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‎अमृतसर: डेस्टिनेशन ही नहीं, दिल को छू लेने वाला एक शहर

कुछ शहर देखने के लिए होते हैं तो कुछ जीने के लिए और उन्हीं शहरों में से एक है अमृतसर, जो अपने भीतर इतिहास की झलक, संस्कृति की मिठास, श्रद्धा और पावनता समेटे खड़ा है। पंजाब की पावन धरती पर बसा यह शहर बना है आस्था, संघर्ष और अपनेपन की ऐतिहासिक समरूपता की भवना से। जब आप पहली बार अमृतसर की सड़कों पर कदम रखेंगे तो जैसे वहाँ की हवा भी कहती है- “स्वागत है, यहाँ आप अकेले नहीं हैं।” क्योंकि यहाँ आपको व्यक्तिगत तौर पर ही नहीं बल्कि एक नागरिक होने की भावना के लिहाज से भी अनूठा महसूस होगा।

‎अमृतसर शहर का दिल, या यह कहें कि इसकी आत्मा.. तो वह है श्री हरिमंदिर साहिब, जिसे दुनिया ‘स्वर्ण मंदिर’ के नाम से जानती है। दिन की पहली किरण जब मंदिर के सोने से ढके गुंबदों पर पड़ती है, तो लगता है जैसे आसमान खुद इस पूरे शहर को आशीर्वाद दे रहा हो। मंदिर को चारों ओर से घेरे शांत जल का सरोवर- ‘अमृत सरोवर’ न केवल शहर के नाम का प्रतीक है, बल्कि एक ऐसी जगह है जहाँ बैठकर इंसान खुद से बातें कर सकता है।

‎अमृतसर

यहाँ कोई बड़ा या छोटा नहीं, सब एक समान हैं। सिर पर रुमाल बाँधे लोग नंगे पाँव चलकर यहाँ आते हैं और लंगर में बैठकर एक साथ भोजन करते हैं। वहाँ न जात देखी जाती है, न धर्म, वहाँ होती है तो केवल सेवा। हर रोज़ हज़ारों लोगों का भोजन बनाना, परोसना और साफ-सफाई करना, यह सब जिस समर्पण से किया जाता है, वही तो इस स्थान की खासियत है।

अमृतसर

अमृतसर केवल श्रद्धा और गुरुद्वारों का शहर नहीं, बलिदान और संघर्ष की भी भूमि है। स्वर्ण मंदिर से कुछ कदम की दूरी पर है जलियांवाला बाग, जिसकी दीवारें आज भी चीख-चीखकर उस दिन की गवाही देती हैं जब 1919 में निहत्थे, मासूम भारतीयों पर अंग्रेज़ों ने गोलियाँ बरसाईं। वह कुआँ, जिसमें लोग जान बचाने के लिए कूदे थे, आज भी वहाँ है। हर बार जब कोई पर्यटक वहाँ खड़ा होता है, तो एक गहरी चुप्पी उसे घेर लेती है। वो समझ पाता है कि आज़ादी सिर्फ एक शब्द नहीं, बल्कि एक जंग थी जिसे हमने अपने खून से जीता है। जो हमें न जाने कितनी कुर्बानियों के बाद मिली है।

अमृतसर का एक पहलू है, देशभक्ति से लबरेज़ वाघा बॉर्डर। शाम के वक्त जब भारत और पाकिस्तान के सैनिक आमने-सामने खड़े होते हैं और कदमों की गूंज, तिरंगे की ऊँचाई, और देशभक्ति के नारे गूंजते हैं, तो वहाँ मौजूद हर शख्स की रगों में जोश भर जाता है। यह एक सैन्य परंपरा होने के साथ एक भावनात्मक प्रदर्शन है जहाँ हर नागरिक एक सैनिक की तरह खड़ा होता है, जिसके हाथ में झंडा होता है और दिल में गर्व। जब आप अमृतसर जाएं, तो ऐसे मंज़र को भी महसूस कर सकते हैं।

अमृतसर

कहते हैं, दिल का रास्ता पेट से होकर गुज़रता है। अमृतसर अपने खान-पान के मामले में किसी जन्नत से कम है। यहाँ के अमृतसरी कुलचे, छोले, पराठें, स्वादिष्ट लस्सी और देसी घी की मिठाइयाँ- सब कुछ ऐसा है कि स्वाद ज़ुबान पर नहीं, सीधे दिल में उतरता है। पुराने शहर की गलियों में जब सुबह-सुबह तवे पर कुलचा सेंका जाता है, और पास ही ढाबे वाला आवाज़ लगाता है- “ओ जी, गरम-गरम कुल्चा लाओ!”, तो लगता है जैसे आप सिर्फ खाना नहीं खा रहे बल्कि इस शहर का एक हिस्सा बन गए हैं।

अमृतसर

‎यहाँ के बाज़ार, चाहे वो हॉल गेट हो, कटरा जामांदारा हो या गुरु बाज़ार; पंजाबी जूतियों, फुलकारी दुपट्टों और रंग-बिरंगे पटियालों से हमेशा सजे रहते हैं। हर दुकान से उठती पंजाबी गानों की बीट्स, दुकानदारों की हँसी और ग्राहकों की चहल-पहल मिलकर एक ऐसा माहौल बनाते हैं जो किसी त्योहार से कम नहीं लगता।

अमृतसर

अमृतसर की सबसे खास बात है, उसकी गर्मजोशी और अपनापन। यहाँ के लोग बिना जाने-पहचाने भी मुस्कुराकर बात करते हैं, रास्ता बताते हैं, और लस्सी का एक एक्स्ट्रा गिलास आपके सामने रख देते हैं। ये शहर आपको अपनी गोद में बिठाता है, और जब आप लौटने लगते हैं, तो आपके दिल में कुछ न कुछ छोड़ देता है। शायद एक याद, एक रंग, एक आवाज़, एक स्वाद- हाँ शायद लस्सी का!

सबसे अच्छा समय : अक्टूबर से मार्च के बीच मौसम सुहावना रहता है, यह समय अमृतसर की यात्रा के लिए अच्छा है।
‎स्थान : अमृतसर, पंजाब (भारत-पाक सीमा से लगभग 28 किलोमीटर दूर)

ट्रेन, हवाईजहाज, या बस, तीनों विकल्प सुविधाजनक हैं।
‎ठहरने के लिए जगहें : यहाँ हर बजट के अनुसार होटल मौजूद हैं। लेकिन स्वर्ण मंदिर के पास ठहरना, इस अनुभव को और खास बना देता है।

अमृतसर

‎अमृतसर का बखान अगर एक वाक्य में करना हो, तो कहा जा सकता है कि- यह वो शहर है जहाँ आस्था, इतिहास, संस्कृति और आत्मीयता एक साथ देखने को मिलते हैं। और मिलता है अपनेपन का वो एहसास जो हमेशा याद रहे

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