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खड़ाऊ चप्पल: लकड़ी से गढ़ी परंपरा, सेहत और भारतीय जीवन का पुराना रिश्ता, श्री राम भी पहनते थे!

खड़ाऊ

खड़ाऊ बनाने की प्रक्रिया बेहद रोचक और मेहनत वाली होती थी। कारीगर पहले चुनी हुई लकड़ी के टुकड़े को तलवे के हिसाब से आकार देते, फिर उसे घंटों तक तराशकर एक आरामदायक ढांचा तैयार करते। इसके बाद लकड़ी के ऊपर दो छोटे खूँटे लगाए जाते, जिन पर पैर टिकाकर चलना होता था। यह काम पूरी तरह हाथों से किया जाता था, इसलिए हर खड़ाऊ अपनी बनावट और वजन में थोड़ी अलग होती—जैसे हर जोड़ी कारीगर की पहचान अपने साथ लेकर चलती हो। किसी मशीन का इस्तेमाल न होने के कारण इन चप्पलों में एक तरह की प्राकृतिक गर्माहट महसूस होती थी।(खड़ाऊ बनाने की प्रक्रिया बेहद रोचक और मेहनत वाली होती थी।)

खड़ाऊ पहनने के फायदे भी काफी महत्त्वपूर्ण थे। नीम जैसी लकड़ियों में एंटी-बैक्टीरियल गुण होते हैं, जो पैरों को संक्रमण से बचाते हैं। खड़ाऊ में पैर ज़मीन से थोड़ा ऊपर रहते हैं, जिससे धूल-मिट्टी का असर कम पड़ता है और पैरों की त्वचा सुरक्षित रहती है। वैद्यक ग्रंथों के अनुसार, लकड़ी पर चलने से तलवों पर पड़ने वाला दबाव संतुलित होता है, जिससे कमर दर्द, एड़ी दर्द और घुटनों में राहत मिलती है। साधु-संत इसे इसलिए पहनते थे ताकि उनका चलना-फिरना नियंत्रित रहे और वे ध्यान और तपस्या में अधिक एकाग्र हो सकें

आज भले ही खड़ाऊ रोज़मर्रा की ज़िंदगी से लगभग दूर हो चुकी है, पर कई मंदिरों, आश्रमों और गाँवों में इसका उपयोग अब भी देखा जा सकता है। कुछ लोग इसे धार्मिक अवसरों पर पहनते हैं, जबकि कई लोग इसे घर में सजावट या संग्रह के रूप में रखते हैं। प्राकृतिक जीवनशैली अपनाने वाले लोगों के बीच खड़ाऊ एक बार फिर चर्चा में है, क्योंकि इसके फायदे और इसकी बनावट दोनों ही इंसान को प्रकृति के और करीब ले जाते हैं। खड़ाऊ की कहानी हमें याद दिलाती है कि कभी साधारण-सी दिखने वाली यह लकड़ी की चप्पल लोगों के जीवन, रीति-रिवाज और स्वास्थ्य का अहम हिस्सा रही है।

खड़ाऊ

By Five Colors Of Travel

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