खर्ची पूजा: भारत की सांस्कृतिक विरासत में हर त्यौहार अपने भीतर कोई न कोई आस्था, रहस्य और इतिहास समेटे हुए है। उत्तर-पूर्वी भारत का छोटा सा लेकिन बेहद खूबसूरत राज्य त्रिपुरा ऐसी ही विविधताओं का घर है। यहां मनाई जाने वाली खर्ची पूजा सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं समाज में पवित्रता, प्रकृति-सम्मान और इंसानी एकता का संदेश देने वाला लोक उत्सव है। त्रिपुरी, बांग्ला और जनजातीय संस्कृतियों की मिली-जुली परंपरा से सजी यह पूजा हर साल जुलाई महीने में मनाई जाती है और पूरे सात दिनों तक चलती है। राजधानी अगरतला से करीब 12-13 किलोमीटरदूर पुरातन राजमहल क्षेत्र ओल्ड अगरतला इस पूजा का मुख्य स्थान है, जहां हजारों श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते हैं।

खर्ची पूजा को समझने के लिए थोड़ा पीछे जाना पड़ता है इसके अर्थ की ओर। खार का मतलब है पाप या अशुद्धि और ची का अर्थ है धोना या शुद्ध करना। यानी खारची पूजा का सीधा मकसद है समाज और प्रकृति से अशुद्धियों को दूर करना और नए शुभ चक्र की शुरुआत करना। यह पूजा प्रकृति पूजा की विरासत भी दर्शाती है क्योंकि इसमें भूमि-देवी की पूजा होती है जिसे त्रिपुरा के लोग चांताई के नाम से जानते हैं। पूजा में छोटे-छोटे लकड़ी के बने 14 सिर 14 देवताओं का प्रतीक बाहर लाए जाते हैं, जिन्हें वर्ष में सिर्फ इसी समय जनता के दर्शन के लिए प्रदर्शित किया जाता है। इन पवित्र प्रतीकों को नदी में स्नान करवाया जाता है, फिर विशेष मंत्र-पाठ के साथ पूजा की जाती है। माना जाता है कि इस प्रक्रिया से समाज की नकारात्मक ऊर्जा और बीमारियां दूर होती हैं।

खर्ची पूजा की सबसे आकर्षक बात यह है कि इसमें किसी एक धर्म या जाति कावर्चस्व नहीं बल्कि हर समुदाय का एक जैसा योगदान होता है। यही वजह है कि इसे सामुदायिक उत्सव कहा जाता है। पूजा के दौरान भव्य जुलूस, पारंपरिक वाद्य-यंत्रों की धुन, रंगीन पोशाकें, स्थानीय नृत्य-गान और लोक कलाओं का अद्भुत प्रदर्शन देखने को मिलता है। सात दिनों की इस महोत्सव रात में सजी-धजी दुकानों, स्थानीय व्यंजनों की खुशबू, हस्तशिल्प बाज़ार और रात-भर चलने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम त्रिपुरा की जीवंतता को पूरी तरह सामने रखते हैं। बड़ी संख्या में पर्यटक सिर्फ इस उत्सव की भव्यता का अनुभव करने के लिए यहां पहुंचते हैं, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था में भी नई ऊर्जा आती है।(पूजा में छोटे-छोटे लकड़ी के बने 14 सिर 14 देवताओं का प्रतीक बाहर लाए जाते हैं)
खर्ची पूजा आज सिर्फ श्रद्धा का पर्व नहीं, बल्कि संस्कृति-संरक्षण और सामाजिकमेल-मिलाप का प्रतीक बन चुकी है। यह हमें याद दिलाती है कि आधुनिकता की तेज़ दौड़ में भी हमारी जड़ें और परंपराएं हमें जोड़कर रखती हैं। यह उत्सव प्रकृति का सम्मान करने, समाज को स्वच्छ और पवित्र बनाने और मिल-जुलकर रहने का संदेश देता है। हर धार्मिक व सामाजिक आयोजन की तरह यह भी हमें सिखाता है कि मन की शुद्धता और सामूहिक सद्भाव ही असल आध्यात्मिकता है।
