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Spiritual Tourism का बढ़ता ट्रेंड- युवाओं की नई ट्रैवल लिस्ट में टॉप पर है गंगा आरती!

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ट्रैवल हमेशा से युवाओं की जिंदगी का अहम हिस्सा रहा है। नई जगहें देखना, अलग संस्कृति को महसूस करना और रोज़मर्रा की भागदौड़ से कुछ समय दूर रहना आज की पीढ़ी की प्राथमिकता बन चुका है। भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में तो यात्रा के अनगिनत रंग हैं- कहीं पहाड़ों की ठंडी वादियां, कहीं समुद्र किनारे सुकून, तो कहीं रेगिस्तान की अनोखी खूबसूरती। बीते कुछ वर्षों तक युवाओं की ट्रैवल लिस्ट में बीच डेस्टिनेशन और नाइटलाइफ़ का क्रेज ज्यादा दिखता था, और Goa का नाम छुट्टियों का पर्याय माना जाता था। लेकिन अब यह ट्रेंड धीरे-धीरे बदल रहा है। (Spiritual Tourism) आज का युवा सिर्फ पहाड़ों या बीच पर घूमने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि वह यात्रा में अनुभव, आत्मिक शांति और सांस्कृतिक जुड़ाव भी तलाश रहा है। यही वजह है कि Varanasi, Haridwar और Rishikesh जैसे शहर तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं, जहां शाम की गंगा आरती और आध्यात्मिक माहौल युवाओं को एक नए तरह का सुकून और जुड़ाव महसूस कराता है। क्यों की जाती है गंगा की आरती गंगा की आरती मुख्य रूप से माँ गंगा के प्रति अपना सम्मान, श्रद्धा और आभार (gratitude) प्रकट करने के लिए की जाती है। यह पवित्र अनुष्ठान इस गहरे विश्वास पर टिका है कि गंगा नदी भक्तों के पापों को धोती है और उनकी आत्मा को शुद्ध कर मोक्ष की ओर ले जाती है। आरती का एक अर्थ ‘दुखों को दूर करने वाली’ भी है, इसलिए भक्त इसे अपने जीवन के कष्टों को मिटाने के लिए करते हैं। इसमें जलाए जाने वाले दीये और अग्नि अज्ञानता के अंधेरे को मिटाने और ज्ञान व स्पष्टता का स्वागत करने के प्रतीक माने जाते हैं। यह अनुष्ठान इस बात की स्वीकृति है कि गंगा केवल पानी का जरिया नहीं बल्कि जीवन को पालने वाली एक दिव्य शक्ति है, जिसे धन्यवाद कहना हमारा कर्तव्य है। शाम (संध्या) के समय यह आयोजन करने से नदी की पवित्रता (sanctity) बनी रहती है और यह लोगों को आध्यात्मिक रूप से नई ऊर्जा और शांति प्रदान करता है। गंगा आरती माँ गंगा को उनके आशीर्वाद के बदले में भक्तों द्वारा दिया गया प्रेम और पूर्ण समर्पण है। सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, ये है एक सामूहिक अनुभव गंगा आरती सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक सामूहिक अनुभव है। जब सूरज ढलता है और घाटों पर दीपों की कतारें जगमगाने लगती हैं, शंखनाद गूंजता है और मंत्रोच्चार की लय वातावरण को भर देती है, तो वहां मौजूद हर शख्स कुछ पल के लिए अपने भीतर झांकने लगता है। खासतौर पर Dashashwamedh Ghat की आरती को देखने के लिए देश-विदेश से लोग पहुंचते हैं। इसी तरह Har Ki Pauri पर होने वाली आरती भी युवाओं के बीच खास आकर्षण बन चुकी है। सोशल मीडिया ने भी इस ट्रेंड को नई रफ्तार दी है। इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर घाटों की सुनहरी शाम, बहती गंगा में तैरते दीप और मंत्रों की गूंज वाली रील्स लाखों व्यूज़ बटोर रही हैं। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि यहां आने वाले कई युवा सिर्फ कंटेंट बनाने नहीं, बल्कि डिजिटल भागदौड़ से कुछ समय दूर रहने के लिए भी पहुंच रहे हैं। क्यों बढ़ रहा है ‘Spiritual Tourism’ का क्रेज? एक बड़ा कारण है बदलती लाइफस्टाइल। तेज़ रफ्तार जिंदगी, करियर का दबाव और लगातार ऑनलाइन रहने की आदत ने मानसिक थकान बढ़ाई है। ऐसे में आध्यात्मिक स्थलों की यात्रा लोगों को ‘डिजिटल डिटॉक्स’ का मौका देती है। घाट पर बैठकर बहते पानी को देखना, आरती की धुन में खो जाना और कुछ पल के लिए फोन को साइड रखना—ये छोटी-छोटी बातें भी गहरा असर छोड़ती हैं। दूसरा कारण है बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर। पिछले कुछ वर्षों में वाराणसी और हरिद्वार जैसे शहरों में घाटों का सौंदर्यीकरण, सड़क और रेलवे कनेक्टिविटी में सुधार, और पर्यटन सुविधाओं का विस्तार हुआ है। इससे युवाओं के लिए यहां पहुंचना पहले से आसान और सुविधाजनक हो गया है। तीसरा पहलू है ‘अनुभव आधारित पर्यटन’। आज का ट्रैवलर सिर्फ जगह देखना नहीं चाहता, बल्कि उस जगह को महसूस करना चाहता है। गंगा आरती के दौरान सामूहिक प्रार्थना में शामिल होना, घाट किनारे बैठकर चाय पीना, सुबह-सुबह नाव की सैर करना- ये सब मिलकर एक ऐसा अनुभव बनाते हैं जो यादों में लंबे समय तक रहता है। केबल बुजुर्ग ही नहीं युवा भी इस आरती में शामिल होंते है दिलचस्प बात यह है कि आध्यात्मिक पर्यटन अब केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रहा। ऋषिकेश में योग, ध्यान और रिवर राफ्टिंग का कॉम्बिनेशन युवाओं को खासा आकर्षित कर रहा है। वाराणसी में सुबह की नाव यात्रा और शाम की आरती एक ही ट्रिप में शांति और संस्कृति दोनों का अनुभव दे देती है। इस तरह आध्यात्मिकता और हल्के एडवेंचर का मेल नई पीढ़ी के ट्रैवल पैटर्न को बदल रहा है। क्या यह ट्रेंड आगे भी जारी रहेगा? टूरिज्म एक्सपर्ट्स मानते हैं कि आने वाले समय में ‘स्पिरिचुअल टूरिज्म’ और तेजी से बढ़ सकता है। कारण साफ है—लोग अब सिर्फ घूमने नहीं, बल्कि खुद को समझने और भीतर की शांति खोजने भी निकल रहे हैं। गंगा आरती जैसे आयोजनों में उन्हें वह सामूहिक ऊर्जा और सकारात्मकता मिलती है, जो किसी बीच पार्टी या क्लब नाइट में शायद नहीं मिल पाती। कुल मिलाकर, गोवा की चमक-दमक अपनी जगह है, लेकिन घाटों पर जलते दीप और गूंजती आरती की आवाज़ आज की युवा पीढ़ी को एक अलग ही तरह का सुकून दे रही है। ट्रैवल की यह नई दिशा बता रही है कि आने वाले दौर में पर्यटन सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्मिक अनुभव का जरिया भी बनेगा।

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गीता जयंती 1 दिसंबर 2025 को मनाई जाएगी! कुरुक्षेत्र में नजर आएंगी महाभारत की झलकियां!

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गीता जयंती उत्सव गीता जयंती हर साल मार्गशीर्ष मा​ह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। यह सिर्फ एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि भारत की आध्यात्मिक धरोहर की सबसे गहरी परंपरा है। यह वही दिन माना जाता है जब श्रीकृष्ण ने महाभारत के युद्धभूमि कुरुक्षेत्र में अर्जुन को जीवन का सबसे बड़ा उपदेश श्रीमद्भगवद्गीता सुनाया था। कहते हैं कि जब अर्जुन मोह, शंका, डर और उलझन में डूब गया था, तब भगवान कृष्ण ने उसे कर्म और धर्म की ऐसी सीख दी, जो न सिर्फ उस समय में बल्कि आज भी हर इंसान के लिए उतनी ही जरूरी है। यही वजह है कि कुरुक्षेत्र को धर्मक्षेत्र कहा जाता है। इसकी मिट्टी से लेकर हवाओं तक में वो कंपन महसूस होते हैं जिन्हें लोग दिव्य ऊर्जा कहते हैं। इतिहासकार बताते हैं कि इस धरती पर करीब 5000 साल पहले वह संवाद हुआ था जिसने आध्यात्मिक चिंतन का रास्ता बदल दिया। गीता जयंती क्यों मनाई जाती है? गीता जयंती इसलिए मनाई जाती है क्योंकि यह वह दिन है जब हमारी संस्कृति को सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ का उपदेश मिला। यह उत्सव हमें याद दिलाता है कि जीवन सिर्फ भौतिक चीजों का खेल नहीं है, बल्कि कर्म, जिम्मेदारी, प्रेम, नैतिकता और संतुलन की यात्रा है। इसकी सबसे अनोखी बात यह है कि यह उत्सव किसी एक धर्म तक सीमित नहीं है इसके संदेश सार्वभौमिक हैं। आप दुनिया के किसी कोने से हों, किसी भी पंथ को मानते हों, गीता आपको अपने मन की उलझनें सुलझाने का रास्ता दिखाती है। इसी वजह से गीता जयंती अब एक वैश्विक आयोजन बन चुका है। कुरुक्षेत्र में लोग मानते हैं कि 1 दिसंबर का सूरज जैसे ही उगता है, उसके साथ धरती पर कुछ पवित्र सा उतर आता है कुछ ऐसा जो मन को शांत और दिल को हल्का कर देता है।(इतिहासकार बताते हैं कि इस धरती पर करीब 5000 साल पहले वह संवाद हुआ था ) कैसे मनाया जाता है यह पावन उत्सव? गीता जयंती के दिन कुरुक्षेत्र पूरी तरह त्यौहार के रंग में रंग जाता है। ब्रह्मसरोवर और ज्योतिसरोवर के किनारे सुबह-सुबह मंत्रोच्चार की गूंज होते हुए सुनाई देती है। साधु-संत, विद्वान, विद्यार्थी, पर्यटक—हर कोई इस दिव्य माहौल का हिस्सा बन जाता है। यहां गीता पाठ, दीपदान, शोभा यात्रा, धर्म सभा, कलात्मक झांकियां, और महाभारत पर आधारित नाटक आयोजित होते हैं। हज़ारों लोग सामूहिक रूप से गीता का पाठ करते हैं, जो एक अनोखा दृश्य होता है। रात को दीपदान का दृश्य तो जैसे स्वर्ग जैसा लगता है हजारों दीपक पानी पर तैरते हुए अद्भुत झिलमिलाहट पैदा करते हैं। दुकानों में पवित्र प्रतीक, शंख, गीता ग्रंथ, और हस्तशिल्प बिकते हैं। यह पूरा माहौल न सिर्फ धार्मिक होता है, बल्कि कला, संस्कृति और लोक रंगों से भी भरपूर होता है। कला और कुरुक्षेत्र का आकर्षक सेटअप कुरुक्षेत्र में गीता जयंती के दौरान तैयार की जाने वाली कलात्मक सजावट इसके मुख्य आकर्षण में से एक है। शहर भर में महाभारत थीम पर शिल्प कृतियां और इंस्टॉलेशन्स लगाए जाते हैं। आर्टिस्ट बड़े-बड़े लकड़ी और फाइबर के मॉडल बनाते हैं जिनमें अर्जुन का रथ, श्रीकृष्ण का सारथ्य, चक्र, शंख और युद्धभूमि के दृश्य शामिल होते हैं। कई जगहों पर रेत से बनी कलाकृतियां पर्यटकों का मन मोह लेती हैं। ब्रह्मसरोवर को रंग-बिरंगी रोशनी से सजाया जाता है, जिससे लगता है कि पूरा तालाब किसी महाकथा का जीवित हिस्सा बन गया हो। इस दौरान यहां का स्ट्रीट फूड, स्थानीय हरियाणवी कढ़ाई, जूट वर्क, लकड़ी की कला और पारंपरिक वाद्य यंत्रों की झलक भी देखने को मिलती है। एक तरह से यह पूरा उत्सव कला, अध्यात्मऔर इतिहास को एक साथ दिखाने वाला जीवंत मंच बन जाता है। गीता से जुड़ी पौराणिक कहानी हर यात्री इस उत्सव में आकर सबसे पहले उस कहानी को महसूस करता है जिसे हम बचपन से सुनते आ रहे हैं अर्जुन का द्वंद्व। जब दोनों सेनाएं आमने-सामने थीं, तब अर्जुन करुणा में भर गया। उसे अपने ही रिश्तेदारों, गुरुओं और मित्रों के खिलाफ लड़ने का दुख हुआ। तभी श्रीकृष्ण ने उसे जीवन का वह महान संदेश दिया जिसमें कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग जैसे सिद्धांत समाए हुए हैं। कहते हैं कि कुरुक्षेत्र की भूमि पर वह संदेश सिर्फ अर्जुन को नहीं, पूरी मानवता को दिया गया था। यही वजह है कि युग बदल गए, लेकिन गीता के शब्द आज भी लोगों की जिंदगी संभालते हैं। कोई निराश हो, परेशान हो, डरा हो या रास्ता खो गया हो गीता उसे फिर से खड़ा कर देती है। इसी संदेश के आदर में लोग हर साल यहां आकर भगवान कृष्ण की इस दिव्य वाणी को श्रद्धांजलि देते हैं। कुरुक्षेत्र कैसे पहुंचें? यात्रियों के लिए आसान गाइड अगर आप 1 दिसंबर को गीता जयंती के समय कुरुक्षेत्र पहुंचना चाहते हैं तो यह सफर बेहद आसान है। दिल्ली से कुरुक्षेत्र लगभग 160 किलोमीटर दूर है और सड़क से 3 से 3.5 घंटे में पहुंचा जा सकता है। हरियाणा रोडवेज की बसें, वोल्वो और टैक्सी की सुविधा आसानी से मिल जाती है। रेलमार्ग की बात करें तो कुरुक्षेत्र जंक्शन उत्तर भारत के प्रमुख रूट से जुड़ा है दिल्ली, लखनऊ, जयपुर, चंडीगढ़, अमृतसर सभी जगहों से ट्रेनें आती हैं। निकटतम हवाई अड्डा चंडीगढ़ एयरपोर्ट है, जो लगभग 95–100 किमी दूर है। शहर में ऑटो, ई-रिक्शा और लोकल टैक्सी आसानी से मिल जाती हैं। ब्रह्मसरोवर, ज्योतिसरोवर, कृष्ण संग्रहालय, हैंडीक्राफ्ट बाजार और महाभारत से जुड़े कई स्थल बहुत नजदीक हैं, इसलिए घूमने में ज्यादा दिक्कत नहीं होती। फाइव कलर्स ऑफ ट्रैवल की तरफ से पांच यात्रा सुझाव 1. सुबह-सुबह ब्रह्मसरोवर पहुंचे: सूर्य की पहली किरण के साथ मंत्रोच्चार का अनुभव जीवनभर याद रहेगा। 2. लोकल कला: लकड़ी की कलाकृतियां, जूट वर्क और गीता थीम वाले शोपीस बहुत खास होते हैं। 3. स्ट्रीट फूड ट्राई करें: हरियाणवी कढ़ी-चावल, मिस्सी रोटी, देसी घी वाली मिठाइयां ट्रैवल का मज़ा दोगुना कर देती हैं। 4. आरामदायक कपड़े और पावर बैंक साथ रखें: भीड़ काफी होती है और फोटोग्राफी के मौके भी। 5. रात का दीपदान मिस न करें: यह इस उत्सव की सबसे खूबसूरत चीज़ है यहां तक कि कैमरा भी उस दृश्य का न्याय नहीं कर पाता। आपको इसे अपनी आँखों से देखना चाहिए। भक्त क्या करें? गीता जयंती जैसे पावन अवसर पर भक्तों के लिए सबसे पहली

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जानिए कहाँ गिरा था माता सती का हृदय? माँ अम्बा का पवित्र धाम..

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गुजरात का नाम लेते ही हमारे मन में समुद्र तट, गिर के शेर और अहमदाबाद की चहल-पहल उतर आती है, लेकिन जब हम उत्तर गुजरात की ओर बढ़ते हैं, तो अरावली की शांत और रहस्यमयी पहाड़ियों के बीच बसा एक ऐसा तीर्थ नजर आता है, जो हर भक्त को अपनी ओर खींच लेता है। यह जगह है अम्बाजी मंदिर है जिसे मां अम्बा का पवित्र धाम कहा जाता है। मंदिर में आप वैसा ही अनुभव करेंगे, जैसा एक छोटा बच्चा अपनी मां की गोद में महसूस करता है! अम्बाजी सिर्फ एक मंदिर नहीं, बल्कि यह वह स्थान है, जहां हजारों सालों से आस्था की ज्योति प्रज्वलित है। यहां पर कदम रखते ही एक शांति और ऊर्जा का अनुभव होता है और वास्तव में यह ऊर्जा खास है। मंदिर का वातावरण भक्तों के जयकारों, घंटियों की आवाज़ और धूप-अगरबत्ती की सुगंध से भर जाता है। कहा जाता है कि अम्बाजी मंदिर 51 शक्तिपीठों में से एक है। मान्यता है कि जब भगवान शिव माता सती के शरीर को लेकर तांडव कर रहे थे, तब उनके हृदय का हिस्सा यहीं गिरा था। इसी वजह से यह स्थान शाक्त परंपरा का एक प्रमुख केंद्र माना जाता है। मंदिर के गर्भगृह में कोई प्रतिमा नहीं है, बल्कि एक श्री यंत्र स्थापित है, जो मां शक्ति का प्रतीक है। यही इसे अन्य मंदिरों से अलग और रहस्यमयी बनाता है। मंदिर का स्वरूप भव्य है। सफेद संगमरमर से बनी इसकी दीवारें दूर से ही चमक उठती हैं। नवरात्रि के समय तो मानिए यह मंदिर किसी स्वर्ग से कम नहीं लगता। जैसे-जैसे आप मंदिर के करीब जाते हैं, वैसा लगता है मानो आप किसी दिव्य लोक में प्रवेश कर रहे हों। मंदिर के सामने का विशाल चौक हमेशा श्रद्धालुओं से भरा रहता है, जो माथे पर चुनरी बांधकर और हाथों में नारियल, फूल और मिठाई लिए मां के दर्शन के लिए कतार में खड़े होते हैं। यहां आने वाले श्रद्धालुओं की भीड़ साल भर लगी रहती है, और खासकर पूर्णिमा के मेले में तो लाखों लोग यहां उमड़ पड़ते हैं। जो मेला सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं है बल्कि आस्था और संस्कृति का महाकुंभ आप इसे कह सकते है। अम्बाजी मंदिर अतीत के आईने में.. अम्बाजी मंदिर का इतिहास बेहद रोचक और पौराणिक कथाओं से जुड़ा हुआ है। माँ शक्ति की आराधना आदिकाल से होती रही है और अम्बाजी उस परंपरा का जीता-जागता प्रतीक है। स्कंद पुराण और मार्कंडेय पुराण जैसे ग्रंथों में भी इसका उल्लेख मिलता है। किंवदंती के अनुसार, यह वही स्थान है जहां देवी सती का हृदय गिरा था। तभी से यहां मां अम्बा की पूजा शुरू हुई। खास बात यह है कि मंदिर के गर्भगृह में कोई मूर्ति नहीं है। केवल एक श्री यंत्र है, जो त्रिकोण और बिंदुओं से बना शक्ति का रहस्यमयी प्रतीक है। भक्त उसी श्री यंत्र की पूजा करते हैं। लोगों का मानना है कि इस मंदिर का निर्माण 7वीं शताब्दी में हुआ था। बाद में, इसमें कई बार पुनर्निर्माण और विस्तार हुआ। गुजरात और राजस्थान के राजाओं ने इसे अपनी आस्था और शौर्य का प्रतीक माना और मंदिर को संरक्षित करने में योगदान भी दिया। मुगल काल में जब कई मंदिर तोड़े गए, तब भी अम्बाजी मंदिर सुरक्षित रहा। कहा जाता है कि यहां की अद्भुत ऊर्जा और स्थानीय लोगों की आस्था ने इस धाम को हमेशा संरक्षित किया। अम्बाजी का महत्व इतना है कि गुजरात और राजस्थान ही नहीं बल्कि पूरे भारत से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। नवरात्रि के समय तो मंदिर की रौनक अद्वितीय हो जाती है। ढोल-नगाड़ों की धुन, गरबा की थाप और माँ के भजन मंदिर के माहौल को अलौकिक बना देते हैं। यहां से जुड़ी एक और पौराणिक कथा है- अरासुर पर्वत की। मान्यता है कि जब देवताओं और असुरों के बीच युद्ध हुआ था, तब माँ अम्बा ने इसी पर्वत पर असुरों का वध किया और देवताओं की रक्षा की। आज भी यह पर्वत मंदिर से थोड़ी दूरी पर स्थित है और भक्त वहाँ जाकर मां का स्मरण करते हैं। उत्सव मेला और नवरात्रि की धूम अम्बाजी मंदिर की असली भव्यता तब देखने को मिलती है, जब यहां पूर्णिमा का मेला लगता है। यह मेला पूरे गुजरात और राजस्थान से लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। लोग दूर-दराज़ से पैदल यात्रा करते हुए “जय मां अम्बे” के जयकारे लगाते हुए यहां पहुंचते हैं। उस समय अम्बाजी कस्बा रंग-बिरंगे झंडों, रोशनी और भक्तों की भीड़ से भर जाता है। नवरात्रि का उत्सव भी यहां अद्वितीय होता है। मंदिर में गरबा और डांडिया की धूम मचती है। हर शाम मां की आरती के बाद ढोल-नगाड़ों और भजनों की गूंज चारों ओर फैल जाती है। यहां का गरबा केवल नृत्य नहीं, बल्कि माँ के प्रति भक्ति का भाव होता है। मेला सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह गुजरात की संस्कृति और परंपरा का भी प्रदर्शन है। यहां लोकनृत्य, लोकगीत और पारंपरिक भोजन यात्रियों को आकर्षित करते हैं। बच्चों के लिए झूले, खिलौनों की दुकानें और मिठाइयों की महक इस मेले को और जीवंत बना देती है। अम्बाजी में त्यौहार के समय यह अनुभव किसी महाकुंभ से कम नहीं होता। चाहे आप भक्त हों या पर्यटक, यहां का माहौल आपको जीवनभर याद रहेगा। अम्बाजी यात्रा में कहां ठहरें और क्या स्वाद लें अम्बाजी कस्बे में हर प्रकार के यात्रियों के ठहरने की सुविधा उपलब्ध है। यहां अच्छे बजट में होटल, धर्मशालाएं और रिसॉर्ट्स सभी मिलते हैं। मंदिर ट्रस्ट भी यात्रियों के लिए अच्छी और स्वच्छ धर्मशालाएं उपलब्ध कराता है। आसपास के शहरों जैसे माउंट आबू या पालनपुर में भी अच्छे होटल हैं, जहां से अम्बाजी तक पहुंचना आसान है। अब बात करें खाने की। तो अम्बाजी में गुजराती थाली का स्वाद लेना न भूलें। फाफड़ा-जलेबी, थेपला, ढोकला और खांडवी जैसी चीज़ें यहां हर गली-चौराहे पर मिल जाती हैं। मंदिर के प्रसाद में मिलने वाला लड्डू विशेष रूप से प्रसिद्ध है। इसके अलावा, सड़क किनारे की दुकानों पर मिलने वाली छाछ, कढ़ी-खिचड़ी और गुजराती मिठाइयां यात्रियों का मन मोह लेती हैं। यात्रा के दौरान गब्बर पहाड़ी पर चढ़ते समय मिलने वाली कचौड़ी और गरमागरम चाय की चुस्की तो जैसे इस सफर का सबसे जरूरी हिस्सा बन जाती है। यहां का स्थानीय स्वाद आपको गुजरात की असली