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मुखौटों के पीछे छिपे चेहरे सिर्फ किरदार नहीं निभाते, बल्कि झारखंड की परंपरा को ज़िंदा करते हैं!

छऊ नृत्य

छऊ नृत्य की सबसे बड़ी पहचान इसके मुखौटे हैं। हर कलाकार अपने चेहरे पर एक अलग मुखौटा लगाता है, जो किसी किरदार का प्रतीक होता है जैसे राम, रावण, दुर्गा, महिषासुर, अर्जुन या कृष्ण। ये मुखौटे रंग-बिरंगे होते हैं और पेपर, मिट्टी और कपड़े से बने होते हैं। इन्हें हाथ से बनाया जाता है, और हर मुखौटे में भाव और पहचान झलकती है। जब कलाकार मंच पर आते हैं, तो उनके चेहरे नहीं, बल्कि मुखौटे बोलते हैं।(जब कलाकार मंच पर आते हैं, तो उनके चेहरे नहीं, बल्कि मुखौटे बोलते हैं।)

छऊ नृत्य

इस नृत्य में शौर्य और युद्धकला की झलक भी देखने को मिलती है। नर्तक अपने पैरों की थाप, शरीर के तेज़ मूवमेंट और तलवार या ढाल के साथ नृत्य करते हैं। ढोल, नगाड़ा और शहनाई की धुन पर जब ये कलाकार मंच पर थिरकते हैं, तो पूरा माहौल गूंज उठता है। हर एक कदम के साथ कहानी आगे बढ़ती है कहीं देवी दुर्गा का राक्षस-वध, कहीं राम-रावण का युद्ध, तो कहीं किसी लोककथा की झलक देखने को मिलती है। छऊ नृत्य का इतिहास काफी पुराना है। माना जाता है कि यह नृत्य राजाओं और सैनिकों की युद्धकला से प्रेरित है। पहले यह नृत्य खास त्यौहारों और धार्मिक आयोजनों में किया जाता था। आज भी झारखंड के कई हिस्सों में छऊ नृत्य चैत्र पर्व, होली, और दुर्गा पूजा के समय खास तौर पर किया जाता है।सरायकेला में तो हर साल छऊ महोत्सव भी मनाया जाता है, जिसमें देश-विदेश से लोग इस नृत्य को देखने आते हैं

छऊ नृत्य

छऊ नृत्य की तीन मुख्य शैलियां हैं सरायकेला छऊ, मयूरभंज छऊ, और पुरुलिया छऊ। सरायकेला छऊ में चहरे के भाव और मुखौटों का ज़्यादा प्रयोग होता है, जबकि मयूरभंज छऊ में बिना मुखौटे के नृत्य किया जाता है। हर शैली की अपनी खासियत और सौंदर्य है, लेकिन सभी का मकसद एक ही है कला और लोककथाओं को ज़िंदा रखना। अगर आप झारखंड की यात्रा की योजना बना रहे हैं, तो एक बार सरायकेला या चाईबासा ज़रूर जाइए। वहां आपको न सिर्फ इस अद्भुत नृत्य को देखने का मौका मिलेगा, बल्कि कलाकारों से मिलने और उनके बनाए मुखौटे देखने का अनुभव भी मिलेगा। लोककला प्रेमियों के लिए यह जगह किसी जन्नत से कम नहीं है। छऊ नृत्य झारखंड की पहचान है यह बताता है कि कला सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि एक संस्कृति की आत्मा भी होती है।

छऊ नृत्य

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