आधुनिकता की चकाचौंध और बढ़ती तकनीक के युग में हम सब एक ऐसी धुरी पर खड़े हैं जहाँ हम सबके बीच होते हुए भी अकेले हैं पर यहाँ अगर हमारा कोई साथी है जो हमेशा हमारे साथ है तो वो है प्रकृति। ऐसी ही एक धरोहर है- अमृत उद्यान ।
दिल्ली के शाही आंचल में, जहां सत्ता और शान का प्रतीक राष्ट्रपति भवन खड़ा है, वहां एक ऐसी हरी-भरी कहानी मौजूद है, जो पत्तों की सरसराहट और फूलों की महक के साथ सदियों से बह रही है। कभी यह जगह मुगल गार्डन के नाम से जानी जाती थी, मानो किसी पुरानी याद की तरह। अब, यह अमृत उद्यान है – एक नया नाम, नई पहचान, लेकिन वही दिलकश जादू। जब मैं यहाँ पहुंची तो इस बाग की मिट्टी में दबी कहानियों को कुरेदते हुए हमने देखा कि कैसे एक शाही विरासत ने देश के गौरव और इतिहास में अपना योगदान दिया।

फूल खिले हैं लिखा हुआ है तोड़ो मत
और मचल कर जी कहता है छोड़ो मत
~अमीक़ हनफ़ी
कैसे बना अमृत उद्यान? लुटियंस का सपना..
बात है पिछली सदी के शुरुआती दशकों की, जब दिल्ली नई सल्तनत की राजधानी बन रही थी। ब्रिटिश हुकूमत ने वायसराय के लिए एक ऐसा आवास बनाने का सपना देखा, जो भव्यता और शक्ति का प्रतीक हो। और इस भव्यता को पूर्णता देने के लिए कल्पना की गई एक ऐसे बाग की, जो आंखों को सुकून दे और मन को शांति। इस जिम्मेदारी का भार पड़ा सर एडविन लुटियंस के कंधों पर, उस वास्तुकार पर जिसने दिल्ली के नक़्शे को भी अपनी रचनात्मकता से सजाया।

लुटियंस, एक चतुर कलाकार की तरह, दो अलग-अलग दुनियाओं को मिलाने का सपना देख रहे थे। उन्हें पश्चिमी बागवानी की सुव्यवस्थित सुंदरता पसंद थी, लेकिन उनका दिल मुगल बागों की आत्मा में बसता था। वह चारबाग शैली, जहां हरियाली एक सुन्दर कविता लिखती हो, जहां पानी कलकल संगीत सुनाता हो, और जहां हर कोना एक कहानी कहता हो। उन्होंने फ़ारसी और भारतीय डिज़ाइनों का समावेशी प्रयोग किया जिसके फलस्वरूप इतना सुन्दर उद्यान आज हमारे सामने मौजूद है।

1928 में, जब वायसराय हाउस बनकर तैयार हुआ, तो इसके दिल में धड़कने लगा यह खूबसूरत बाग। दूर-दूर से मिट्टी लाई गई, अनगिनत पौधे और फूल चुने गए। कहा जाता है कि लुटियंस खुद हर पौधे और हर पत्थर की जगह तय करते थे, जैसे कोई चित्रकार अपनी उत्कृष्ट कृति को अंतिम रूप दे रहा हो। यहां गुलाबों की ऐसी किस्में लगाई गईं, जो शायद ही कहीं और मिलती थीं। नाजुक रंग और मादक खुशबू लिए हुए। मौसमी फूलों की क्यारी हर ऋतु में अपना रंग बदलती थी, मानो प्रकृति हर कुछ महीनों में एक नया कैनवास सजाती हो।
एक से भले दो! और वो भी जब आम जनता हो
इस बाग को सींचने और संवारने में अनगिनत बागवानों ने अपनी जिंदगी लगा दी। जो मिट्टी की भाषा समझते थे, पौधों की ज़रूरतों को जानते थे। उनकी मेहनत और लगन का ही नतीजा था कि यह उद्यान जल्द ही अपनी अद्भुत सुंदरता के लिए जाना जाने लगा।
1947 में, जब भारत आज़ाद हुआ, तो वायसराय हाउस बन गया राष्ट्रपति भवन, और यह शाही बाग बन गया आम लोगों का अपना ऊद्यान। वसंत ऋतु में, जब फूल अपनी पूरी रंगत में होते थे, तो इस उद्यान के दरवाजे सबके लिए खोल दिए जाते थे। हज़ारों लोग दूर-दूर से इसकी सुंदरता देखने आते थे। यह सिर्फ एक दर्शनीय स्थल नहीं था, यह आज़ाद भारत की नई पहचान का हिस्सा बन गया था। एक ऐसी जगह जहां हर कोई प्रकृति की शांति और खुशी महसूस कर सकता था।


यह बाग कई ऐतिहासिक पलों का गवाह बना। देश के बड़े-बड़े नेताओं और विदेशी मेहमानों ने इसकी सुंदरता की प्रशंसा की। यह भारतीय संस्कृति और प्राकृतिक वैभव का प्रतीक बन गया था।
मुग़ल गार्डेन से अमृत उद्यान तक
पहले इसे मुग़ल गार्डेन के नाम से जाना जाता था और फिर आया वह पल, जब इस बाग ने एक नया नाम अपनाया- अमृत उद्यान। 29 जनवरी, 2023 को, भारत की स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में मनाए जा रहे ‘आज़ादी का अमृत महोत्सव’ की भावना को आगे बढ़ाते हुए, इस प्रतिष्ठित उद्यान को एक नया नाम मिला। ‘अमृत’ – जिसका अर्थ है अमरता, दिव्यता और जीवन का सार। यह नाम का बदलाव सिर्फ एक परिवर्तन नहीं था। यह भारत की जड़ों की ओर लौटने, अपनी सांस्कृतिक विरासत को सम्मान देने और भविष्य के लिए एक नई उम्मीद जगाने का प्रतीक था।


अमृत उद्यान आज भी उतना ही खूबसूरत और जीवंत है, बल्कि शायद और भी ज़्यादा। यहां फूलों की नई किस्में जोड़ी गई हैं, बागवानी की आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है, और आगंतुकों के अनुभव को और बेहतर बनाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। हर्बल गार्डन में आपको आयुर्वेद के खजाने मिलेंगे, तो बोनसाई गार्डन में प्रकृति की कला का अद्भुत नमूना देखने को मिलेगा। यह उद्यान अब सिर्फ आंखों को सुकून देने वाली जगह नहीं है, बल्कि यह जैव विविधता का संरक्षण और पर्यावरण के प्रति जागरूकता का केंद्र भी बन गया है।
संरक्षण के लिए प्रयास आवश्यक
इस सुंदरता को बनाए रखने के लिए हर दिन अथक प्रयास किए जाते हैं। कुशल बागवान अपनी कला और विज्ञान के ज्ञान से इस उद्यान को हरा-भरा रखते हैं। पानी की हर बूंद का महत्व समझा जाता है, और टिकाऊ बागवानी तकनीकों का उपयोग किया जाता है। यह सिर्फ एक बाग नहीं, यह प्रकृति के साथ एक सतत संवाद है। और मुझे भी यहाँ जाकर इसी संवाद का अनुभव हुआ।


अमृत उद्यान हर किसी के लिए खुला है। यहां आने वाले हर व्यक्ति को एक अलग तरह की शांति और खुशी मिलती है। फूलों के रंग और खुशबू मन को तरोताजा कर देते हैं, और प्रकृति के बीच कुछ पल बिताकर सच में दिल को सुकून मिलता है। यह एक ऐसी जगह है जो लोगों को भी जोड़ती है क्योंकि यहाँ प्रकृति का साथ और इसकी सुंदरता एक अपनेपन का एहसास करवाती है। प्रकृति के प्रति गहरा प्रेम, सुंदरता के प्रति अटूट श्रद्धा और शांति की शाश्वत खोज, यही है इस बाग़ का मूल।

अमृत उद्यान, राष्ट्रपति भवन के हृदय में स्पन्दन हुआ, भारत की विरासत और भविष्य का एक जीवंत प्रतीक है। यह एक ऐसी जगह है जो हर आगंतुक को प्रेरित करती है, प्रकृति की अद्भुत शक्ति की याद दिलाती है, और हमें यह बताती है कि जीवन का असली ‘अमृत’ प्रकृति की गोद में ही छिपा है।
मेरा सफरनामा- नंदनी वार्ष्णेय

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