जब भी भारतीय चिकित्सा पद्धति का नाम आता है, तो हमारे ज़हन में सबसे पहला नाम आयुर्वेद का आता है। आयुर्वेद (Ayurveda) एक ऐसा शास्त्र है जिसका उद्देश्य मनुष्य को स्वस्थ व रोग-रहित जीवन देना है। यदि फिर भी कोई रोग की चपेट में आ जाए तो ऐसे में उसका उपचार करना है। आयुर्वेद में भोजन को औषधि कहा गया है। अत: यदि हम भोजन का ही उचित रूप से सेवन करें, तो हमेशा स्वस्थ और निरोगी रहेंगे।
’आयुर्वेद’ दो शब्दों आयु तथा वेद(ज्ञान) से बना हैl अत: जिससे आयु का ज्ञान हो उसे आयुर्वेद कहते हैं। लेकिन यहाँ आयु का मतलब केवल उम्र नहीं है। आयुर्वेद में शरीर, इन्द्रिय (ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ) मन और आत्मा(Consciousness) के संयोग को आयु कहते हैं। इन सभी के स्तर पर स्वस्थ होकर मनुष्य संपूर्ण रूप से स्वस्थ रह सकता है और दीर्घायु को प्राप्त कर सकता है।
आयुर्वेद में व्यक्ति के स्वास्थ्य के रक्षण के लिए पौष्टिक भोजन, दिनचर्या, रात्रिचर्या, ऋतुचर्या, आहार-विहार, पथ्य-अपथ्य इत्यादि का वर्णन किया गया है।
आइये जानते हैं कि आयुर्वेदके अनुसार हम एक बेहतरीन सुबह की शुरुआत कैसे कर सकते हैं-
1.उठने का समय : ब्रह्ममुहूर्त

हमें ब्रह्ममुहूर्त अर्थात् सूर्योदय से दो घंटे पूर्व लगभग सुबह 4 से 5:30 बजे के बीच उठ जाना चाहिए। उठने का यह समय सबसे उपयुक्त माना जाता है, क्योंकि ब्रह्ममुहूर्त में शरीर को स्वच्छ, सात्त्विक और प्रदूषण रहित वायु मिलती है। ब्रह्म मुहूर्त के समय उठने पर नित्य कर्म करने से हमारी आयु लम्बी होती है।
2.उषापान- सुबह-सुबह पानी पीने की प्रक्रिया
उषा का अर्थ होता है सुबह और सुबह-सुबह पानी पीने की प्रक्रिया को उषापान कहा जाता है। उषापान में धातु(चांदी, तांबा, सोना आदि) के बर्तन में रात भर रखे हुए साफ पानी को पिया जाता है। तांबे के बर्तन में रखा सादा या हल्का गुनगुना पानी पीना सेहत के लिए फायदेमंद होता है। आयुर्वेद के अनुसार हमें सुबह उठने के बाद बिना कुल्ला किये यह पानी पीना चाहिए।

हमें लगभग 1.4 लीटर पानी को थोड़ा थोड़ा करके पीना चाहिए ताकि हमारी आतें(intestines), जो लगभग 6 से 8.5 मीटर लंबी होती हैं, पूरी तरह से साफ़ हों पाएँ। शुरुआत में एक या दो गिलास पानी से शुरुआत करें, फिर धीरे धीरे ये मात्रा बढ़ाकर 4 से 6 गिलास करें।
यह आंतों को साफ़ करने के अलावा पूरी रात सोने के बाद सुबह हमारी बॉडी को दोबारा हाइड्रेट करता है। यह दिमाग को तरोताजा करता है और शरीर को ऊर्जा देता है। यह अपच की समस्या को भी दूर करता है। मुंह और दांतों के विकारों को भी ठीक करता है।
3.मलोत्सर्ग या मल त्याग करना:
उठने के बाद मल का त्याग मौन होकर करना चाहिए। प्रयत्नपूर्वक मलोत्सर्ग नहीं करना चाहिए। यदि आप नियमित और प्रतिदिन मल का त्याग करते हैं, तो आपका शरीर स्वस्थ, पवित्र और दुर्गन्ध रहित होकर स्वच्छ हो जाता है। इसके लिए आपको सही मात्रा में संतुलित आहार का सेवन करना चाहिए और अपनी शरीर की जरूरत के अनुसार पानी पीते रहना चाहिए।
4. आयुर्वेद में मुख-प्रक्षालन (मुख की शुद्धि)
मल का त्याग करने के पश्चात् अपने हाथों को अच्छी तरह से धोकर, स्वच्छ जल से अपने मुख, आँख, नाक, कान तथा चेहरे को अच्छी तरह धोना चाहिए। इससे सुस्ती दूर होती है और मुख की शुद्धि होती है।
5.दाँत साफ करना:

आयुर्वेद के अनुसार, आगे की ओर से कोमल दातुन से प्रातः और भोजन के पश्चात् दातुन करना चाहिए। दातुन को छोटी अंगुली के समान मोटी, सीधी तथा लम्बाई में 12 अंगुली होना चाहिए। दातुन के द्वारा किसी भी प्रकार से मसूढ़ों को हानि न पहुँचाएँ। लम्बी दातुन से चीरकर जीभ को भी साफ करें।
आजकल दाँतों के लिए टूथब्रश और टूथपेस्ट का इस्तेमाल किया जाता है। इनका सावधानी से गर्म पानी के साथ इस्तेमाल किया जा सकता है।
6.गण्डूष (Oil pulling):
गण्डूष या ऑयल पुलिंग में मुंह में तेल भरकर कुछ देर के लिए उसे मुंह में चारों तरफ घुमाया जाता है। इसके बाद इस तेल का कुल्ला कर दिया जाता है। आप 4 से 5 मिनट तक इस प्रक्रिया को कर सकते हैं। इसके लिए तिल या सरसों का तेल के प्रयोग को उत्तम कहा गया है। गण्डूष क्रिया होंठों का फटना, मुँह का सूखना और छाले इत्यादि के लिए फायदेमंद होती है। इससे दाँत और मसूड़े मजबूत होते हैं और मुख की मलिनता और दुर्गन्धता का नाश होता है।
7.अभ्यंग(तेल मालिश): आयुर्वेद के अनुसार
आयुर्वेद के अनुसार प्रतिदिन शरीर पर अभ्यंग यानि तेल मालिश करनी चाहिए। इससे त्वचा साफ़ और शरीर मजबूत होता है। तेल को हल्के हाथों से पूरे शरीर पर लगाना चाहिए। सिर, कान और पैर के तलवों का विशेष रूप से प्रतिदिन अभ्यंग करना चाहिए। पैरों में तेल लगाने से आँखों की रोशनी बढ़ती है, रूखापन, थकावट, पैरों का फटना, आदि नहीं होते। कान में तेल लगाने से कान दर्द, बहरापन, कान के रोग इत्यादि नहीं होते। सिर पर तेल लगाने से बालों के गिरना रुकता है, सफेद बालों में कमी आती है, सिरदर्द नहीं होता है। अभ्यंग से चेहरे पर चमक आती है और मन शांत होता है।
8.योग व ध्यान:

सबसे पहले वॉर्म अप के लिए कुछ हल्के व्यायाम फिर सूर्य नमस्कार और क्षमतानुसार अन्य आसन करने चाहिए तथा कूल डाउन के लिए शवासन या तितली आसान किया जा सकता है। तत्पश्चात् ध्यान व प्राणायाम करना चाहिए, ताकि पूरे दिन शरीर व मन ऊर्जावान रहे।
आयुर्वेद मतानुसार शक्ति से अधिक व्यायाम नहीं करना चाहिए, वह शरीर के लिए नुकसानदायक हो सकता है। व्यायाम अपनी आधी शक्ति अर्थात् माथे पर पसीना आने तक करना चाहिए।
9.स्नान:
स्नान यानि नहाने से शरीर साफ होता है और ताज़गी मिलती है। इससे पसीना, गंदगी और थकान दूर होती है, तथा शरीर को ऊर्जा मिलती है, इससे शरीर भी स्वच्छ होता है और मन को भी प्रसन्नता मिलती है।
10.सुबह का भोजन:
आयुर्वेद के अनुसार हमें अपनी प्रकृति (वात, पित्त या कफ) तथा ऋतु के अनुसार भोजन करना चाहिए। तथा सुबह के नाश्ते में सदैव ताज़ा, गर्म व हल्का भोजन करना चाहिए। क्योंकि सुबह के समय हमारी पाचन अग्नि बढ़ने की प्रक्रिया चल रही होती है और गर्म भोजन जल्दी पचता है। अत: नाश्ते में अत्यधिक मसालेदार, भारी या कच्चा भोजन नहीं करना चाहिए। आजकल हम समय कम होने के कारण अक्सर पैक्ड फूड की तरफ बढ़ते जा रहे हैं किंतु उस भोजन के प्रीज़रवेटिव्स हमें पोषण देने की बजाय नुकसान अधिक पहुँचाते हैं। अत: यदि आप एक स्वस्थ शरीर चाहते हैं तो आपको पैक्ड फूड से बचना चाहिए और ताज़ा भोजन करना करें। नाश्ते के लिए मूंग दाल खिचड़ी, दलिया, उपमा तथा सब्जियों का सूप आदि शामिल अच्छे विकल्प हो सकते हैं।

जब दिन की शुरुआत संतुलन, शुद्धता, अनुशासन और आत्मचिंतन से होती है, तो हर काम में सहजता, और संतोष प्रकट होता है। Health is wealth यानी ‘स्वस्थ शरीर ही सबसे बड़ा धन है।’ तो क्यों न कल से ही एक नई शुरुआत करें,अपने और अपने स्वास्थ्य के लिए।
जानिए आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रंथों और विद्वानों के नाम:-
चरकसंहिता- आचार्य चरक
सुश्रुतसंहिता – आचार्य सुश्रुत
अष्यङ्गसंग्रह – आचार्य वाग्भट
अष्यङ्गहृदय – आचार्य वाग्भट द्वितीय
माधवनिदान – आचार्य माधव
शाङ्गधरसंहिता – आचार्य शाङ्गधर
भावप्रकाश – आचार्य भावमिश्र

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