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भारत के 7 Textile Towns जहाँ हर धागा सुनाता है अपनी विरासत की कहानी

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अगर आपको लगता है कि Travel सिर्फ Mountains, Beaches या Forts तक ही सीमित है, तो ज़रा अपना नज़रिया बदलिए। भारत के कई ऐसे Textile Towns हैं जहाँ की गलियों में सिर्फ कपड़े नहीं, बल्कि सदियों पुरानी तहज़ीब, हुनर और विरासत भी बुनी जाती है। कहीं Silk Looms की आवाज़ सुनाई देती है, कहीं Handloom Weavers अपने हाथों से जादू रचते हैं, तो कहीं Block Printing और Embroidery पूरी दुनिया में अपनी पहचान बना चुके हैं। अगर आप Local Culture को करीब से महसूस करना चाहते हैं, Shopping के साथ कुछ नया सीखना चाहते हैं और Authentic India को एक्सप्लोर करना चाहते हैं, तो ये 7 Textile Towns आपकी Bucket List में ज़रूर होने चाहिए। 1. वाराणसी, उत्तर प्रदेश जहाँ Banarasi Silk की चमक पूरी दुनिया में मशहूर है वाराणसी सिर्फ घाटों और मंदिरों के लिए नहीं जाना जाता, बल्कि यह भारत का सबसे प्रतिष्ठित Textile Town भी माना जाता है। यहां बनने वाली Banarasi Silk Sarees अपनी बारीक कारीगरी, Gold और Silver Zari Work और Royal Look के लिए दुनिया भर में पसंद की जाती हैं। कई परिवार पीढ़ियों से इस हुनर को ज़िंदा रखे हुए हैं। इस जगह की खासियत Banarasi Silk Weaving की सदियों पुरानी विरासत। Handloom Workshops को करीब से देखने का मौका। Traditional Designs और Modern Fashion का शानदार मेल। यहां क्या देखें? Weaver Colonies Banaras Hindu University दशाश्वमेध घाट काशी विश्वनाथ कॉरिडोर Local Textile Markets घूमने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से मार्च का मौसम सबसे आरामदायक रहता है। सुबह घाटों का माहौल और शाम की गंगा आरती दोनों मिस नहीं करनी चाहिए। कैसे पहुंचे? वाराणसी Airport, Railway Station और National Highways से पूरे देश से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। 2. कांचीपुरम, तमिलनाडु Silk Sarees की शाही दुनिया अगर South India की बात हो और Kanchipuram का ज़िक्र न आए, ऐसा हो ही नहीं सकता। यहां की Kanchipuram Silk Sarees अपने Rich Fabric, Vibrant Colors और Pure Silk के लिए दुनियाभर में मशहूर हैं। इस जगह की खासियत Pure Mulberry Silk का इस्तेमाल। Traditional South Indian Designs। Handloom Families की पीढ़ियों पुरानी कला। यहां क्या देखें? Silk Weaving Units Ekambareswarar Temple Kailasanathar Temple Local Silk Markets घूमने का सबसे अच्छा समय नवंबर से फरवरी का मौसम सबसे शानदार रहता है। कैसे पहुंचे? चेन्नई से लगभग 75 किलोमीटर दूर है। सड़क और रेल दोनों से आसानी से पहुंचा जा सकता है। 3. भीलवाड़ा, राजस्थान भारत का Textile City राजस्थान का भीलवाड़ा देश के सबसे बड़े Textile Production Hubs में गिना जाता है। यहां Suiting Fabric, Yarn और Textile Industries की लंबी चेन देखने को मिलती है। इस जगह की खासियत विशाल Textile Industries। Modern Manufacturing और Traditional Experience। Business और Industrial Tourism के लिए बेहतरीन जगह। यहां क्या देखें? Textile Markets Harni Mahadev Temple Local Fabric Showrooms Nearby Mandalgarh Fort घूमने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से फरवरी सबसे बेहतर रहता है। कैसे पहुंचे? भीलवाड़ा Railway Station देश के कई शहरों से जुड़ा हुआ है। उदयपुर Airport सबसे नज़दीक है। 4. पाटन, गुजरात Patola Weaving का बेमिसाल हुनर पाटन अपनी Rare Patola Sarees के लिए मशहूर है। इन Sarees को तैयार करने में कई महीने लग जाते हैं और इन्हें दुनिया के सबसे मुश्किल Handloom Textiles में गिना जाता है। इस जगह की खासियत Double Ikat Patola Technique। बेहद Limited और Exclusive Production। UNESCO स्तर की विरासत जैसा महत्व रखने वाला हुनर। यहां क्या देखें? Patola House Rani Ki Vav Sahastralinga Talav Local Craft Shops घूमने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से मार्च। कैसे पहुंचे? अहमदाबाद से सड़क मार्ग द्वारा लगभग ढाई घंटे में पहुंचा जा सकता है। 5. चंदेरी, मध्य प्रदेश हल्के और बेहद खूबसूरत Chanderi Fabric की जन्मभूमि चंदेरी सदियों से अपने Elegant और Lightweight Fabric के लिए जाना जाता है। यहां की Sarees और Dupattas Royal Families से लेकर Modern Fashion Designers तक की पसंद रहे हैं। इस जगह की खासियत Cotton और Silk Blend Fabric। बेहद हल्का और Elegant Textile। Traditional Loom Experience। यहां क्या देखें? Chanderi Fort Weaver Homes Badal Mahal Gate Local Textile Market घूमने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से फरवरी। कैसे पहुंचे? झांसी और ललितपुर से सड़क मार्ग द्वारा आसानी से पहुंचा जा सकता है। 6. भागलपुर, बिहार Silk City की अलग ही पहचान भागलपुर को India की Silk Capital भी कहा जाता है। यहां बनने वाला Tussar Silk अपनी Natural Shine और Premium Quality के लिए पूरी दुनिया में Export किया जाता है। इस जगह की खासियत Tussar Silk Production। Traditional Handloom Industry। Export Quality Textile। यहां क्या देखें? Silk Markets Vikramshila Ruins Weaver Villages Ganga Riverfront घूमने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से मार्च। कैसे पहुंचे? भागलपुर Railway Station पूर्वी भारत के कई शहरों से जुड़ा हुआ है। 7. इचलकरंजी, महाराष्ट्र Powerloom Capital की तेज़ रफ्तार दुनिया महाराष्ट्र का इचलकरंजी देश के सबसे बड़े Textile Towns में शामिल है। यहां हजारों Powerlooms लगातार Fabric तैयार करते हैं और Modern Textile Industry की धड़कन माने जाते हैं। इस जगह की खासियत Large Scale Textile Production। Powerloom Industry। Traditional और Modern Technology का शानदार कॉम्बिनेशन। यहां क्या देखें? Textile Markets Local Loom Clusters Kolhapur Nearby Attractions Industrial Visits घूमने का सबसे अच्छा समय नवंबर से फरवरी। कैसे पहुंचे? कोल्हापुर सबसे नज़दीकी Railway Station और Airport है। वहां से सड़क मार्ग द्वारा आसानी से पहुंच सकते हैं। Five कलर्स ऑफ ट्रैवल की तरफ से कुछ सुझाव अगर Textile Shopping करनी है तो Local Weaver Stores से खरीदारी करें। इससे Original Products भी मिलेंगे और Local Artisans को सीधा फायदा होगा। Bargaining ज़रूर करें, लेकिन अदब और एहतराम के साथ। हर कपड़े के पीछे किसी कारीगर की महीनों की मेहनत होती है। Handloom Demonstration देखने का मौका मिले तो बिल्कुल मिस मत कीजिए। यही असली Experience है। Festival Season में कई Textile Towns में Craft Fairs लगते हैं, जहां आपको Rare Collections देखने को मिल सकते हैं। Cash और Digital Payment दोनों साथ रखें क्योंकि कुछ छोटी दुकानों पर Card Facility नहीं होती। अगर Photography कर रहे हैं तो पहले Weaver से Permission लेना बेहतर रहेगा। Local Food भी ज़रूर Taste करें, क्योंकि हर Textile Town अपने Flavours के लिए भी मशहूर है। भारत के Textile Towns

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काशी घूमने जा रहे हैं? ये 5 अनुभव बना देंगे आपकी ट्रिप को शानदार!

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भारत केवल एक देश नहीं, बल्कि आस्थाओं, परंपराओं और सभ्यताओं की जीवित भूमि है। हिमालय की ऊँचाइयों से लेकर सागर की गहराइयों तक फैला यह देश हजारों वर्षों से ज्ञान, तपस्या और संस्कृति का केंद्र रहा है। यहां की नदियां जीवनदायिनी हैं और असंख्य पवित्र स्थल- अयोध्या, मथुरा, द्वारका, पुरी, बद्रीनाथ, केदारनाथ, आस्था और सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक माने जाते हैं, जहां लोग मोक्ष और आत्मिक शांति की तलाश में पहुंचते हैं। इन्हीं पावन स्थलों की श्रृंखला में वाराणसी का नाम सबसे प्राचीन और विशिष्ट माना जाता है। काशी, बनारस या वाराणसी, यह शहर केवल एक स्थान नहीं बल्कि एक अनुभव है, जिसे दुनिया के सबसे प्राचीन जीवित शहरों में गिना जाता है। गंगा के तट पर बसी इस नगरी में हर मोड़ पर इतिहास, हर घाट पर आस्था और हर गली में संस्कृति सांस लेती है, और कहा जाता है कि यहां मृत्यु भी उत्सव बन जाती है तथा जीवन हर क्षण दर्शन देता है। आज हम आपको बताएंगे काशी के वो 5 अनुभव, जिन्हें हर यात्री को कम से कम एक बार ज़रूर करना चाहिए। गंगा घाटों पर नाव की सैर वाराणसी और प्रयागराज जैसे तीर्थस्थलों में गंगा और त्रिवेणी संगम पर नाव की सवारी पर्यटन और धार्मिक आस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जहाँ श्रद्धालु गंगा आरती, सूर्योदय के दृश्यों और संगम में डुबकी लगाने के लिए आते हैं। भारत में लगभग 14,500 किलोमीटर लंबा नौवहन मार्ग है, लेकिन अक्सर ओवरलोडिंग, लाइफ जैकेट की कमी और अपर्याप्त ट्रेनिंग की वजह से नाव हादसे होते रहते हैं, जैसा कि हाल ही में तुलसीघाट पर एक टक्कर के बाद हुआ। इन खतरों को देखते हुए NIDM और IWAI जैसे संस्थानों ने ‘बोट और नेविगेशन सुरक्षा’ पर ज़ोर दिया है, जिसमें नावों का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन, फिटनेस सर्वे और नाविकों के लिए विशेष ट्रेनिंग जैसे सुझाव दिए गए हैं ताकि पर्यटन को सुरक्षित बनाया जा सके। इसके अलावा, मल्लाह और निषाद समुदाय के नाविक, जो पर्यटकों के लिए ‘सांस्कृतिक सूत्रधार’ के रूप में काम करते हैं, उनके सामाजिक-आर्थिक विकास और सुरक्षा की ओर भी विशेष ध्यान देने की ज़रूरत है क्योंकि उनकी आजीविका का मुख्य साधन यही पर्यटन है। काशी विश्वनाथ मंदिर के दर्शन वाराणसी का श्री काशी विश्वनाथ मंदिर भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में सबसे पवित्र माना जाता है और इसे दुनिया के सबसे पुराने शहरों में से एक, काशी की आत्मा कहा जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा 13 दिसंबर 2021 को उद्घाटित ‘काशी विश्वनाथ कॉरिडोर’ ने इस प्राचीन मंदिर को सीधे गंगा के घाटों से जोड़ दिया है, जिससे तीर्थयात्रियों के लिए दर्शन की राह बहुत आसान और ‘विश्व स्तरीय’ हो गई है। इस भव्य कॉरिडोर के निर्माण के दौरान लगभग 40 से अधिक पुराने और “लुप्त” मंदिर सामने आए हैं, जिन्हें अतिक्रमण हटाकर संरक्षित किया गया है। इतिहास के अनुसार, वर्तमान मंदिर का मुख्य निर्माण 1780 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर द्वारा करवाया गया था। आज यहाँ श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए ‘सुगम दर्शन’ (वीआईपी दर्शन) की व्यवस्था है, जिसका शुल्क ₹300 है, हालांकि नए साल जैसे अत्यधिक भीड़भाड़ वाले मौकों पर सुरक्षा और व्यवस्था बनाए रखने के लिए ‘स्पर्श दर्शन’ पर अस्थायी रोक लगा दी जाती है। शाम की गंगा आरती का अलौकिक दृश्य गंगा आरती भारत की एक अत्यंत महत्वपूर्ण आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपरा है, जो मुख्य रूप से वाराणसी, हरिद्वार और ऋषिकेश जैसे पवित्र शहरों में गंगा नदी के तट पर आयोजित की जाती है। हाल ही में, हरिद्वार के ‘हर की पौड़ी’ पर होने वाली 109 साल पुरानी आरती को उसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महानता के लिए ‘ऑक्सफोर्ड बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स’ में स्थान मिला है, जो इसकी वैश्विक पहचान को और पुख्ता करता है। वाराणसी के दशाश्वमेध घाट पर शाम के समय होने वाली भव्य आरती अपनी दिव्यता के लिए प्रसिद्ध है, जहाँ सात युवा ब्राह्मण पारंपरिक मंत्रों, शंखनाद और बड़े पीतल के दीपों के साथ माँ गंगा की वंदना करते हैं। इसी तरह ऋषिकेश में परमार्थ निकेतन और त्रिवेणी घाट पर यह अनुष्ठान श्रद्धा और शांति के साथ संपन्न होता है। शास्त्रों के अनुसार, गंगा आरती में शामिल होने से आत्मा शुद्ध होती है और यह मोक्ष प्राप्ति का एक मार्ग माना जाता है। यह पावन अनुष्ठान न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह भारत की प्राचीन वैदिक विरासत और सांस्कृतिक निरंतरता को भी दुनिया के सामने जीवंत रखता है। बनारसी खाने का स्वाद चखे बिना मत लौटिए बनारस अपनी रूहानियत के साथ-साथ अपने लाजवाब खान-पान के लिए भी दुनिया भर में मशहूर है, जहाँ हर गली में एक नया स्वाद मिलता है। यहाँ के खाने में कचौरी-सब्ज़ी सबसे लोकप्रिय नाश्ता है, जिसे ‘राम भंडार’ जैसे पुराने ठिकानों पर जलेबी के साथ बड़े चाव से खाया जाता है। टमाटर चाट यहाँ का एक अनोखा और खास व्यंजन है, जिसे मिट्टी के कुल्हड़ों में घी, मसालों और खट्टी-मीठी चटनी के साथ परोसा जाता है। पारंपरिक भोजन में बाटी चोखा (जिसे लिट्टी चोखा भी कहते हैं) यहाँ का मुख्य आकर्षण है, जो सत्तू और मसालों से तैयार होता है। सर्दियों के मौसम में मलइयो (Malaiyyo) यहाँ की सबसे दुर्लभ मिठाई है, जो केवल सुबह के वक्त मिलती है और ओस की बूंदों से बनने वाले दूध के झाग से तैयार होती है। इसके अलावा, बनारस की रबड़ी वाली लस्सी, केसरिया ठंडाई और घाटों पर मिलने वाली कड़क लेमन टी पर्यटकों के अनुभव को यादगार बना देती हैं। अंत में, मशहूर बनारसी पान खाए बिना यहाँ की यात्रा अधूरी मानी जाती है, जिसे भोजन के बाद पाचन के लिए और स्वाद के लिए पसंद किया जाता है। सारनाथ और काशी की गलियों की सैर वाराणसी, जिसे काशी या बनारस भी कहा जाता है, गंगा नदी के तट पर बसा दुनिया का सबसे पुराना और पवित्र शहर है। यह शहर हिन्दू, बौद्ध और जैन धर्मों के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण आध्यात्मिक केंद्र है, जहाँ के 84 घाट और काशी विश्वनाथ मंदिर यहाँ की रूहानियत का दिल माने जाते हैं। बनारस अपनी संस्कृति, संगीत के बनारस घराने और बनारसी सिल्क साड़ियों के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। यहाँ का स्ट्रीट फूड जैसे कचौड़ी-सब्जी, टमाटर चाट, लस्सी और मशहूर बनारसी पान सैलानियों के बीच बहुत लोकप्रिय है। शहर के पास ही

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एक होली ऐसी भी : चिता के भस्म से खेली जाती है यहाँ होली

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दोस्तों जैसा कि फाल्गुन के महीने की शुरुआत हो चुकी है और देश भर में होली (Holi) के गानों की गूंज सुनाई देने लगी है। ऐसे में आप सब ने खबरों में जरूर देखा होगा कि मथुरा वृंदावन में किसी दिन लठमार होली मनाई जा रही है, तो किसी दिन बनारस में मसान होली खेली जा रही है। ऐसे में आपके जहन में यह सवाल जरूर आया होगा कि होली तो होली होती है, इसके इतने प्रकार कैसे हैं और क्यों हैं?आज के फाइव फाइव कलर्स ऑफ ट्रैवल के इस ब्लॉग में हम आपको बताने जा रहे हैं पूरे भारतवर्ष में मनाए जाने वाले अलग-अलग होली के प्रकारों के बारे में।होली का रंगों से बहुत हीं गहरा रिश्ता है। इसीलिए जब भी होली का नाम आता है हमारे दिल और दिमाग में सबसे पहले रंग, गुलाल और पिचकारी का ख्याल आता है। लेकिन क्या आपको पता है एक होली ऐसी भी होती है जहां ये रंग नहीं होते हैं, जहां पिचकरिया नहीं होती हैं, जहां गुलाल नहीं होते हैं बल्कि वहां चिता की भस्म होती है। जी हाँ आपने बिल्कुल सही समझा है हम बात कर रहे हैं बनारस के मणिकर्णिका घाट की मसान होली (Masan Holi of Banaras) के बारे में। क्या है इतिहास? मणिकर्णिका घाट बनारस के सबसे प्रसिद्ध घाटों में से एक घाट है, जो पूरे भारतवर्ष में मोक्ष स्थल के नाम से जाना जाता है। महारानी अहिल्याबाई होलकर ने इस शमशान का निर्माण करवाया था। कहते हैं जो काशी में मरता है वह मोक्ष को प्राप्त करता है और इसी काशी के गंगा घाटों में से एक है यह मणिकर्णिका घाट जहां बाकी के गंगा घाट अपनी गंगा आरती, पूजा अर्चना और सैर सपाटा के लिए प्रसिद्ध है, वहीं मणिकर्णिका घाट जीवन के अंतिम यात्रा की गवाही देता है। हिंदू धर्म में विश्वास रखने वाले लोगों की यह ख्वाहिश होती है कि उनका अंतिम संस्कार मणिकर्णिका घाट पर किया जाए। लेकिन ऐसा क्यों है? क्यों यह घाट इतनी पवित्र है कि यहां के चिता के भस्म से होली खेली जाती है? यह होली सिर्फ यहां के स्थानीय लोग नहीं खेलते, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों से यहां लोग इस होली में भाग लेने आते हैं। क्यों है इतना खास? मणिकर्णिका घाट के मसान होली को समझने के लिए आपको पहले जानना होगा कि मणिकर्णिका घाट इतना प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण क्यों है?दरअसल मणिकर्णिका देश के गिने चुने महाशमशानों में से एक है। बताया जाता है कि यह यहां चिता की अग्नि कभी ठंडी नहीं पड़ती है और यह शमशान कभी शांत नहीं होता है। चाहे कोई भी परिस्थिति हो, कोई भी मौसम हो, कोई भी दिन हो यहां चिताएं जलती रहती हैं। कहा जाता है कि जब से इस शमशान का निर्माण हुआ है तब से लेकर आज तक यह शमशान कभी शांत नहीं हुआ। यहाँ एक चिता की आग बुझने वाली होती है तो दूसरे को आग दे दी जाती है और यह प्रक्रिया सतत चलता रहती है। कैसे पड़ा मणिकर्णिका नाम? मणिकर्णिका घाट के बारे में बहुत सारी किंवदंतियाँ सामने आती हैं। लेकिन सबसे प्रसिद्ध लोक कथा के अनुसार माता पार्वती महादेव के व्यस्तताओं के कारण बहुत हीं परेशान थी। तो उन्होंने महादेव के साथ समय व्यतीत करने के लिए एक उपाय ढूंढा। उन्होंने अपने कर्णफूल को यहीं गिरा दिया और महादेव को ढूंढने के लिए कहा। महादेव उस कर्णफूल को नहीं ढूंढ पाए और मान्यता है कि यहां आने वाली प्रत्येक अर्थी के कान में महादेव स्वयं पूछते हैं कि वह कर्णफूल कहां है? साथ हीं साथ उन्हें तारक मंत्र का उपदेश देकर मोक्ष भी दिलाते हैं। क्यों मनाई जाती है मसान होली? पुराणों के अनुसार मसान होली मनाने के पीछे का कारण स्वयं भूतनाथ महादेव हैं। उन्होंने हीं सबसे पहले मसान होली मनाना आरंभ किया था। बताया जाता है कि जब महादेव और पार्वती जी का विवाह हुआ तो वह कुछ दिनों के लिए काशी घूमने आए थे। उस दिन रंगभरी एकादशी का दिन था। महादेव ने पार्वती माता को गुलाल लगाकर होली मनाई । लेकिन उनके भक्तगण में अधिकतर भूत पिशाच हीं थे। जो उन्हें दूर से देखकर हीं खुश हो रहे थे लेकिन खुद होली नहीं मना पा रहे थे। उनकी दुविधा को देखते हुए महादेव ने रंगभरी एकादशी के अगले दिन अपने उन भक्तों के साथ मणिकर्णिका के शमशान में होली खेली थी। उन्होंने चिता के भस्म को अपने शरीर पर मलकर अपने गणों के साथ नृत्य किया था। उसी दिन से यह प्रथा चली जा रही है कि हर साल रंगभरी एकादशी के अगले दिन यहां साधु संत और अघोर पंथ को मानने वाले लोग यहां आकर मसान होली खेलते हैं और जीवन के साथ-साथ मृत्यु का उत्सव मनाते हैं। कब मनाई जाती है मसान होली? यहाँ हर साल रंगभरी एकादशी के दूसरे दिन चिता के भस्म से होली खेली जाती है, जिसे मसान होली या भस्म होली के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है की महादेव स्वयं अपने गणों के साथ उस दिन होली खेलते हैं। अघोर पंथ को मानने वाले लोग इस होली में हिस्सा लेना पसंद करते हैं। क्योंकि यह होली संसार के मोह माया को त्यागने के लिए लोगों को प्रेरित करती है।

Types of silk sarees Culture Lifestyle Review

हर नव वधू के वार्डरोब में शामिल होने चाहिए ये सिल्क की साड़ियां, जानिए इनकी खासियत और कीमत

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जब भी कभी भारतीय परिधानों की बात आती है तो साड़ियों का जिक्र सबसे पहले होता है। …और हो भी क्यों ना! साड़ी भारतीय महिलाओं के द्वारा पहने जाने वाला सबसे प्रमुख परिधान जो है। महिलाओं के बीच साड़ियां इतनी प्रसिद्ध हैं कि इनके भी कई वैराइटीज देखने को मिलते हैं। भारत विविधताओं का देश है इसलिए भारत के अलग-अलग भागों में अलग-अलग तरह की साड़ियों को पहनने और अलग-अलग तरह से साड़ियों को बांधने का चलन रहा है। जहां बंगाल में मोटे लाल बॉर्डर वाले सफेद साड़ियों का चलन है, वहीं महाराष्ट्र में हरे और चटख रंगों वाले सिल्क की साड़ियों को पहनने का चलन है। साड़ियों की जो वैरायटी सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है वह है सिल्क! …..और सिल्क साड़ियों की भी अपनी ही अलग-अलग वैराइटीज होती हैं। सिल्क की साड़ियां समृद्धि और एलिगेंस की प्रतीक मानी जाती हैं। कई बॉलीवुड अभिनेत्रियाँ भी सिल्क की साड़ियां पहनना पसंद करती हैं। लेकिन जब भी सिल्क साड़ियों को खरीदने की बात आती है तो हमारे जहन में सबसे पहले आता है कि कौन सा सिल्क लिया जाए? किस टाइप के सिल्क की साड़ी सबसे बेहतरीन होती है?आज के फाइव कलर्स ऑफ ट्रेवल के इस ब्लॉग में हम आपको बताने वाले हैं सिल्क की साड़ियों के अलग-अलग वैराइटीज (Types of silk sarees) के बारे में और उनकी खासियतों के बारे में। अगर मूल रूप से सिल्क की बात की जाए तो भारत में चार प्रकार के सिल्क के रेशे बनाए जाते हैं- शहतूत रेशम, ओक तसर सिल्क, एरी सिल्क और मुगा रेशम। अगर सिल्क की साड़ियों के बारे में बात की जाए तो सिल्क साड़ियों की कुछ प्रसिद्ध वैरायटी निम्नांकित हैं- बनारसी सिल्क साड़ियां : बनारसी सिल्क साड़ी भारत में सिल्क की सबसे प्रसिद्ध साड़ी मानी जाती है। बनारसी सिल्क साड़ी को बेहतरीन गुणवत्ता वाले सिल्क के धागों से तैयार किया जाता है। अगर बात करें बनारसी सिल्क साड़ियों के डिजाइन की तो इनमें अधिकतर फ्लोरल पेटर्न की डिजाइनिंग देखी जाती है। बनारसी सिल्क साड़ियां चटक रंग से लेकर धूसर रंग तक हर रंग में उपलब्ध होते हैं। ये खास अवसरों पर पहनी जाने वाली साड़ियां हैं और भारत की सांस्कृतिक विरासत का एक बेहतरीन नमूना पेश करती हैं। कांजीवरम सिल्क साड़ियां : तमिलनाडु के एक छोटे से शहर कांचीपुरम में कांजीवरम साड़ी के निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई थी। यहीं वजह है कि इसे कांचीपुरम सिल्क साड़ी भी कहा जाता है।कांजीवरम सिल्क को प्योर मूलबेरी सिल्क के धागों से बनाया जाता है। इतना हीं नहीं कांजीवरम सिल्क की साड़ियों में सोने और चांदी के जरी के काम किए जाते हैं। जिसके कारण यह साड़ियां और महंगी हो जाती हैं। इन साड़ियों को अधिकांशतः शादी विवाह जैसे बड़े आयोजनों में पहना जाता है। कांचीपुरम सिल्क की साड़ियों की बुनावट भी कुछ खास होती है। इन साड़ियों में बॉर्डर, साड़ी तथा पल्लू तीनों भागों को अलग-अलग धागों से बुना जाता है। जिसके कारण ये साड़ियां और भी खास हो जाती हैं। अगर आप कांजीवरम सिल्क की साड़ियां खरीद रहे हैं तो उन्हें खरीदते वक्त आप यह स्योर करें कि आप असली कांजीवरम हीं खरीद रहे हैं। क्योंकि आजकल कांजीवरम साड़ियों के नाम पर धोखाधड़ी के भी मामले देखे जाते हैं। कांचीपुरम साड़ियों को पहचानने का सबसे आसान तरीका है कि असली कांजीवरम साड़ी के प्लेट्स को एक दूसरे से घिसने पर किसी भी प्रकार की आवाज नहीं आती है। चंदेरी सिल्क साड़ियां : चंदेरी सिल्क साड़ियों का निर्माण विंध्याचल के चंदेरी कस्बे से शुरू हुआ था। यह साड़ियां दिखने में शाईनी और वजन में बहुत हीं हल्की होती हैं। चंदेरी सिल्क साड़ियों की एक और खासियत यह है कि यह बाकी के सिल्क साड़ियों के तरह मोटे नहीं होते हैं। इनका फैब्रिक पारदर्शी होता है। यहीं वजह है कि चंदेरी सिल्क साड़ियां वजन में काफी लाइटवेट होती हैं। अगर रंगों के मिलावट की बात की जाए तो इसमें कंट्रास्ट कलर का इस्तेमाल देखने को मिलता है। हालांकि बदलते दौर के साथ अब पेस्टल कलर्स में भी चंदेरी सिल्क साड़ियां उपलब्ध होने लगी हैं। ये साड़ियां छूने में काफी मुलायम होती हैं। मुलायम होने की खासियत से ही इनके असली या फिर नकली होने का पहचान किया जा सकता है।अगर बात करें लागत की तो चंदेरी सिल्क की साड़ियां आपको ₹5000 की रेंज से मिलने शुरू हो जाएंगी। चंदेरी साड़ियों में गोल्ड सिल्वर या फिर कॉपर के धागों के वर्क भी देखने को मिल जाते हैं। बलूचरी सिल्क साड़ी : बलूचरी सिल्क साड़ियां अपने आंचल के वर्क के लिए जानी जाती हैं। बलूचरी साड़ियों के आंचल में खास तरह का वर्क किया गया होता है बलूचरी साड़ी के आंचल पर पौराणिक कथाओं के दृश्यों को उभारा जाता है। चटख लाल कलर की साड़ियों पर जब गोल्डन कलर के वर्क से पौराणिक कथाओं के दृश्यों को उभारा जाता है तो इस कलाकारी को देखकर ऐसा लगता है कि जैसे ये अभी बोल पड़ेंगी। इसमें अधिकतर रामायण तथा महाभारत के दृश्यों का चित्रण किया जाता है। हालांकि मुगल काल में ऐसी साड़ियों में नवाबों के दिनचर्या को दिखाया जाता था और बेलबूटेदार डिजाइंस किए जाते। शुरुआती दौर में ये साड़ियां जमींदार घरानों की महिलाओं की पसंदीदा साड़ी हुआ करती थी। ब्रिटिश शासन काल में ब्रिटिश अफसर की बीवियां भी इस कारीगरी को पसंद किया करती थीं। आज के समय में ऐसी साड़ियां शादी विवाह जैसे बड़े आयोजनों के अवसर पर पहनी जाती हैं। बलूचरी साड़ी की एक खास वैरायटी होती है जिसमें सोने के धागों से साड़ी पर बुनावट की जाती है। ये साड़ियां स्वर्णचेरी साड़ियां कहलाती हैं। अधिकतर बलूचरी साड़ियां चटक रंगों में पसंद की जाती हैं। इनका निर्माण बंगाल के मुर्शिदाबाद में किया जाता है। पैठणी सिल्क साड़ियां : पैठणी सिल्क साड़ियां मराठी संस्कृति की पहचान हैं। अक्सर महाराष्ट्र में शुभ अवसरों पर त्योहार और शादी विवाह के मौके पर महिलाएं पैठाणी सिल्क साड़ियों को पहनती हैं। पैठनी साड़ी का निर्माण महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले के पैठणी नमक शहर से शुरू हुआ था। यही वजह है कि इन साड़ियों को पैठनी साड़ी का नाम दे दिया गया। यह साड़ियां, लाल, हरे, नीले, गुलाबी और पीले रंगों में अवेलेबल होती हैं। इनकी बुनाई की तकनीक बहुत ही जटिल होती है। इन साड़ियों में एक