चौंडाला कहां है और इसकी मूल कहानी?
चौंडाला Chaundhala या Chondhala महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में, Paithan तालुका, Chhatrapati Sambhajinagar जो पहले औरंगाबाद जिले का एक छोटा सा गांव है। यहां की आबादी करीब 800 से 1000 के आसपास बतायी जाती है और पूरे गांव में लगभग 400 से 500 घर हैं। गांव की सबसे बड़ी पहचान उसकी उन अनूठी परंपराओं और मान्यताओं की है जो कई पीढ़ियों से बदलती दुनिया में भी जस की तस कायम हैं।

चौंडाला गांव की परंपरा बहुत कठोर है। यहां 500 सालों से कभी भी एक घर में भी दो-मंजिला मकान नहीं बनाया गया और कोई घर पलंग, खाट या सोफा-बिस्तर का उपयोग नहीं करता। यानी पूरे गांव में सोने के लिए सिर्फ ज़मीन या Cotton-Mat पर ही सोया जाता है।(चौंडाला कहां है और इसकी मूल कहानी?)

आखिर ऐसा क्यों?
कहा जाता है कि गांव के मुहाने पर एक प्राचीन मंदिर है रेणुका देवी मंदिर जिसकी देवी कभी विवाहित नहीं हुई थीं। ग्रामीण लोककथा के अनुसार, देवी का विवाह तय हुआ था, लेकिन बारातियों के आते समय एक राक्षस ने उन्हें रोक दिया। इसके बाद देवी ने विवाह से इंकार कर दिया। तब उस राक्षस और उसके साथ आए हुए बाराती दल को शाप मिला और वे सब पत्थर में बदल गए। कहा जाता है कि आज भी मंदिर के आस-पास उन पत्थरों के अवशेष देखे जा सकते हैं। यह घटना जातीय स्मृति में इतनी गहरी रही कि गांव वालों ने तय किया कि आगे कभी भी विवाह नहीं होगा। न ही दो-मंजिला घर बनेगा, न ही पलंग होगा। और यह परंपरा आज तक कायम है। किसी का विवाह विवाह मंडप या शादी-समारोह कुछ भी नहीं होता यदि विवाह करना हो, तो गांव से बाहर किसी अन्य गांव या मंदिर में करना पड़ता है। कोई भी घर दो-मंजिला नहीं बनाता, सब एक मंजिला मंदिर जैसी ऊंचाई के ऊपर मकान नहीं बनते। सोने के लिए जमीन या मैट सोफा, पलंग, खाट आदि पूरी तरह मना है।

कब और कैसे शुरू हुई यह परंपरा?
कहानी कहते हैं कि यह परंपरा लगभग 500 साल पुरानी है। उस समय जब रेणुका देवी के विवाह को लेकर जो घटना हुई थी! राक्षस का विघ्न, देवी का अस्वीकृति और बारातियों का पत्थर बन जाना तब से यह परंपरा शपथ बनकर गांव में रच गयी। उसके बाद से, हर पीढ़ी ने इसे बनाए रखा। समय बदला लेकिन श्रद्धा नहीं। गांव के लोग आज भी अपने पूर्वजों द्वारा तय नियमों का पालन करते हैं चाहे आधुनिकता कितनी भी बढ़ जाए। इस परंपरा को तोड़ने या उल्लंघन की कोशिश करने वालों का कहना है कि पूजा-पाठ हमेशा गांव की देवी के सम्मान में होता है, लेकिन शादी-ब्याह, शादी-समारोह, दो-मंजिला घर, लक्ज़री बिस्तर या ऊंचे मकान इन सबका विचार तक नहीं किया जाता।

श्रद्धा अभी भी जिंदा है।
आज भी चौंडाला गांव की पहचान उसकी अचूक परंपराओं और धार्मिक विश्वासों से है। देश में ऐसा दुर्लभ गांव है, जहां 500 सालों से एक भी शादी, पलंग या दो-मंजिला घर नहीं हुआ। यह बात मराठ वाड़ा और महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि पूरे भारत के दर्शकों के लिए चौंकाने वाली है। कुछ लोग इसे अंधविश्वास कह सकते हैं, तो कुछ इसे सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं का सम्मान। गांव के बुज़ुर्ग बताते हैं कि सब रीति-रिवाज, नियम और विश्वास पीढ़ी दर पीढ़ी चलते आए हैं। गांव के युवा भी इन परंपराओं को तोड़ने से बचते हैं। शादी होती तो भी गांव से बाहर। बच्चों की बचपन से यही समझ होती है कि पलंग की बजाय ज़मीन ही सही है।
परंपरा, श्रद्धा या रहस्य

चौंडाला वह गांव है जो आधुनिक भारत में आकर भी अपनी अनोखी पहचान नहीं खोया। यहां की परंपरा चाहे वो पलंग-खाट का न होना हो, दो-मंजिला घरों का न होना हो, या 500 सालों से न हुए विवाह सब कुछ इस विश्वास पर टिका है कि देवी की इच्छा का सम्मान करना चाहिए। चाहे आप इसे लोककथा समझें या श्रद्धा चौंडाला आपको सोचने पर मजबूर कर देगा कि कितनी ताकत होती है रीति-रिवाज़ों और सामूहिक श्रद्धा की। इस गांव ने साबित किया है कि समाज के नियम-कानून हमेशा बदलते नहीं कुछ मान्यताएं वो होती हैं जो सदियों तक बरकरार रहती हैं। और इसका उदाहरण यह गांव ही है।
