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दिल्ली से दौसा की यात्रा-चांद बावड़ी में गायब हो गई थी बारात, खानवा युद्ध में घायल राणा सांगा की मृत्यु भी यहीं

दिल्ली की भागदौड़ भरी जिंदगी से थोड़ा ब्रेक लेने और कुछ अलग अनुभव करने की चाह में, मैंने और मेरे दोस्तों ने दौसा की प्रसिद्ध चांद बावड़ी की यात्रा प्लान की। यह यात्रा सिर्फ एक ट्रिप नहीं थी, बल्कि राजस्थान के इतिहास, संस्कृति और एक अद्भुत स्थापत्य कला के नमूने को करीब से जानने का एक मौका था। पश्चिम विहार के मेरे फ्लैट से सुबह-सुबह जब हमारी कार निकली, तो हवा में एक नया जोश और उत्साह घुला हुआ था। इस दौरान चांद बावड़ी के बारात गायब होने के रहस्य को जानने के लिए भी उत्सुक था।

दौसा तक का रास्ता, जो लगभग 250 किलोमीटर का है, हमें राजस्थान के ग्रामीण इलाकों और उसके सुनहरे इतिहास से रूबरू कराने वाला था। सुबह की ताजी हवा और हाईवे पर कम ट्रैफिक ने हमारी यात्रा को और भी मजेदार बना दिया। रास्ते में मैंने देखा कि कैसे धीरे-धीरे शहरी शोरगुल कम होता जा रहा था और हरे-भरे खेत तथा दूर क्षितिज पर दिखती अरावली की पहाड़ियां हमारा स्वागत कर रही थीं।
सफर के दौरान, हमने कुछ देर के लिए बांदीकुई के पास ‘राणा सांगा की छतरी’ के पास रुकने का फैसला किया। हालांकि हमारा मुख्य लक्ष्य चांद बावड़ी थी, लेकिन इतिहास के इस महत्वपूर्ण पड़ाव को नज़रअंदाज़ करना ठीक नहीं था।

चांद बावड़ी

राणा सांगा की छतरी, बांदीकुई से लगभग 5 किलोमीटर दूर बसवा में स्थित है। यह मेवाड़ के महान योद्धा महाराणा संग्राम सिंह (राणा सांगा) की याद में बनाई गई एक स्मारक है। ग्रामीणों के मुताबिक, राणा सांगा की छतरी बांदीकुई के पास बसवा में इसलिए बनाई गई है क्योंकि 1527 में खानवा के युद्ध में घायल होने के बाद, उनके प्रमुख सहयोगी आमेर के राजा पृथ्वीराज कछवाहा ने उन्हें बसवा में सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया था, जहां उन्होंने अपने प्राण त्याग दिए थे। इसलिए, बसवा में राणा सांगा की स्मृति में छतरी बनाई गई है।

चांद बावड़ी

दौसा पहुंचने से पहले हमने कुछ स्थानीय गांवों का दौरा किया। यहां के लोग बेहद मिलनसार और अपनी संस्कृति से जुड़े हुए थे। मिट्टी के घर, रंग-बिरंगे परिधान पहने लोग और खेतों में काम करते किसान, यह सब कुछ इतना वास्तविक और दिल को छूने वाला था। हमें स्थानीय पकवानों का स्वाद चखने का भी मौका मिला, जो बेहद स्वादिष्ट थे। यह अनुभव हमें शहरी जीवन की भागदौड़ से दूर एक शांतिपूर्ण और सरल जीवन की झलक दे गया। हमने वहां दाल-बाटी और चूरमा का स्वाद भी चखा।

दोपहर होते-होते हम दौसा जिले के आभानेरी गांव स्थित ‘चांद बावड़ी’ पहुंच गए। बावड़ी को पहली नजर में देखते ही मैं मंत्रमुग्ध हो गया। यह सिर्फ एक बावड़ी नहीं, बल्कि कला, इंजीनियरिंग और इतिहास का एक अद्भुत संगम है। इसकी वास्तुकला इतनी जटिल और खूबसूरत है कि इसे देखकर आंखें थकती नहीं।
चांद बावड़ी 13वीं सदी में निर्मित एक विशाल बावड़ी (सीढ़ीदार कुआं) है, जिसमें 3500 से अधिक सीढ़ियां हैं। ये सीढ़ियां 13 मंजिलों में एक व्यवस्थित पैटर्न में नीचे उतरती जाती हैं जिससे यह किसी भूलभुलैया जैसा प्रतीत होता है। बावड़ी के चारों ओर परिक्रमा करते हुए मैंने महसूस किया कि इसे इतनी सटीकता और सौंदर्य के साथ कैसे बनाया गया होगा।

चांद बावड़ी

यह दुनिया की सबसे बड़ी और गहरी बावड़ियों में से एक है। इसकी सबसे खास बात इसकी त्रिकोणीय सीढ़ियां हैं, जो एक विशेष ज्यामितीय पैटर्न में बनी हैं। यह इतनी गहरी है कि नीचे का तापमान ऊपर के तापमान से 5-6 डिग्री सेल्सियस कम रहता है, जो भीषण गर्मी में भी राहत देता है। इसका निर्माण पानी बचाने और लोगों को स्वच्छ जल उपलब्ध कराने के उद्देश्य से किया गया था।

चांद बावड़ी से जुड़ी एक दिलचस्प और रहस्यमयी लोककथा है कि यहां एक पूरी बारात गायब हो गई थी। ग्रामीणों के अनुसार, एक बार एक बारात शादी के लिए जा रही थी और रात होने पर उन्होंने बावड़ी में विश्राम करने का फैसला किया। सुबह जब लोग जागे, तो बारात और उनके सारे सामान का कोई निशान नहीं था, जैसे वे हवा में गायब हो गए हों। कुछ स्थानीय लोग मानते हैं कि यह किसी अदृश्य शक्ति का कमाल था, जबकि कुछ इसे एक मनगढ़ंत कहानी मानते हैं। यह कथा बावड़ी के रहस्य और अलौकिक आकर्षण को और बढ़ा देती है। हालांकि, इस कहानी के कोई ठोक प्रमाण नहीं मिलते।
हमने बावड़ी के एक-एक कोने को एक्सप्लोर किया। हर सीढ़ी, हर पत्थर अपनी एक कहानी कह रहा था। जैसे-जैसे हम नीचे उतरते गए, हवा ठंडी होती गई और सूरज की रोशनी भी कम होती गई, जिससे एक रहस्यमयी माहौल बन गया। ऐसा लगा जैसे हम समय में पीछे जा रहे हों। बावड़ी के ठीक सामने ‘हर्षत माता मंदिर’ है, जिसके खंडहर भी अपनी भव्यता का प्रमाण देते हैं। कहा जाता है कि यह मंदिर भी चांद बावड़ी के समय का ही है और इसे देवी हर्षत माता को समर्पित किया गया था।

हर्षत माता मंदिर चांद बावड़ी के ठीक सामने स्थित एक प्राचीन हिंदू मंदिर है, जो देवी हर्षत माता को समर्पित है। यह मंदिर अपनी शानदार मूर्तियों और जटिल नक्काशी के लिए जाना जाता है। हालांकि, यह अब खंडहर की स्थिति में है, लेकिन इसकी बची हुई कलाकृतियां इसकी पिछली भव्यता का प्रमाण देती हैं।
हमने बावड़ी और मंदिर परिसर में काफी समय बिताया, फोटो खींची और इस अद्भुत स्थान की ऊर्जा को महसूस किया। शाम होते-होते सूरज की रोशनी सीढ़ियों पर एक अलग ही चमक बिखेर रही थी, जिससे बावड़ी और भी खूबसूरत लग रही थी।

चांद बावड़ी

सूर्य अस्त होने से पहले हमने दिल्ली के लिए वापसी की यात्रा शुरू की। मन में चांद बावड़ी की अद्भुत छवियां और राजस्थान के गांवों की सादगी बसी हुई थी। इस यात्रा ने न केवल मुझे एक शानदार पर्यटन स्थल से परिचित कराया, बल्कि भारत की समृद्ध विरासत और स्थापत्य कला की गहराई को भी समझने का मौका दिया।
आस-पास के अन्य ऐतिहासिक स्थल: दौसा का छिपा खजानाः
दौसा और उसके आसपास कई अन्य ऐतिहासिक स्थल भी हैं, जो कम प्रसिद्ध होने के बावजूद अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता रखते हैं। इनमें दौसा किला, भांडारेज बावड़ी और खवारावजी का किला शामिल हैं। ये स्थान उन लोगों के लिए बेहतरीन हैं जो भीड़भाड़ से दूर ऐतिहासिक वास्तुकला और ग्रामीण जीवन का अनुभव करना चाहते हैं।

रात तक मैं पश्चिम विहार (दिल्ली) स्थित अपने फ्लैट पर वापस आ गया, लेकिन चांद बावड़ी की भव्यता और उसकी रहस्यमयी सीढ़ियों की यादें मेरे मन में ताज़ा थीं। यह यात्रा सिर्फ एक दर्शनीय स्थल का भ्रमण नहीं, बल्कि एक ऐसा अनुभव था जिसने मुझे भारतीय इतिहास और कला की गहराइयों से जोड़ा। मैं निश्चित रूप से इस अनुभव को अपने दोस्तों और परिवार के साथ दोबारा जीना चाहूंगा

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