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Chausath Yogini Temple: यह वही मंदिर है जिसकी थीम पर बना भारत का संसद भवन!

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Chausath Yogini Temple Chausath Yogini Temple: जिसके हूबहू शैली में बनी है भारतीय संसद। अब आपका सवाल वाजिब है कि कैसे? तो आइए मैं बताता हूं कैसे? आज हम अपनी इस विशेष यात्रा में आपको ले चलते हैं, एक बेहद खास जगह। जो इतिहास का ऐसा उदाहरण है। जिसकी छवि आप भारत की पुरानी संसद भवन में देख सकते हैं। जी हां ग्वालियर शहर से मात्र 40 किलोमीटर की दूरी पर मौजूद है एक ऐसी रहस्यमय जगह जिसको देखकर आप भी दंग रह जाएंगे। बिल्कुल हमारी तरह। क्योंकि हमने जब इस मंदिर की सैकड़ों सीढ़ियां चढ़ीं और इसके दर्शन किए तो हमारी वही प्रतिक्रिया थी, जो एक असमान्य चीज देख लेने से किसी की भी होती है। यहां की खूबसूरती यह इलाके आधुनिक चीजों से थोड़े पीछे हैं, पर यह जगह भारत की वास्तविक आत्मा को समझने के लिए सबसे बढ़िया हैं। यहां आप शुद्ध हवा का लुत्फ उठा सकते हैं और पक्षियों की आवाजें सुन सकते हैं। साथ ही सूर्य उदय और अस्त देख पाना सौभाग्य का पल होगा। यह समय यहां बिताना किसी सपने से कम से नहीं है, आपके पास समय हो तो एक बार यहां के गांव में घूमें और लोकल लोगों से बात करें। आपको नए नए अनुभव देखने और सुनने को मिल सकते हैं। यहां के लोग बहुत प्यारे हैं। उनका बोलना और बात करना बहुत अच्छा है। बहुत ही सम्मान के साथ आपसे बात करते हैं और आपसे भी वह यही उम्मीद करते हैं। (जिसके हूबहू शैली में बनी है भारतीय संसद। ) कैसे बना यह चौंसठ योगनियों का मंदिर? लगभग 100 फीट की ऊंचाई पर बना यह मंदिर गूढ़ रहस्यों का स्थान तो है ही और कमाल की बात यह है कि बहुत ही पवित्र भी। क्योंकि अभी तक यह मंदिर भीड़ भाड़ से बचा हुआ है। इस खास जगह को कच्छप राजा देवपाल द्वारा लगभग 1383 में बनाया गया था। कुछ किंवदंतियों का मानना है की इस मंदिर को 9 वीं शताब्दी में भौम वंश की रानी हीरा देवी ने की थी। जो अभी तक उसी अंदाज में इतिहास की कहानियों को बयां करते हुए खड़ा है। यहां जाने के बाद जब हमने यहां के लोकल लोगों से पूछा तो एक और बात पता चली कि यह मंदिर तंत्र मंत्र विद्या के लिए जाना जाता है। हालांकि आज के समय में यह चौसठ योगनियों के मंदिर वैसे ही बने हैं। जैसे इनका निर्माण हुआ था। चौसठ योगनियों का मंदिर इसका नाम इसलिए पड़ा क्योंकि इस मंदिर में चौसठ कमरे हैं जो आप आज भी वैसे ही देख सकते हैं।  जैसे निर्माण के वक्त थे। चौसठ कमरे चौसठ योगनियों को समर्पित हैं जो भगवान शिव की आराधना करती थीं। या तप करती थीं। इन चौसठ कमरों के बिलकुल बीच में बना है भगवान शिव का मंदिर। जिसमें लगभग 2 फीट ऊंची शिवलिंग विराजमान है। एक और प्राचीन शिवलिंग बीचों बीच इस मंदिर के चबूतरे पर रखी हुई है। जिसको देखने पर ऐसा लगता है जैसे यह शिवलिंग मंदिर से भी ज्यादा प्राचीन है। सैकड़ों साल से कई भूकंप और आंधियां आईं पर इस चौसठ योगनियों के पवित्र मंदिर की नींव हिला न सकीं। यही खासियत है इतिहास के इस बेजोड़ नमूने की। कहां है और कैसे पहुंचे? यह मंदिर मध्यप्रदेश के मुरैना जिले में आता है और मुरैना से लगभग 34 किलोमीटर दूर मितावली गांव में स्थित यह मंदिर इतिहास प्रेमियों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। आपको ग्वालियर या मुरैना से यहां पहुंचने में ज्यादा समय नहीं मात्र 1 घंटा लग सकता है। जैसा कि इतनी ही दूरी ग्वालियर की है तो बिल्कुल इतना ही समय यहां से भी आपको देना पड़ सकता है। ट्रेन के जरिए ग्वालियर एक ऐसा जंक्शन है जहां से देश के किसी भी कोने में आप कहीं भी आ जा सकते हैं। इसके अलावा आप मुरैना से भी यहां पहुंच सकते हैं। मुरैना में भी रेलवे स्टेशन मौजूद है। पर बात आती है मुरैना या ग्वालियर से यहां तक कैसे पहुंचे? तो आप यहां से टैक्सी या ऑटो बुक कर सकते हैं। बस से कैसे पहुंचे? बस से आप मुरैना और ग्वालियर होते हुए यहां पहुंच सकते हैं। मुरैना और ग्वालियर तक आपको कहीं से भी बस मिल जाएगी। लेकिन यहां से आपको टैक्सी या ऑटो ही बुक करना पड़ सकता है। यदि आप अपने ही वाहन से हैं तब तो बात अलग ही है। आप आराम से यहां पहुंच सकते हैं। रास्ता बढ़िया है, गाड़ी सरपट दौड़ती है। आस पास के आकर्षण जब भी आप यहां जाने का प्लान बना रहे हैं तो यहां के कुछ अदभुत स्थान आपकी ट्रैवल लिस्ट में जरूर शामिल होने चाहिए जिनमें- बटेश्वर धाम वास्तव में जब भी आप ग्वालियर, मुरैना या मितावली के चौसठ योगनियों के मंदिर जाने का सोच रहें हैं, तो बटेश्वर धाम जाना बिल्कुल न भूलें। क्योंकि यह एक ऐसा स्थान है जहां आप जाते ही अपने आपको प्राचीन युग में पाएंगे। 100 मंदिरों का यह गढ़ आज भी अपनी जीवंतता बनाए हुए है। यहां के हर पत्थर में आपको कुछ न कुछ गढ़ा हुआ मिलेगा। इन सैकड़ों मंदिरों में आप देख पाएंगे दिव्य शिवलिंग। इन सैकड़ों छोटे बड़े मंदिरों की अद्भुत कहानी है जो अगली पेशकश में आप पढ़ पाएंगे। शनि मंदिर जब आप ग्वालियर से मितावली या गढ़मुक्तेश्वर जाते हैं तो रस्ते में ही आपको मिलेगा, प्राचीन और दिव्य शनि मंदिर। माना जाता है कि यह मंदिर उल्का पिंड के पत्थर से निर्मित है। इसपर कई मतभेद हैं। जो आप यहां आकर ही सुलझा सकते हैं। गड़ी पढ़ावली यात्रा के दौरान जब आप गढ़मुक्तेशर से मितावली जाते हैं तो रस्ते में ही आप पाएंगे। गड़ी पढ़ावली जहां पर एक प्राचीन किले का दीदार आप कर पाएंगे। जो बेहद खास जगह है इतिहास प्रेमियों के लिए। यहां आकर आप यहां की सुंदरता और ग्रामीण जीवन को समझ पाएंगे। और इतिहास के इन पन्नो को पलटकर इनमें छिपे रहस्य जान पाएंगे। रुकने और खाने पीने का इंतजाम मितावली, गड़ी पढ़ावली या बटेश्वर ये छोटे छोटे गांव व कस्बे हैं। यहां आपको ज्यादा सुविधाएं मुहैया नहीं हो पाएंगी। इसलिए आप एक दो दिन के सफर पर निकले हैं तो ग्वालियर और मुरैना में आप

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“मांडू” प्रेम, इतिहास और पहाड़ों की गोद में बसा मध्यप्रदेश का अनौखा शहर! क्यों है आपके लिए खास?

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मांडू शहर के पत्थरों में बसी मोहब्बत की सांसें मांडू शहर मध्यप्रदेश के दिल में बसा एक ऐसा शहर है जो इतिहास, कला और प्रेम की कहानी कहता है। इस शहर का हर पत्थर किसी किस्से से जुड़ा है। इसे वैसे तो मांडवगढ़ भी कहा जाता है और यह मालवा पठार पर स्थित है। चारों ओर हरियाली, घाटियां और पुराने किलों के अवशेष इस जगह को रहस्यमय और खूबसूरत बनाते हैं। यहां का वातावरण शांत है, हवा में पुरानी सभ्यता की खुशबू घुली है। सर्दियों में जब कोहरा इन प्राचीन महलों को ढक लेता है, तो मांडू किसी चित्र में सजे स्वप्न जैसा लगता है। यह जगह न सिर्फ इतिहास प्रेमियों के लिए खास है बल्कि उन लोगों के लिए भी जो प्रकृति के बीच सुकून तलाशते हैं। मांडू में घूमते हुए ऐसा लगता है जैसे समय थम गया हो। यहां की हर दीवार, हर दरवाज़ा, हर झरोखा बीते जमाने की यादों से भरा है। यह शहर भारत के उन कुछ स्थानों में से है जहां रोमांस और इतिहास एक साथ सांस लेते हैं। इंदौर से मांडू तक हर मोड़ पर एक कहानी मांडू पहुंचने के लिए सबसे आसान रास्ता इंदौर से होकर जाता है। यह शहर इंदौर से करीब सौ किलोमीटर की दूरी पर है और सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है। आप टैक्सी, निजी वाहन या सरकारी बस से आराम से यहां पहुंच सकते हैं। अगर आप ट्रेन से यात्रा करना चाहते हैं, तो निकटतम रेलवे स्टेशन इंदौर और धर हैं। हवाई मार्ग से आने वाले यात्रियों के लिए इंदौर का देवी अहिल्या एयरपोर्ट सबसे नजदीक है। इंदौर से मांडू तक का सफर बेहद खूबसूरत है। रास्ते में हरियाली, पहाड़ और घुमावदार सड़कें आपको एक अलग ही अनुभव देती हैं। सर्दियों में जब हल्की धुंध रास्ते को ढक लेती है, तब यात्रा किसी फिल्मी सीन जैसी लगती है। रास्ते में छोटे-छोटे गांव, चाय की टपरियां और लोकल लोगों की मुस्कान इस सफर को यादगार बना देती हैं। मांडू पहुंचते ही पहला एहसास होता है जैसे किसी दूसरे युग में कदम रख दिया हो।(यह शहर भारत के उन कुछ स्थानों में से है जहां रोमांस और इतिहास एक साथ सांस लेते हैं।) मांडू बुलाता है जहां इतिहास गाता है प्रेमगीत मांडू जाने का असली कारण इसका वातावरण और इसकी कहानी है। यह शहर आपको सिर्फ देखने का नहीं, महसूस करने का मौका देता है। यहां की हवा में प्रेम की मिठास है और इतिहास की गहराई भी। रानी रूपमती और बाज बहादुर की प्रेमकथा ने इस जगह को अमर बना दिया है। यह वही मांडू है जहां राजा बाज बहादुर ने अपनी रानी रूपमती के लिए गाने और कविताएं लिखीं, और रानी ने पहाड़ियों पर बैठकर नर्मदा नदी को निहारा। कहा जाता है, जब मुगलों ने मांडू पर हमला किया, तो रूपमती ने आत्मसमर्पण की बजाय मृत्यु को चुना। इस कहानी की गूंज आज भी रूपमती मंडप की हवा में सुनाई देती है। मांडू आने वाले यात्रियों को यहां की शांति, पहाड़ियों का सौंदर्य और इतिहास का रोमांच एक साथ मिलता है। यहां के जहाज महल से जब झील में सूरज की किरणें प्रतिबिंबित होती हैं, तो ऐसा लगता है जैसे समय खुद ठहर गया हो। मांडू में हर मौसम खास है, लेकिन सर्दियां इसे और भी मनमोहक बना देती हैं। मांडू का सुनहरा इतिहास जैसे समय ठहर गया हो मांडू का इतिहास हजारों साल पुराना है। माना जाता है कि इसकी नींव छठी शताब्दी में पड़ी थी। पहले यह परमार वंश के अधीन था, फिर दिल्ली सल्तनत और मुगलों ने इस पर शासन किया। लेकिन मांडू का सबसे यादगार काल वह था जब यहां बाज बहादुर और रानी रूपमती का शासन था। यह समय कला, संगीत और प्रेम का स्वर्ण युग माना जाता है। उस दौर में मांडू में कई सुंदर इमारतें बनीं जहाज महल, हिंडोला महल, रानी रूपमती मंडप और जामी मस्जिद जैसी रचनाएं आज भी वास्तुकला का अद्भुत उदाहरण हैं। जहाज महल दो झीलों के बीच बना है और सचमुच एक तैरते जहाज जैसा दिखता है। वहीं रूपमती मंडप से नर्मदा नदी का दृश्य इतना सुंदर है कि शब्द कम पड़ जाएं। मांडू का हर पत्थर उस दौर की कला और प्रेम का प्रमाण है। यहां घूमते हुए आप सिर्फ इतिहास नहीं देखते, उसे जीते हैं। स्वाद जो याद रह जाए, मांडू की थाली से मोहब्बत तक मांडू की यात्रा अधूरी है अगर आपने यहां का लोकल खाना नहीं चखा। यहां का मालवी फ्लेवर हर व्यंजन में झलकता है। सर्दियों में गरमागरम भुट्टे का कीस, दाल-बाफला और देसी घी से बनी रबड़ी-जलेबी का स्वाद भूलना मुश्किल है। मांडू के छोटे ढाबों और लोकल होटलों में देसी तड़के की खुशबू हर यात्री को खींच लाती है। शाम के वक्त जब आप रूपमती मंडप के पास बैठकर गुड़ की चाय पीते हैं, तो हवा में ठंडक और इतिहास का जादू एक साथ महसूस होता है। यहां के लोग मेहमानों के साथ दिल खोलकर पेश आते हैं। कुछ ढाबों में लोकल संगीत भी चलता है जो अनुभव को और खास बना देता है। खाने के साथ-साथ यहां की मिठाइयां भी प्रसिद्ध हैं। खासकर मांडू का मालपुआ और रबड़ी, जो स्थानीय त्यौहारों में जरूर बनती हैं। हर निवाले में मालवा की मिट्टी की खुशबू महसूस होती है। फाइव कलर्स ऑफ़ ट्रेवल की और से जरुरी यात्रा सुझाव सुबह जल्दी निकलें- रूपमती मंडप से सूर्योदय देखने का अनुभव शानदार होता है।सर्दियों में जाएं- अक्टूबर से मार्च तक मांडू का मौसम सबसे सुहाना रहता है।लोकल गाइड लें- गाइड आपको मांडू की अनसुनी प्रेमकथाएँ और ऐतिहासिक रहस्य बताएगा। लोकल खाना ज़रूर चखें- भुट्टे का कीस, दाल-बाफला और मालवा की मिठाई यह सब यात्रा को खास बना देंगे। शाम को रुकें- झील किनारे बैठकर सूर्यास्त देखें, वहीं मांडू का असली जादू महसूस होगा। वो एहसास जो एक बार नहीं, बार-बार बुलाए मांडू की सैर के लिए सर्दी का मौसम सबसे अच्छा है। अक्टूबर से मार्च तक का समय यहां घूमने के लिए आदर्श माना जाता है। इस दौरान मौसम ठंडा और आसमान साफ़ रहता है। तापमान करीब दस से बीस डिग्री के बीच रहता है, जो यात्रा को आरामदायक बनाता है। सुबह की हल्की धुंध में जब महलों की आकृतियां उभरती हैं, तो