Best Hindi Travel Blog -Five Colors of Travel

Categories
Category Culture Punjab Travel

पंजाब के लिए बैसाखी क्यों रखती है इतनी अहमियत? जानें रोचक बातें!

पंजाब की खूबसूरत धरती पर जब अप्रैल का महीना आता है, तो हवा में एक अलग ही सुकून छा जाता है। बैसाखी का उत्सव वास्तव में इसी सुकून का प्रतीक है। यह त्यौहार न केवल फसल कटाई का जश्न है, बल्कि सिख इतिहास की एक घटना से भी जुड़ा हुआ है। बैसाखी को वैशाखी भी कहा जाता है, जो हिंदू सौर कैलेंडर के वैशाख महीने की पहली तारीख को मनाया जाता है। और यह 13 या 14 अप्रैल को आता है। देखा जाए तो, बैसाखी की जड़ें बहुत गहरी हैं। यह त्यौहार सदियों पुराना है। पहले यह मुख्य रूप से किसानों का उत्सव हुआ करता था।

उत्सव के दौरान पंजाब के खेतों में रबी की फसलें तैयार हो जाती हैं। किसान अपनी मेहनत का फल पाकर खुशी महसूस कर रहे होते हैं। वे देवताओं को धन्यवाद देते हैं। लेकिन 1699 में यह त्यौहार और भी मनमोहक हो गया था। जब आनंदपुर साहिब में दसवें सिख गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की। उन्होंने पंज प्यारों को अमृत चखाया और सिखों को एकजुट किया। यह घटना बैसाखी के दिन ही हुई थी। गुरु जी ने कहा कि सिख समुदाय को अपनी रक्षा खुद करनी होगी। इस तरह, बैसाखी सिखों के लिए नया साल और साहस का प्रतीक बन गया।

बैसाखी

इस समय आनंदपुर साहिब के मैदान में हजारों सिख इकट्ठे हुए थे। गुरु गोबिंद सिंह जी ने तंबू से खून से सनी तलवार निकाली। उन्होंने पूछा, कौन अपना सिर देगा? एक के बाद एक पांच सिख आगे आए। यह दृश्य कितना अद्भुत रहा होगा सोचकर हैरानी होती है। जहां हिम्मत और विश्वास की ज्योति जली होगी। तभी खालसा का जन्म हुआ, जो जाति-पाति से परे था। यह घटना बैसाखी को हमेशा के लिए अमर कर गई। झारखंड से लेकर पंजाब तक, बैसाखी की कहानी सबको आकर्षित करती है। यह त्यौहार गुरु अमर दास जी के समय से मनाया जाता है। वे चाहते थे कि सिख एकजुट हों। और फिर बैसाखी ने उन्हें जोड़ा भी।

बैसाखी

आज भी, यह उत्सव पंजाबी नये साल की शुरुआत के रूप में मनाते हैं। अद्भुत दृश्य बनता है जब किसान खेतों में सरसों के फूलों के बीच नाचते हैं। असल में यह इतिहास की मनमोहक गाथा है, जो हर साल दोहराई जाती है। वैसे बैसाखी हमें सिखाती है कि मेहनत और विश्वास से कुछ भी हासिल किया जा सकता है। हकीकत है यह त्यौहार सुकून देता है, क्योंकि यह हमें अपनी जड़ों से जोड़ता है। पंजाब के गांवों में बैसाखी की तैयारी महीनों पहले शुरू हो जाती है। किसान अपने खेतों को सजाते हैं। महिलाएं नए कपड़े सिलवाती हैं। उत्सव ऊर्जा से भरा होता है। 1919 में जलियांवाला बाग हत्याकांड भी बैसाखी के दिन ही हुआ था, जो स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दे गया। यह दुखद घटना भी बैसाखी की महत्ता को बढ़ाती है। यह त्यौहार इतिहास की किताबों से निकलकर जीवंत हो जाता है। जब बैसाखी आती है।

जब सुबह की पहली किरणें खेतों पर पड़ती हैं, तो हवा में गेहूं की खुशबू फैल जाती है। लोग सुबह जल्दी उठते हैं। नहा धोकर साफ कपड़े पहनते हैं। फिर गुरुद्वारों की ओर चल पड़ते हैं। स्वर्ण मंदिर में भजन कीर्तन की ध्वनि गूंजती है। लोग मत्था टेकते हैं और प्रसाद ग्रहण करते हैं। यह दृश्य खूबसूरत सपने जैसा लगता है। उत्सव की शुरुआत नगर कीर्तन से होती है। पंज प्यारे गुरु ग्रंथ साहिब जी की पालकी लेकर निकलते हैं। लोग पीछे चलते हैं। ढोल की थाप पर बधाई गाते जाते हैं। सड़कें रंग-बिरंगी हो जाती हैं। बच्चे फूल बरसाते हैं। और महिलाएं फुलकारी की चूनर ओढ़े खूब नाचती हैं। पुरुष पगड़ी बांधकर इसमें भाग लेते हैं। यह जुलूस ऊर्जा से भरा होता है। पंजाब के कई गांवों में मेला भी लगता है। वहां खाने के स्टॉल, खेल-तमाशे और हैन्डीक्राफ्ट बिकते हैं। बच्चे झूले झूलते हैं। युवा कुश्ती लड़ते हैं।

वास्तव में यह मेला बेहद मनमोहक होता है। बैसाखी में भांगड़ा और गिद्दा नृत्य मुख्य हैं। भांगड़ा में पुरुष खूब नाचते हैं। और मनोरंजन करते हैं। गिद्दा में महिलाएं हाथों से ताल देते हुए थिरकती हुई नजर आती हैं। यह नृत्य फसल कटाई की खुशी दर्शाते हैं। पंजाब के अलावा, बैसाखी पूरे भारत में मनाया जाता है। असम में रोंगाली बिहू, बंगाल में पोइला बैसाख, तमिलनाडु में पुथांडु। हर जगह यह नया साल लाता है। लेकिन पंजाब में यह सबसे अलग लगता है।

बैसाखी का सांस्कृतिक स्वरूप बेहद खास है। यह त्यौहार पंजाबी संस्कृति का आईना है। फसल कटाई के बाद किसान अपनी मेहनत का फल पाते हैं। वे खुशी से नाचते गाते हैं। यह परंपरा सदियों पुरानी मानी जाती है। बैसाखी के इस उत्सव में पारंपरिक वेशभूषा का विशेष महत्व है। महिलाएं सलवार कमीज और फुलकारी की दुशाला पहनती हैं। फुलकारी की कढ़ाई बहुत खूबसूरत होती है। पुरुष कुर्ता पजामा और पगड़ी में सजते हैं। पगड़ी का रंग पीला या नारंगी होता है, जो कि फसल की याद दिलाता है। परंपराओं में लंगर सबसे मनभावक हिस्सा है।

गुरुद्वारों में सबके लिए खाना बनता है। कोई भेदभाव नहीं होता है। लोग मिलकर खाते हैं। कढ़ा प्रसाद विशेष है। गेहूं के आटे, घी और चीनी से बनता है। इसका बहुत ही मजेदार होता है। फिर मीठे पीले चावल, सरसों का साग और मक्की की रोटी। ये व्यंजन नई फसल से बने होते हैं। किसान इन्हें बांटते हैं और सबको एकता की परंपरा सिखाते हैं।

बैसाखी के मेले बहुत ही महत्व रखते हैं, वहां हस्तशिल्प, लोक संगीत और नाटक होते हैं जो सबको प्रेरित करते हैं। बच्चे खेलते हैं एवं युवा गटका प्रदर्शन करते हैं। गटका मार्शल आर्ट है, जो खालसा की हिम्मत दिखाता है। बैसाखी पंजाबी लोक कला को जीवित रखे हुए है यह कहते हुए मुझे कोई संकोच नहीं। भांगड़ा और गिद्दा न केवल पंजाब के नृत्य हैं, बल्कि नृत्य पंजाबी संस्कृति का हिस्सा हैं। पंजाब के अलावा यह त्यौहार अन्य राज्यों में भी मनाया जाता है। बिहार में वैशाखी, केरल में विशु। लेकिन पंजाब में यह सबसे खास है। बैसाखी हमें सिखाता है कि संस्कृति को संजोना कितना जरूरी है।

पंजाबी त्योहर स्वादिष्ट व्यंजनों के अधूरे हैं। यह उत्सव भी स्वाद का ही तो त्यौहार है। जब फसल कटाई होती है, तो ताजा अनाज आता है। उसी ताजा अनाज से व्यंजन बनाए जाते हैं, एवं खाए और खिलाए जाते हैं। इन व्यंजनों में सबसे पहले आता है कढ़ा प्रसाद। यह आटा, घी और चीनी से बनता है। गुरुद्वारे में भी बंटता है। इसका स्वाद आत्मा तृप्त कर देता है। फिर मीठे पीले चावल। केसर से रंगे जाते हैं। इन्हें खाकर मन आनंदित हो जाता है।

फिर आता है सरसों का साग और मक्की की रोटी। साग हरा और तीखा होता है। साथ में रोटी गर्मागर्म। घी लगाकर खाएं तो मजा आ जाता है। और हां साथ में लस्सी भी जरूरी है। दही से बनी ठंडी लस्सी गर्मी में राहत देती है। मीठी लस्सी में चीनी डालकर पीते हैं तो और भी बढ़िया। गांवों में लोग घर पर व्यंजन बनाते हैं। फिरनी भी बनती है। जो दूध, चावल और केसर से बनती है। ऊपर बादाम छिड़कें जाते हैं। इसका स्वाद बहुत ही खास और अनोखा होता है। बैसाखी पर मेहमानों को ये व्यंजन बांटे जाते हैं। यह परंपरा एकता को मजबूत करती है।

बैसाखी आज भी जीवित है, लेकिन इसमें नया रंग आ चुका है। यक़ीनन, आधुनिक समय ने इसे और मनमोहक बना दिया है।

बैसाखी

शहरों में लोग सोशल मीडिया पर बैसाखी शेयर करते हैं। वीडियो बनाते हैं और सबको बधाइयाँ देते हैं। कनाडा, अमेरिका में भी पंजाबी समुदाय बैसाखी मनाते हैं। वहां और भी बड़े परेड होते हैं। वैंकूवर में लाखों लोग इकट्ठे होते हैं। नया दौर सुकून देने बाला तो है। बैसाखी पर्यावरण जागरूकता भी लाता है। किसान जैविक खेती पर जोर देंगे इसका संदेश हमें देता है।

यह त्यौहार हमें सिखाता है कि पुरानी परंपराओं को नया रूप देना जरूरी है। बदलते दौर में सब कुछ बदलता है, बदलाव तो प्रकृति का नियम है। यह उत्सव हमेशा चमकता था और हमेशा चमकता रहेगा

By Five Colors Of Travel

Five Colors of Travel भारत का एक भरोसेमंद Hindi Travel Blog है जहां आप ऑफबीट डेस्टिनेशन, culture, food, lifestyle और travel tips की authentic जानकारी पढ़ते हैं

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *