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हनुमान यहाँ से उठा ले गए थे द्रोणागिरि पर्वत! जानें रामायण से जुड़ा इतिहास

उत्तराखंड की हरी भरी वादियों में कई ऐसे गांव हैं जो प्रकृति की गोद में छिपे खजाने की तरह हैं। द्रोणागिरी गांव इनमें से एक है। चमोली जिले में बसा यह गांव जहाँ से हनुमान उठा ले गए थे द्रोणागिरि पर्वत। हिमालय की ऊंची पहाडियों के बीच स्थित है। यह जोशीमठ से करीब 20 किलोमीटर दूर है और समुद्र तल से 2700 मीटर की ऊंचाई पर। गांव छोटा सा है। लेकिन इसका नाम पुरानी कथाओं और प्राकृतिक सुंदरता से जुडा है। यहां की हवा इतनी साफ है कि इस गांव का अहसास अंतरतम बस सा जाता है। गांव के लोग मुख्य रूप से गढ़वाली बोलते हैं और खेती तथा पशुपालन से जीवन चलाते हैं।

द्रोणागिरी का नाम रामायण से जुड़ा है। कथा है कि हनुमान जी यहां संजीवनी बूटी लेने आए थे। लक्ष्मण को बचाने के लिए उन्होंने पूरा पहाड़ उखाड लिया था। इसी वजह से गांव वाले हनुमान की पूजा नहीं करते। वे मानते हैं कि हनुमान ने गांव को नुकसान पहुंचाया है। यह अनोखी मान्यता गांव को रहस्यमयी बनाती है। गांव में पुराने घर भी देखने को मिलते हैं, जो लकडी और पत्थर से बने हैं। यहां की सडकें संकरी हैं, लेकिन पैदल चलना मजेदार है। पर्यटक यहां ट्रेकिंग के लिए भी आते हैं। गांव से नंदा देवी और अन्य चोटियां दिखती हैं। जिनके दृश्य आंखों में बस जाते हैं।

हनुमान यहाँ से उठा ले गए थे द्रोणागिरि पर्वत!

यह गांव शांत और सुंदर है। यहां कोई शोर नहीं, सिर्फ पक्षियों की चहचहाहट और हवा की सरसराहट आपको अपना एहसास कराएगी। लोग सादा जीवन जीते हैं। सुबह उठकर खेतों में काम करते हैं। शाम को आग के पास बैठकर कहानियां सुनाते हैं। दरअसल, द्रोणागिरी पर्यटन के लिए नया है, लेकिन जो आते हैं, वे यहां की शांति से मोहित हो जाते हैं। गांव में कुछ होमस्टे हैं, जहां पर्यटक ठहर सकते हैं। यहां की हवा में जडी बूटियों की महक है, क्योंकि गांव औषधीय पौधों से भरा है।

द्रोणागिरी का इतिहास पुराना है। यह रामायण काल से जुडा है। लेकिन आधुनिक समय में धीरे-धीरे यह ट्रेकिंग का केंद्र बन रहा है। पर्यटक जोशीमठ से ट्रेक करके आते हैं। रास्ते में जंगल और नदियां मिलती हैं। और ये नदियां गांव पहुंचकर थकान मिटा देती हैं। यहां की सादगी और प्रकृति का मेल बाकमाल का है। यह गांव हमें सिखाता है कि जीवन में शांति कितनी जरूरी है। वैसे तो द्रोणागिरी गांव हिमालय की गोद में बसा है। लेकिन महत्वपूर्ण बात यही है की यह अलौकिक गांव हर किसी को आकर्षित करता है। अपनी खूबसूरत वादियों से अद्भुत नजरों से, अपनी नदियों और झरनों से। विश्वास कीजिए यहां की कहानियां और दृश्य आपको मोह लेंगे। अगर आप शांत जगह तलाश रहे हैं, शहर की जिंदगी से थक हार गए हैं तो यह मानिए की द्रोणागिरी आपके लिए बेस्ट है।

द्रोणागिरी गांव की सुंदरता देखकर मन खुश हो जाता है। हिमालय की ऊंची पहाडियां चारों तरफ घेरती हैं। गांव से नंदा देवी, दूनागिरी और अन्य चोटियां दिखती हैं। सुबह की धूप में ये चोटियां हीरे के जैसे चमकती हैं। गांव के आसपास हरे जंगल हैं, जहां देवदार और बुरांश के पेड हैं। वसंत में बुरांश के लाल फूल गांव को रंगीन बना देते हैं। यहां की वादियां इतनी हसीन हैं कि लगता है प्रकृति ने यहां अपना सर्वश्रेष्ठ दिया है। गांव से कई ट्रेकिंग रूट हैं। जैसे द्रोणागिरी ट्रेक, जो कुवारी पास तक जाता है। रास्ते में छोटी नदियां और झरने मिलते हैं। पानी इतना साफ है कि पीने लायक है। गर्मियों में यहां का मौसम ठंडा रहता है।

सर्दियों में बर्फ गिरती है, जो गांव को सफेद चादर से ढक देती है। देश के अनेकों हिस्सों से पर्यटक भी बर्फबारी देखने ही आते हैं। गांव औषधीय पौधों से भरा है, जैसे संजीवनी बूटी की तरह के पौधे। गांव की वादियों में घूमना मजेदार है। साथ ही साथ सुबह सूरज की पहली किरण पहाडों पर पडती है तो वह द्रश्य किसी तस्वीर से कम् नहीं होता। शाम को सूर्यास्त का नजारा बाकमाल का होता है। गांव से दूर एक छोटी झील है, जहां का पानी पूरी तरह नीला दिखता है। यहां पक्षी चहचहाते हैं और जंगली जानवर भी देखने को मिलते हैं, लेकिन वे शांत रहते हैं। गांव की खूबसूरती में पहाडों का रंग बदलना देखने लायक है। सुबह हरा, शाम लाल।

द्रोणागिरी गांव की संस्कृति गढवाली है। लोग यहां पुरानी परंपराओं को निभाते हैं। जैसे गांव में एक मंदिर हैं, जहां लोग पूजा करते हैं। लेकिन हनुमान जी की पूजा नहीं होती जैसा की आप जानते हैं। सच में यहां के लोग खूब मेहनती हैं। वे खेती करते हैं, जिनमें मुख्य फसल आलू, मंडुवा और जौ हैं। गांव की अधिकतर महिलाएं घर संभालती हैं और बुनाई करती हैं। यहां लोक गीत गाए जाते हैं क्योंकि स्थानीय लोग बेहद आनंदमय जीवन जीना पसंद करते हैं। गांव में ही शाम को लोग इकट्ठा होकर कहानियां सुनाते हैं। त्यौहारों के समय पर बेहद नाच गाने होते हैं। जैसे गढवाली होली और दीवाली पर।

यदि खाने की बात की जाए तो खाना यहां का सादा लेकिन स्वादिष्ट बहुत है। मुख्य व्यंजन में आलू की सब्जी, दाल और रोटी हैं। मंडुवे की रोटी भी बनती है जो काफी पौष्टिक मानी जाती है। खाते-पीते सब हमारे जैसा सामान्य ही हैं लेकिन सभी चीजों में कुछ-कुछ अनौखा होता है। जैसे सर्दियों में गुड की मिठाई बनाते हैं। जडी बूटियों से चाय बनाते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए अच्छी है। पर्यटक लोकल खाना ट्राई करते हैं। होमस्टे में घर का खाना ही मिलता है जो काबिले तारीफ होता है। आप यहां का खाना एक बार चखेंगे तो यकीनन यह स्वाद आपको याद रह जाएगा। एक और अच्छी बात गांव की सभी परंपराएं प्रकृति से जुडी हुई हैं।

यहाँ लोग पेड़ पूजते हैं। पर्यावरण की रक्षा करते हैं और यहां कोई प्रदूषण नहीं। तो आप भी थोड़ा इस और ध्यान दें, मतलब इस साफ-सफाई को बरकरार रखें। क्योंकि यहां के लोग सादगी से जीते हैं। संसाधनों की कमी है लेकिन यह संस्कृति हमें सिखाती है कि कम में खुश रहना कितना अच्छा है। वास्तव में द्रोणागिरी की धरोहर अनमोल है।

जैसे की मैनें बताया की द्रोणागिरी गांव रामायण से जुडा हुआ है। कथा है कि लक्ष्मण को मेघनाद का बाण लगता है। जिसके बाद उन्हें बचाने के लिए संजीवनी बूटी चाहिए होती है। संजीवनी बूटी लाने का काम हनुमान जी को सौंपा जाता है। हनुमान जी द्रोणागिरी पहाड़ संजीवनी लाने गए। लेकिन बूटी पहचान न सके, तो वहाँ से पूरा पहाड उखाड लाए। इससे गांव को बहुत नुकसान हुआ। इसलिए गांव वाले हनुमान जी की पूजा नहीं करते। वे मानते हैं कि हनुमान जी ने गांव की शांति भंग की है। इसीलिए यहां हनुमान जी का कोई मंदिर नहीं है।

लोग राम और अन्य देवताओं की पूजा करते हैं। लेकिन भगवान हनुमान की नहीं। यह मान्यता सदियों पुरानी है। गांव वाले कहते हैं कि पहाड उखडने से गांव का एक हिस्सा टूट गया। इसलिए वे हनुमान जी से नाराज हैं। लेकिन रामायण की अन्य कथाओं का वे सम्मान करते हैं। यही अनोखी मान्यता गांव को विशेष बनाती है।

द्रोणागिरी पहुंचना बहुत ही रोमांचक और आसान है। सडक मार्ग से जयपुर या दिल्ली से ऋषिकेश होते हुए जोशीमठ पहुंचें। जोशीमठ से गांव की दूरी मात्र 20 किलोमीटर है। बस या टैक्सी मिलती है, तो पकड़िए और आ जाइए इस मनोरम स्थान पर। यदि हवाई मार्ग से आना है तो, जॉली ग्रांट एयरपोर्ट देहरादून मौजूद है। वहां से बस या टैक्सी से जोशीमठ पहुँचने में कोई समस्या थोड़े है। ट्रेन से हरिद्वार या ऋषिकेश स्टेशन पहुंचें जो आपको सबसे बेहतर होगा। क्या होता है ट्रेन से रास्ते के सारे खूबसूरत नजारे हम देख सकते हैं, अपने कैमरे में कैद कर सकते हैं। हरिद्वार या ऋषिकेश से बस से जोशीमठ, बहुत ही आसान रास्ता है

लम्बे सफर पर चलते-चलते बीच राह किसी ढ़ाबे पर कड़क चाय पीने की तलब हमेशा मुझे ज़िंदा बनाये रखती
है।

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