को नहलाते हैं और उनकी खूब सेवा करते हैं। और शायद यह इसी सेवा का ही फल है कि आज तक उनके परिवार में किसी भी तरह की कोई समस्या नहीं आई। सुबह से गायों को नहला-धुलाकर वह उन सभी गायों को चराने के लिए भी ले जाते हैं। और शाम को फिर उसी गौशाला में ले आते हैं। यही उनकी दिन चर्या है।

क्यूं करनी चाहिए गाय की सेवा?
वैसे आपको बता दूं की गाय की सेवा भारतीय संस्कृति में अत्यंत पवित्र और पुण्य मानी गई है। गाय की सेवा करने से मन को शांति, संतोष और आध्यात्मिक ऊर्जा मिलती है। सुबह गाय को चारा देना, उससे बात करना, उसके साथ समय बिताना — यह एक हीलिंग थैरेपी की तरह काम करता है। साथ ही गाय से दूध, दही, घी, मक्खन आदि पोषण‑समृद्ध आहार मिलते हैं।

गाय की सेवा करने के लिए विज्ञान का क्या कहना है?
दरअसल, केवल धार्मिक दृष्टि से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी गौ-सेवा लाभकारी मानी जाती है। गाय के गोबर और मूत्र से बने उत्पाद पर्यावरण के लिए उपयोगी और की तरह के प्रदूषण से मुक्त होते हैं। गोबर से बनी खाद जमीन की उर्वरता को बढ़ाती है और जैविक खेती को प्रोत्साहन देती है। इसके अलावा, गाय की सेवा से मनुष्य के भीतर करुणा, विनम्रता और सकारात्मक ओज का विकास होता है। यह सेवा आत्मिक शांति और संतुलन का भी माध्यम बनती है। आज जब जीवन भागदौड़ और तनाव से भरा है, तब गाय की सेवा हमें प्रकृति और संस्कृति से जोड़ने का सरल मार्ग प्रदान करती है। इसलिए गाय की सेवा न केवल एक धार्मिक कर्तव्य है, बल्कि यह मानवता, स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण का एक तरह से प्रतीक भी है।

गौ-शाला कितनी पुरानी है, इसकी बनावट से पता चलता है
कई सालों पुरानी इस गौ-शाला का पता इसकी पुरानी दीवारों से पता चलता है। यह दीवारें कई सालों की कहानियां कहती हैं। जो इस गौशाला की दीवारों पर नजर आती हैं। इसमें हर गाय के लिए अपनी अलग जगह है। इन दीवारों में छिपे हैं भगवान श्री कृष्ण के स्वर और उनकी मुरली की धुन। जब आप इस गौशाला में प्रवेश करते हैं तो देखते इसका दरवाजा वैसे से ही बना हुआ है जैसे आप उसी काल में पहुंचे हों। जब श्री कृष्ण अपनी मुरली की धुन से इन गायों को चराने के लिए ले जाते हैं। जैसे ही हम गौशाला के अंदर पहुंचे तो हमने देखा की सबसे पहले दरवाजे के बिल्कुल सामने ही भगवान श्री कृष्ण का मंदिर है। जिसमें श्री कृष्ण के साथ राधा जी भी दिखाई देती हैं। आप जैसे ही इस गौशाला के अंदर जाते हैं आप एक अलग ही दुनिया में पहुंच जाते हैं। सच में आपको ऐसा महसूस होगा जैसे आप द्वापर युग में पहुंचे गए हों।

कैसे पहुंचे इस गौशाला तक?
गोवर्धन शहर में एंट्री करते ही जब आप गोवर्धन की परिक्रमा शुरू करते हैं तब बाएं तरफ से सबसे पहले आपको इसी गौशाला के दर्शन करने को मिलेंगे। रास्ते में ही एक बहुत बड़ा दरवाजा मिलेगा। जो ऐसा प्रतीत होगा जैसे किसी बड़े से महल को आप देख रहे हों। मुख्य सड़क पर ही आपको यह प्राचीन गौशाला दिखाई देगी।

गौशाला के अन्दर पहुँचते ही आपको सुकून तो अवश्य मिलेगा। इसमें कई सारी खोलियां आपको देखने के लिए मिलेंगी। जिनमें गाय बछड़ों को बांधा जाता है। वहीं उनके लिए चारा खिलाया जाता है। यदि आप यहां जाते हैं तो आपको गौमाता की सेवा करनी चाहिए। आप सेवा करेंगे तो आप खुद से यह एहसास करेंगे कि आप श्री कृष्ण की भक्ति कर रहे हों।
कई एकड़ में फैली यह गौशाला आज के समय में बहुत प्रसांगिक है क्योंकि जिस तरह आज हम देखते हैं, किस तरह गाय माता सड़कों पर बेसहारा होकर घूम रही हैं। इसलिए जो गाय की सेवा करते हैं, हमें उनकी मदद करनी चाहिए। ताकि इस तरह के अच्छे काम कभी रुकें न।









