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चीन में अनोखी परंपरा- शादी से 1 माह पहले शुरू हो जाती हैं रोने की तैयारियां

चीन की एक ऐसी परंपरा जो किसी की भी सोच को पूरी तरह बदल सकती है- तूजिया समुदाय की ‘रोती हुई शादी’
चीन की ग्रामीण संस्कृति को समझना, बीजिंग और शंघाई की चकाचौंध के बाद, एक अलग ही चीन देखना एक सुखद अनुभव हो सकता है। सिचुआन के एक दूरदराज के इलाके में तूजिया लोग रहते हैं।

चीन में अनोखी परंपरा

एक शांत, हरे-भरे गांव में पहुंचे, तो हर तरफ़ एक सुकून। हवा में पहाड़ों की ताज़गी और लकड़ियों के जलने की धीमी सी गंध। शादी का माहौल लेकिन भारतीय शादियों की तरह वहां भी शायद ढोल-नगाड़े और ढेर सारा खाना ही नहीं एक अनोखी परंपरा भी होती है- ‘कुहुन’ या ‘रोती हुई शादी’।
कुहुन? क्या मतलब, रोती हुई शादी?
मतलब, “यहां दुल्हनें शादी से एक महीने पहले से हर दिन एक घंटा रोती हैं। ये कोई दुख के आंसू नहीं होते, बल्कि परंपरा का हिस्सा हैं। और शादी नज़दीक आते-आते, मां और फिर दादी भी इसमें शामिल हो जाती हैं।” दिल्ली में तो लड़कियां अपनी शादी के लिए ख़ूब शॉपिंग करती हैं, पार्लर जाती हैं, और हर पल को ख़ुशी से जीती हैं। रोने की परंपरा? यह अजीब लग सकता है पर साथ ही अविश्वसनीय रूप से दिलचस्प भी।

यहाँ एक दुल्हन का घर जो अगले हफ़्ते शादी करने वाली है। कैसा दिखता होगा? घर में एक अजीब सा माहौल होता है। उदासी नहीं, लेकिन एक गहन गंभीरता। जवान दुल्हन एक कमरे में अकेली बैठी होगी। जैसे ही घड़ी ने शाम के सात बजाए, उसने धीरे-धीरे रोना शुरू कर दिया। यह कोई सिसकना नहीं, बल्कि एक लयबद्ध, धुन भरा रोना होता है, जिसमें दर्द और अलविदा कहने की भावना घुल-मिल गई होती है।

यह दुख का रोना नहीं है, बल्कि विदाई का गीत है। यह अपने परिवार, अपने बचपन, अपने घर को छोड़ने का एक भावनात्मक इज़हार है। वे मानते हैं कि यह रोने से दुल्हन के नए जीवन में समृद्धि और ख़ुशी आती है। यह जितनी ऊँची और मधुर आवाज़ में रोती है, उतना ही उसे कुशल और अच्छी पत्नी माना जाता है।
जब शादी का दिन नज़दीक आता है तो दुल्हन की मां और दादी भी इस ‘रोने’ में शामिल हो जाती हैं। तीनों एक साथ बैठकर एक धुन में रोती हैं। मां बेटी को विदा करने के लिए, और दादी अपनी बेटी और पोती, दोनों को आशीर्वाद देने के लिए। उनके आंसू भावनाओं के सैलाब होते हैं। प्रेम, विदाई, चिंता और भविष्य के लिए शुभकामनाएं। यह नज़ारा इतना मार्मिक होता है कि आपकी आंखों में भी नमी आ जाए।
यह सिर्फ़ एक परंपरा नहीं थी, बल्कि भावनाओं को व्यक्त करने का एक गहरा तरीक़ा है। यह बताता है कि कैसे एक लड़की अपने अतीत को पीछे छोड़कर एक नए जीवन में कदम रखती है। यह उस बंधन का प्रतीक, जो एक परिवार को एक साथ जोड़े रखता है, और उस प्रेम का जो वे एक-दूसरे के लिए महसूस करते हैं।

हमारी दुनिया कितनी विविध है! कहीं जश्न में पटाखे फूटते हैं, तो कहीं आंसू भी परंपरा का हिस्सा बन जाते हैं। ये ब्लॉग पढ़कर आप भी सोच में पड़ गए होंगे कि दुनिया को समझने के लिए, हमें अपनी सोच के दायरों से बाहर निकलना होगा और हर संस्कृति की अपनी ख़ासियत को समझना होगा। जैसे हमने चीन की इस अनूठी परम्परा के बारे में जाना।

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