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तंजावुर- इसे कहा जाता है दक्षिण भारत का चावल का कटोरा!

तमिलनाडु का एक ऐसा शहर जो अपनी सुंदरता और संस्कृति के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। इसे ‘मंदिरों का शहर’ और ‘दक्षिण भारत का चावल का कटोरा’ कहा जाता है। तंजावुर सिर्फ एक जगह नहीं बल्कि एक ऐसा उदाहरण है जो आपको इतिहास, कला और परंपराओं की दुनिया में ले जाता है। तंजावुर तमिलनाडु के ब्यावर जिले में कावेरी नदी के किनारे बसा है। यह शहर चोल साम्राज्य की राजधानी रहा है, जिसने सैकड़ों साल पहले दक्षिण भारत को अपनी शानदार वास्तुकला और संस्कृति से सजाया।

यहां के मंदिर, महल और पुस्तकालय आपको अतीत की सैर कराते हैं। तंजावुर की खास बात यह है कि यह पुरानी परंपराओं को आज भी जीवित रखे हुए है। चाहे वह तंजौर पेंटिंग हो, कर्नाटक संगीत हो या फिर हस्तशिल्प, हर चीज में इस शहर की आत्मा झलकती है। मैंने जब तंजावुर के बारे में पहली बार पढ़ा, तो मुझे यकीन नहीं हुआ कि कोई शहर इतना खास हो सकता है। लेकिन जब मैंने इसकी कहानियां जानी, तो लगा कि इसे देखना तो बनता है। इस ब्लॉग में हम आपको तंजावुर के प्रमुख स्थानों, इतिहास, संस्कृति, खानपान और वहां पहुंचने के तरीकों के बारे में बताएंगे।

तंजावुर का इतिहास इतना पुराना और रोचक है कि इसे सुनकर आप हैरान रह जाएंगे। यह शहर चोल वंश की राजधानी हुआ करता था, जिसका शासन नौ वीं से तेरह वीं शताब्दी तक चला। चोल शासक राजराजा ने इसे अपनी राजधानी बनाया और यहां भव्य बृहदेश्वर मंदिर बनवाया। इस मंदिर को देखकर आज भी लोग दांतों तले उंगली दबा लेते हैं। कहा जाता है कि तंजावुर का नाम एक राक्षस तंजन के नाम पर पड़ा है, जिसकी आखिरी इच्छा थी कि इस जगह का नाम उसके नाम पर रखा जाए। पहले इसे तंजापुरी कहा जाता था।

तंजावुर

चोल वंश के बाद तंजावुर पर नायक और मराठा शासकों ने राज किया। सन् 1749 में ब्रिटिशों ने इस पर कब्जा किया, लेकिन शहर की संस्कृति और कला पर उनका ज्यादा असर नहीं पड़ा। मराठा शासक सरफोजी द्वितीय ने सरस्वती महल पुस्तकालय को और समृद्ध किया, जो आज भी विद्वानों के लिए खजाना है। तंजावुर की यह खासियत है कि हर शासक ने इसे और सुंदर बनाया। यहां की जमीन बहुत उपजाऊ है, जिसके कारण इसे चावल का कटोरा भी कहा जाता है। कावेरी नदी की वजह से धान की खेती खूब होती है। यह शहर न सिर्फ इतिहास बल्कि खेती और व्यापार के लिए भी मशहूर रहा है। अगर आप इतिहास में रुचि रखते हैं, तो तंजावुर आपके लिए उम्दा लोकेशन है।

तंजावुर में घूमने की जगहों की कोई कमी नहीं है। यहां हर कोने में कुछ न कुछ खास है। तो चलिए हमारे साथ हम उन सभी जगहों का रुख आपको करते हैं जिनमे सबसे पहले है-

यह तंजावुर का सबसे मशहूर मंदिर है, जिसे बड़ा मंदिर भी कहते हैं। इसे चोल राजा राजराजा ने 1010 ईस्वी में बनवाया था। यह यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है। मंदिर की ऊंचाई 216 फीट है और इसका शिखर कांसे का बना है। मंदिर के अंदर नंदी की विशाल मूर्ति है जो 12 फीट ऊंची और 25 टन वजनी है। दीवारों पर चोल और नायक काल की चित्रकारी है, जो अजंता की गुफाओं की याद दिलाती है। मंदिर के चारों तरफ खाई और अनाईकट नदी इसे और खूबसूरत बनाते हैं। आपको बताते हुए में अचरच स महसूस कर रहा हूं क्योंकि इस मंदिर का शिखर इतना सटीक बना है कि उसकी छाया जमीन पर नहीं पड़ती। यह जानकार तो आपको भी हैरान होना चाहिए।

यह भारत का सबसे पुराना और अनोखा पुस्तकालय है। इसमें 44,000 से ज्यादा पांडुलिपियां हैं, जिनमें से ज्यादातर संस्कृत और तमिल में हैं। मराठा राजा सरफोजी द्वितीय ने इसे बनवाया था। यहां दुर्लभ किताबें, चित्र और नक्शे हैं। अगर आप किताबों के शौकीन हैं, तो यह जगह आपको बहुत पसंद आएगी।

तंजावुर

यह महल नायक और मराठा शासकों की शान को दिखाता है। इसका निर्माण सन् 1535 में शुरू हुआ और बाद में मराठों ने इसे और भव्य बनाया। महल में रॉयल म्यूजियम, दरबार हॉल और बेल टावर हैं। दीवारों पर मध्यकालीन चित्रकारी है जो आपको मंत्रमुग्ध कर देगी। यह महल इतिहास और कला का शानदार नमूना है।

विजयनगर किले के अंदर बनी यह जगह बहुत सुंदर है। इसमें एक वर्गाकार तालाब है, जो पहले महल को पानी सप्लाई करता था। आज यह पर्यटकों के लिए खुला है। शांत माहौल और हरियाली इसे पिकनिक के लिए बेहतरीन बनाती है।

यह मंदिर तंजावुर से थोड़ा दूर है, लेकिन इसे देखे बिना आपकी यात्रा मानिए अधूरी है। इसे चोल राजा राजेंद्र ने बनवाया था। यह भी यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है। मंदिर की नक्काशी और वास्तुकला देखने लायक है। इनके अलावा, आप थानजई ममानी कोइल, अलंगुडी गुरु मंदिर और स्वार्ट्ज चर्च भी देख सकते हैं। हर जगह की अपनी एक कहानी है, जो आपको इतिहास रूबरू करती है।

तंजावुर सिर्फ मंदिरों के लिए नहीं, बल्कि अपनी कला और संस्कृति के लिए भी जाना जाता है। यहां की तंजौर पेंटिंग पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। इन चित्रों में सोने की पत्ती और रंगों का इस्तेमाल होता है, जो इन्हें चमकदार बनाता है। आप गांधी रोड पर पुंपुहर की दुकानों से ये पेंटिंग्स खरीद सकते हैं। यहां का कर्नाटक संगीत भी बहुत लोकप्रिय है। तंजावुर में कई संगीत समारोह होते हैं, खासकर तिरुवैयरु में, जहां संत त्यागराज को याद किया जाता है।

अगर आप संगीत प्रेमी हैं, तो इन समारोहों में जरूर जाएं। हस्तशिल्प और साड़ियां भी तंजावुर की खासियत हैं। यहां की सिल्क साड़ियां बहुत सुंदर होती हैं। आप स्थानीय बाजारों से पंचलोहा मूर्तियां और पूजा सामग्री भी खरीद सकते हैं। गांव के बाजारों में घूमना अपने आप में मजेदार है। स्थानीय लोग बहुत मिलनसार हैं और आपको अपनी संस्कृति के बारे में खूब बताएंगे। त्योहारों में तंजावुर की रौनक देखते बनती है। शिवरात्रि, नवरात्रि और राजराजन उत्सव धूमधाम से मनाए जाते हैं। अगर आप इन त्योहारों के समय जाएं, तो आपको लोक नृत्य और संगीत का मजा मिलेगा। तंजावुर की संस्कृति इतनी खास है कि आप इसके रंग में रंग ही जाएंगे।

तंजावुर का खाना दक्षिण भारतीय स्वाद का खजाना है। यहां आपको सांभर, रसम, इडली, डोसा, उपमा और पोंगल मिलेगा। खास तौर पर मसाला डोसा और स्वीट पोंगल बहुत मशहूर हैं। अगर आप मिठाई पसंद करते हैं, तो केसरी भात ट्राई करें। स्थानीय रेस्टोरेंट में आपको शाकाहारी और स्वादिष्ट खाना मिलेगा। मेरी सलाह है कि किसी छोटे से ढाबे में खाना खाएं, वहां का स्वाद यकीनन आपको हमेशा याद रहेगा।

तंजावुर में रुकने के लिए कई विकल्प हैं। सस्ते गेस्ट हाउस से लेकर लग्जरी होटल तक। कुछ मशहूर होटल हैं संगम होटल, होटल विक्टोरिया और शिव मुरुगन लॉज। अगर आप मंदिरों के पास रहना चाहते हैं, तो छोटे होटल या होम स्टे चुनें। और इसके लिए आपको पहले से बुकिंग करना बेहतर होगा, खासकर त्योहारों के समय।

हवाई मार्ग सबसे नजदीकी हवाई अड्डा तिरुचिरापल्ली जो तंजावुर से 57 किलोमीटर है। वहां से टैक्सी या बस ले सकते हैं। दूसरा विकल्प चेन्नई हवाई अड्डा है जो यहां से 380 किलोमीटर है।

रेल मार्ग तंजावुर जंक्शन चेन्नई, त्रिची और नागौर से जुड़ा है। कई ट्रेनें रोज चलती हैं। तो आप ट्रेन के जरिए भी बड़ी ही कुशलता से तंजावुर पहुँच सकते हैं और अपने सफर का आनंद उठा सकते हैं।

सड़क मार्ग तंजावुर तमिलनाडु के सभी बड़े शहरों से सड़क मार्ग से जुड़ा है। चेन्नई से 380 किलोमीटर, कोच्चि और बैंगलोर से भी बसें मिल जाती हैं। सबसे बेहतर ऑप्सन बस से यात्रा करना है, क्योंकि जाते और आते समय आप रास्ते में चलते हुए सारे नजारे अपने केमरे में कैद कर सकते हैं, और रोमांचित हो सकते हैं। वैसे यहां पहुंचने के लिए सबसे अच्छा समय है अक्टूबर से मार्च, जब मौसम सुहावना होता है। इसके आलवा आप सितंबर में जाकर यहां पर मेलों का मजा ले सकते हैं।

आपका तंजावुर जाना इसलिए जरूरी है क्योंकि यह आपको इतिहास, कला और संस्कृति के अनोखे नजारे दिखाता है। बृहदेश्वर मंदिर की भव्यता, सरस्वती महल की पांडुलिपियां और स्थानीय खाने का स्वाद आपको हमेशा याद रहेगा। दरअसल में अपना अनुभव बताऊं तो यह शहर वास्तव में शांति और सुकून देता है।

तंजावुर

By Five Colors Of Travel

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