जब भी कभी भारतीय परिधानों की बात आती है तो साड़ियों का जिक्र सबसे पहले होता है। …और हो भी क्यों ना! साड़ी भारतीय महिलाओं के द्वारा पहने जाने वाला सबसे प्रमुख परिधान जो है। महिलाओं के बीच साड़ियां इतनी प्रसिद्ध हैं कि इनके भी कई वैराइटीज देखने को मिलते हैं। भारत विविधताओं का देश है इसलिए भारत के अलग-अलग भागों में अलग-अलग तरह की साड़ियों को पहनने और अलग-अलग तरह से साड़ियों को बांधने का चलन रहा है। जहां बंगाल में मोटे लाल बॉर्डर वाले सफेद साड़ियों का चलन है, वहीं महाराष्ट्र में हरे और चटख रंगों वाले सिल्क की साड़ियों को पहनने का चलन है। साड़ियों की जो वैरायटी सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है वह है सिल्क! …..और सिल्क साड़ियों की भी अपनी ही अलग-अलग वैराइटीज होती हैं। सिल्क की साड़ियां समृद्धि और एलिगेंस की प्रतीक मानी जाती हैं। कई बॉलीवुड अभिनेत्रियाँ भी सिल्क की साड़ियां पहनना पसंद करती हैं। लेकिन जब भी सिल्क साड़ियों को खरीदने की बात आती है तो हमारे जहन में सबसे पहले आता है कि कौन सा सिल्क लिया जाए? किस टाइप के सिल्क की साड़ी सबसे बेहतरीन होती है?
आज के फाइव कलर्स ऑफ ट्रेवल के इस ब्लॉग में हम आपको बताने वाले हैं सिल्क की साड़ियों के अलग-अलग वैराइटीज (Types of silk sarees) के बारे में और उनकी खासियतों के बारे में।
अगर मूल रूप से सिल्क की बात की जाए तो भारत में चार प्रकार के सिल्क के रेशे बनाए जाते हैं- शहतूत रेशम, ओक तसर सिल्क, एरी सिल्क और मुगा रेशम।
अगर सिल्क की साड़ियों के बारे में बात की जाए तो सिल्क साड़ियों की कुछ प्रसिद्ध वैरायटी निम्नांकित हैं-
बनारसी सिल्क साड़ियां :
बनारसी सिल्क साड़ी भारत में सिल्क की सबसे प्रसिद्ध साड़ी मानी जाती है। बनारसी सिल्क साड़ी को बेहतरीन गुणवत्ता वाले सिल्क के धागों से तैयार किया जाता है। अगर बात करें बनारसी सिल्क साड़ियों के डिजाइन की तो इनमें अधिकतर फ्लोरल पेटर्न की डिजाइनिंग देखी जाती है। बनारसी सिल्क साड़ियां चटक रंग से लेकर धूसर रंग तक हर रंग में उपलब्ध होते हैं। ये खास अवसरों पर पहनी जाने वाली साड़ियां हैं और भारत की सांस्कृतिक विरासत का एक बेहतरीन नमूना पेश करती हैं।

कांजीवरम सिल्क साड़ियां :
तमिलनाडु के एक छोटे से शहर कांचीपुरम में कांजीवरम साड़ी के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई थी। यहीं वजह है कि इसे कांचीपुरम सिल्क साड़ी भी कहा जाता है।कांजीवरम सिल्क को प्योर मूलबेरी सिल्क के धागों से बनाया जाता है। इतना हीं नहीं कांजीवरम सिल्क की साड़ियों में सोने और चांदी के जरी के काम किए जाते हैं। जिसके कारण यह साड़ियां और महंगी हो जाती हैं। इन साड़ियों को अधिकांशतः शादी विवाह जैसे बड़े आयोजनों में पहना जाता है। कांचीपुरम सिल्क की साड़ियों की बुनावट भी कुछ खास होती है। इन साड़ियों में बॉर्डर, साड़ी तथा पल्लू तीनों भागों को अलग-अलग धागों से बुना जाता है। जिसके कारण ये साड़ियां और भी खास हो जाती हैं।

अगर आप कांजीवरम सिल्क की साड़ियां खरीद रहे हैं तो उन्हें खरीदते वक्त आप यह स्योर करें कि आप असली कांजीवरम हीं खरीद रहे हैं। क्योंकि आजकल कांजीवरम साड़ियों के नाम पर धोखाधड़ी के भी मामले देखे जाते हैं। कांचीपुरम साड़ियों को पहचानने का सबसे आसान तरीका है कि असली कांजीवरम साड़ी के प्लेट्स को एक दूसरे से घिसने पर किसी भी प्रकार की आवाज नहीं आती है।
चंदेरी सिल्क साड़ियां :

चंदेरी सिल्क साड़ियों का निर्माण विंध्याचल के चंदेरी कस्बे से शुरू हुआ था। यह साड़ियां दिखने में शाईनी और वजन में बहुत हीं हल्की होती हैं। चंदेरी सिल्क साड़ियों की एक और खासियत यह है कि यह बाकी के सिल्क साड़ियों के तरह मोटे नहीं होते हैं। इनका फैब्रिक पारदर्शी होता है। यहीं वजह है कि चंदेरी सिल्क साड़ियां वजन में काफी लाइटवेट होती हैं। अगर रंगों के मिलावट की बात की जाए तो इसमें कंट्रास्ट कलर का इस्तेमाल देखने को मिलता है। हालांकि बदलते दौर के साथ अब पेस्टल कलर्स में भी चंदेरी सिल्क साड़ियां उपलब्ध होने लगी हैं। ये साड़ियां छूने में काफी मुलायम होती हैं। मुलायम होने की खासियत से ही इनके असली या फिर नकली होने का पहचान किया जा सकता है।
अगर बात करें लागत की तो चंदेरी सिल्क की साड़ियां आपको ₹5000 की रेंज से मिलने शुरू हो जाएंगी। चंदेरी साड़ियों में गोल्ड सिल्वर या फिर कॉपर के धागों के वर्क भी देखने को मिल जाते हैं।
बलूचरी सिल्क साड़ी :

बलूचरी सिल्क साड़ियां अपने आंचल के वर्क के लिए जानी जाती हैं। बलूचरी साड़ियों के आंचल में खास तरह का वर्क किया गया होता है बलूचरी साड़ी के आंचल पर पौराणिक कथाओं के दृश्यों को उभारा जाता है। चटख लाल कलर की साड़ियों पर जब गोल्डन कलर के वर्क से पौराणिक कथाओं के दृश्यों को उभारा जाता है तो इस कलाकारी को देखकर ऐसा लगता है कि जैसे ये अभी बोल पड़ेंगी। इसमें अधिकतर रामायण तथा महाभारत के दृश्यों का चित्रण किया जाता है। हालांकि मुगल काल में ऐसी साड़ियों में नवाबों के दिनचर्या को दिखाया जाता था और बेलबूटेदार डिजाइंस किए जाते। शुरुआती दौर में ये साड़ियां जमींदार घरानों की महिलाओं की पसंदीदा साड़ी हुआ करती थी। ब्रिटिश शासन काल में ब्रिटिश अफसर की बीवियां भी इस कारीगरी को पसंद किया करती थीं। आज के समय में ऐसी साड़ियां शादी विवाह जैसे बड़े आयोजनों के अवसर पर पहनी जाती हैं।

बलूचरी साड़ी की एक खास वैरायटी होती है जिसमें सोने के धागों से साड़ी पर बुनावट की जाती है। ये साड़ियां स्वर्णचेरी साड़ियां कहलाती हैं। अधिकतर बलूचरी साड़ियां चटक रंगों में पसंद की जाती हैं। इनका निर्माण बंगाल के मुर्शिदाबाद में किया जाता है।
पैठणी सिल्क साड़ियां :

पैठणी सिल्क साड़ियां मराठी संस्कृति की पहचान हैं। अक्सर महाराष्ट्र में शुभ अवसरों पर त्योहार और शादी विवाह के मौके पर महिलाएं पैठाणी सिल्क साड़ियों को पहनती हैं। पैठनी साड़ी का निर्माण महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले के पैठणी नमक शहर से शुरू हुआ था। यही वजह है कि इन साड़ियों को पैठनी साड़ी का नाम दे दिया गया। यह साड़ियां, लाल, हरे, नीले, गुलाबी और पीले रंगों में अवेलेबल होती हैं। इनकी बुनाई की तकनीक बहुत ही जटिल होती है। इन साड़ियों में एक भी धागा खुला नहीं छोड़ा जाता है। साफ सुथरी बुनावट वाली इन साड़ियों की कीमत लगभग ₹10000 रुपए के आसपास होती है।

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