Best Hindi Travel Blog -Five Colors of Travel

Gurudwara Sis Ganj Sahib | A Gateway to Sikh Heritage | Delhi

अगर आप लाल किला और चांदनी चौक घूमने जाएँ, तो लाल किले के बिलकुल सामने चांदनी चौक स्थित गुरुद्वारा शीशगंज साहिब जरूर जा सकते हैं। रुमाल से ढके हुए सिर और चेहरे पर सुकून को देखकर ही कोई यह बता सकता है कि यह व्यक्ति गुरुद्वारे से होकर आया है। गुरुद्वारा है ही ऐसी जगह। यहां आप ना सिर्फ भगवान की आराधना कर सकते हैं बल्कि पुण्य का काम भी कर सकते हैं। कुछ लोगों को गुरुद्वारा इसलिए जाना पसंद होता है क्योंकि वह अपने जीवन के सभी कष्टों को दूर करना चाहते हैं, तो कुछ सुकून की तलाश में गुरुद्वारा जाते हैं। कुछ ऐसे व्यक्ति भी हैं, जो धन से परिपूर्ण होने के बाद भी वहां जाकर समाज सेवा करना चाहते हैं। वहीं कुछ लोग बस एक पर्यटक के तौर पर गुरुद्वारा जाते हैं। गुरुद्वारे जाने के सबके कारण अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन गुरुद्वारे से बाहर निकलते वक्त सबके चेहरे पर चमक और सुकून जरूर देखने को मिलता है।

You Should also read: Best Tourist Places to Visit in Delhi

दिल्ली में कुल 9 प्रमुख गुरुद्वारे हैं और उन्हीं में से एक है चांदनी चौक स्थित शीश गंज साहिब गुरुद्वारा। तो आइए हम आपको बताते हैं इस विशेष ऐतिहासिक महत्व वाले गुरुद्वारे के बारे में :

इतिहास

इस गुरुद्वारे का इतिहास बहुत ही मार्मिक रहा है। यह गुरुद्वारा उस जगह पर स्थित है जहां मुगल बादशाह औरंगजेब ने सिक्खों के नौंवे गुरु, गुरु तेग बहादुर सिंह का गला काट दिया था। बताया जाता है कि, गुरु तेग बहादुर सिंह के शहादत के बाद उनके सिर को भाई जैता जी आनंदपुर साहिब ले गए और उनके धड़ (पवित्र शरीर) को लक्खी शाह वणजारा ने अपने घर ले जाकर वहां उनका अंतिम संस्कार किया। जिस स्थान पर गुरु तेग बहादुर सिंह जी का अंतिम संस्कार किया गया उस स्थान को आज रक़ीब गंज साहिब के नाम से जाना जाता है। इस गुरुद्वारे का निर्माण श्री बघेल सिंह द्वारा 1783 में करवाया गया था। निर्माण के कुछ वर्षों पश्चात इसे सोने से मंडवाया भी गया। गुरु तेग बहादुर सिंह के शहादत की याद में बनाया गया यह गुरुद्वारा आज भी सिक्खों के आस्था का केंद्र है

गुरुद्वारे के सामने रोड के दूसरे ओर सती दास जी, मती दास जी और दयाला जी के याद में स्मारक बनाए गए हैं। बताया जाता है कि यहां मती दास जी को आरे से काट दिया गया था। सती दास जी को रुई में लपेटकर जला दिया गया और दयाला जी को उबलते देग में डाल कर उबाल दिया गया था। गुरुद्वारा के सामने औरा स्मारक के बगल में हीं मती दास म्यूजियम भी है जहां उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं को गहराई से जाना जा सकता है।

इस गुरुद्वारे को सेना भी करती है सलाम

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि, गणतंत्र दिवस की परेड में भारतीय सेना के सिक्ख रेजीमेंट के जवान राष्ट्रपति को सलामी देने के बाद गुरुद्वारा शीश गंज साहिब पर भी सलामी देते हैं। इस गुरुद्वारे को मिलने वाला यह सम्मान इसे अन्य गुरुद्वारों से अलग बनाती है।

प्राचीन स्थापत्य कला की दिखती है यहां झलक

यह गुरुद्वारा हल्के केसरिया और सफेद रंग के पत्थरों से बना हुआ है। इसके गुंबदों को सोने से मंडवाया गया है। इस गुरुद्वारे में उस कुए को भी संरक्षित किया गया है जहां गुरु तेग बहादुर ने अंतिम बार स्नान किया था। भक्तगण यहां जाकर भी मत्था टेकते हैं।

गुरुद्वारा दो मंजिलों में बँटा हुआ है। जिसमें निचली मंजिल में जूता घर, सामान घर, पैर हाथ धोने के जगह, पीने के पानी की व्यवस्था और पार्किंग है। वहीं पहली मंजिल पर मुख्य गुरुद्वारा और लंगर घर है। गुरुद्वारे के दीवारों पर हर जगह पंजाबी भाषा में उपदेश खुदवाए गए हैं। गुरुद्वारे के मुख्य भवन में तख्त के सामने का स्थान लोगों के बैठने के लिए है। मुख्य भवन के सामने वाले भवन में लंगर गृह है। जहां एक साथ 100 से भी अधिक लोगों को बिठा कर खिलाया जा सकता है। यहां लोग अपनी स्वेच्छा से सेवा भी कर सकते हैं और बर्तनों को साफ करने में मदद भी कर सकते हैं।

लोग तख्त के सामने मत्था टेकने के बाद वहां से निकलकर प्रसाद लेने जाते हैं। जहां शुद्ध घी और आटे की बनी हलवा प्रसाद में दी जाती है। इस हलवे के स्वाद की बराबरी दुनिया का कोई भी व्यंजन नहीं कर सकता, क्योंकि यह हलवा एक व्यंजन नहीं बल्कि भगवान का प्रसाद है जिसे आस्था और प्रेम भाव से तैयार किया जाता है। हलवा खाने के बाद लोग लंगर गृह में लंगर खाने जाते हैं। जहां आपको थाली देने से पहले वह आपसे वाहेगुरु जी की जय बोलने को कहेंगे। जिसके बाद लंगर के लिए लगी पंक्तियों में बैठकर लंगर का प्रसाद ग्रहण कर सकते हैं।

गुरुद्वारे में हो रही गुरबाणी की मधुर ध्वनि, आपके मन में सकारात्मकता का संचार करती है। गुरुद्वारे में जाकर मन तो शांत होता हीं है, साथ ही साथ यहां जाने से जीवन में एक तहजीब और अनुशासन आता है।


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *