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पिथौरा पेंटिंग- आदिवासी संस्कृति की अद्भुत कहानी पढ़ हो जाएंगे हैरान!

पिथौरा पेंटिंग, भारत की आदिवासी कला का एक अनमोल हिस्सा है, जो गुजरात और मध्य प्रदेश की जनजातियों की सांस्कृतिक धरोहर को दर्शाती है। यह कला मुख्य रूप से राठवा, भील और भिलाला जनजातियों द्वारा बनाई जाती है, जो गुजरात के छोटा उदयपुर और पंचमहल जिलों और मध्य प्रदेश के धार और झाबुआ में रहते हैं। इसका नाम पिथौरा बाबा से आता है, जिन्हें शादी और समृद्धि का देवता माना जाता है। यह पेंटिंग सिर्फ कला नहीं, बल्कि एक धार्मिक रस्म है, जो सैकड़ों सालों से चली आ रही है।

पिथौरा पेंटिंग की जड़ें प्रागैतिहासिक गुफा चित्रों से जुड़ी हैं। माना जाता है कि यह कला 11वीं सदी में शुरू हुई थी, जब आदिवासी लोग अपनी कहानियां और विश्वास दीवारों पर उकेरते थे। यह चित्रण पहले गुफाओं, चट्टानों और दीवारों पर होता था। समय के साथ, यह घरों की दीवारों तक पहुंचा। जनजाति के लोग इसे सुख-शांति और समृद्धि के लिए बनाते हैं। जब परिवार में कोई समस्या आती है, जैसे बीमारी, फसल खराब होना या बच्चे का जन्म, तो वे पिथौरा भगवान से मन्नत मांगते हैं। मन्नत पूरी होने पर दीवार पर पेंटिंग बनवाते हैं। यह कला आदिवासी जीवन का दर्पण है। इसमें प्रकृति, पशु, पक्षी और दैनिक जीवन के दृश्य होते हैं।

पिथौरा पेंटिंग

गुजरात के राठवा समुदाय में यह पेंटिंग एक पवित्र रस्म है, जिसे बडवा नामक पुजारी के मार्गदर्शन में बनाया जाता है। यह सिर्फ सजावट नहीं, बल्कि विश्वास और श्रद्धा का प्रतीक है। पहले यह केवल दीवारों पर बनती थी, लेकिन अब कैनवास और कपड़े पर भी बनाई जाती है, जिससे इसे बाजार में बेचा जा सके। यह बदलाव आधुनिकता का प्रभाव है, लेकिन परंपरा की आत्मा वही है। पिथौरा पेंटिंग की खासियत इसका सरल और जीवंत रूप है। इसमें रंग प्राकृतिक होते हैं, जो मिट्टी, पत्तियों और फूलों से बनाए जाते हैं। यह कला न केवल देखने में सुंदर है, बल्कि आदिवासी संस्कृति की गहरी कहानी कहती है। इसे समझने के लिए हमें इसकी शुरुआत की प्रक्रिया को जानना होगा।

पिथौरा पेंटिंग बनाना एक सामूहिक और पवित्र प्रक्रिया है। यह काम शुरू होने से पहले बडवा, जो जनजाति का मुख्य पुजारी होता है, रस्म करता है। वह सपने या संकेत के जरिए तय करता है कि पेंटिंग कब और कहां बनानी है। यह आमतौर पर घर के मुख्य कमरे या बरामदे की दीवार पर बनाई जाती है, जिसे ओसारी कहते हैं। सबसे पहले दीवार को तैयार किया जाता है। मिट्टी और गोबर का लेप लगाकर सतह को चिकना करते हैं। फिर चावल के आटे से सफेद आधार बनाया जाता है। रंग प्राकृतिक होते हैं जिनमें सफेद चावल से, लाल मिट्टी से, पीला हल्दी से, और हरा पत्तियों से बनता है। ब्रश की जगह बांस की छड़ियां या उंगलियां इस्तेमाल होती हैं। यह देसी तरीका कला को अनोखा बनाता है।

पेंटिंग बनाने का काम पुरुष करते हैं, जिन्हें लखारा कहते हैं। ये लोग पीढ़ियों से प्रशिक्षित होते हैं। पहले एक आयताकार बॉर्डर बनाया जाता है, जिसे हीम कहते हैं। इसके चार कोनों में चार दिशाओं का प्रतीक होता है। फिर केंद्र में सात घोड़े बनाए जाते हैं, जो पिथौरा बाबा के वाहन हैं। इसके बाद अन्य चित्र जैसे सूरज, चंद्रमा, पशु और लोग बनते हैं। प्रक्रिया में कई दिन लगते हैं। रस्म के साथ गीत और नृत्य होते हैं। पेंटिंग पूरी होने पर गांव में उत्सव मनता है। यह सामूहिकता इस कला को खास बनाती है। अब कुछ कलाकार कपड़े या कागज पर बनाते हैं, ताकि पर्यटकों को बेच सकें। यह प्रक्रिया पर्यावरण के अनुकूल है, क्योंकि रंग प्राकृतिक हैं। पेंटिंग में हर रंग और चित्र का अर्थ होता है।

पिथौरा पेंटिंग की खूबसूरती इसके चित्रों और रंगों में है। हर चित्र और रंग कुछ कहता है। सबसे महत्वपूर्ण चित्र है सात घोड़े, जो गुजरात और मध्य प्रदेश की सात पहाड़ियों का प्रतीक हैं। घोड़ा पिथौरा बाबा का वाहन है, जो शक्ति और समृद्धि दर्शाता है। पेंटिंग में सूरज और चंद्रमा समय को दिखाते हैं। पेड़, फूल और नदियां प्रकृति से जुड़ाव बताती हैं। पशु जैसे गाय, बैल और हाथी धन और व्यापार का प्रतीक हैं। शादी की बारात या खेती के दृश्य जनजाति के जीवन को दर्शाते हैं। कुछ पेंटिंग में आधुनिक चीजें जैसे ट्रेन, बाइक या हवाई जहाज भी दिखते हैं, जो समय के साथ बदलाव को बताते हैं। रंगों का भी अर्थ है। लाल प्यार और उत्साह का, हरा समृद्धि का और सफेद शांति का प्रतीक है। नीला आकाश और अनंत को दर्शाता है। ये रंग बोल्ड और जीवंत होते हैं, जो पेंटिंग को आकर्षक बनाते हैं।

पिथौरा पेंटिंग

हर पेंटिंग अलग होती है, क्योंकि यह कलाकार की कल्पना पर निर्भर करती है। कोई दो पेंटिंग एक जैसी नहीं होतीं। पेंटिंग में देवता भी होते हैं, जैसे इंद्र, गणेश और रानी काजल, जो जनजाति की कुलदेवी हैं। ये चित्र कहानियां कहते हैं। जैसे, एक पेंटिंग में बारह सिर वाला देवता बार माथा नो धानी दिखता है, जो सभी दिशाओं से रक्षा करता है। यह जनजाति की पौराणिक मान्यताओं को दर्शाता है। चित्र और रंग मिलकर एक कहानी बुनते हैं। यह कला सिर्फ देखने की नहीं, बल्कि समझने की है। यह आदिवासी जीवन, विश्वास और प्रकृति से जुड़ाव को जीवंत करती है। अब इस कला के महत्व और इसके वर्तमान रूप पर बात करते हैं।

पिथौरा पेंटिंग का महत्व केवल कला तक सीमित नहीं है। यह राठवा और भील जनजातियों की पहचान है। यह उनके विश्वास, परंपराओं और जीवनशैली को दर्शाती है। पेंटिंग बनाना एक धार्मिक कार्य है, जो समुदाय को एकजुट करता है। जब पेंटिंग बनती है, तो पूरा गांव शामिल होता है। यह सामाजिक बंधन को मजबूत करता है। यह कला पर्यावरण के प्रति सम्मान भी दिखाती है। प्राकृतिक रंगों का उपयोग और प्रकृति के चित्र इसके सबूत हैं। यह जनजातियों की पर्यावरण के साथ सहजीवन की भावना को दर्शाता है। पिथौरा पेंटिंग को बनाना और पूजना समुदाय के लिए सुख और समृद्धि का प्रतीक है।

आज, यह कला पर्यटन को बढ़ावा दे रही है। छोटा उदयपुर और अलिराजपुर जैसे क्षेत्रों में पर्यटक इस कला को देखने आते हैं। सरकार ने इसे बढ़ावा देने के लिए प्रदर्शनियां और कार्यशालाएं शुरू की हैं। स्कूलों और सरकारी दफ्तरों में पिथौरा पेंटिंग्स प्रदर्शित होती हैं। यह जनजातियों के लिए आय का स्रोत भी बन रही है। हालांकि, चुनौतियां भी हैं। युवा पीढ़ी शहरों की ओर जा रही है, जिससे यह कला कम हो रही है। फिर भी, कुछ संगठन इसे बचाने के लिए काम कर रहे हैं। यह कला भारत की सांस्कृतिक विविधता का प्रतीक है। अब आधुनिक समय में इसके बदलाव और भविष्य पर बात करते हैं।

आधुनिक समय में पिथौरा पेंटिंग ने नया रूप लिया है। पहले यह केवल दीवारों तक सीमित थी लेकिन अब कैनवास, कपड़े और कागज पर बनाई जाती है। इससे कलाकार इसे बेच सकते हैं। दिल्ली, मुंबई और विदेशों में प्रदर्शनियां लगती हैं। कुछ कलाकार, जैसे साक्षी भायदिया, इस कला को सिलाई के साथ जोड़ रहे हैं, जो नया प्रयोग है। आधुनिकता के बावजूद, पिथौरा की आत्मा वही है। यह अभी भी धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रखती है। गुजरात और मध्य प्रदेश सरकार इसे बढ़ावा दे रही हैं। लेकिन भविष्य में इसे बचाने के लिए और प्रयास होने चाहिए। स्कूलों में कला सिखाने और कार्यशालाओं से नई पीढ़ी को जोड़ा जा सकता है।

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