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सब जानते हैं कि ओणम केरल में मनाया जाता है, मगर क्यों? जानिए..

इस देश में जिसमें मैने जन्म लिया। यहां लाखों कहानियां सड़क चलते देखने को मिल जाती हैं। कहनियों में कई विषय स्थान पाते हैं। वैसी ही एक कहानी मैंने ओणम के बारे में पढ़ी तो इस पर ब्लॉग लिखने का ख्याल आया। भारत के त्योहारों में ओणम का विशेष स्थान है। यह केरल का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण उत्सव है, जो दस दिनों तक धूमधाम से मनाया जाता है। ओणम सांस्कृतिक दृष्टि से एक बहुत ही खास त्योहार है, जो भाद्रपद महीने में अगस्त या सितंबर में आता है। यह केरल की संस्कृति, परंपरा और एकता का प्रतीक है। तो पेश है एक मुकम्मल ब्लॉग फाइव कलर्स ऑफ ट्रैवल की तरफ से।

यह उत्सव राजा महाबली की वापसी की कहानी से जुड़ा है, जिन्हें लोग आज भी प्यार और सम्मान करते हैं। ओणम की कहानी काफी पौराणिक है। केरल के लोग मानते हैं कि महाबली एक दयालु और न्यायप्रिय राजा थे। उनके शासन में सभी सुखी थे, कोई भी दुखी नहीं था। भगवान विष्णु ने वामन अवतार में उनकी परीक्षा ली और उन्हें पाताल भेज दिया था। लेकिन विष्णु ने वरदान दिया कि महाबली हर साल अपनी प्रजा से मिलने आएंगे। ओणम उसी वापसी का जश्न है। लोग अपने घरों को सजाते हैं, स्वादिष्ट भोजन बनाते हैं और उत्सव को बड़े धूम-धाम, लोकनृत्य और लोकगीत के जरिए मनाते हैं।

ओणम

यह त्योहार दस दिनों तक चलता है। पहला दिन अत्थम है और आखिरी दिन तिरुवोणम। हर दिन अलग-अलग रस्में होती हैं। यह ओणम सिर्फ धार्मिक उत्सव नहीं है। यह फसल की खुशी और सामाजिक एकता का प्रतीक है। केरल के गांवों और शहरों में भी लोग मिलकर इसे मनाते हैं। चाहे हिंदू, मुस्लिम या ईसाई, सभी इसमें शामिल होते हैं और आपसी भाई-चारे की मिसाल पेश करते हैं। ओणम की खासियत है इसका रंग बिरंगा माहौल। लोग नए कपड़े पहनते हैं, हां बिल्कुल दीवाली के तरह घरों में फूलों की रंगोली बनाते हैं और नाव दौड़ देखते हैं। यह उत्सव केरल की संस्कृति को दुनिया भर में मशहूर करता है। पर्यटक इस समय केरल आते हैं और इसकी सुंदरता देख हैरत में पड़ जाते हैं।

ओणम का हर दिन खास होता है।

पहला दिन अत्थम से उत्सव शुरू होता है। लोग अपने घरों को साफ करते हैं और फूलों की रंगोली बनाते हैं, जिसे पूक्कलम कहते हैं। पूक्कलम में रंग बिरंगे फूलों से सुंदर डिजाइन बनाए जाते हैं। हर दिन डिजाइन बड़ा और जटिल होता जाता है। तिरुवोणम के दिन यह सबसे खूबसूरत होता है। लोग मानते हैं कि यह रंगोली राजा महाबली का स्वागत करती है।

दूसरी रस्म है ओणम साडी पहनना। महिलाएं सफेद और सुनहरी साडी पहनती हैं, जिसे कसावु साडी कहते हैं। पुरुष भी पारंपरिक धोती पहनते हैं। यह कपड़े उत्सव को और मजेदार बनाते हैं। लोग एक दूसरे के घर जाते हैं और शुभकामनाएं देते हैं। यह देखने में बहुत ही रोचक लगता है। कभी आप भी इस शानदार त्यौहार का हिस्सा बनिए। यकीनन यह पल आपके जीवन का सबसे खास पल होगा।

इसके बाद है तीसरी रस्म नृत्य और संगीत। महिलाएं कैककोट्टिकली नृत्य करती हैं। यह एक गोल घेरे में किया जाने वाला नृत्य है, जिसमें ताल और गीत होते हैं। पुरुष पुलिकली नृत्य करते हैं, जिसमें वे बाघ का रूप धरते हैं। यह नृत्य मजेदार और जोशीला होता है। बच्चे भी इसमें शामिल होते हैं। हर कोई यह देखकर खुद को ऊर्जावान महसूस करता है।

सबसे मजेदार मेरी अपनी पसंद चौथी रस्म है नाव दौड़, जिसे वल्लमकली कहते हैं। यह केरल की नदियों में होती है। लंबी नावों में लोग एक साथ चप्पू चलाते हैं। दर्शक तट पर खड़े होकर हौसला बढ़ाते हैं। यह दौड़ ताकत और एकता दिखाती है। अंतिम और पांचवी रस्म है पूजा। लोग मंदिरों में जाते हैं और विष्णु भगवान को धन्यवाद देते हैं। घरों में मिट्टी की मूर्तियां रखी जाती हैं, जो महाबली और वामन को दर्शाती हैं। यह रस्म भक्ति भाव को बढ़ाती है। ओणम उत्सव की रस्में केरल की संस्कृति को सामने लाती हैं।

ओणम का सबसे मजेदार हिस्सा है इसका भोजन, जिसे ओणम साद्य कहते हैं। साद्य एक शाकाहारी भोज है, जो केले के पत्ते पर परोसा जाता है। इसमें 20 से 26 व्यंजन होते हैं। मुंह में पानी आए तो पी लेना क्योंकि यह स्वादिष्ट भोजन तभी चखने को मिलेगा जब आप ओणम उत्सव में शामिल होंगे। वैसे भी यह भोजन सिर्फ स्वाद के लिए नहीं, बल्कि एकता और साझा करने के लिए है। लोग जमीन पर बैठकर इसे खाते हैं। साद्य में कई तरह के व्यंजन होते हैं। जैसे पायसम, जो चावल और गुड़ से बनी मिठाई है। अवियल, जिसमें कई सब्जियां और नारियल होता है। सांभर, दाल और इमली का स्वाद। रसम, जो मसालेदार सूप है। इसके अलावा पचडी, कोट्टु करी, थोरन और चावल होते हैं।

ओणम

हर व्यंजन का स्वाद अलग और अनोखा होता है। पायसम कई तरह की होती है। पाल पायसम दूध से बनती है, जबकि अडा पायसम में चावल का आटा होता है। इनके ऊपर काजू और किशमिश डाले जाते हैं। साद्य में केला चिप्स और पापडम भी होते हैं, जो कुरकुरे होते हैं। साद्य परोसने का तरीका भी खास है। केले के पत्ते पर पहले नमक, चटनी और अचार रखा जाता है। फिर सब्जियां, दाल और चावल। हर चीज का स्थान तय है। लोग इसे हाथ से खाते हैं। वास्तव में यह अनुभव स्वाद और परंपरा का मेल है। केरल के घरों में साद्य परिवार के साथ खाई जाती है। दरअसल, साद्य मिलता तो रेस्तरां में भी है। लेकिन फिर भी ओणम उत्सव में पर्यटक इसे ट्राई करने के लिए उत्साहित रहते हैं। साद्य सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि केरल की आत्मा है। यह ओणम को और खास बनाता है।

ओणम का उत्साह इसके आयोजनों में दिखता है। सबसे बड़ा आकर्षण है वल्लमकली, यानी नाव दौड़। यह केरल की नदियों और झीलों में होती है। सबसे मशहूर दौड़ अरनमुला और कोट्टायम में होती है। लंबी नावों में 50 से 100 लोग चप्पू चलाते हैं। नावें सजी होती हैं। दर्शक तट पर खड़े होकर तालियां बजाते हैं। यह दौड़ ताकत और एकता का प्रदर्शन है।

पुलिकली नृत्य एक और मजेदार आयोजन है। इसमें लोग बाघ का रूप धरते हैं। उनके शरीर पर रंग पोता जाता है और बाघ जैसे कपड़े पहनाए जाते हैं। यह नृत्य त्रिशूर में बहुत मशहूर है। लोग इसे देखकर हंसते हैं और तस्वीरें लेते हैं।

कैककोट्टिकली नृत्य महिलाओं का समूह नृत्य है। वे सफेद साडी पहनकर गोल घेरे में नाचती हैं। गीत और ताल के साथ यह नृत्य सुंदर लगता है। बच्चे और बूढ़े भी इसमें शामिल होते हैं। यह नृत्य सामाजिक मेलजोल बढ़ाता है। मेले भी ओणम का हिस्सा हैं। गांवों और शहरों में स्टाल लगते हैं। लोग हस्तशिल्प, कपड़े और भोजन खरीदते हैं। बच्चे झूलों का मजा लेते हैं। रात को आतिशबाजी होती है। यह आयोजन ओणम को यादगार बनाते हैं। पर्यटक इनका हिस्सा बनकर केरल की संस्कृति को समझते हैं।

ओणम सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि केरल की आत्मा है। यह उत्सव राजा महाबली की याद में मनाया जाता है। लोग मानते हैं कि इस समय महाबली अपनी प्रजा से मिलने आते हैं। इसलिए घरों को सजाया जाता है और भोजन बनाया जाता है। यह त्योहार एकता और समानता सिखाता है। ओणम का महत्व सामाजिक और सांस्कृतिक दोनों रूपों में है। यह हर धर्म के लोगों को जोड़ता है। केरल में हिंदू, मुस्लिम और ईसाई मिलकर इसे मनाते हैं। यह उत्सव पर्यटन को भी बढ़ावा देता है। लाखों पर्यटक इस समय केरल आते हैं।

वे नाव दौड़, नृत्य और साद्य का मजा लेते हैं। आधुनिक समय में ओणम का रूप बदला है। अब लोग ऑनलाइन बधाई देते हैं। रेस्तरां में साद्य पैकेज मिलते हैं। लेकिन परंपराएं आज भी वही हैं। पूक्कलम, साद्य और नृत्य आज भी मुख्य हैं। युवा पीढ़ी इसे उत्साह से मनाती है। ओणम पर्यावरण के प्रति जागरूकता भी बढ़ाता है। पूक्कलम में प्राकृतिक फूलों का इस्तेमाल होता है।

By Five Colors Of Travel

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