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रानी नो हजीरो मकबरा परिसर में लगने वाला यह बाजार! क्यों है अहमदाबाद वालों के लिए बेहद खास जानिए?

रानी नो हजीरो क्या है खासियत?

रानी नो हजीरो

क्यों जाएं रानी नो हजीरो?

रानी नो हजीरो अहमदाबाद की आत्मा है। अगर आप गुजरात की असली पहचान देखना चाहते हैं, तो इस बाज़ार की गलियों में ज़रूर टहलें। यह जगह परंपरा, संस्कृति और मेहनत की मिसाल है। यहां हर दुकान किसी कलाकार की कला को ज़िंदा रखे हुए है। रंग-बिरंगे दुपट्टे, बंधेज साड़ियां, मिरर वर्क वाले कुर्ते, चांदी के पुराने डिजाइन के गहने और कच्छी एम्ब्रॉयडरी सब यहां मिलते हैं। यह बाज़ार महिलाओं के लिए तो स्वर्ग है। पुराने ज़माने से यह बाजार महिलाओं की पसंदीदा जगह रही है क्योंकि यहां पारंपरिक कपड़ों और गहनों का खज़ाना है। खास बात यह है कि आज भी यहां की बहुत-सी दुकानें महिलाओं द्वारा ही चलाई जाती हैं ये महिलाएं अहमदाबाद की असली शान हैं। हर ग्राहक के साथ उनकी बातचीत में अपनापन होता है, और हर चीज़ में मेहनत की झलक। रानी नो हजीरो की असली खूबसूरती इसकी सादगी में है। न यहां चमक-दमक वाले शो-रूम हैं, न शोरगुल वाला माहौल, लेकिन यहां की हर दुकान में असली गुजराती कल्चर का एहसास मिलता है। यह बाजार सिर्फ खरीदारी नहीं, बल्कि गुजरात की परंपरा को महसूस करने का एक भी तरीका है।

रानी नो हजीरो का इतिहास शाही मकबरों से फैशन हब तक!

रानी नो हजीरो

रानी नो हजीरो का नाम सुनते ही लोग पूछते हैं यह नाम इतना अनोखा क्यों है? असल में हजीरो शब्द गुजराती में मकबरा या समाधि के लिए इस्तेमाल होता है। यह जगह सुल्तान अहमद शाह की रानियों की कब्रों का परिसर है। 15वीं सदी में इस जगह को खास तौर पर रानियों के आराम और स्मृति के लिए बनाया गया था। यह मकबरा चौकोर आकार में है, जिसके चारों ओर सुंदर मेहराबें और बारीक पत्थर की जालियां हैं। समय के साथ इस परिसर के बाहर छोटी-छोटी दुकाने बनने लगीं, जहां पहले धार्मिक वस्तुएं और स्थानीय सामान बिकता था। धीरे-धीरे यह इलाका इतना रौनकदार बाजार बन गया कि अब यह पुराने अहमदाबाद की पहचान बन चुका है। इतिहासकारों का मानना है कि यहां का स्थापत्य मुगल और गुजराती शैलियों का सुंदर मिश्रण है। कब्रों के बीच बनी पत्थर की दीवारों पर नक्काशी, चारों तरफ़ छतरियां और गुंबद इस जगह को किसी मिनिएचर महल जैसा बनाते हैं। अब यह बाज़ार उस दौर का प्रतीक है, जहां इतिहास और आधुनिकता एक-दूसरे से हाथ मिला रहे हैं।

पुराने अहमदाबाद की गलियों के बीच रानी नो हजीरो की रौनक

रानी नो हजीरो

रानी नो हजीरो, पुराने अहमदाबाद के मणेक चौक के पास स्थित है, जो शहर का सबसे चहलकदमी वाला इलाका है। अगर आप कलूपुर रेलवे स्टेशन से आते हैं तो यह लगभग 3 किलोमीटर दूर है। यहां तक पहुंचने के लिए ऑटो या ई-रिक्शा सबसे आसान तरीका है। पास ही भद्रा किला और जामा मस्जिद जैसे ऐतिहासिक स्थान हैं, इसलिए आप इन्हें एक ही सफर में जोड़ सकते हैं। यह इलाका यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज सिटी का हिस्सा है, इसलिए यहां की गलियां थोड़ी संकरी हैं। गाड़ी लेकर अंदर जाना मुश्किल हो सकता है, इसलिए पास की पार्किंग या मणेक चौक में वाहन खड़ा कर पैदल चलना सबसे अच्छा है। सुबह 10 बजे से लेकर शाम 8 बजे तक यहां का बाजार खुला रहता है, लेकिन अगर आप असली रंग और भीड़ का मज़ा लेना चाहते हैं तो शाम का वक्त सबसे बढ़िया है। तब यहां दीपक जल उठते हैं, दुकानों में ग्राहकों की भीड़ होती है और वातावरण में हल्का संगीत और हंसी की आवाजें मिलती हैं।

आप यहां से क्या खरीदें सकते हैं?

रानी नो हजीरो

अगर आप रानी नो हजीरो जा रहे हैं, तो खाली हाथ लौटना मुश्किल है। यहां हर दुकान में कुछ ऐसा मिलेगा जो आपको रुककर देखने पर मजबूर कर देगा। यहां की सबसे प्रसिद्ध चीज़ है बंधन और बंधेज साड़ियां, जिनके रंग और डिजाइन गुजरात की पहचान हैं। इसके अलावा कच्छी एम्ब्रॉयडरी वाले बैग, चांदी के झुमके, पायल, मंगलसूत्र, और पुराने राजस्थानी डिज़ाइन के हार बेहद लोकप्रिय हैं। पुरुषों के लिए यहां पारंपरिक गुजराती पगड़ी और कुर्ते मिलते हैं, जबकि बच्चों के लिए रंगीन लोक-कपड़े। इन कपड़ों में इस्तेमाल किया गया मिरर वर्क और हाथ की सिलाई देखने लायक होती है। दुकानदार बहुत ही विनम्र होते हैं, और मोलभाव यहां की परंपरा का हिस्सा है। यहां की सबसे खास बात यह है कि ज़्यादातर चीज़ें लोकल कारीगरों द्वारा हाथ से बनाई जाती हैं। हर चीज़ में गुजरात की मिट्टी और मेहनत की झलक मिलती है। यही वजह है कि रानी नो हजीरो सिर्फ बाजार नहीं, बल्कि एक जीवित कला प्रदर्शनी है।

आसपास क्या है घूमने के लिए

रानी नो हजीरो

रानी नो हजीरो के पास अहमदाबाद की कई ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जगहें हैं जिन्हें आप साथ में घूम सकते हैं। मणेक चौक यह पुराना बाजार दिन में सोने-चांदी का व्यापार करता है और रात को फूड मार्केट बन जाता है। यहां का फाफड़ा-जलेबी, ढोकला और सैंडविच बहुत प्रसिद्ध है। सिदी सैयद की जाली अहमदाबाद की शान मानी जाने वाली यह जालीदार खिड़की पत्थर की बारीक नक्काशी का खास नमूना है। भद्रा किला और जामा मस्जिद मुगल स्थापत्य और इस्लामी कला का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। तीन दरवाजा पुरानी दीवारों और फोटोग्राफी के शौकीनों के लिए बेहतरीन जगह। साबरमती रिवरफ्रंट शाम के वक्त इसकी सैर अहमदाबाद की खूबसूरती को और बढ़ा देती है। रानी नो हजीरो के पास ये सारी जगहें इतनी करीब हैं कि आप एक दिन में इन्हें आराम से कवर कर सकते हैं।

परंपरा और कला की जिंदादिली  

रानी नो हजीरो,

रानी नो हजीरो में घूमना सिर्फ बाजार देखना नहीं, बल्कि एक ज़िंदा संस्कृति को महसूस करना है। यहां के लोगों की गर्मजोशी, दुकानदारों की हंसी, कपड़ों की खुशबू और हर तरफ़ बिखरे रंग आपको मोह लेते हैं। इस बाजार में एक पुरानी आत्मा बसती है ऐसी आत्मा जो समय के साथ बदलती नहीं, बस और समृद्ध होती जाती है। शाम के वक्त जब रोशनियां जलती हैं और लोग अपने सामान समेटते हैं, तब हवा में एक मीठा सुकून महसूस होता है। कई विदेशी सैलानी भी यहां आते हैं और कहते हैं कि रानी नो हजीरो उन्हें किसी पुराने युग में ले जाता है जहां समय धीमे चलता है, लेकिन दिल तेज़ धड़कता है। अहमदाबाद की यह जगह सिर्फ खरीदारी की मंज़िल नहीं, बल्कि एक एहसास है

कैसे पहुंचे रानी नो हजीरो, अहमदाबाद?

रानी नो हजीरो

रानी नो हजीरो, अहमदाबाद के पुराने शहर में मणेक चौक के पास स्थित है। यहां तक पहुंचना बहुत आसान है। अगर आप कलूपुर रेलवे स्टेशन से आ रहे हैं, तो यह सिर्फ 3 किलोमीटर दूर है और ऑटो या ई-रिक्शा से 10–15 मिनट में पहुंच सकते हैं। सरदार वल्लभभाई पटेल इंटरनेशनल एयरपोर्ट से दूरी करीब 9 किलोमीटर है, जहां से कैब या लोकल टैक्सी आसानी से मिल जाती है। अहमदाबाद के किसी भी हिस्से से लोकल बसें और मेट्रो स्टेशन से यहां पहुंचना आसान है। पुराना शहर संकरी गलियों वाला इलाका है, इसलिए मुख्य सड़क से आगे पैदल चलना बेहतर रहेगा। आसपास कई पार्किंग स्पॉट हैं, लेकिन भीड़ के समय जल्दी पहुंचना अच्छा रहता है।(यह बाजार सिर्फ खरीदारी नहीं, बल्कि गुजरात की परंपरा को महसूस करने का एक भी तरीका है।)

फाइव कलर्स ऑफ ट्रैवल की तरफ से 5 यात्रा सुझाव

रानी नो हजीरो

1. सुबह जल्दी या शाम के वक्त जाएं इस समय भीड़ कम होती है और बाजार की असली रंगीनियत निखरती है।

2. हेरिटेज वॉक से जुड़ें, इससे आप इतिहास, स्थापत्य और स्थानीय कहानियों को और गहराई से समझ पाएंगे।

3. लोकल फूड ज़रूर ट्राय करें मणेक चौक के ढोकला, फाफड़ा और खमण बिना चखे मत लौटिए।

4. नकद साथ रखें कई दुकानों में अभी भी UPI या कार्ड की सुविधा सीमित है।

5. खरीदारी में मोलभाव करें, पर मुस्कराते हुए। यहां सौदे नहीं, रिश्ते बनते हैं और यही अहमदाबाद की असली खूबसूरती है।

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Hello! I Pardeep Kumar

मुख्यतः मैं एक मीडिया शिक्षक हूँ, लेकिन हमेशा कुछ नया और रचनात्मक करने की फ़िराक में रहता हूं।

लम्बे सफर पर चलते-चलते बीच राह किसी ढ़ाबे पर कड़क चाय पीने की तलब हमेशा मुझे ज़िंदा बनाये रखती
है।

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