दिल्ली-मुंबई एयरपोर्ट विवाद: कुछ समय पहले ऐसा मामला सामने आया है जिसमें Airports Economic Regulatory Authority of India यानी AERA और एयरपोर्ट संचालकों के बीच विवाद अब Telecom Disputes Settlement and Appellate Tribunal, TDSAT तथा Supreme Court of India तक पहुंच गया है और सरकार ने फैसला किया है कि वह यात्रियों के पक्ष में खड़ी होगी। यह विवाद करीब ₹50,000 करोड़ के दावे से जुड़ा है। अगर यह दावेदारी स्वीकार हो गई, तो यात्रियों को बड़े उछाल वाले यूजर चार्जेज User Development Fee UDF, लैंडिंग व पार्किंग शुल्क आदि भुगतने पड़ सकते हैं, जो कि फ्लाइट टिकट और यात्रा की कुल लागत को कई गुना बढ़ा देंगे।

विवाद की जड़: HRAB यानी काल्पनिक एसेट वैल्यू और पुरानी टैरिफ गणना
मामला 2006 में जब भारत के दो सबसे व्यस्त हवाई अड्डों Indira Gandhi International Airport जो कि दिल्ली में है और Chhatrapati Shivaji Maharaj International Airport मुंबई का निजीकरण हुआ था, उसके समय से शुरू हुआ। उस समय इन एयरपोर्ट के असली एसेट्स जैसे रनवे, टर्मिनल, पार्किंग, लाउंज, दुकानों आदि का डेटा पर्याप्त या विश्वसनीय नहीं था। इसलिए AERA ने एक अस्थायी प्रणाली अपनाई जिसे कहा गया था Hypothetical Regulatory Asset Base HRAB। इसका उद्देश्य था कि एसेट्स की काल्पनिक वैल्यू तय करके आधार बनाया जाए ताकि टैरिफ यूज़र फीस, पार्किंग, लैंडिंग आदि निर्धारित की जा सके।

लेकिन FY 2009–2014 के दौरान जब टैरिफ तय किए गए, तब AERA ने केवल एरोनॉटिकल एसेट्स unway, terminal, आदि को शामिल किया। वहीं ऑपरेटरों का मानना था कि नॉन-एरोनॉटिकल एसेट्स जैसे कि duty free दुकानें, पार्किंग, लाउंज, अन्य सुविधाएं भी मूल्यांकन में शामिल होने चाहिए थे। AERA ने इन दावों को पहले नहीं माना। ताजा रिन्यूड हिसाब के बाद TDSAT ने यह तय किया है कि पुरानी गणना गलत थी और ऑपरेटरों ने जो एसेट वैल्यू वसूलनी थी। वह करीब ₹50,000 करोड़ से अधिक है। अगर फैसला ऑपरेटरों के पक्ष में हुआ तो टैक्सियर फीस में 22 गुना तक की वृद्धि!(एसेट्स की काल्पनिक वैल्यू तय करके आधार बनाया जाए ताकि टैरिफ यूज़र फीस, पार्किंग, लैंडिंग आदि निर्धारित की जा सके।)

इस पुनर्मूल्यांकन के चलते एयरपोर्ट ऑपरेटरों ने दावा किया है कि उन्होंने 2009–2014 के दौरान पर्याप्त टैरिफ नहीं लिया। अब उन्हें वह राशि वसूलने का हक मिलना चाहिए। लेकिन इस वसूली का बोझ सीधे यात्रियों पर ही पड़ेगा। यूज़र डेवलपमेंट फीस UDF लैंडिंग-फीस, पार्किंग चार्ज, अन्य शुल्क सभी में भारी बढ़ोतरी संभव है। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक UDF में 22 गुना तक की वृद्धि हो सकती है।

उदाहरण के लिए एयरपोर्ट अड्डे पर घरेलू यात्रियों का UDF ₹129 से बढ़कर ₹1,261, और अंतरराष्ट्रीय यात्रियों के लिए ₹650 से ₹6,356 हो सकता है। वहीं मुंबई हवाई अड्डे की बात करें तो घरेलू यात्रियों का UDF ₹175 से ₹3,856 और अंतरराष्ट्रीय के लिए ₹615 से ₹13,495 तक पहुंच सकता है। टिकट की कीमतों में यह बढ़ोतरी सीधे दिखेगी यानी आम यात्रियों के लिए फ्लाइट लेना महंगा हो जाएगा, और हवाई यात्रा धड़ल्ले से करने वालों को अतिरिक्त खर्च झेलना पड़ेगा।

सरकार ने क्यों लिया पक्ष और अब सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई?
यह पूरा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट में 3 दिसंबर 2025 से सुनवाई के लिए तय हुआ है। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि केंद्र सरकार ने तय किया है कि वह यात्रियों के पक्ष में खड़ी होगी। यानी सरकार समझती है कि इस तरह बड़े हवाई शुल्क वृद्धि का बोझ आम आदमी पर नहीं डाला जाना चाहिए। सरकार का यह कदम इसलिए भी ट्रेंडिंग है, क्योंकि कई लोग पहले से ही चिंतित थे कि यूज़र चार्ज, पार्किंग, लैंडिंग फीस जैसे अतिरिक्त शुल्कों में अचानक इतनी भारी वृद्धि यात्रियों की जेब पर असर डालेगी और हवाई यात्रा आम आदमी के लिए महंगी हो जाएगी। सरकार का समर्थन इस विवाद में यात्रियों के हितगार हो सकता है।

क्या होगा यात्रियों के लिए आगे क्या मायने रखता है?
अगर सुप्रीम कोर्ट या नियामक प्राधिकरण फैसला ऑपरेटरों के पक्ष में हुआ तो हवाई यात्रा महंगी हो सकती है, टिकट के साथ-साथ एयरपोर्ट की सेवाओं के लिए अतिरिक्त भुगतान करना पड़ेगा। इससे यात्रियों की संख्या पर असर पड़ेगा, खासकर उन लोगों के लिए जिनकी यात्रा घरेलू या बजट टिकटों पर निर्भर होती है। दूसरी ओर, अगर सरकार के समर्थन और यात्रियों के हित को देखते हुए न्यायालय यात्रियों के पक्ष में फैसला करता है तो यह विवाद लंबे समय तक कानूनी जटिलताओं में उलझ सकता है और नॉन एरोनॉटिकल एसेट्स के मूल्यांकन और टैरिफ गणना का मॉडल पुनर्निर्धारित हो सकता है।

यह मामला सिर्फ आर्थिक विवाद नहीं है बल्कि आम यात्री की जेब, हवाई यात्रा की सस्ती पहुंच और वायु सेवा उपभोग की सुविधा से जुड़ा हुआ है। ऐसे में सरकार का यात्रियों के पक्ष में खड़ा होना और न्यायपालिका का संतुलित फैसला इस मामले की दिशा तय करेगा और एक बार फिर तय होगा कि उड़ान आम आदमी के लिए बनी रहेगी या महंगी लागत का सफर बन जाएगा।
