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कर्नाटक का रागी मुड्डे जिसे एक बार भी खाओगे तो बात बन जाएगी!

भारत के दक्षिणी राज्यों की खानपान परंपराएं जितनी विविध और समृद्ध हैं, उतनी ही पौष्टिक भी हैं। इन्हीं में से एक है कर्नाटक का प्रसिद्ध व्यंजन रागी मुड्डे। अक्सर इसे “फिंगर मिलेट बॉल्स” भी कहा जाता है। रागी यानी मंडुआ का उपयोग भारत में सदियों से किया जा रहा है। प्राचीन धर्मशास्त्रों और आयुर्वेद में रागी का उल्लेख मिलता है। कहा जाता है कि पुराने समय में कर्नाटक और तमिलनाडु के किसान खेतों में लंबे समय तक काम करने के बाद रागी मुड्डे खाते थे क्योंकि यह पेट को लंबे समय तक भरा रखता था और शरीर को आवश्यक ऊर्जा देता रहता था

कर्नाटक की ग्रामीण संस्कृति में रागी मुड्डे केवल भोजन ही नहीं, बल्कि जीवनशैली का हिस्सा रहा है। यह पीढ़ी दर पीढ़ी घरों में बनता आया है। पहले के लोग खासकर गांवों के बुजुर्ग इसे “गरीब का सोना” कहते थे क्योंकि यह सस्ता भी था और सेहत के लिए फायदेमंद भी था। शादी-ब्याह, त्योहार और धार्मिक अनुष्ठानों के अवसर पर भी रागी के व्यंजन बनाए जाते हैं। खासकर कर्नाटक के पुराने राजाओं की रसोई में भी रागी का खास स्थान था।

रागी मुड्डे

वैसे कहा जाता है कि रागी अफ्रीका से भारत आई थी, लेकिन कर्नाटक ने इसे अपनी थाली और पहचान में इतना पिरो दिया कि यह यहां की प्रमुख फसल और संस्कृति का प्रतीक बन गई है। “रागी मुड्डे” को कर्नाटक के लोग गर्व से “हमारा असली भोजन” कहते हैं। यहां तक कि जब लोग शहरों और विदेशों में बसते हैं, तो भी रागी आटा और रागी मुड्डे की याद उनके स्वाद में हमेशा बसी रहती है।

रागी मुड्डे बनाने का तरीका बिलकुल सरल है, लेकिन इसे बनाने में थोड़ी सावधानी और अनुभव जरूरी होता है। यह पकवान जितना साधारण दिखता है, उतना ही खास तरीके से इसे बनाया जाता है। रागी मुड्डे बनाने के लिए सबसे पहले रागी का आटा लिया जाता है। एक गहरे बर्तन में पानी गर्म किया जाता है। पानी जब उबाल पर आ जाता है, तब उसमें हल्का नमक और कभी-कभी थोड़ा सा तेल या घी डाला जाता है। इसके बाद धीरे-धीरे रागी का आटा डालकर लकड़ी की बड़ी करछी से लगातार चलाया जाता है। ये सब करने में हाथ का जोर और धैर्य दोनों चाहिए, क्योंकि आटे को गांठ बनने से बचाना होता है। धीरे-धीरे इसका मिक्स्चर गाढ़ा होकर लचीला और चिपचिपा बन जाता है। जब यह पूरी तरह से पक जाए और चमकदार दिखाई देने लगे, तब उसे गोल-गोल गेंद जैसी आकृति में बना दिया जाता है। यही है रागी मुड्डे। खास बात यह है कि रागी मुड्डे को कभी चाकू-कांटे से नहीं खाया जाता। इसे हाथ से तोड़ा जाता है, छोटी-छोटी गेंद बनाई जाती है और फिर इसे सांभर, रस्सम, मटन करी या दाल में डुबो-डुबोकर खाया जाता है।

इसका स्वाद तब और भी बढ़ जाता है। गांवों में यह काम बड़े प्यार से किया जाता है। महिलाएं घर के आंगन में बैठकर बड़े बर्तनों में रागी मुड्डे बनाती हैं और पूरे परिवार के लिए परोसती हैं। इसे खाने का एक अनोखा आनंद है जो आज के किसी भी रेस्टोरेंट में मिल पाना मुश्किल है।

रागी मुड्डे सिर्फ स्वाद में ही नहीं, बल्कि सेहत में भी किसी खजाने से कम नहीं है। इसमें मौजूद पोषक तत्व इसे सुपरफूड बना देते हैं। सबसे पहले बात करें इसके कैल्शियम की तो रागी को “कैल्शियम का राजा” कहा जाता है। यह हड्डियों और दांतों के लिए बेहद फायदेमंद बताया जाता है। बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएं सभी के लिए यह एक आदर्श भोजन है। इसके अलावा रागी में आयरन, फाइबर और प्रोटीन भरपूर मात्रा में होते हैं। आयरन खून की कमी को दूर करता है, वहीं फाइबर पाचन तंत्र को मजबूत बनाता है। यह शरीर को लंबे समय तक ऊर्जा देता है, इसलिए इसे खाने के बाद जल्दी भूख नहीं लगती। यही कारण है कि किसान और मेहनतकश लोग इसे अपना मुख्य भोजन बनाते थे।

रागी मुड्डे

डायबिटीज़ से पीड़ित लोगों के लिए रागी वरदान है क्योंकि इसका ग्लाइसेमिक इंडेक्स कम होता है, जिससे ब्लड शुगर नियंत्रित रहता है। यह शरीर के वजन को भी नियंत्रित करने में मदद करता है। रागी में मौजूद एक अमीनो एसिड दिमाग की कार्य क्षमता को भी बढ़ाते हैं और तनाव को कम करने में सहायक होते हैं। इसके अलावा कहा गया है कि रागी का नियमित सेवन नींद की समस्या को कम करता है और शरीर को ठंडक पहुंचाता है। आजकल डॉक्टर और न्यूट्रिशनिस्ट भी रागी को डायट प्लान में शामिल करने की सलाह देते हैं। बच्चे की ग्रोथ में, गर्भवती महिलाओं की सेहत और बुजुर्गों की हड्डियों के लिए यह बेहद उपयोगी साबित होता है।

रागी मुड्डे को अकेले खाना मुश्किल है, लेकिन जब यह किसी लजीज पकवान के साथ जुड़ता है, तो उसका स्वाद दुगुना हो जाता है। सबसे ज्यादा मशहूर है सांभर और रस्सम। रागी मुड्डे का छोटा टुकड़ा तोड़कर गर्मागरम सांभर में डुबोने का मज़ा ही अलग होता है। खट्टा-तीखा रस्सम इसके स्वाद को और भी बढ़ा देता है। गांवों में लोग इसे अक्सर मटन करी या चिकन करी के साथ खाना पसंद करते हैं। रागी मुड्डे का साधारण और हल्का स्वाद मसालेदार मटन करी के साथ जब मिल जाता है, तो यह एक बेहतरीन कॉम्बिनेशन बन जाता है। जिसको खाने वाला कभी भी इसका स्वाद नहीं भूलता है।

इसके अलावा दाल, घी, छाछ और हरी सब्जियों के साथ भी इसे खाया जाता है। त्योहारों या विशेष अवसरों पर रागी मुड्डे के साथ नारियल की चटनी और खास सब्जी भी परोसी जाती है। कर्नाटक के अलग-अलग हिस्सों में इसे परोसने के तरीके अलग-अलग हैं। मैसूर और मंड्या इलाके में इसे मटन सूप के साथ खाया जाता है, जबकि उत्तरी कर्नाटक में इसे मूंग दाल या बेसन की ग्रेवी के साथ भी परोसा जाता है। आजकल तो कई जगह रेस्टोरेंट्स में रागी मुड्डे को “हेल्थ फूड” कहकर परोसा जाने लगा है। यहां इसे मॉडर्न ट्विस्ट देकर सलाद, दही और सूप के साथ भी पेश किया जाता है।

रागी मुड्डे कभी सिर्फ गांवों और किसानों का भोजन माना जाता था, लेकिन आज यह ग्लोबल फूड बन चुका है। हेल्थ कॉन्शस लोग, डाइट पर रहने वाले और फिटनेस एक्सपर्ट्स अब इसे सुपरफूड मानते हैं। क्योंकि इसकी खूबियों की जितनी तारीफ की जाए उतनी कम है। शहरों में बढ़ती फास्टफूड संस्कृति के बीच रागी मुड्डे एक संतुलित और पौष्टिक विकल्प बनकर सामने आया है। बेंगलुरु, मैसूर और अन्य शहरों के रेस्टोरेंट्स में अब रागी मुड्डे को गर्व से परोसा जाता है। हेल्थ कैफे और ऑर्गेनिक स्टोर्स में रागी का आटा बड़ी डिमांड में है। विदेशों में भी भारतीय समुदाय इसे बड़ी शिद्दत से अपनाता है। खासकर अमेरिका और यूरोप में जहां हेल्थ फूड का ट्रेंड तेज है, वहां रागी उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है। सरकार भी अब “मिलेट्स मिशन” के तहत रागी जैसे मोटे अनाजों को बढ़ावा दे रही है।

संयुक्त राष्ट्र ने साल 2023 को “इंटरनेशनल ईयर ऑफ मिलेट्स” घोषित किया था, जिससे रागी मुड्डे की लोकप्रियता और भी बढ़ गई। भविष्य में यह सिर्फ कर्नाटक की थाली तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दुनिया भर में भारतीय भोजन का हेल्दी राजदूत बनेगा। यह कहना गलत नहीं होगा कि रागी मुड्डे आज सिर्फ भोजन नहीं, बल्कि एक लाइफस्टाइल बन चुका है

By Five Colors Of Travel

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