प्रेम मंदिर में बहती प्रेम की लहर
प्रेम मंदिर वृंदावन – कभी-कभी ज़िंदगी की भागदौड़ में मन थक जाता है, और तब हम खोजते हैं किसी ऐसे ठिकाने की जहां कुछ पल के लिए चैन मिल जाए। मेरे लिए वो ठिकाना था प्रेम मंदिर। जिस जगह का नाम सुनते ही दिल में एक अलग सी फील उठती है। प्रेम शब्द में जो मिठास है, जब उसके आगे मंदिर जुड़ता है, तो लगता है जैसे भक्ति और सौंदर्य का अनोखा संगम बन गया हो। मथुरा की धरती पर कदम रखते ही एक अद्भुत वाइब महसूस होती है जैसे हवा में बांसुरी की मधुर धुन घुली हो। चारों तरफ़ भगवान कृष्ण की कहानियां, दीवारों पर चित्र, दुकानों से आती माखन-मिश्री की खुशबू और लोगों के चेहरे पर श्रद्धा की स्माइल सब कुछ मन को भा जाता है।

सफर की शुरुआत कुछ रोमांचक अंदाज में
दिल्ली से मथुरा की दूरी करीब 180 किलोमीटर है। अगर आपको सैर-सपाटे का शौक है तो यमुना एक्सप्रेसवे पर गाड़ी दौड़ाना एक शानदार अनुभव है। चिकनी सड़क, हवा का झोंका और खेतों के बीच से गुजरता रास्ता हर पल बस यात्रा की फील देता है। ट्रेन से भी पहुंचना बहुत आसान है। मथुरा जंक्शन या वृंदावन रोड स्टेशन दोनों ही नज़दीक हैं। स्टेशन से बाहर निकलते ही ऑटो और ई-रिक्शा वाले आवाज़ लगाते हैं प्रेम मंदिर, बीस रुपये में छोड़ देंगे!(मेरे लिए वो ठिकाना था प्रेम मंदिर, मथुरा।)

रास्ते में जैसे-जैसे मंदिर पास आता है, वैसे-वैसे दिल की धड़कनें तेज़ होती जाती हैं। सड़क के दोनों ओर फूलों की दुकानें, रंग-बिरंगी रोशनियां और भक्तों की भीड़ देखकर लगता है जैसे पूरा शहर इसी मंदिर के इर्द-गिर्द सांस लेता हो। जब मंदिर का पहला नज़ारा सामने आता है, सफेद संगमरमर की चमक आंखों को चौंका देती है। और अंदर से एक ही शब्द निकलता है वाह! यही है वो ठिकाना जिसकी चर्चा हर कोई करता है।

प्रेम मंदिर की पहली झलक जो दिल में बस जाए
मंदिर में कदम रखते ही जो दृश्य सामने आता है, वो शब्दों में बयां करना कठिन है। पूरा मंदिर सफेद संगमरमर से बना है इतना उजला कि सूरज की किरणें भी उस पर उतर कर नाचती हैं। हर दीवार, हर खंभा और हर मूर्ति मानो कोई कहानी कह रही हो। राधा-कृष्ण की मूर्तियां इतनी मनोहर कि लगता है अभी जीवंत हो जाएंगी। चारों ओर फूलों की खुशबू, भजनों की धीमी धुन और हवा में घुली भक्ति की वाइब यह सब मिलकर मन को शांत कर देते हैं।

रात में जब लाइट्स जलती हैं, तो मंदिर किसी स्वप्न जैसा दिखने लगता है। सफेद पत्थर नीले, गुलाबी, सुनहरे और बैंगनी रंगों में रंग जाता है। लगता है जैसे चांदनी धरती पर उतर आई हो। फव्वारों में जब पानी की धाराएं रंगीन रोशनी से मिलती हैं, तो ऐसा लगता है जैसे जल और प्रकाश मिलकर संगीत रच रहे हों। लोग बस खड़े होकर देखते रहते हैं कोई मोबाइल का कैमरा उठाता है, तो कोई बस निहारता है। उस पल में शब्द नहीं, बस एहसास होता है।
मंदिर परिसर के हर कोने में कहानी छिपी है

प्रेम मंदिर का परिसर बहुत विशाल है। यहां घूमते हुए ऐसा लगता है जैसे किसी सपनों की दुनिया में आ गए हों। हर मोड़ पर कोई नई झांकी कोई नया दृश्य, कोई नया अनुभव है। यहां भगवान कृष्ण की लीलाओं के इतने सुंदर दृश्य बनाए गए हैं कि लगता है जैसे इतिहास जीवित हो उठा हो।

गोवर्धन पर्वत उठाने की झांकी रासलीला का दृश्य, माखन चोरी का खेल सब कुछ इतना सजीव कि मन मोह लेता है। रात में जब झांकियों के चारों ओर छोटी-छोटी लाइट्स जलती हैं, तो पूरा माहौल किसी जादुई संसार में बदल जाता है। भक्त, यात्री, बच्चे सबके चेहरों पर एक जैसी खुशी होती है। यहां की भीड़ में भी एक अनुशासन देखने को ,मिलता है। लेकिन कोई शोर नहीं, कोई धक्का-मुक्की नहीं। बस एक जन्नत जैसी शांति और पूरा भक्ति भरा वातावरण।
एक अद्भुत नजारा जो दिल जीत ले

किसी भी यात्रा का मज़ा तब पूरा होता है जब उसमें खाने की खुशबू शामिल हो। प्रेम मंदिर के बाहर आपको मथुरा की असली रौनक देखने को मिलती है स्वाद और सुगंध से भरी गालियां का मनभावक दृश्य हर किसी का दिल चुरा लेता है। सबसे पहले तो मथुरा का प्रसिद्ध पेड़ा। इतना नरम और मलाईदार कि मुंह में जाते ही घुल जाए। फिर आती है कचौड़ी-जलेबी की जोड़ी, जो यहां की पहचान है।

गरमागरम कचौड़ी के साथ जब मीठी जलेबी का स्वाद मिलता है, तो लगता है जैसे स्वाद और भक्ति का मिलन हो गया हो। थोड़ा आगे बढ़िए तो दुकानों पर रबड़ी, लस्सी और छाछ मिलेगी। अगर आप कुछ नया ट्राय करना चाहें तो आसपास कुछ छोटे-छोटे कैफे हैं जहां मथुरा स्पेशल चाट, पनीर रोल और पाव भाजी जैसी चीज़ें मिलती हैं। यहां का खाना सिर्फ़ पेट नहीं भरता, आत्मा को भी तृप्त कर देता है। स्थानीय लोग कहते हैं जो पेड़ा यहां खा ले, वो इस भूमि की मिठास अपने भीतर ले जाता है।

प्रेम मंदिर में कुछ विशेष है, जो हरेक को आकर्षित करता है
शाम ढलते ही प्रेम मंदिर एक नए रूप में बदल जाता है। आसमान में तारे टिमटिमाते हैं और ज़मीन पर लाइट्स की चमक फैल जाती है। संगमरमर की दीवारें नीले, गुलाबी और सुनहरे रंगों में नहाती हैं। ऐसा लगता है मानो मंदिर नहीं, कोई सपना जीवंत हो गया हो। फव्वारों से उड़ता पानी जब लाइट्स से टकराता है तो बूंदें इंद्रधनुष की तरह चमक उठती हैं। चारों तरफ़ बैठी भीड़ उस दृश्य को देखकर मंत्रमुग्ध हो जाती है।

कोई मौन में खोया है, कोई भक्ति गीतों में झूम रहा है, कोई बस कैमरा से उस पल को कैद कर रहा है। वो माहौल इतना दिव्य होता है कि लगता है समय रुक गया हो। हवा में ठंडक, दिल में भक्ति, और आंखों में वो चमक बस यही वो पल है जब इंसान खुद को भूलकर ईश्वर से मिल जाता है। संगीत की मधुर धुनें कानों में गूंजती हैं, और मंदिर की लाइट्स जैसे कहती हैं जहां प्रेम है, वहीं ईश्वर है।
लौटते वक्त की अनुभूति बस यादों में जाती है

जब मंदिर से लौटने का समय आता है, तो मन भारी हो जाता है। कदम बार-बार पीछे मुड़कर देखने को मजबूर हो जाते हैं। ऑटो में बैठते हुए भी आंखों के सामने वही रोशन मंदिर, वही फव्वारे, वही झांकियां घूमती रहती हैं। रास्ते की हवा अब पहले जैसी नहीं लगती, उसमें अब भक्ति और संतोष की खुशबू घुल जाती है। मन बार-बार यही दोहराता है और रट लगाता है फिर लौटूंगा यहां।

क्योंकि ऐसा ठिकाना दुनिया में कोई और नहीं। घर पहुंचने के बाद भी जब रात को आंखें बंद होती हैं, तो प्रेम मंदिर की तस्वीरें दिल में झिलमिलाने लगती हैं। वो लाइट्स, वो शांति, वो वाइब सब कुछ जैसे आत्मा का हिस्सा बन जाता है।
अंत में बस यादें रह जाती हैं

प्रेम मंदिर सिर्फ़ एक दर्शनीय स्थल नहीं, बल्कि एक अनुभव है। यह वो जगह है जहां संगमरमर की ठंडक में भक्ति की गर्माहट महसूस होती है, जहां हर दीवार कहती है प्रेम ही भगवान है। यहां की लाइट्स सिर्फ़ आंखों को नहीं, आत्मा को भी रोशन कर देती हैं। अगर आप एक घुमक्कड़ हैं, अगर आपको नई जगहों की खोज का शौक है, तो प्रेम मंदिर आपके सफर की सूची में ज़रूर होना चाहिए।

यहां का हर कोना, हर झांकी, हर रंग और हर फव्वारा यह कहता है जहाँ प्रेम है, वहीं जीवन है। तो अगली बार जब मन में सुकून की चाह उठे, या दिल चाहे किसी दिव्य वाइब में खो जाने का, तो याद रखिए मथुरा का प्रेम मंदिर आपका इंतज़ार कर रहा है।

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