भारत का हर एक इलाका अपनी एक विशेष पहचान रखता है। कहीं संगीत में परंपरा बोलती है, तो कहीं रंगों में संस्कृति का झलकना हमें गर्व महसूस कराता है। झारखंड की मिट्टी में बसी खोवर चित्रकला ऐसी ही एक अनोखी लोक कला है, जो गांवों की दीवारों पर जिंदगी और प्रेम की छुपाए हुए है। यह कला झारखंड की पहचान बन चुकी है और अब पर्यटकों को अपनी ओर खींच रही है। खोवर शब्द दरअसल “कोहबर” से बना है, जिसका मतलब होता है शादी के बाद नए जोड़े का कमरा। जब गांव में किसी की शादी होती है, तो घर की दीवारों पर और खासकर कोहबर कमरे में, औरतें अपने हाथों से ये चित्र बनाती हैं। इसमें चावल के घोल, कोयले, लाल मिट्टी और पत्थर से बने नेचुरल रंगों का इस्तेमाल होता है। कोई ब्रश नहीं बस उंगलियां और बांस की टहनियों के सहारे यह सब किया जाता है।

इन चित्रों में होता है प्रकृति, प्रेम और जीवन की झलक का रंगमंच। पेड़-पौधे, बेल-बूटे, मछलियां, सूरज, चांद, पक्षी, हाथी। सब कुछ इन डिजाइनों का हिस्सा होते हैं। हर आकृति का अपना एक अर्थ होता है। मछली अच्छाई का संकेत है, पेड़ जीवन का प्रतीक है, और सूरज नई शुरुआत का प्रतीक। जब ये सब एक साथ दीवारों पर उतरते हैं, तो पूरा घर जैसे संग्रहालय बन चुका हो ऐसा लगता है। हज़ारीबाग, चतरा, और कोडरमा जिले इस कला के लिए बेहद जाने-माने जाते हैं। आज कल देखा जाए तो यहां की महिलाएं पीढ़ी दर पीढ़ी खोवर चित्रकला को आगे बढ़ा रही हैं। शादी के अलावा अब यह कला त्यौहारों, फसल कटाई और पूजा के अवसरों पर भी बनाई जाती है। समय के साथ अब इसे दीवारों से निकालकर कपड़ों, पेपर और लकड़ी पर भी उतारा जाने लगा है। अब तो आप खोवर पेंटिंग्स को घर की सजावट या गिफ्ट के रूप में भी देख सकते हैं।(कोई ब्रश नहीं बस उंगलियां और बांस की टहनियों के सहारे यह सब किया जाता है।)

खोवर चित्रकला की सबसे खास बात यह है कि यह नारी सृजन की निशानी है। महिलाएं इसे सिर्फ सजावट के लिए नहीं, बल्कि अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए बनाती हैं। शादी के समय जब दुल्हन अपने घर की दीवारों पर खोवर बनाती है, तो उसमें उसका स्नेह, उम्मीद और जीवन का सपना झलकता है। एक तरह से यह कहा जा सकता है कि ये चित्र सिर्फ रंग नहीं, बल्कि औरतों के मन की भाषा हैं। आज के दौर में जब मशीनों का राज है, तब भी खोवर चित्रकला अपने हाथों की कला से लोगों का दिल जीत रही है। अब सरकार और समाज इस पारंपरिक कला को बचाने में जुटे हैं। कई कलाकारों ने इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान दिलाई है। ऐसा सुना जा रहा है कि झारखंड पर्यटन विभाग भी हज़ारीबाग और उसके आस-पास के इलाकों में खोवर आर्ट टूर शुरू करने की तैयारी में है, ताकि लोग इस कला को करीब से देख सकें।

अगर आप झारखंड की यात्रा पर हैं, तो एक बार हज़ारीबाग ज़रूर जाएं। वहां की मिट्टी की दीवारों पर बनी खोवर कला को देखकर ऐसा लगेगा जैसे हर दीवार कुछ कहना चाहती है। इन गांवों की हवा में रंग और परंपरा घुली होती है। जब आप उन चित्रों को देखेंगे, तो महसूस करेंगे कि कला सिर्फ शहरों की गैलरी में नहीं, बल्कि गांव की मिट्टी में भी सांस लेती है।
