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रानी नो हजीरो मकबरा परिसर में लगने वाला यह बाजार! क्यों है अहमदाबाद वालों के लिए बेहद खास जानिए?

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रानी नो हजीरो क्या है खासियत? अहमदाबाद का नाम आते ही सबसे पहले दिमाग़ में आता है एक ऐसा शहर जो परंपरा और आधुनिकता के मेल से बना हो। यहां की गलियों में हर मोड़ पर इतिहास सांस लेता है, और इन्हीं में से एक सबसे खास जगह है रानी नो हजीरो। सच कहूं तो यह सिर्फ बाजार नहीं, बल्कि एक जीता-जागता म्यूज़ियम है, जहां संस्कृति, रंग, कपड़े और लोगों की मुस्कुराहट मिलकर एक अद्भुत दृश्य रचती हैं। इसे स्थानीय लोग रानी हजीरो मार्केट भी कहते हैं। जब आप पुराने अहमदाबाद की गलियों में कदम रखते हैं, तो हल्की धूप, मसालों की खुशबू, दुकानदारों की आवाज़ और कपड़ों के रंग मिलकर माहौल को खास बना देते हैं। दरअसल, रानी नो हजीरो अपने आप में इतिहास की निशानी है यहां के पत्थरों में बीते ज़माने की परछाई नज़र आती है। हर दुकान, हर गलियारा और हर झरोखा आपको बताता है कि यह शहर क्यों “World Heritage City” कहलाता है। बाजार में घूमते हुए महसूस होता है कि यह जगह सिर्फ खरीदारी के लिए नहीं, बल्कि आत्मा को छू लेने वाला अनुभव है। चाहे आप सैलानी हों, इतिहास प्रेमी या फैशन के शौकीन रानी नो हजीरो सबको अपने अंदाज़ से मोह लेता है। क्यों जाएं रानी नो हजीरो? रानी नो हजीरो अहमदाबाद की आत्मा है। अगर आप गुजरात की असली पहचान देखना चाहते हैं, तो इस बाज़ार की गलियों में ज़रूर टहलें। यह जगह परंपरा, संस्कृति और मेहनत की मिसाल है। यहां हर दुकान किसी कलाकार की कला को ज़िंदा रखे हुए है। रंग-बिरंगे दुपट्टे, बंधेज साड़ियां, मिरर वर्क वाले कुर्ते, चांदी के पुराने डिजाइन के गहने और कच्छी एम्ब्रॉयडरी सब यहां मिलते हैं। यह बाज़ार महिलाओं के लिए तो स्वर्ग है। पुराने ज़माने से यह बाजार महिलाओं की पसंदीदा जगह रही है क्योंकि यहां पारंपरिक कपड़ों और गहनों का खज़ाना है। खास बात यह है कि आज भी यहां की बहुत-सी दुकानें महिलाओं द्वारा ही चलाई जाती हैं ये महिलाएं अहमदाबाद की असली शान हैं। हर ग्राहक के साथ उनकी बातचीत में अपनापन होता है, और हर चीज़ में मेहनत की झलक। रानी नो हजीरो की असली खूबसूरती इसकी सादगी में है। न यहां चमक-दमक वाले शो-रूम हैं, न शोरगुल वाला माहौल, लेकिन यहां की हर दुकान में असली गुजराती कल्चर का एहसास मिलता है। यह बाजार सिर्फ खरीदारी नहीं, बल्कि गुजरात की परंपरा को महसूस करने का एक भी तरीका है। रानी नो हजीरो का इतिहास शाही मकबरों से फैशन हब तक! रानी नो हजीरो का नाम सुनते ही लोग पूछते हैं यह नाम इतना अनोखा क्यों है? असल में हजीरो शब्द गुजराती में मकबरा या समाधि के लिए इस्तेमाल होता है। यह जगह सुल्तान अहमद शाह की रानियों की कब्रों का परिसर है। 15वीं सदी में इस जगह को खास तौर पर रानियों के आराम और स्मृति के लिए बनाया गया था। यह मकबरा चौकोर आकार में है, जिसके चारों ओर सुंदर मेहराबें और बारीक पत्थर की जालियां हैं। समय के साथ इस परिसर के बाहर छोटी-छोटी दुकाने बनने लगीं, जहां पहले धार्मिक वस्तुएं और स्थानीय सामान बिकता था। धीरे-धीरे यह इलाका इतना रौनकदार बाजार बन गया कि अब यह पुराने अहमदाबाद की पहचान बन चुका है। इतिहासकारों का मानना है कि यहां का स्थापत्य मुगल और गुजराती शैलियों का सुंदर मिश्रण है। कब्रों के बीच बनी पत्थर की दीवारों पर नक्काशी, चारों तरफ़ छतरियां और गुंबद इस जगह को किसी मिनिएचर महल जैसा बनाते हैं। अब यह बाज़ार उस दौर का प्रतीक है, जहां इतिहास और आधुनिकता एक-दूसरे से हाथ मिला रहे हैं। पुराने अहमदाबाद की गलियों के बीच रानी नो हजीरो की रौनक रानी नो हजीरो, पुराने अहमदाबाद के मणेक चौक के पास स्थित है, जो शहर का सबसे चहलकदमी वाला इलाका है। अगर आप कलूपुर रेलवे स्टेशन से आते हैं तो यह लगभग 3 किलोमीटर दूर है। यहां तक पहुंचने के लिए ऑटो या ई-रिक्शा सबसे आसान तरीका है। पास ही भद्रा किला और जामा मस्जिद जैसे ऐतिहासिक स्थान हैं, इसलिए आप इन्हें एक ही सफर में जोड़ सकते हैं। यह इलाका यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज सिटी का हिस्सा है, इसलिए यहां की गलियां थोड़ी संकरी हैं। गाड़ी लेकर अंदर जाना मुश्किल हो सकता है, इसलिए पास की पार्किंग या मणेक चौक में वाहन खड़ा कर पैदल चलना सबसे अच्छा है। सुबह 10 बजे से लेकर शाम 8 बजे तक यहां का बाजार खुला रहता है, लेकिन अगर आप असली रंग और भीड़ का मज़ा लेना चाहते हैं तो शाम का वक्त सबसे बढ़िया है। तब यहां दीपक जल उठते हैं, दुकानों में ग्राहकों की भीड़ होती है और वातावरण में हल्का संगीत और हंसी की आवाजें मिलती हैं। आप यहां से क्या खरीदें सकते हैं? अगर आप रानी नो हजीरो जा रहे हैं, तो खाली हाथ लौटना मुश्किल है। यहां हर दुकान में कुछ ऐसा मिलेगा जो आपको रुककर देखने पर मजबूर कर देगा। यहां की सबसे प्रसिद्ध चीज़ है बंधन और बंधेज साड़ियां, जिनके रंग और डिजाइन गुजरात की पहचान हैं। इसके अलावा कच्छी एम्ब्रॉयडरी वाले बैग, चांदी के झुमके, पायल, मंगलसूत्र, और पुराने राजस्थानी डिज़ाइन के हार बेहद लोकप्रिय हैं। पुरुषों के लिए यहां पारंपरिक गुजराती पगड़ी और कुर्ते मिलते हैं, जबकि बच्चों के लिए रंगीन लोक-कपड़े। इन कपड़ों में इस्तेमाल किया गया मिरर वर्क और हाथ की सिलाई देखने लायक होती है। दुकानदार बहुत ही विनम्र होते हैं, और मोलभाव यहां की परंपरा का हिस्सा है। यहां की सबसे खास बात यह है कि ज़्यादातर चीज़ें लोकल कारीगरों द्वारा हाथ से बनाई जाती हैं। हर चीज़ में गुजरात की मिट्टी और मेहनत की झलक मिलती है। यही वजह है कि रानी नो हजीरो सिर्फ बाजार नहीं, बल्कि एक जीवित कला प्रदर्शनी है। आसपास क्या है घूमने के लिए रानी नो हजीरो के पास अहमदाबाद की कई ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जगहें हैं जिन्हें आप साथ में घूम सकते हैं। मणेक चौक यह पुराना बाजार दिन में सोने-चांदी का व्यापार करता है और रात को फूड मार्केट बन जाता है। यहां का फाफड़ा-जलेबी, ढोकला और सैंडविच बहुत प्रसिद्ध है। सिदी सैयद की जाली अहमदाबाद की शान मानी जाने वाली यह जालीदार खिड़की पत्थर की बारीक नक्काशी का खास नमूना है। भद्रा किला और जामा