हयग्रीव माधव मंदिर -असम की मिट्टी में कुछ ऐसा जादू है जो हर यात्री को बार-बार अपनी ओर खींच लाता है। और जब बात हाजो की आती है, तो मानो यह धरती खुद श्रद्धा, आस्था और सौंदर्य का संगम बन जाती है। यहां का हयग्रीव माधव मंदिर केवल एक पूजा-स्थल नहीं, बल्कि एक ठिकाना है जहां मन को सुकून, आत्मा को शांति और आंखों को प्राकृतिक जन्नत का नज़ारा मिलता है। गुवाहाटी से लगभग तीस किलोमीटर दूर यह जगह घुमक्कड़ों के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं। हर कदम पर कुछ नया देखने, समझने और महसूस करने को मिलता है। रास्ते में जब ब्रह्मपुत्र की हवाएं चेहरे से टकराती हैं, तो लगता है जैसे कोई अदृश्य शक्ति आपको पुकार रही हो “आओ, सच्चे सुकून की तलाश यहीं खत्म होती है।”

इतिहास की कई परतें उकेरता हयग्रीव माधव मंदिर
हयग्रीव माधव मंदिर की कहानी सैकड़ों साल पुरानी है। कहा जाता है कि इसका निर्माण 10वीं शताब्दी में हुआ था, और इसे राजा रघुदेव नारायण ने पुनर्निर्मित करवाया था। असम की पारंपरिक स्थापत्य शैली और दक्षिण भारतीय मंदिर कला का अनोखा संगम इस मंदिर को अलग पहचान देता है। “हयग्रीव” का अर्थ होता है घोड़े के मुख वाला विष्णु अवतार। मान्यता है कि भगवान विष्णु ने हयग्रीव रूप में वेदों की रक्षा की थी। मंदिर की दीवारों पर उकेरी गई मूर्तियां इस कथा को जीवंत करती हैं। पत्थरों पर की गई नक्काशी मानो आज भी प्राचीन काल की कहानियां बयां करती हैं। स्थानीय लोग इसे माधव देवल भी कहते हैं। यह जगह न केवल हिन्दू श्रद्धालुओं की बल्कि बौद्ध अनुयायियों के लिए भी समान रूप से पवित्र है। कहते हैं कि बुद्ध ने यहां निर्वाण प्राप्त किया था। शायद यही वजह है कि यहां बौद्ध और हिन्दू दोनों समुदायों की एक अद्भुत एकता की भावना महसूस होती है।

घुमक्कड़ों का ठिकाना हाजो की ओर सफर
अगर तुम असली ट्रैवलर हो, तो हाजो तुम्हारे लिए एक परफेक्ट स्पॉट है। गुवाहाटी से यह सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है, और रास्ते में जो दृश्य मिलते हैं, वो दिल में हमेशा के लिए बस जाते हैं। हरे-भरे खेत, लोकल टी स्टॉल की खुशबू, और ब्रह्मपुत्र की धारा यह सब मिलकर सफर को यादगार बना देते हैं। यहां पहुंचने पर लगता है जैसे तुमने किसी पोस्टकार्ड की दुनिया में कदम रखा हो। लोकल लोग बड़े ही अपनत्व से मिलते हैं। अपने तरीके से नमस्कार कहकर जो मुस्कान वे देते हैं, वह सीधे दिल में उतर जाती है। अगर तुम थोड़ा असमिया बोल लो तो और मज़ा आता है कोशिश करना सुना है कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती है।(सच्चे सुकून की तलाश यहीं खत्म होती है)

मंदिर परिसर की चहलपहल और सुकून
मंदिर में जैसे ही कदम रखते हो, एक अद्भुत एहसास होता है। घंटियों की आवाज़, भक्तों का गान, और फूलों की खुशबू यह सब मिलकर एक भव्य और दिव्य वातावरण बना देते हैं। सीढ़ियां चढ़ते हुए जब ऊपर पहुंचते हो, तो सामने भगवान हयग्रीव माधव की मूर्ति दिखाई देती है। उनके चेहरे पर जो शांति है, वो दिल को छू जाती है। यहाँ की चहलपहल भी अपने आप में अनोखी है। कोई आरती में लीन है, कोई फोटो खींच रहा है, तो कोई मंदिर के पीछे बने तालाब में बैठे बतखों को दाना खिला रहा है। बच्चे खिलखिलाते हैं, और बुज़ुर्ग भक्ति में डूबे रहते हैं। यह दृश्य हृदय को शांति से भर देता है। अगर शाम के समय पहुंचो, तो सनसेट व्यू किसी “आध्यात्मिक पेंटिंग” जैसा लगता है। सूरज की किरणें जब ब्रह्मपुत्र की लहरों पर पड़ती हैं, तो पूरा आसमान सुनहरी रोशनी में नहा जाता है।

लोकल फ्लेवर स्वाद जो हाजो को खास बनाता है
घुमक्कड़ी का असली मज़ा तब आता है जब तुम लोकल खाना चखो। हाजो में स्ट्रीट साइड दुकानों पर जो असमिया थाली मिलती है, वह स्वाद और सादगी का संगम है। मछली-भात, खार, तेंगा झोल, और पिठा यहां के खास व्यंजन हैं। अगर तुम वेजिटेरियन हो, तो यहां की लाऊ-टेंगा करी जो कद्दू की खट्टी सब्ज़ी होती है ज़रूर ट्राई करना। एक लोकल दुकान “माधव टी स्टॉल” में मिलने वाली चाय इतनी सुगंधित है कि एक बार पीकर बार-बार आने का मन करेगा। वहां बैठकर जब लोकल लोग गपशप करते हैं, तो लगता है जैसे समय ठहर गया हो।

हाजो का धार्मिक मेल – एकता की मिसाल
हाजो को “तीन धर्मों की धरती” कहा जाता है यहां हिन्दू, मुस्लिम और बौद्ध, तीनों समुदायों के पवित्र स्थल मौजूद हैं। हयग्रीव माधव मंदिर के पास ही पुआ मक्का मस्जिद है, जो मुस्लिम श्रद्धालुओं का प्रमुख स्थान है। थोड़ी दूरी पर केकेटारी सत्र है, जहां वैष्णव परंपरा का पालन होता है। और वहीं बौद्ध अनुयायी मानते हैं कि यहीं भगवान बुद्ध ने आत्मज्ञान प्राप्त किया था। ऐसे में यह जगह न केवल धार्मिक, बल्कि सांस्कृतिक जन्नत भी है, जहां इंसानियत और आस्था दोनों का संगम देखने को मिलता है।
ठहरने के ठिकाने और घूमने के आसपास के स्पॉट

अगर तुम हाजो में रुकने की सोच रहे हो, तो यहां के लोकल गेस्ट हाउस और इको सिस्टम बेहतरीन हैं। ब्रह्मपुत्र नदी से सटे होमस्टे एक शानदार जगह है जहां सुबह की चाय नदी की ठंडी हवा के साथ मिलकर जन्नत का एहसास देती है।
पास में ही कुछ बेहतरीन स्पॉट हैं

मदन कमदेव मंदिर, जहां प्राचीन मूर्तियां और खंडहर रोमांचक अनुभव देते हैं। पांडु पहाड़, जहां से गुवाहाटी का सुंदर दृश्य दिखता है। और अगर थोड़ा आगे जाओ, तो सुजाता हिल से पूरे हाजो का पैनोरमिक व्यू देखने को मिलता है। यहां हर जगह नेचुरल लवर के लिए कुछ न कुछ खास है। पेड़ों की सरसराहट, पक्षियों की चहचहाहट और शांत माहौल किसी भी थके यात्री को सुकून से भर देता है।
भक्ति और प्रकृति का संगम एक अनुभव जो याद रह जाए

हयग्रीव माधव मंदिर सिर्फ एक तीर्थ नहीं, यह एक अनुभव है। यहां आने वाला हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में बदल जाता है। कुछ को यहां श्रद्धा मिलती है, कुछ को सुकून, और कुछ को अपने अंदर की शांति का पता चलता है। ब्रह्मपुत्र की लहरें मानो हर आगंतुक से कहती हैं “थोड़ा ठहरो, खुद को सुनो।” यही हाजो का असली मतलब है ठहराव में जीवन का अर्थ ढूंढना। जब सूर्य अस्त होता है और मंदिर की आरती की ध्वनि चारों ओर फैलती है, तब लगता है जैसे पूरी प्रकृति उसी एक ताल में झूम रही हो। यह अनुभव शब्दों में नहीं, केवल महसूस किया जा सकता है।
हाजो की जन्नत में मिला आत्म-सुकून

हयग्रीव माधव मंदिर की यात्रा एक साधारण यात्रा नहीं, बल्कि इनर पीस की तलाश है। यहां का हर पत्थर, हर दीवार, हर हवा का झोंका किसी कहानी से भरा हुआ है। यह जगह न सिर्फ धार्मिक दृष्टि से पवित्र है, बल्कि घुमक्कड़ों के लिए भी किसी हिडेन पैराडाइज से कम नहीं। अगर तुम जिंदगी की भागदौड़ में थक चुके हो, तो एक बार हाजो ज़रूर जाओ। वहां जाकर तुम्हें एहसास होगा कि सुकून किसी फाइव स्टार रिजॉर्ट में नहीं, बल्कि ऐसे पवित्र स्थलों में मिलता है जहां दिल को सच्ची शांति मिलती है।

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