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Lonavala: मानसून में बन जाता है सबकी पहली पसंद! Guide 2026

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जैसे ही आसमान में पहली बारिश की बूंदें गिरती हैं और मिट्टी की सोंधी खुशबू हवा में घुलने लगती है, वैसे ही मुंबई और पुणे के लोगों के मन में एक ही नाम आता है- Lonavala। मानसून शुरू होते ही यह खूबसूरत हिल स्टेशन लोगों से भर जाता है। कोई दोस्तों के साथ रोड ट्रिप पर आता है, कोई परिवार के साथ छुट्टियां मनाने और कोई सिर्फ बारिश का आनंद लेने के लिए यहां पहुंच जाता है। आखिर ऐसा क्या है जो हर साल लाखों लोगों को यहां खींच लाता है? आइए जानते हैं। Lonavala में बारिश आते ही सब यहां क्यों पहुंच जाते हैं? मानसून में Lonavala का पूरा माहौल बदल जाता है। चारों तरफ हरियाली, पहाड़ों पर उतरते बादल, ठंडी हवा और झरनों की आवाज लोगों को शहर की भागदौड़ से दूर सुकून का एहसास कराती है। यही वजह है कि बारिश शुरू होते ही हर कोई यहां आने का प्लान बनाने लगता है। Lonavala में मानसून का नजारा कैसा होता है? बारिश के दौरान Lonavala किसी जन्नत से कम नहीं लगता। गर्मियों में जो पहाड़ सूखे नजर आते हैं, वे कुछ ही दिनों में हरे रंग की चादर ओढ़ लेते हैं। बादल कई बार सड़कों तक उतर आते हैं और चारों तरफ धुंध फैल जाती है। यहां का मौसम इतना सुहाना हो जाता है कि लोग घंटों सिर्फ प्रकृति को निहारते रहते हैं। यहां के झरने क्यों हैं सबसे बड़ा आकर्षण? मानसून में Lonavala के लगभग हर पहाड़ से पानी बहने लगता है। कुने फॉल्स इस मौसम में बेहद शानदार दिखाई देता है। कैटलधार फॉल्स एडवेंचर पसंद करने वालों को खूब आकर्षित करता है। वहीं रिवर्स वॉटरफॉल का नजारा लोगों को हैरान कर देता है, क्योंकि यहां पानी नीचे गिरने की बजाय हवा के कारण ऊपर उड़ता हुआ दिखाई देता है। यहां में Bhushi Dam क्यों है इतना फेमस? भुशी डैम मानसून में सबसे ज्यादा भीड़ खींचने वाली जगहों में से एक है। बारिश के दौरान यहां सीढ़ियों के ऊपर से पानी बहने लगता है और लोग घंटों पानी में बैठकर बारिश का मजा लेते हैं। दोस्तों के साथ यहां बैठना, बारिश में भीगना और ठंडी हवा महसूस करना एक अलग ही अनुभव देता है। Lonavala में क्या खाएं? बारिश और गरमा-गरम खाने का रिश्ता बहुत खास होता है। यहां का वड़ा पाव, कंदा भजिया, भुट्टे के पकौड़े और कड़क चाय लोगों को खूब पसंद आते हैं। टाइगर पॉइंट पर बैठकर गर्म चाय पीते हुए बादलों को गुजरते देखना हर पर्यटक के लिए यादगार अनुभव बन जाता है। यहां में कौन-कौन सी जगहें घूमें? Lonavala में घूमने के लिए कई शानदार जगहें हैं। भुशी डैम, टाइगर पॉइंट, लायंस पॉइंट, कुने फॉल्स और पवना झील यहां के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में गिने जाते हैं। बारिश के मौसम में इन जगहों की खूबसूरती कई गुना बढ़ जाती है। Lonavala ट्रेकिंग के लिए क्यों है खास? अगर आपको ट्रेकिंग पसंद है, तो Lonavala आपके लिए बेहतरीन जगह है। राजमाची, लोहगढ़ और विसापुर जैसे किलों की ट्रेकिंग मानसून में बेहद रोमांचक हो जाती है। बादलों के बीच इन किलों तक पहुंचने का अनुभव लंबे समय तक याद रहता है। यहां मुंबई और पुणे वालों की पहली पसंद क्यों है? Lonavala की सबसे बड़ी खासियत इसकी लोकेशन है। यह मुंबई और पुणे दोनों शहरों के काफी करीब है। यहां तक पहुंचने में सिर्फ डेढ़ से ढाई घंटे का समय लगता है। यही कारण है कि लोग वीकेंड पर छोटी-सी छुट्टी के लिए सबसे पहले इसी जगह को चुनते हैं। यहां फोटोग्राफी के लिए क्यों है परफेक्ट? बारिश में भीगी सड़कें, पहाड़ों पर तैरते बादल, झरनों का नजारा और हर तरफ फैली हरियाली फोटोग्राफी के लिए परफेक्ट माहौल बनाते हैं। यही वजह है कि आज Lonavala फोटोग्राफर्स और कंटेंट क्रिएटर्स की पसंदीदा जगह बन चुका है। Lonavala जाने का सबसे अच्छा समय कौन-सा है? अगर आप बारिश और हरियाली का असली मजा लेना चाहते हैं, तो जून से सितंबर के बीच यहां जाना सबसे अच्छा माना जाता है। इसी दौरान यहां के झरने अपने पूरे रूप में दिखाई देते हैं और मौसम सबसे ज्यादा सुहाना रहता है। Lonavala कैसे पहुंचें? Lonavala सड़क और रेल दोनों से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है। मुंबई और पुणे से यहां के लिए नियमित ट्रेन और बस सेवाएं उपलब्ध हैं। आप अपनी कार से भी आसानी से यहां पहुंच सकते हैं। मुंबई-पुणे एक्सप्रेस-वे का सफर मानसून में और भी खूबसूरत हो जाता है। Lonavala में कहां रुकें? यहां हर बजट के हिसाब से होटल और रिसॉर्ट उपलब्ध हैं। अगर आप प्रकृति के करीब रहना चाहते हैं, तो पहाड़ियों के बीच बने रिसॉर्ट अच्छे विकल्प हो सकते हैं। वहीं परिवार के साथ आने वाले लोगों के लिए कई आरामदायक होटल भी उपलब्ध हैं। Lonavala क्यों बन गया है Monsoon Wonderland? हरियाली, झरने, ठंडी हवा, स्वादिष्ट खाना, ट्रेकिंग और आसान पहुंच, ये सब चीजें मिलकर Lonavala को एक परफेक्ट मानसून डेस्टिनेशन बनाती हैं। यहां आकर लोगों को शहर की भागदौड़ से कुछ समय दूर रहने और प्रकृति के बीच सुकून के पल बिताने का मौका मिलता है। यहां घूमने से पहले किन बातों का ध्यान रखें? मानसून में यहां काफी भीड़ रहती है, इसलिए सुबह जल्दी निकलने की कोशिश करें। झरनों और खाई के किनारों पर जाने से बचें। हमेशा अच्छी ग्रिप वाले जूते पहनें और अपने फोन व कैमरे के लिए वॉटरप्रूफ कवर जरूर साथ रखें। Five Colors of Travel की ओर से Lonavala के लिए 5 खास सुझाव वीकेंड की बजाय वीकडेज में जाएं, ताकि कम भीड़ मिले। बारिश में ट्रेकिंग करते समय फिसलन से सावधान रहें। गरम कपड़े और एक अतिरिक्त जोड़ी कपड़े साथ रखें। स्थानीय दुकानों से चाय और भजिया का स्वाद जरूर लें। प्लास्टिक और कचरा बिल्कुल न फैलाएं और प्रकृति को साफ रखने में अपना योगदान दें। तो देर किस बात की? अपना रेनकोट, कैमरा और दोस्तों को तैयार कीजिए और निकल पड़िए Lonavala के मानसून मैजिक को महसूस करने।

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भारत का एक मात्र मंदिर जहाँ मूषक नहीं मोर है गणेश जी की सवारी-खासियत जानकर रह जायेंगे दंग

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गणेश चतुर्थी का त्यौहार देश भर में धूमधाम से मनाया जाता है. इस गणेशोत्‍सव में हर कोई गणपति बप्पा की भक्ति में दिलोजान से रमा नजर आता है। गणेश चतुर्थी के इस खास मौके पर हम आपको गणेश जी से जुड़े एक बेहद खूबसूरत और अनोखे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसकी मान्यता और विशेषता सुनकर आप दंग रह जाएंगे, जो है भारत का एक मात्र मंदिर जहाँ मूषक नहीं मोर है गणेश की सवारी… महाराष्ट्र के शहर पुणे की ऐतिहासिक गलियों में स्थित त्रिशुंड गणपति मंदिर एक ऐसा आध्यात्मिक ठिकाना है, जो न केवल अपनी अनोखी मूर्ति के लिए प्रसिद्ध है, बल्कि अपनी स्थापत्य कला, रहस्यमय इतिहास और आध्यात्मिक ऊर्जा के लिए भी श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। यह भारत का शायद इकलौता गणेश मंदिर है, जहां गणपति बप्पा तीन सूंडों (त्रिशुंड), छह भुजाओं और तीन नेत्रों के साथ मोर पर सवार दिखाई देते हैं—जो कि पारंपरिक मूषक वाहन से एकदम अलग और दुर्लभ दृश्य है। इसलिए यह भारत का एक मात्र मंदिर है जहाँ गणेश जी की सवारी मोर है. मंदिरगणेश भक्तों के लिए यह मंदिर एक अनोखा अनुभव है—जहाँ वे न सिर्फ दर्शन करते हैं, बल्कि गणेश के उस रूप से भी जुड़ते हैं जो बल, विवेक और ख़ूबसूरती का प्रतीक है। यह स्थान केवल पुणे की धरोहर नहीं, बल्कि एक ऐसी आध्यात्मिक यात्रा की शुरुआत है, जो बप्पा के मोर-सवार स्वरूप के दर्शन से होती है। कब हुआ था मंदिर का निर्माण मंदिर की नींव 1754 में भिक्षुगिरि गोसावी ने रखी और 1770 में यह बन कर पूरा हुआ। मान्यताओं के अनुसार शुरुआत में यह एक शिव मंदिर था, फिर गणपति मंदिर बन गया। मंदिर संगमरमर व देक्कन बेसाल्ट पत्थर से बना है। बाहरी दीवारों की नक्काशी में घोड़ों, गैंडों, अंग्रेज़ सैनिकों और युद्ध के मैदानों जैसे दृश्य बने हुए हैं। ऐसा माना जाता है कि ये नक्काशी 1757 में हुई प्लासी की लड़ाई के बाद बंगाल और असम पर अंग्रेजों की जीत को दिखाती है। वहीं दूसरी ओर मंदिर की बनावट में मालवा, राजपूताना और द्रविड़ शैलियों का खूबसूरत मेल दिखता है। दीवारों पर तीन लिपियाँ—देवनागरी, संस्कृत और फ़ारसी—मानना हैं कि यह मंदिर सांस्कृतिक और धार्मिक सार्वभौमिकता को दर्शाता है। गुरु पूर्णिमा पर खुलता है मंदिर के विशेष तहखाने का दरवाजा मंदिर में एक तहखाना (जहाँ गोसावी भिक्षुगिरि की समाधि स्थित है) भी है, यहां तपस्वी ध्यान करते थे। ये जगह आमतौर पर बंद रहता है। केवल गुरु पूर्णिमा के दिन ही दर्शन के लिए खोला जाता है। गणेश चतुर्थी पर जगमगा उठता है मंदिर भारत का यह एक मात्र मंदिर -त्रिशुंड गणपति मंदिर खासतौर पर गणेश चतुर्थी और गुरु पूर्णिमा पर रौशनी से जगमगा उठता है। इन दिनों मंदिर को अच्छे से सजाया जाता है,ऐसे खास मौकों पर भजन-कीर्तन, ढोल-मंजीरे और भक्तों की सामूहिक प्रार्थना और भक्ति भाव  पूरे वातावरण को दिव्यता और सौन्दर्यता से भर देते हैं। दूर-दूर से यहाँ भक्त आकर न केवल पूजा-अर्चना करते हैं, बल्कि आत्मिक शांति और आस्था की अनुभूति भी करते हैं। भक्तों का विश्वास है कि यहां से भावपूर्ण भक्ति द्वारा हर मनोकामना पूर्ण होती है यह मंदिर पुणे के सोमवार पेठ (Somwar Peth) इलाके में स्थित है, कमला नेहरू हॉस्पिटल के पास। भक्तों के लिए फाइव कलर्स ऑफ़ ट्रेवल के विशेष सुझाव – 1*भीड़-भाड़ और तंग गलियों में स्थित होने के कारण पार्किंग चुनौतीपूर्ण हो सकती है; सुझाव है कि ऑटो या लोकल परिवहन से आएँ। 2*यदि संभव हो तो सुबह (7–8 ) या शाम (4–6 ) में दर्शन करिए — तब मौसम सुहावना होता है और भीड़ भी थोड़ी कम रहती है। 3*आसपास स्थित अन्य मंदिर (जैसे नागेश्वर मंदिर, जूनी बेलबाग मंदिर) भी दर्शन योग्य हैं। अगर आप यहाँ आये ही हैं तो इन मंदिरों के भी दर्शन कर सकते हैं। बाकी तो सब बढ़िया ही है….. A story by Pardeep Kumar

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कोल्हापुरी चप्पल – गांव की गलियों से अंतर्राष्ट्रीय रैम्प तक

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कोल्हापुरी चप्पल– भारतीय सांस्कृतिक और पारंपरिक हस्तशिल्प की एक अनोखी बनावट, जो न केवल अपनी रंग-रूप और टिकाऊपन के लिए मशहूर है बल्कि यह भारत की कारीगरी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की एक रूपोश कहानी को भी दर्शाती है। महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले में जन्मी इस चप्पल ने न केवल स्थानीय बाजारों तक अपनी पहुँच बनाई बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय फैशन जगत तक अपना खास नाम दर्ज कर एक अलग पहचान का निर्माण किया। आज यह चप्पल सिर्फ एक पहनने की वस्तु नहीं रही बल्कि एक सांस्कृतिक पहचान और प्रतीक बन गई है। जो ग्रामीण भारत की कला, परंपरा, आत्मनिर्भरता और जड़ों से जुड़ाव महसूस कराती है। ये कहानी शुरू कहाँ से हुई? कोल्हापुरी चप्पल की कहानी उस वक्त से शुरू होती है, जब भारत में चमड़े से वस्तुएं बनाना एक पारंपरिक कला और व्यवसाय हुआ करता था। इसे बनाने की प्रक्रिया अद्भुत है, पहले चमड़े को सागौन की छाल या नीम से रंग कर उसे प्राकृतिक रूप से तैयार किया जाता था। तब बिना किसी रासायनिक प्रक्रिया के यह चप्पल पूरी हस्तनिर्मित होती थी। और इस चप्पल की मजबूती की बात की जाए तो यह मानिए यह हाथ से बनी चप्पल वर्षों तक साथ निभाती थी। इस चप्पल की अद्भुत बात यह थी कि यह चप्पल न केवल किसान, मजदूर और ग्रामीण जीवन से जुड़े लोगों की पहली पसंद रही, बल्कि इसे राजघरानों में भी बेहद पसंद किया जाता था । कोल्हापुर की रियासतों के समय से ही यह चप्पल कोल्हापुर के समाज और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा रही है और आज पूरी दुनिया इस कोल्हापुरी चप्पल की मुरीद है। कैसे बनाई जाती हैं कोल्हापुरी चप्पलें? इस चप्पल को बनाने की प्रक्रिया एक जटिल और मेहनत काम है। इसे पूर्णतः  हाथ से बनाया जाता है, जिसमें चमड़े की कटाई, सिलाई, गुंथाई और सजावट शामिल होती है। इस चप्पल की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें किसी भी प्रकार की कील, नट-बोल्ट या मशीनरी का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। इसे पूरी तरह हाथों से बनाया जाता है। आपको यह जानकार आश्चर्य होगा की इस चप्पल की शुरुआत पारंपरिक रूप से पुरुषों के लिए हुई थी। लेकिन हम आज की बात करें तो महिलाओं और बच्चों के लिए भी विभिन्न डिज़ाइनों में चप्पल उपलब्ध हैं, जो इसे और खास, विविध और लोकप्रिय बनाता है। चप्पल की डिज़ाइन में ये जो जटिल बुनाई है, रंगों का संयोजन और उभरी हुई कलात्मक आकृतियाँ हैं, वे इसे एक फैशन स्टेटमेंट बना देती हैं। आजीविका का साधन- कोल्हापुर और इसके आसपास के जिलों सांगली, सोलापुर, सातारा आदि में बसे हुए कारीगरों ने पीढ़ियों से इस कला को जीवित बनाए रखा है। यह मात्र एक व्यापार नहीं है बल्कि उनके जीवन का एक अभिन्न हिस्सा है, जिससे दूर हो पाना उनके लिए सरल नहीं है। क्योंकि कई परिवारों की आजीविका इस कला पर ही निर्भर है। एक समय इस कला के पतन का भी था। जब मशीनों और प्लास्टिक के सस्ते उत्पादों ने इस कला पर प्रतिकूल प्रभाव डाला था लेकिन फिर भी कोल्हापुरी चप्पल अपने परंपरागत शिल्प के कारण जीवित रही। इस विपदा से निपटने के लिए कोल्हापुर और उसके आस-पास के कारीगरों ने खूब संघर्ष किया। आज भी यह कारीगर पीढ़ी दर पीढ़ी अपने बच्चों को इस कला में निपुण बना रहे हैं। यह केवल रोजगार नहीं बल्कि एक पहचान है, एक बहुमूल्य विरासत है। एक प्रीमियम फैशन उत्पाद इसी को देखते हुए, सरकार ने भी इस कला को प्रोत्साहित करने के लिए कई अच्छी योजनाओं की शुरुआत की। कोल्हापुरी चप्पल को ‘जीआई टैग’ भी प्राप्त है। जो इस बात की गारंटी देता है कि यह उत्पाद विशिष्ट क्षेत्र से सम्बन्ध रखता है और उसकी गुणवत्ता भी उसी क्षेत्र के नाम पर केंद्रित है। जीआई टैग अन्तर्राष्ट्रीय मार्केट में इस उत्पाद की वैधता को और भी मजबूत करने का काम करता है। अब यह चप्पल एशिया के अलावा यूरोप, अमेरिका, जापान और खाड़ी वाले देशों तक निर्यात की जाती है। जहां अब इस हस्तकला को एक प्रीमियम फैशन उत्पाद के रूप में देखा जाता है। निर्माण है पूरी तरह से प्राकृतिक इस चप्पल की विशेषता न सिर्फ इसकी बनावट और बुनावट में बल्कि उसके पहनने के एहसास में भी झलकती है। ये चप्पल पैरों में पूरी तरह से फिट हो जाती हैं, उसका चमड़ा मानो सांस लेता हो। इस चप्पल की सबसे खास बात यही है कि गर्मियों में पहनने से भी इससे पैर पसीने से पसीजते नहीं हैं। जिसके कारण इसका उपयोग करने से पैरों में कोई एलर्जी या जलन जैसी समस्या नहीं होती क्योंकि इसका निर्माण पूरी तरह से प्राकृतिक चमड़े होता है। इस चप्पल की खासियत यह है की इसे धोती, कुर्ता, साड़ी, लहंगा किसी भी ड्रेस के साथ पहन सकते हैं। यह सबके के साथ खूब जचती है। यह तो हुई सांस्कृतिक पहनावे की बात, लेकिन यदि मॉडर्न पहनावे की बात की जाये तो जींस, स्कर्ट और पैंट आदि के साथ भी इसे पहना जा सकता है। हर एक ड्रेस के साथ यह एक अलग ही लुक देती है। समय के साथ आए बदलाव हालांकि समय के साथ-साथ इसकी बनावट और डिजाइन में बदलाव आया है। पर इस चप्पल की मूल पहचान आज भी कोल्हापुर की भूमि से जुड़ी हुई है। आजकल कई फैशन ब्रांड्स कोल्हापुर डिज़ाइन को अपनी शृंखला में सम्मिलित कर रहे हैं। नए रंग, नए पैटर्न, फ्लोरल डिज़ाइंस और कढ़ाई जैसी खास सजावट इसे आधुनिक ग्राहकों के लिए आकर्षक बनाती है। वहीं दूसरी ओर पारंपरिक डिज़ाइनों की मांग अब भी बाजार में बनी हुई है, विशेषकर उन ग्राहकों के बीच जो इसकी प्राकृतिक जड़ों के महत्व को समझते हैं। पारंपरिक शैली का एक पुख्ता नमूना इन दिनों जब फैशन उद्योग पूरी तरह मशीनरी और रासायनिक उत्पादों पर आधारित हो गया है, फिर भी कोल्हापुरी चप्पल एक ऐसी मिसाल है, जो टिकाऊ फैशन की ओर इंगित करती है। यह पूरी तरह पर्यावरण के अनुकूल है, स्थानीय शिल्पकारों को रोजगार मुहैया कराती है, और पारंपरिक भारतीय कला और संस्कृति को जीवित रखती है। अब फैशन की दुनिया में ऐसी कम ही चीज़ें होती हैं, जो परंपरा, शैली और टिकाऊपन की और इशारा करती हों और कोल्हापुरी चप्पल उन्हीं दुर्लभ उदाहरणों का एक पुख्ता नमूना है। एक समय में प्लास्टिक

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Tadoba National Park-चंद्रपुर जिले में स्थित है महाराष्ट्र का सबसे बड़ा और पुराना राष्ट्रीय उद्यान

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ताडोबा अंधेरी राष्ट्रीय उद्यान (Tadoba National Park) महाराष्ट्र का सबसे बड़ा और पुराना नेशनल पार्क है जो, चंद्रपुर जिले में स्थित है। यह नेशनल पार्क ताडोबा राष्ट्रीय उद्यान और अंधेरी वन्यजीव अभ्यारण्य का सम्मलित रूप है। ताडोबा नेशनल पार्क लगभग 625 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है और इसकी स्थापना 1955 में हुई थी। सर्वप्रथम, ताडोबा राष्ट्रीय उद्यान को 1955 में नेशनल पार्क बनाया गया था। इसके पश्चात 2008 में अंधेरी वन्यजीव अभ्यारण्य घोषित कर दिया गया था। इसके बाद 1995 में इन दोनों को मर्ज कर दिया गया। ताडोबा और अंधेरी के जंगलों में रहने वाले जनजातियों द्वारा ताडोबा या तरु भगवान की पूजा की जाती है। और इसी भगवान के नाम पर इस राष्ट्रीय उद्यान का नामकरण हुआ है अंधेरी वन्य जीव अभ्यारण का नाम अंधेरी नदी के नाम पर रखा गया है। फॉउना (Fauna in Tadoba National Park) ताडोबा राष्ट्रीय उद्यान में कई प्रकार के फॉउना (Fauna) निवास करते हैं। यहाँ पाए जाने वाले जीवों में बंगाल टाइगर (Bengal Tiger), भारतीय तेंदुआ (Indian Leopard), स्लॉथ भालू (Sloth Bear), गौर (Gaur), सांभर (Sambar), ढोल (Dhole), स्मॉल इंडियन सिवेट (Small Indian Civet), नीलगाय (Nilgai), वाइल्ड कैट्स (Wild Cats), चौसिंगा (Chausingha), बार्किंग डियर (Barking Deer), चीतल (Chital), हनी बैजर (Honey Badger), ग्रे -हेडेड फिश ईगल (Grey-headed Fish Eagle), क्रेस्टेड सर्पेंट ईगल (Crested Serpent Eagle), चेंजेबल हॉक-ईगल (Changeable Hawk-Eagle), इंडियन पिटा (Indian Pitta), क्रेस्टेड ट्रीस्विफ्ट (Crested Treeswift), स्टोन कर्लेव (Stone Curlew), ब्लैक-नेप्ड ब्लू फ्लाईकैचर (Black-naped Blue Flycatcher), पैराडाइज फ्लाईकैचर (Paradise Flycatcher), क्रेस्टेड हनी बज़र्ड (Crested Honey Buzzard), ब्रॉन्ज-विंग्ड जैकाना (Bronze-winged Jacana), लेसर गोल्डनबैक्ड वुडपेकर (Lesser Goldenbacked Woodpecker), ऑरेंज-हेडेड थ्रश (Orange-headed Thrush), भारतीय मोर (Indian Peacock), मॉर्मन (Mormon), मोनार्क (Monarch), स्वोर्डटेल (Swordtail), मार्श मगरमच्छ (Marsh Crocodile), भारतीय मॉनिटर टेरापिंस (Indian Monitor Terrapins), इंडियन पाइथन (Indian Python), भारतीय स्टार कछुआ (Indian Star Tortoise), इंडियन कोबरा (Indian Cobra) और रसेल वाइपर (Russell’s Viper) शामिल है। फ्लोरा (Flora in Tadoba National Park) अगर बात की जाए ताडोबा नेशनल पार्क के फ्लोरा की तो, यहाँ पायी जाने वाली वन की प्रजाति दक्षिणी उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती है। यहाँ पाए जाने वाले वृक्षों की प्रजातियों में सागौन (Teak), क्रोकोडाइल बार्क (Crocodile Bark), बीजा (Beeja), हल्द (Hald), तेंदू (Tendu), सेमल (Semal), सलाई (Salai), बहेड़ा (Bahera), हिरदा (Hirda), कराया गोंद (Karaya Gum), फ्लेम-ऑफ-द-फॉरेस्ट (Flame-of-the-Forest), क्रेप मर्टल (Crape Myrtle), लानिया कोरोमंडेलिका (Lania coromandelica), एक्सलवुड (Axlewood), अर्जुन (Arjun) और ब्लैक प्लम (Black Plum) शामिल हैं। बेस्ट टाइम टू विजिट ताडोबा नेशनल पार्क (Best time to visit Tadoba National Park) यदि आप ताडोबा राष्ट्रीय उद्यान घूमने जाना चाहते है तो समर (Summer) के समय यहाँ जाना के प्लानिंग से बचे। इसका कारण यह है कि इस अवधि में यहाँ बहुत गर्मी होती है जिसके कारण आप इस नेशनल पार्क में अच्छी तरह से नहीं घूम पाएंगे। यदि आप गोरुमारा राष्ट्रीय उद्यान को अच्छी तरह से एक्सप्लोर करना चाहते है तो आप यहाँ ठंड के महीनों (नवंबर से मार्च) में आ सकते है। कैसे पहुंचे ताडोबा राष्ट्रीय उद्यान (How to reach Tadoba National Park)?