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दशहरा पर लगाते हैं एक-दूसरे को तिलक, कहते हैं कृपा बनाए रखना! लेकिन क्यों? जानिए यहाँ

दशहरा, जिसे विजयदशमी भी कहा जाता है, भारतीय संस्कृति के उन अनमोल पर्वों में से एक है जो सिर्फ त्यौहार नहीं, बल्कि हमारे विश्वास का हिस्सा हैं। इस पर्व का इतिहास हमें सीधे-सीधे पौराणिक कथाओं की ओर ले जाता है। सबसे प्रसिद्ध कथा रामायण से जुड़ी है। कहा जाता है कि इस दिन भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया था

दशहरा

रावण केवल लंका का राजा ही नहीं था, बल्कि अत्यधिक ज्ञानवान और बलशाली भी था। फिर भी उसके भीतर का अहंकार और अधर्म उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बना। जब राम ने सीता को छुड़ाने के लिए लंका पर चढ़ाई की, तो नौ दिनों की कठिन लड़ाई के बाद दशमी के दिन उन्होंने रावण को परास्त कर दिया। तभी से अच्छाई पर बुराई की जीत की खुशी में मनाया जाता है यह दशहरा का त्यौहार।

वास्तव में, दशहरा का यह संदेश केवल युद्ध की जीत नहीं है, बल्कि धर्म, सत्य और नैतिकता की विजय का प्रतीक बन गया है। यही कारण है कि यह पर्व केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि जीवन की सच्चाई के रूप में भी मनाया जाता है। इसके अलावा दशहरा की जड़ें महाभारत से भी जुड़ी मानी जाती हैं। कथा है कि जब पांडव अज्ञातवास के समय अपने शस्त्र शमी वृक्ष के नीचे छुपाकर रख आए थे, तो अज्ञातवास पूर्ण होने पर उन्होंने उसी दशमी तिथि को अपने शस्त्र पुनः धारण किए थे। इसे भी विजय और नए आरंभ का प्रतीक माना गया था। कुछ लोग बताते हैं कि भारत के अलग-अलग हिस्सों में दशहरा को अलग-अलग कहानियों और परंपराओं से जोड़ा जाता है।

कहीं यह राम की विजय का पर्व है, तो कहीं शक्ति की आराधना का। यह विविधता ही दशहरा को और भी अद्भुत और शानदार बना देती है। ऐसा लगता है मानो भारत इस पर्व में हर साल नया जीवन पा लेता हो। लोग खूब खुशियां मनाते हैं, रावण के बड़े-बड़े पुतले बनाकर उनका दहन करते हैं। और साथ ही साथ अपने अंदर की बुराइयों का भी दहन करते हैं।

अगर आपने कभी दशहरे की शाम को मैदान में रावण दहन देखा है, तो आप समझ सकते हैं कि यह पर्व केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भावनाओं का महापर्व है। शाम ढ़लते ही लोग बड़े-बड़े मैदानों में एकत्रित होते हैं। वहां विशालकाय रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद की प्रतिमाएं पहले से ही तैयार होती हैं। पटाखों और आतिश बाज़ियों से सजे ये पुतले रात के अंधेरे में जब जलते हैं, तो ऐसा लगता है मानो आकाश तक रोशनी फैल गई हो। बच्चों की हंसी, ढोल-नगाड़ों की आवाज़ और “जय श्रीराम” के नारों से वातावरण गूंज उठता है। यह परंपरा हमें यह याद दिलाती है कि चाहे बुराई कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसका अंत निश्चित है!

रावण दहन केवल पुतला जलाने की रस्म नहीं, बल्कि भीतर के अहंकार, ईर्ष्या और नकारात्मकता को जलाकर त्यागने का प्रतीक भी है। उत्तर भारत में दशहरे पर रामलीला का आयोजन भी बड़ी धूमधाम से होता है। रामलीला केवल नाटक नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला सिखाती है। इसमें राम के आदर्श, सीता की मर्यादा, हनुमान की निष्ठा और लक्ष्मण की समर्पण भावना का चित्रण किया जाता है। दक्षिण भारत में दशहरा शक्ति पूजा का रूप ले लेता है। मैसूर का दशहरा तो विश्वभर में प्रसिद्ध है। वहां पूरे शहर को रोशन किया जाता है, राजमहल जगमगाता है और हाथियों की शोभायात्रा लोगों का मन मोह लेती है।

दशहरा

इसी तरह पूर्वोत्तर भारत में दुर्गा पूजा के रूप में दशहरा मनाया जाता है। पंडालों की भव्यता, मूर्तियों की सुंदरता और आरती की गूंज हर किसी को भाव-विभोर कर देती है। इस तरह दशहरा हर क्षेत्र में अपनी अनूठी पहचान बनाए हुए है, लेकिन इसके केंद्र में वही सीख है बुराई का अंत और अच्छाई की जीत। गांव व शहरों में रामायण के नाटक किए जाते हैं जहां पर अभिनेता अपने अभिनय से रामायण की पूरी कथा का मंचन करते हैं। जो इस उत्सव को और भी खास बनाता है।

दशहरा केवल धार्मिक त्यौहार नहीं है, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक धरोहर का एक साझा उदाहरण है। अगर हम ऐतिहासिक दृष्टि से देखें, तो भारत में दशहरा हमेशा से सामाजिक मेलजोल और उत्सव का अवसर रहा है। गांव-गांव में लोग अपने कामकाज छोड़कर एक जगह इकट्ठा होते थे। यह पर्व रिश्तों को मजबूत करने और समाज में भाईचारे की भावना जगाने का जरिया बनता था। कृषि प्रधान समाज में दशहरा का समय बेहद खास माना जाता है। यह वह अवसर होता है जब किसान खरीफ की फसल काटकर राहत महसूस करता है और नई फसलों की तैयारी करता है। इसलिए दशहरा उनके लिए केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक महत्त्व भी रखता है।

बहुत से नामचीन मानते हैं कि दशहरे के मेले, मेलजोल और सामूहिक कार्यक्रमों ने भारतीय समाज को बार-बार एकजुट करने का काम किया। अंग्रेज़ी शासन के समय भी दशहरा स्वतंत्रता की भावना जगाने का अवसर बन गया। रावण दहन और रामलीला के मंचन में छिपे संदेश ने लोगों को यह भरोसा दिलाया कि एक दिन विदेशी शासन का भी अंत होगा। आज भी दशहरा हमें यह सिखाता है कि समाज तभी आगे बढ़ सकता है जब हम बुराई, अन्याय और भेदभाव को त्यागकर अच्छाई, समानता और न्याय को अपनाएं।

समय के साथ दशहरे के रंग और रूप भी बदलते जा रहे हैं। पहले, जहां गांव और कस्बों में रामलीला और रावण दहन ही प्रमुख आकर्षण हुआ करता था, वहीं आज बड़े शहरों में दशहरा आधुनिक तकनीक के साथ और भव्य तरीके से मनाया जाने लगा है। अब पुतलों को तैयार करने में नई-नई तकनीकों का इस्तेमाल होता है। आतिश बाज़ियां इतनी चमकदार और रंगीन होती हैं कि पूरा आकाश जगमगा उठता है।

दशहरा

सोशल मीडिया के दौर में भी दशहरे की धूम देखने लायक होती है। लोग इंस्टाग्राम और फेसबुक पर रावण दहन की लाइव स्ट्रीमिंग करते हैं, फोटो और वीडियो साझा करते हैं। इससे यह पर्व केवल एक शहर या गांव तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दुनिया भर में इसकी गूंज पहुंच जाती है। शिक्षण संस्थान और दफ्तर भी दशहरे को नए तरीकों से मनाते हैं। कहीं सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं, तो कहीं “एथिकल वर्कशॉप” आयोजित की जाती है जिसमें दशहरे को आधुनिक जीवन से जोड़कर समझाया जाता है।

हालांकि एक चिंता भी है। आधुनिकता की चमक-दमक में कई बार त्यौहार का मूल विचार पीछे छूट जाता है। पटाखों और प्रदूषण की समस्या पर भी सवाल उठते हैं। ऐसे में अब समाज यह सोचने लगा है कि रावण दहन तो हो, लेकिन पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना। कई जगहों पर पर्यावरण अनुकूल- Eco Friendly दशहरा मनाने की शुरुआत हो चुकी है। यह बदलाव बताता है कि भले ही समय बदल जाए, लेकिन दशहरे की आत्मा सत्य की विजय आज भी उतनी ही प्रासंगिक है जितनी सदियों पहले थी।

दशहरा हर वर्ष हमें वही शाश्वत संदेश देता है कि चाहे बुराई कितनी भी ताकतवर क्यों न हो, उसका अंत निश्चित है! यह पर्व हमें अपने भीतर झांकने का अवसर भी देता है। असल में रावण बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर भी छिपा है अहंकार, क्रोध, लालच, ईर्ष्या और अन्य नकारात्मक भावनाओं के रूप में। जब हम दशहरे पर पुतला जलाते हैं, तो दरअसल हम अपने भीतर के इन राक्षसों को जलाने का संकल्प लेते हैं।

By Five Colors Of Travel

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