गुजरात का नाम लेते ही हमारे मन में समुद्र तट, गिर के शेर और अहमदाबाद की चहल-पहल उतर आती है, लेकिन जब हम उत्तर गुजरात की ओर बढ़ते हैं, तो अरावली की शांत और रहस्यमयी पहाड़ियों के बीच बसा एक ऐसा तीर्थ नजर आता है, जो हर भक्त को अपनी ओर खींच लेता है। यह जगह है अम्बाजी मंदिर है जिसे मां अम्बा का पवित्र धाम कहा जाता है।
मंदिर में आप वैसा ही अनुभव करेंगे, जैसा एक छोटा बच्चा अपनी मां की गोद में महसूस करता है!
अम्बाजी सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि यह वह स्थान है, जहां हजारों सालों से आस्था की ज्योति प्रज्वलित है। यहां पर कदम रखते ही एक शांति और ऊर्जा का अनुभव होता है और वास्तव में यह ऊर्जा खास है। मंदिर का वातावरण भक्तों के जयकारों, घंटियों की आवाज़ और धूप-अगरबत्ती की सुगंध से भर जाता है। कहा जाता है कि अम्बाजी मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है। मान्यता है कि जब भगवान शिव माता सती के शरीर को लेकर तांडव कर रहे थे, तब उनके हृदय का हिस्सा यहीं गिरा था। इसी वजह से यह स्थान शाक्त परंपरा का एक प्रमुख केंद्र माना जाता है।

मंदिर के गर्भगृह में कोई प्रतिमा नहीं है, बल्कि एक श्री यंत्र स्थापित है, जो मां शक्ति का प्रतीक है। यही इसे अन्य मंदिरों से अलग और रहस्यमयी बनाता है। मंदिर का स्वरूप भव्य है। सफेद संगमरमर से बनी इसकी दीवारें दूर से ही चमक उठती हैं। नवरात्रि के समय तो मानिए यह मंदिर किसी स्वर्ग से कम नहीं लगता। जैसे-जैसे आप मंदिर के करीब जाते हैं, वैसा लगता है मानो आप किसी दिव्य लोक में प्रवेश कर रहे हों। मंदिर के सामने का विशाल चौक हमेशा श्रद्धालुओं से भरा रहता है, जो माथे पर चुनरी बांधकर और हाथों में नारियल, फूल और मिठाई लिए मां के दर्शन के लिए कतार में खड़े होते हैं। यहां आने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ साल भर लगी रहती है, और खासकर पूर्णिमा के मेले में तो लाखों लोग यहां उमड़ पड़ते हैं। जो मेला सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं है बल्कि आस्था और संस्कृति का महाकुंभ आप इसे कह सकते है।
अम्बाजी मंदिर अतीत के आईने में..
अम्बाजी मंदिर का इतिहास बेहद रोचक और पौराणिक कथाओं से जुड़ा हुआ है। माँ शक्ति की आराधना आदिकाल से होती रही है और अम्बाजी उस परंपरा का जीता-जागता प्रतीक है। स्कंद पुराण और मार्कंडेय पुराण जैसे ग्रंथों में भी इसका उल्लेख मिलता है। किंवदंती के अनुसार, यह वही स्थान है जहां देवी सती का हृदय गिरा था। तभी से यहां मां अम्बा की पूजा शुरू हुई। खास बात यह है कि मंदिर के गर्भगृह में कोई मूर्ति नहीं है। केवल एक श्री यंत्र है, जो त्रिकोण और बिंदुओं से बना शक्ति का रहस्यमयी प्रतीक है। भक्त उसी श्री यंत्र की पूजा करते हैं। लोगों का मानना है कि इस मंदिर का निर्माण 7वीं शताब्दी में हुआ था। बाद में, इसमें कई बार पुनर्निर्माण और विस्तार हुआ।

गुजरात और राजस्थान के राजाओं ने इसे अपनी आस्था और शौर्य का प्रतीक माना और मंदिर को संरक्षित करने में योगदान भी दिया। मुगल काल में जब कई मंदिर तोड़े गए, तब भी अम्बाजी मंदिर सुरक्षित रहा। कहा जाता है कि यहां की अद्भुत ऊर्जा और स्थानीय लोगों की आस्था ने इस धाम को हमेशा संरक्षित किया। अम्बाजी का महत्व इतना है कि गुजरात और राजस्थान ही नहीं बल्कि पूरे भारत से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। नवरात्रि के समय तो मंदिर की रौनक अद्वितीय हो जाती है। ढोल-नगाड़ों की धुन, गरबा की थाप और माँ के भजन मंदिर के माहौल को अलौकिक बना देते हैं। यहां से जुड़ी एक और पौराणिक कथा है- अरासुर पर्वत की। मान्यता है कि जब देवताओं और असुरों के बीच युद्ध हुआ था, तब माँ अम्बा ने इसी पर्वत पर असुरों का वध किया और देवताओं की रक्षा की। आज भी यह पर्वत मंदिर से थोड़ी दूरी पर स्थित है और भक्त वहाँ जाकर मां का स्मरण करते हैं।
उत्सव मेला और नवरात्रि की धूम
अम्बाजी मंदिर की असली भव्यता तब देखने को मिलती है, जब यहां पूर्णिमा का मेला लगता है। यह मेला पूरे गुजरात और राजस्थान से लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। लोग दूर-दराज़ से पैदल यात्रा करते हुए “जय मां अम्बे” के जयकारे लगाते हुए यहां पहुंचते हैं। उस समय अम्बाजी कस्बा रंग-बिरंगे झंडों, रोशनी और भक्तों की भीड़ से भर जाता है। नवरात्रि का उत्सव भी यहां अद्वितीय होता है। मंदिर में गरबा और डांडिया की धूम मचती है।
हर शाम मां की आरती के बाद ढोल-नगाड़ों और भजनों की गूंज चारों ओर फैल जाती है। यहां का गरबा केवल नृत्य नहीं, बल्कि माँ के प्रति भक्ति का भाव होता है। मेला सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह गुजरात की संस्कृति और परंपरा का भी प्रदर्शन है। यहां लोकनृत्य, लोकगीत और पारंपरिक भोजन यात्रियों को आकर्षित करते हैं। बच्चों के लिए झूले, खिलौनों की दुकानें और मिठाइयों की महक इस मेले को और जीवंत बना देती है। अम्बाजी में त्यौहार के समय यह अनुभव किसी महाकुंभ से कम नहीं होता। चाहे आप भक्त हों या पर्यटक, यहां का माहौल आपको जीवनभर याद रहेगा।
अम्बाजी यात्रा में कहां ठहरें और क्या स्वाद लें
अम्बाजी कस्बे में हर प्रकार के यात्रियों के ठहरने की सुविधा उपलब्ध है। यहां अच्छे बजट में होटल, धर्मशालाएं और रिसॉर्ट्स सभी मिलते हैं। मंदिर ट्रस्ट भी यात्रियों के लिए अच्छी और स्वच्छ धर्मशालाएं उपलब्ध कराता है। आसपास के शहरों जैसे माउंट आबू या पालनपुर में भी अच्छे होटल हैं, जहां से अम्बाजी तक पहुंचना आसान है। अब बात करें खाने की। तो अम्बाजी में गुजराती थाली का स्वाद लेना न भूलें। फाफड़ा-जलेबी, थेपला, ढोकला और खांडवी जैसी चीज़ें यहां हर गली-चौराहे पर मिल जाती हैं। मंदिर के प्रसाद में मिलने वाला लड्डू विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
इसके अलावा, सड़क किनारे की दुकानों पर मिलने वाली छाछ, कढ़ी-खिचड़ी और गुजराती मिठाइयां यात्रियों का मन मोह लेती हैं। यात्रा के दौरान गब्बर पहाड़ी पर चढ़ते समय मिलने वाली कचौड़ी और गरमागरम चाय की चुस्की तो जैसे इस सफर का सबसे जरूरी हिस्सा बन जाती है। यहां का स्थानीय स्वाद आपको गुजरात की असली आत्मा से परिचित कराता है।
क्यों खास है, यह अंबाजी का मंदिर?
अम्बाजी मंदिर सिर्फ पूजा-अर्चना का स्थान नहीं, बल्कि यह इतिहास, आस्था, संस्कृति और प्रकृति का संगम है। अरावली की गोद में बसा यह धाम हर यात्री को आध्यात्मिक ऊर्जा और शांति प्रदान करता है। यहां की यात्रा जीवन भर की यादों में बस जाती है। चाहे आप धार्मिक भाव से आए हों या एक पर्यटक की तरह, अम्बाजी मंदिर आपको निराश नहीं करेगा। खास इसलिए भी क्योंकि नवरात्रि के समय यह मंदिर इतना सजाया जाता है की कोई भी सैलानी या श्रद्धालु यहां से बापिस जाने के लिए तैयार नहीं होते। जब में वहां पहुंचा तो मानो मुझे ऐसा लगा जैसे मैं किसी नई दुनिया में आ गया हुं। वास्तव में इस जगह की इस मंदिर की जितनी खूबियां गिनाऊं वे सब कम हैं।

कीजिए अम्बाजी की यात्रा और उठाइए हसीन नजारों का लुत्फ़
अम्बाजी मंदिर की यात्रा अपने आप में एक रोमांचक अनुभव है। यहां पहुंचना जितना आसान है, उतना ही सुंदर भी है। यह मंदिर बनासकांठा जिले में स्थित है और गुजरात-राजस्थान की सीमा के पास है। अगर आप सड़क मार्ग से आ रहे हैं, तो अहमदाबाद से अम्बाजी की दूरी लगभग 180 किलोमीटर है। रास्ते में अरावली की पहाड़ियां, हरे-भरे खेत और गांव की जीवनशैली देखने को मिलती है। यह सफर अपने आप में एक पर्यटन है। अहमदाबाद, पालनपुर, उदयपुर और माउंट आबू से यहां के लिए नियमित बसें और टैक्सी मिल जाती हैं। रेल मार्ग से आने वालों के लिए सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन अबू रोड है, जो लगभग 20 किलोमीटर दूर है। वहां से टैक्सी या बस लेकर मंदिर पहुंचा जा सकता है। अगर आप हवाई यात्रा करना चाहते हैं, तो अहमदाबाद और उदयपुर सबसे नजदीकी एयरपोर्ट हैं।
यात्रा के दौरान जैसे-जैसे आप अम्बाजी कस्बे की ओर बढ़ते हैं, सड़कों पर मां अम्बा के झंडे और रंग-बिरंगे स्वागत द्वार नजर आते हैं। दुकानों में प्रसाद, चुनरी और मां की तस्वीरें सजाई रहती हैं। स्थानीय लोग बड़े आत्मीय भाव से यात्रियों का स्वागत करते हैं। अम्बाजी का मुख्य मंदिर पहाड़ी के नीचे स्थित है, लेकिन यहां से थोड़ी दूरी पर गब्बर पहाड़ी है, जिसे माँ का मूल स्थान माना जाता है। गब्बर तक जाने के लिए श्रद्धालु सीढ़ियां चढ़ते हैं या फिर अब यहां लगी रोपवे सेवा का आनंद ले सकते हैं। ऊपर पहुंचने पर गंगा-जमुना की घाटी का नज़ारा इतना मनमोहक होता है कि थकान पलभर में दूर हो जाती है।

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