जब भी राजस्थान घूमने की बात होती है, तो अक्सर लोग किलों के बारे में, राजाओं-महाराजाओं की शान के बारे में और रेगिस्तान के बारे में सोचते हैं। उन्हें लगता है कि यहाँ हर तरफ सूखा होगा, ऊँट होंगे और दूर-दूर तक बस रेत ही रेत होगी। लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। राजस्थान सिर्फ रेगिस्तान नहीं, बल्कि रंगों और शान से भरा हुआ एक ऐसा प्रदेश है, जहाँ खान-पान से लेकर पहनावे तक सब कुछ अलग और खास है। इसके साथ ही राजस्थान की पहचान सिर्फ किले या महल नहीं हैं, बल्कि यहाँ का कल्चर है, और इस कल्चर का एक बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है राजस्थानी कठपुतली कला और आज इस ब्लॉग में आप जानेंगे राजस्थान की शान, राजस्थानी कठपुतली के बारे में।
नागौर: जहाँ से शुरू हुई कठपुतलियों की कहानी
नागौर की गलियों में घूमते हुए रंग-बिरंगी कठपुतलियाँ हर किसी का ध्यान खींच लेती हैं। माना जाता है कि इसी इलाके से इस कला की शुरुआत हुई थी। यह कोई नई परंपरा नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही विरासत है, जिसका ज़िक्र लोकगीतों और कहानियों में मिलता है। आज नागौर की कठपुतली को जीआई टैग भी मिल चुका है, जो इसे इस जगह की खास पहचान बनाता है।

कठपुतली बनाने वाले और दिखाने वाले कौन होते है
इस कला को आज तक ज़िंदा रखने का सारा श्रेय भाट और नट समुदाय को जाता है। इन समुदायों के लिए कठपुतली सिर्फ कमाई का जरिया ही नहीं, बल्कि उनकी आस्था और विश्वास का केंद्र है। भाट समुदाय तो कठपुतली को माता भवानी का रूप मानता है और उसे एक खिलौना नहीं, बल्कि माता समझकर बहुत सम्मान देता है। ऐसा माना जाता है कि जब कठपुतली बनकर तैयार हो जाती है, तो कलाकार उससे एक बार माफी माँगते हैं कि आने वाले समय में काम करते हुए अगर कोई गलती हो जाए या अनजाने में कठपुतली का अपमान हो जाए, तो उसके लिए वे पहले ही क्षमा माँग लेते हैं। यहाँ तक कि रोज़ अपना काम खत्म करने के बाद वे कठपुतली की पूजा करते हैं और उसे मिठाई भी खिलाते हैं। यह सब देखकर ऐसा लगता है कि इनके लिए कठपुतली कोई साधारण खिलौना नहीं, बल्कि सदियों से चला आ रहा एक गहरा विश्वास है, जो आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाया जा रहा है।
Rajasthani Kathputli कैसे बनती है
राजस्थानी कठपुतली ज़्यादातर आम की लकड़ी से बनाई जाती है। इसकी बड़ी-बड़ी आँखें, चमकीले रंगों वाले सजे-धजे कपड़े और राजपूती अंदाज़ इसे अलग पहचान देता हैं। इसकी सबसे खास बात यह है कि इन कठपुतलियों के पैर नहीं होते। कमर के नीचे लंबा सा घाघरा पहनाया जाता है, जिसे नाचते समय देखकर ऐसा लगता है जैसे पुतली सच में चल रही हो। एक कठपुतली बनाना भी कोई आसान काम नहीं होता। पहले लकड़ी को काटकर उसका आकार बनाया जाता है, फिर उसे अच्छे से घिसा जाता है, रंग किया जाता है और आखिर में कपड़े पहनाए जाते हैं। इन सभी चरणों से होकर जब कठपुतली तैयार होती है, तब जाकर उसमें जान आती है।
वीरता की कहानियाँ और मशहूर पात्र

कठपुतली कला में वीरता की कहानियों का खास महत्व होता है और इनमें नागौर के बहादुर योद्धा अमर सिंह राठौर की कहानी सबसे ज़्यादा दिखाई जाती है। पहले एक पूरे खेल में कई दर्जन पात्र होते थे, लेकिन आज के समय में कलाकार कुछ चुनिंदा किरदारों के साथ ही कहानी दिखाते हैं, ताकि दर्शक आसानी से समझ सकें और उनसे जुड़ सकें। समय के साथ यह कला भी बदल रही है। आज के कठपुतली कलाकार सिर्फ मंच पर खेल दिखाने तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि की-रिंग, वॉल हैंगिंग और दूसरी सजावटी चीज़ें भी बना रहे हैं। साथ ही सोशल मीडिया और यूट्यूब के ज़रिए ये कलाकार अपनी कला को नकीबुल पूरे देश बल्कि पुरी दुनिया तक पहुँचा रहे हैं, जिससे यह परंपरा नई पीढ़ी तक भी पहुँच रही है।









