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हजरत निजामुद्दीन औलिया को आखिर क्यों कहा जाता है महबूब-ए-इलाही?

दिल्ली की हलचल भरी जिंदगी में एक ऐसी जगह है जो दिल को बेहिसाब सुकून देती है। हजरत निजामुद्दीन दरगाह, दिल्ली के निजामुद्दीन पश्चिम क्षेत्र में बसी, एक ऐसी हसीन मंजिल है जहां हर धर्म के लोग अपनी जुस्तजू लेकर आते हैं। यह दरगाह मशहूर सूफी संत हजरत निजामुद्दीन औलिया की याद में बनी है, जिन्हें महबूब-ए-इलाही यानी ईश्वर का प्रिय कहा जाता है। यह जगह तकरीबन 700 साल पुरानी है और दिल्ली के दिल में आध्यात्मिकता का प्रतीक है।

हजरत निजामुद्दीन औलिया 1238-1325 चिश्ती संप्रदाय के महान और चौथे संत थे। उनका मानना था कि ईश्वर तक पहुंचने का रास्ता प्यार और इंसानियत से होकर जाता है। उनकी शिक्षाएं धर्म, जाति और अमीरी-गरीबी के बंधनों को तोडती थीं। यकीनन, यही वजह है कि उनकी दरगाह आज भी हर तरह के लोगों को अपनी ओर खींचती है। 1325 में उनके निधन के बाद मुहम्मद बिन तुगलक ने इस दरगाह का निर्माण शुरू किया। बाद में 1562 में फरीदुन खान ने इसे और सुंदर बनवाया।

दरगाह का परिसर कई मकबरों, एक मस्जिद और एक बावली का घर है। यहां मशहूर कवि अमीर खुसरो, मुगल राजकुमारी जहांआरा बेगम और अन्य शख्सियतों के मकबरे भी हैं। दरगाह की सफेद गुंबद और जालीदार दीवारें इसे जन्नत जैसा बनाती हैं। हर गुरुवार शाम को होने वाली कव्वाली की महफिल इस जगह को और मनभावक बनाती है। यह दरगाह दिल्ली की भीड में एक शांत कोना है, जहां लोग अपनी मनोकामनाओं के साथ आते हैं और सुकून पाते हैं।

हजरत निजामुद्दीन दरगाह की बनावट देखकर मन मोह जाता है। यह इमारत 14वीं सदी की है, लेकिन इसका मौजूदा ढांचा 1562 में फरीदुन खान ने बनवाया। दरगाह का मुख्य मकबरा एक चौकोर कमरे में है, जिसके ऊपर सफेद गुंबद है। गुंबद की ऊंचाई तकरीबन 20 फीट है और इस पर काले रंग की लकीरें इसे और हसीन बनाती हैं। चारों तरफ संगमरमर का आंगन और जालीदार दीवारें हैं, जो इसे जन्नत की तरह सजाती हैं। दरगाह का परिसर कई हिस्सों में बंटा है। मुख्य मकबरे के पास अमीर खुसरो और जहांआरा बेगम के मकबरे हैं। अमीर खुसरो का मकबरा चबूतरा-ए-यार कहलाता है, जो लाल बलुआ पत्थर से बना है।

पास में जमात खाना मस्जिद है, जिसे खिलजी मस्जिद भी कहते हैं। यह 1325 में बनी और लाल पत्थर से सजी है। इसके तीन छोटे गुंबद इसे और मनमोहक बनाते हैं। दरगाह के पीछे एक बावली है, जिसे 1321 में बनवाया गया था। यह बावली हमेशा पानी से भरी रहती है। लोग मानते हैं कि इसका पानी चमत्कारी है। एक कहानी है कि जब तुगलकाबाद किला बन रहा था, तब बावली के लिए मजदूरों को रात में काम करना पडता था। तेल की कमी होने पर संत की दुआ से बावली के पानी से दीये जलाए गए। यह कहानी दरगाह की जादुई छवि को और बेमिसाल और रहस्यमई बनाती है। दरगाह की जालीदार दीवारों पर लोग धागे बांधते हैं। वे मानते हैं कि इससे उनकी मनोकामना पूरी होगी। यह बनावट सिर्फ पत्थर और संगमरमर की नहीं, बल्कि आस्था और प्यार की कहानी है। यह जगह इतनी हसीन है कि हर कोने में इतिहास और आध्यात्मिकता की गूंज सुनाई देती है। अब हम कव्वाली की दुनिया में कदम रखते हैं।

हजरत निजामुद्दीन दरगाह की आत्मा उसकी कव्वालियों में बसती है। हर गुरुवार शाम को यहां कव्वाली की महफिल सजती है, जो तकरीबन 1500 लोगों को अपनी ओर खींचती है। कव्वाली सूफी संगीत का एक रूप है, जो ईश्वर और संतों की भक्ति में डूबा होता है। यह इतनी मनभावक होती है कि सुनने वाला सरपट जन्नत की सैर करने लगता है। कव्वाल लोग हारमोनियम, तबला और ढोलक बजाते हैं। उनके गीत अमीर खुसरो के लिखे होते हैं, जो निजामुद्दीन के सबसे प्रिय शिष्य थे। “छाप तिलक सब छीनी रे, मोसे नैना मिलाइके” जैसे गीत सुनकर मन मोह जाता है। कव्वाल रंग बिरंगे कपडे पहनते हैं और उनकी आवाज में ऐसी जादूगरी होती है कि लोग तालियां बजाने लगते हैं।

हजरत निजामुद्दीन औलिया

कव्वाली की शुरुआत अमीर खुसरो ने की थी। कहा जाता है कि उन्होंने “मन कुन्तो मौला” को संगीत में ढाला, जो आज भी गाया जाता है। यह संगीत सिर्फ गाना नहीं, बल्कि ईश्वर से जुडने का रास्ता है। लोग पैसे देकर कव्वालों को सम्मान देते हैं। बच्चे उनके लिए नोट लाते हैं और कव्वाल उन्हें दुआ देते हैं। बॉलीवुड ने भी इस कव्वाली को अपनाया है। “कुन फया कुन” और “अर्जियां” जैसे गाने इस दरगाह में फिल्माए गए हैं। यह महफिलें यकीनन दिल को छूती हैं। लोग यहां आकर अपनी परेशानियां भूल जाते हैं। कव्वाली की धुनें दरगाह को और खूबसूरत बनाती हैं। यह संगीत सुकून का खजाना है।

हजरत निजामुद्दीन दरगाह सिर्फ एक धार्मिक जगह नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक धरोहर है। यह सूफी संस्कृति का केंद्र है, जहां हर धर्म के लोग आते हैं। निजामुद्दीन औलिया की शिक्षाएं प्यार और एकता की थीं। उनका कहना था, “सबको प्यार दो, किसी से नफरत मत करो।” यही वजह है कि यह दरगाह हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई सबके लिए खुली है। यहां बसंत पंचमी का त्यौहार धूम-धाम से मनाया जाता है। किंवदंती है कि निजामुद्दीन अपने भतीजे की मृत्यु से दुखी थे। अमीर खुसरो ने पीले कपडे पहनकर बसंत मनाया, जिससे संत मुस्कुराए। आज भी यह परंपरा चलती है। लोग पीले कपडे पहनते हैं और कव्वाल गीत गाते हैं।

हजरत निजामुद्दीन औलिया

दरगाह में हर दिन लंगर होता है, जहां मुफ्त खाना बांटा जाता है। यह इंसानियत का प्रतीक है। रात में दीये जलाने की रस्म, जिसे दुआ-ए-रोशनी कहते हैं, मन को सुकून देती है। हर साल रबी-उल-अव्वल के 17वें और 18वें दिन निजामुद्दीन और अमीर खुसरो का उर्स मनाया जाता है। हजारों लोग इसमें शामिल होते हैं। यह दरगाह दिल्ली की सांस्कृतिक आत्मा है। यह हमें सिखाती है कि प्यार और एकता से धरती पर जन्नत बनाई जा सकती है। यह जगह हर दिल को जोडती है। यह यकीनन एक ऐसी मंजिल है जहां हर कोई अपनी जुस्तजू पूरी करता है।

हजरत निजामुद्दीन दरगाह की सैर एक भावनात्मक और आध्यात्मिक अनुभव है। यह दिल्ली के निजामुद्दीन पश्चिम में बोली गेट रोड पर है। नजदीकी मेट्रो स्टेशन इंद्रप्रस्थ और जंगपुरा हैं, जो 5-6 किलोमीटर दूर हैं। ऑटो या टैक्सी से आसानी से यहां पहुंचा जा सकता है। दरगाह सुबह 5:30 से रात 10:30 तक खुली रहती है। गुरुवार को रात 10:30 तक कव्वाली होती है। प्रवेश मुफ्त है, लेकिन सिर ढकना जरूरी है। महिलाएं मुख्य मकबरे के अंदर नहीं जा सकतीं, लेकिन जाली से झांककर दर्शन कर सकती हैं। लोग चादर, फूल और इत्र चढाते हैं। दुकानों पर ये सामान आसानी से मिलते हैं।

हजरत निजामुद्दीन औलिया

इसके अलावा जैसा कि पहले भी बताया गया, पर्यटक जाली पर धागा बांधकर मनोकामना मांगते हैं। इस दरगाह की गलियां रंग बिरंगी हैं। यहां खाने की दुकानों से कबाब और निहारी की खुशबू आती है। कव्वाली की महफिल में कई लोग तो खो ही जाते हैं। और कई पर्यटक कहते हैं कि यह अनुभव उन्हें जन्नत की सैर कराता है। यदि आप चाहें तो पास में हुमायूं का मकबरा और लोधी गार्डन भी हैं, जिन्हें घूमा जा सकता है। दरगाह की सैर सुकून और आध्यात्म का संजोग है।

By Five Colors Of Travel

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