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Gurudwara Sis Ganj Sahib | A Gateway to Sikh Heritage | Delhi

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You Should also read: Best Tourist Places to Visit in Delhi दिल्ली में कुल 9 प्रमुख गुरुद्वारे हैं और उन्हीं में से एक है चांदनी चौक स्थित शीश गंज साहिब गुरुद्वारा। तो आइए हम आपको बताते हैं इस विशेष ऐतिहासिक महत्व वाले गुरुद्वारे के बारे में : गुरुद्वारे के सामने रोड के दूसरे ओर सती दास जी, मती दास जी और दयाला जी के याद में स्मारक बनाए गए हैं। बताया जाता है कि यहां मती दास जी को आरे से काट दिया गया था। सती दास जी को रुई में लपेटकर जला दिया गया और दयाला जी को उबलते देग में डाल कर उबाल दिया गया था। गुरुद्वारा के सामने औरा स्मारक के बगल में हीं मती दास म्यूजियम भी है जहां उनके जीवन के विभिन्न पहलुओं को गहराई से जाना जा सकता है। इस गुरुद्वारे को सेना भी करती है सलाम आपको यह जानकर हैरानी होगी कि, गणतंत्र दिवस की परेड में भारतीय सेना के सिक्ख रेजीमेंट के जवान राष्ट्रपति को सलामी देने के बाद गुरुद्वारा शीश गंज साहिब पर भी सलामी देते हैं। इस गुरुद्वारे को मिलने वाला यह सम्मान इसे अन्य गुरुद्वारों से अलग बनाती है। प्राचीन स्थापत्य कला की दिखती है यहां झलक यह गुरुद्वारा हल्के केसरिया और सफेद रंग के पत्थरों से बना हुआ है। इसके गुंबदों को सोने से मंडवाया गया है। इस गुरुद्वारे में उस कुए को भी संरक्षित किया गया है जहां गुरु तेग बहादुर ने अंतिम बार स्नान किया था। भक्तगण यहां जाकर भी मत्था टेकते हैं। गुरुद्वारा दो मंजिलों में बँटा हुआ है। जिसमें निचली मंजिल में जूता घर, सामान घर, पैर हाथ धोने के जगह, पीने के पानी की व्यवस्था और पार्किंग है। वहीं पहली मंजिल पर मुख्य गुरुद्वारा और लंगर घर है। गुरुद्वारे के दीवारों पर हर जगह पंजाबी भाषा में उपदेश खुदवाए गए हैं। गुरुद्वारे के मुख्य भवन में तख्त के सामने का स्थान लोगों के बैठने के लिए है। मुख्य भवन के सामने वाले भवन में लंगर गृह है। जहां एक साथ 100 से भी अधिक लोगों को बिठा कर खिलाया जा सकता है। यहां लोग अपनी स्वेच्छा से सेवा भी कर सकते हैं और बर्तनों को साफ करने में मदद भी कर सकते हैं। लोग तख्त के सामने मत्था टेकने के बाद वहां से निकलकर प्रसाद लेने जाते हैं। जहां शुद्ध घी और आटे की बनी हलवा प्रसाद में दी जाती है। इस हलवे के स्वाद की बराबरी दुनिया का कोई भी व्यंजन नहीं कर सकता, क्योंकि यह हलवा एक व्यंजन नहीं बल्कि भगवान का प्रसाद है जिसे आस्था और प्रेम भाव से तैयार किया जाता है। हलवा खाने के बाद लोग लंगर गृह में लंगर खाने जाते हैं। जहां आपको थाली देने से पहले वह आपसे वाहेगुरु जी की जय बोलने को कहेंगे। जिसके बाद लंगर के लिए लगी पंक्तियों में बैठकर लंगर का प्रसाद ग्रहण कर सकते हैं।

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Best Places to visit in Amritsar

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अमृतसर- आस्था और सुकून का शहर मुझे जब भी अपने व्यस्त शेड्यूल में या रोज़मर्रा की ज़िंदगी में थोड़े सुकून के पल चाहिए होते हैं तब अनायास ही यात्रा का ख्याल आता है। जब कभी ऐसा लगता है कि इस तनावपूर्ण और भागदौड़ भरी ज़िंदगी से थोड़ी निजात चाहिए तब मेरे पास अंतिम विकल्प यात्रा का ही बचता है। इस बार कार्यक्रम बना अमृतसर का। वो भी प्रसिद्ध त्यौहार बैसाखी के अगले दिन। कैसे पहुंचे अमृतसर बैसाखी के त्यौहार की शुरुआत भारत के पंजाब राज्य से ही हुई है और इसे रबी की फसल की कटाई शुरू होने की ख़ुशी के रूप में मनाया जाता है। बैसाखी के दिन गोल्डन टेम्पल को जगमगाती लाइटों से सजाया जाता है। देश भर से सिख श्रद्धालु इस दिन अमृतसर पहुँचते हैं। बैसाखी से अगले दिन जाने का फायदा ये हुआ कि भीड़ इतनी नहीं थी। वैसे अमृतसर घूमने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से मार्च ही रहता है। हम हिसार से अमृतसर ट्रैन से पहुंचे। स्टेशन से उतरते ही बाहर फ्री बस सेवा का भी इंतेज़ाम रहता है जो ‘सतनाम वाहेगुरु’ के जयकारें लगाते हुए सीधे गोल्डन टेम्पल ले जाती है। गुरूद्वारे पहुँचते-पहुँचते रात के 11 बज चुके थे। हमनें अंदर परिसर में ही स्थित गंगा निवास में वातानुकूलित रूम बुक करवाया था। भले ही अप्रैल के महीने में ठीक-ठाक गर्मी होती है पर अंदर परिसर में ठंडक थी। थोड़ा आराम करने के बाद जैसे ही हमनें हरमंदिर साहिब में कदम रखा एक हमें अलग ही वातावरण की अनुभूति हुई। और लगा जैसे यहाँ आना पूरी तरह सार्थक हो गया। मेन हाल में दर्शन के लिए लम्बी-लम्बी लाइनें लगी हुयी थी। सुबह तड़के पालकी के दर्शन किये। दर्शन के लिए भले ही भीड़ कितनी ही क्यों न हो पर थकान जरा-सी भी नहीं होती, बस यही खासियत है यहाँ की। परमात्मा एक है और वो सब जगह मौज़ूद है। एक औंकार, सतनाम करता पुरख निरभउ निरवैर…… गोल्डन टेम्पल में दिन रात शब्द कीर्तन और गुरुबाणी चलती रहती है जो दुनिया की भाग दौड़ से थके हारे मन को रूहानी सुकून देती है। अद्भुत और अलौकिक गुरुद्वारा स्वर्ण मंदिर में प्रवेश के लिए चार द्वार है जो इस बात के प्रतीक हैं की यहाँ के दरवाज़े हर धर्म के लोगो के लिए खुले हैं। रात में जगमगाती रौशनी में संगमरमर और सोने के आवरण से बना यह गुरुद्वारा अद्भुत और अलौकिक लगता है। अंदर परिसर में ही दुनिया की सबसे बड़ी रसोई में से एक गुरु के लंगर में रोज़ाना हज़ारों लोग प्रशाद रूप में भोजन ग्रहण करते है। इतनी बेहतरीन व्यवस्था, इतना स्वाद और इतना अपनापन। सच में अद्भुत। इसी कारण कहते हैं अमृतसर में कोई भूखा नहीं सोता। पवित्र जल के तालाब के बीचों-बीच गुरुद्वारा साहिब है व चारों तरफ बड़ा-सा प्रांगण है। जहाँ आपको सैंकड़ों श्रद्धालु सिमरन करते मिल जायेंगे। गुरूद्वारे में एक भव्य म्यूजियम भी है जहां सिख धर्म से जुडी ऐतिहासिक चीज़ें रखी गयी है। गुरुओं की देन- अमृतसर शहर वैसे तो अमृतसर को देश विदेश में सब जानते हैं लेकिन दरबार साहिब (गोल्डन टेम्पल ) इस शहर की लाइफ लाइन है। पूरा अमृतसर शहर गोल्डन टेम्पल के इर्द गिर्द ही बसा हुआ है। अमृतसर शहर गुरुओं की देन माना जाता है। चौथे गुरु रामदास जी ने पांच सौ बीघा जमीन लेकर यह शहर बसाया था। तभी इसका नाम पड़ा रामदासपुर। महाराज रंजीत सिंह ने हरमिंदर साहिब पर उन्नीसवीं शताब्दी में सोने का आवरण चढ़वाया था और तब से अमृतसर को स्वर्ण नगरी भी कहा जाने लगा। एक शहर के तौर पर देखें तो यह सिर्फ अपने गुरुद्वारों के लिए प्रसिद्ध नहीं है बल्कि कौमी एकता का एक बेहतरीन उदाहरण भी है – यहाँ जहां एक तरफ बेहद खूबसूरत दुर्गियाना मंदिर है वहीँ आज़ादी की लड़ाई की गवाह दिल्ली की जामा मस्जिद जैसी दिखती खैरउद्दीन मस्जिद भी है। जहाँ हज़ारों लोग इबादत के लिए आते हैं।(Golden Temple, Amritsar) वाघा बॉर्डर अमृतसर शहर से 30-32 किलोमीटर एकऔर डेस्टिनेशन है वाघा बॉर्डर। यहाँ पर रोज़ शाम को दोनों देशों के सिपाहियों द्वारा बहुत ही जोशीले ढंग से अपने-अपने राष्ट्रीय ध्वज को वापिस उतरा जाता है। इस दौरान देशभक्ति का ऐसा रंग चढ़ जाता है जिसकी कल्पना करना भी सम्भव नहीं। यहाँ की ये जोशीली परेड देखने के लिए आपको समय से पहले ही जाना पड़ता है वरना भीड़ इतनी हो जाती है कि वहां पर खड़े होने की भी जगह नसीब नहीं होती। जलियावालां बाग अमृतसर में ही भारत की आज़ादी के इतिहास का साक्षी प्रसिद्ध जलियावालां बाग भी है। आज जलियावालां बाग एक पर्यटक स्थल बन गया है और रोजाना हजारों सैलानी इसे देखने आते हैं। यहाँ की दीवार पर आज भी उन गोलियों के निशान मौज़ूद हैं जो जनरल डायर ने निहत्थी भीड़ पर चलवाई थी जिसमे हज़ारों लोग मारे गए थे। अमृतसर शहर के पुराने बाजार आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं जैसे किसी ज़माने में हुआ करते थे। आप शाम के समय पैदल ही बाजार की सैर पर निकल सकते हैं। भीड़-भाड़ वाले ये बाजार एक बार तो आपको चांदनी चौक की याद दिला देंगे। अगर आप खाने के शौकीन हैं तो अमृतसर आपके लिए किसी जन्नत से कम नहीं होगा। अमृतसर लस्सी, छोले भटूरे, राजमा चावल और पिन्नी का स्वाद पूरी दुनिया में मशहूर है। बात चाहे धार्मिक आस्था की हो, इतिहास की हो, संस्कृति की या फिर खानपान की, अमृतसर का कोई सानी नहीं।