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भारतीय शिल्पकला को दर्शाती हैं सदियों पुरानी अजंता की गुफाएं

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महाराष्ट्र का संभाजी नगर जिसे पहले औरंगाबाद कहा जाता था वह अजंता और एलोरा की गुफाओं के लिए मशहूर है। आज के इस ब्लॉग में हम आपको बताएंगे अजंता की गुफाओं के इतिहास के बारे में, यहां की कलाकृतियों के बारे में, और यहां कैसे पहुंचे इसके बारे में। संभाजी नगर के पहाड़ियों को खोदकर बनाई गई यह गुफाएं और उनके अंदर उकेरी गई कलाकृतियां भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया से पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हैं। इतिहास में रुचि रखने वाले लोगों के लिए अजंता कई वर्षों से शोध का एक महत्वपूर्ण स्थान बना हुआ है। अजंता की गुफाएं बौद्ध धर्म के उपासकों के लिए किसी तीर्थ स्थल से कम नहीं है। इन गुफाओं में भगवान बुद्ध के हजारों मूर्तियों को उकेरा गया है। इतिहास (History of Ajanta caves) अगर इतिहास की बात करें तो अजंता की गुफाओं का निर्माण कई सौ सालों के मेहनत की परिणिति है। इतिहासकारों का मानना है कि गुफा नंबर 9 और 10 को बनाने में 400 सालों का वक्त लगा था और इनका निर्माण 200 ईसा पूर्व से 200 ई के बीच करवाया गया था। गुफा नंबर 9 और 10 को अजंता की सबसे पुरानी गुफा के रूप में जाना जाता है। वहीं गुफा नंबर 4, 6, 11, 15, 16 और 17 के निर्माण के बारे में बताया जाता है कि इनका निर्माण 350 ई से 500 ई तक के बीच में हुआ।अजंता की गुफाएं दो भागों में विभाजित थीं। जिनमें एक भाग का उपयोग विहार के रूप में किया जाता था, वहीं दूसरे भाग का उपयोग आराधना के लिए किया जाता था। इस स्थान को चैत्य महाकक्ष कहा जाता था। अद्भुत है यहां की वास्तुकला (Amazing architecture) सहयाद्री पर्वत के चट्टानों को काटकर यहां लगभग 29 गुफाओं का निर्माण करवाया गया है। यह गुफाएं भारत के समृद्ध इतिहास और भारतीय स्थापत्य कला के उत्कृष्टता को बहुत ही बेहतरीन तरीके से दुनिया के सामने रखने की कोशिश करते हैं। यहाँ के वास्तु कला के कलाकार इतने कुशल थे कि यहां के कुछ गुफाओं को 100 फीट तक खोदकर बनाया गया है। विहार का भाग बहुत ही सीधा-साधा और सरल वास्तुकला का क्षेत्र था, वहीं चैत्य महाकक्ष में दीवारों पर कई प्रकार के मूर्तियों को बनवाया गया था। यह कक्ष भगवान बुद्ध को समर्पित था और उपासना के लिए उपयोग में लाया जाता था। इन कक्षों में चित्रों और मूर्तियों के द्वारा भगवान बुद्ध के अवतार के बारे में विस्तृत वर्णन देखने को मिलता है। विहार का उपयोग भिक्षुओं के द्वारा बुद्ध के धार्मिक उपदेशों के ज्ञान और अध्ययन के लिए किया जाता था।अजंता की गुफाओं का निर्माण दो समय काल में करवाया गया था। पहला तेहरवाड काल और दूसरा महायान काल। तेहरवाड काल में गुफा नंबर 9 और 10 का निर्माण आराधना के लिए करवाया गया था। वहीं गुफा नंबर 8, 12, 13 और 15 का निर्माण विहार कक्ष के रूप में करवाया गया था। वहीं महायान कल में तीन चैत्य कक्ष गुफा नंबर 19, 26 और गुफा नंबर 29 का निर्माण आराधना कक्ष के रूप में करवाया गया था। वहीं अन्य 11 गुफाओं का निर्माण वास स्थान अर्थात विहार परिसर के रूप में करवाया गया था। अजंता की गुफाओं में मुख्यतः बौद्ध के जीवन से संबंधित चित्र देखने को मिलते हैं। इसके अलावा चित्रों के जरिए जातक कथाओं का वर्णन देखने को मिलता है। इन चित्रों में राज दरबारों की तत्कालीन स्थितियों आपको भी उकेरा गया है और रोजमर्रा की जिंदगी को दिखाया गया है। इन सबसे परे गुफाओं में फूलों और पशुओं का भी चित्रण किया गया है। अजंता की गुफाओं तक कैसे पहुंचे (How to reach Ajanta Caves)? अगर आप अजंता की गुफाओं को घूमना चाहते हैं तो इसके लिए तीनों तरह के परिवहन माध्यमों का उपयोग कर सकते हैं। अजंता की गुफाएं महाराष्ट्र के औरंगाबाद में स्थित है। इसलिए अगर आप बाय रोड आना चाहते हैं तो आप सबसे पहले औरंगाबाद पहुंच सकते हैं। औरंगाबाद से अजंता की गुफाओं तक पहुंचने में आपको लगभग 45 मिनट का समय लगेगा। अगर आप वाया ट्रेन आना चाहते हैं तो उसके लिए भी आपको औरंगाबाद रेलवे स्टेशन तक आना पड़ेगा। वहीं फ्लाइट से आने के लिए आप जलगांव एयरपोर्ट तक का फ्लाइट ले सकते हैं। जलगांव एयरपोर्ट अजंता की गुफाओं से लगभग 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

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मांगी तुंगी- जो दिखती है ‘द ग्रेट वॉल आफ चाइना’ की तरह

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क्या आपको पता है इंडिया में भी ‘द ग्रेट वॉल आफ चाइना’ के जैसी ही एक वॉल है? जी हां आपने कुछ भी गलत नहीं पढ़ा है! यह सच है कि भारत में भी द ग्रेट वॉल आफ चाइना के जैसी ही एक इमारत है। आज के इस ब्लॉग में हम इसी वॉल के बारे में आपको बताएंगे। इस वॉल का नाम है मांगी तुंगी पिनेकल्स। जैन धर्म के सबसे प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक मांगी तुंगी पिनेकल्स महाराष्ट्र के सबसे खूबसूरत पर्यटन स्थलों में से एक है। जिसे एक्सप्लोर करने दूर-दूर से पर्यटक यहां घूमने आते हैं।असल में मांगी और तुंगी सह्याद्री के पहाड़ियों की दो चोटियां है जिन्हें जोड़ने के लिए सीढ़ियां बनाई गई हैं। जो दूर से देखने पर बिल्कुल ‘द ग्रेट वॉल ऑफ चाइना’ के जैसी दिखाई देती है। मांगी तुंगी पिनेकल्स तक पहुंचने के लिए सीढ़ियों का निर्माण करवाया गया है। अगर सीढ़ियों के संख्या की बात की जाए तो इन सीढ़ियों की संख्या लगभग 3500 से भी ज्यादा है। जिसे चढ़ने में आपको दो से तीन घंटे का समय लग सकता है। लेकिन इन सीढ़ियों को चढ़ते हुए आपको जरा भी थकान का एहसास नहीं होगा। क्योंकि इन सीढ़ियों के दोनों ओर दिखने वाले खूबसूरत नजारे किसी के भी थकान को पल भर में गायब करने के सक्षम हैं। इन खूबसूरत नजारों को देखने के बाद और ज्यादा उत्सुकता होती है कि अगर यह रास्ता इतना खूबसूरत है तो पीक पर पहुंचने के बाद का नजारा कितना खूबसूरत होगा? …और यही सवाल पर्यटकों को थकने नहीं देता है और आगे बढ़ने के लिए मोटिवेट करता है। मांगी तुंगी ट्रेक पर जाने के लिए दो रास्ते जाते हैं। जिसमें एक रास्ता पैदल ट्रैकिंग करने वालों के लिए है। जिसमें आपको 3500 सीढ़ियां चढ़नी पड़ेंगी। वहीं दूसरा रास्ता उन लोगों के लिए है जो गाड़ी से जाना चाहते हैं। लेकिन इस रास्ते में आप पूरी दूरी गाड़ी से कवर नहीं कर सकते हैं। इस रास्ते के जरिए आपको लास्ट के 1000 सीढ़ियों की चढ़ाई करनी होगी। मांगी तुंगी पिनेकल्स घूमने जाने का सबसे सही समय (Best time to visit Mangi Tungi pinnacles) खासकर के जब भारत में मानसून की एंट्री होती है और इसके बाद धीरे-धीरे ठंड बढ़ने लगती है तो मांगी तुंगी पिनेकल्स पर कोहरे का साया मंडराने लगता है। अक्टूबर से मार्च तक के समय में मांगी तुंगी पिनेकल्स का यह नजारा देखने लायक होता है। अगर आप मांगी तुंगी पिनेकल्स को विजिट करना चाहते हैं तो, हमारा यह सुझाव होगा कि आप मानसून के बाद ही यहां आए। क्योंकि इस समय चारों ओर ग्रीनरी ही ग्रीनरी देखने को मिलती है। जिसके कारण  मांगी तुंगी पीक्स की खूबसूरती और भी ज्यादा निखर का सामने आती है। मांगी तुंगी पीक्स से दिखने वाले नजारे इतने खूबसूरत होते हैं कि कुछ पल के लिए खुद को भूलकर उसे मूमेंट में ठहर जाने का दिल चाहता है। सनराइज और सनसेट के समय का लाल आकाश इस पिनेकल्स की खूबसूरती को और बढ़ा देता है। अगर आप नेचर लवर हो तो आपको इस ट्रेक के लिए जरूर जाना चाहिए। कैसे पहुंचे (How To Reach Mangi Tungi Pinnacles)? मांगी तुंगी नासिक शहर से लगभग 125 किलोमीटर, मुंबई से तकरीबन 280 किलोमीटर और पुणे शहर से लगभग 330 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। अगर आप पब्लिक ट्रांसपोर्ट से मांगी तुंगी पहुंचना चाहते हैं तो इसके लिए आपको सबसे पहले ताराबाद टाउन पहुंचाना पड़ेगा। आप ताराबाद टाउन से नासिक टू नंदुरबार स्टेट बस के जरिए मांगी तुंगी के बेस विलेज यानी भीलवड़ विलेज तक पहुंच सकते हैं। यह बस आपको मांगी तुंगी ट्रैक के बिल्कुल गेट के पास उतारेगी। जहां से आप अपना ट्रेकिंग स्टार्ट कर सकते हैं। मांगी तुंगी पिनेकल्स पर बना मंदिर शाम के 3:00 बजे बंद हो जाता है। क्योंकि अंधेरा होने के कारण किसी भी दुर्घटना के होने के चांसेस बहुत ज्यादा बढ़ जाते हैं। इन्हीं दुर्घटनाओं को अवॉइड करने के लिए यहां पर 3:00 बजे शाम के बाद मंदिर बंद हो जाते हैं। जिसके बाद आपको वापस से लौटना होगा। आप मैक्सिमम तीन बजे तक यहां घूम सकते हैं। इस ट्रेक के लिए हमारी ओर से आपको एक सुझाव होगा कि आप जब भी मांगी तुंगी ट्रेक के लिए जाएं तो अपने साथ एक डंडा या फिर हाइकिंग पोल जरूर रखें। क्योंकि मांगी तुंगी ट्रेक के आसपास बंदरों की संख्या बहुत ज्यादा है। जो कि यहां आने वाले पर्यटकों के बैग पर झपट्टा मार देते हैं। उन बंदरों से बचने के लिए आप अपने पास एक छोटा सा लकड़ी का डंडा रख सकते हैं। आपके पास कुछ नहीं है तो घबराने वाली कोई बात नहीं है। इस ट्रेक के स्टार्टिंग पॉइंट पर हीं बहुत सारी कठिया मिलती हैं। जिन्हें आप ₹20 देकर खरीद सकते हैं। बेहतरीन है यहां की कलाकृति (The artwork here is excellent) मांगी तुंगी पिनेकल्स के पास आपको कई सारी गुफाएं देखने को मिलेंगी। जिनके अंदर जैन स्थापत्य कला के कई उदाहरण देखने को मिलते हैं। इनमें जैन धर्म से जुड़े लेख भी शामिल हैं। इसके अलावा वहां कई सारी मूर्तियां भी देखने को मिलती हैं जो जैन धर्म से ताल्लुकात रखती हैं। जब आप यह ट्रेक स्टार्ट करेंगे तो लगभग 250 सीढ़ियां चढ़ने के बाद आपको एक छोटा सा मंदिर देखने को मिलेगा जो बहुत हीं प्राचीन मंदिर है और जैन धर्म के भगवान मुनि शत नाथ से जुड़ा हुआ है। मांगी तुंगी की चोटियों पर पहाड़ियों को खोदकर तरह-तरह के मूर्तियों को उकेरा गया है। हजारों साल पुराने होने के बावजूद भी इन मूर्तियों की फिनिशिंग देखने लायक है। मांगी तुंगी के पिनेकल्स पर भगवान महावीर की गुफा, शांतिनाथ जैन दिगंबर और श्री मांगी गिरी के गुफा के साथ-साथ और कई सारी गुफाएं हैं। जिनके अंदर बहुत सी कलाकृतियों को उकेरा गया है। यहां स्थापित है भगवान ऋषभ गिरी देवता की सबसे ऊंची प्रतिमा (The tallest statue of Lord Rishabh Giri Devta is installed here) मांगी तुंगी ट्रैक पर हीं आपको भगवान ऋषभ गिरी देवता की प्रतिमा भी देखने को मिलती है। जो 108 फीट ऊंची है। इस प्रतिमा का इनॉग्रेशन 2016 में किया गया और इस प्रतिमा को बनाने में लगभग 22 साल लग गए। अगर आज के

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कुम्भे वॉटरफॉल : सह्याद्री की पहाड़ियों में बहता हुआ खूबसूरत झरना

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सह्याद्री की पहाड़ियों की असीम खूबसूरती दुनिया भर से पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती है। पहाड़ियों की श्रृंखला में खतरनाक ट्रैकिंग डेस्टिनेशंस के साथ-साथ कुछ ऐतिहासिक किले और कई सारे प्राकृतिक झरने भी हैं जो पर्यटकों के मनमोहन में सक्षम है। यहां एडवेंचर टूरिज्म से लेकर रिलिजियस टूरिज्म तक के लिए हर तरह के पर्यटन स्थल मौजूद हैं। आज के इस ब्लॉग में मैं सह्याद्री के इन्हीं पहाड़ियों को चीर कर बहने वाली एक खूबसूरत झरने के बारे में बताने वाली हूंँ जिसका नाम है कुम्भे वॉटरफॉल। कैसे पहुँचे (How to reach)? सह्याद्री की पहाड़ियों में बहता कुम्भे वॉटरफॉल महाराष्ट्र के मानगांव में स्थित है। जवाब मानगांव से छोटे पगडंडियों के जरिए इस झरने की ओर कदम बढ़ाएंगे तो दूर से ही आपके कानों में इस झरने की कौतुहलता घुलने लगेगी। मानगांव पहुंचने के लिए आप अगर बाय रोड जाना चाहते हैं तो मानगांव बस स्टॉप तक बस की सुविधा उपलब्ध हो जाती है। वहीं अगर वाया ट्रेन मानगांव पहुंचाना चाहते हैं तो मानगांव में एक रेलवे स्टेशन भी है। जिसका नाम मानगांव रेलवे स्टेशन है। हवाई हवाई रूट के जरिए ट्रेवल करने के शौकीन लोगों के लिए कुम्भे वॉटरफॉल से सबसे नजदीकी हवाई अड्डा पुणे हवाई अड्डा है। जो कुम्भे वॉटरफॉल से लगभग 126 किलोमीटर दूर स्थित है और यह एक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है। कुम्भे वॉटरफॉल के इस असीम खूबसूरती को देखने के लिए दुनिया भर के अलग-अलग कोने से पर्यटक यहां घूमने आते हैं। यहां अक्सर लोग पिकनिक मनाने, ट्रैकिंग करने और कैंप लगाने के लिए आते हैं। अगर आप नेचर को पसंद करने वाले हैं तो आपको यह जगह बहुत ही पसंद आने वाला है। नेचर फोटोग्राफी करने वाले लोगों के लिए भी कुम्भे वॉटरफॉल एक बेहतरीन फोटोग्राफी डेस्टिनेशन है। जहां से वह प्रकृति की खूबसूरती को बहुत ही बेहतरीन तरीके से अपने कैमरे में कैद कर सकते हैं। कुम्भे वॉटरफॉल जाने का सबसे सही समय (Best time to visit Kumbhe Waterfall)? वैसे तो कुम्भे वॉटरफॉल्स घूमने कभी भी जा सकते हैं, लेकिन यहां जाने का सबसे सही समय मानसून का होता है। क्योंकि इस समय वॉटरफॉल में पानी की मात्रा बहुत ज्यादा होती है। साथ ही इस समय आसपास ग्रीनरी भी देखने को मिलता है। जिसके कारण वॉटरफॉल की खूबसूरती में चार चांद लग जाते हैं। मानसून में झरने में पानी की मात्रा बढ़ जाने के कारण झरना और भी तेज गति से आगे बढ़ता है। जब आप पहाड़ियों के बीच से झरने को बहता हुआ देखेंगे तो यकीन मानिए इसकी खूबसूरती देखकर कुछ पल के लिए आपको भी ऐसा ही लगेगा कि जैसे इससे खूबसूरत और क्या हीं हो सकता है? बड़े शहरों के शोर शराबे से दूर प्रकृति की गोद में बहते हुए इस झरने के बारे में आज भी बहुत कम लोग जानते हैं। इस वजह से  यहां ज्यादा लोगों की आवाजाही नहीं होती है। यही वजह है कि यहां आप बहुत ही शांत माहौल में पिकनिक मना सकते हैं। अगर आप कुछ समय के लिए अपने काम से ब्रेक लेकर किसी प्राकृतिक पर्यटन स्थल को घूमना चाहते हैं तो कुम्भे वॉटरफॉल इसके लिए सबसे बेस्ट ऑप्शन हो सकता है, क्योंकि यहां आपकी प्राइवेसी में दखल देने वाला कोई नहीं होता है। आप बहुत ही आराम से यहां अपनी छुट्टियां बिता सकते हैं। साथ ही ट्रैकिंग और कैंपिंग के जरिए आप अपनी छुट्टी को और भी ज्यादा रोमांचक बना सकते हैं।

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बांधवगढ़ नेशनल पार्क जहां आप देख सकते हैं बेख़ौफ़ बंगाल टाइगर्स को

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मध्य प्रदेश के विंध्याचल पर्वत में स्थित बांधवगढ़ नेशनल पार्क अपने बाघों के लिए प्रसिद्ध है। बांधवगढ़ नेशनल पार्क में इन बाघों को देखने के लिए दुनिया के अलग-अलग कोने से साल भर में लगभग 50,000 से भी ज्यादा पर्यटक आते हैं और जंगल सफारी के जरिए बाघों की खोज में निकल जाते हैं। बांधवगढ़ नेशनल पार्क लगभग 105 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है। इस नेशनल पार्क में बाघ के अलावा कई अन्य प्रकार के स्तनधारी जीव भी पाए जाते हैं। जिनमें तेंदुआ, भेड़िया, सियार, हिरण, भालू, लंगूर, बंदर, जंगली सूअर, जंगली कुत्ते, लोथल बीयर और चीतल जैसे जीव प्रमुख है।वर्तमान समय में बांधवगढ़ नेशनल पार्क में 165 बाघ अपना जीवन यापन कर रहे हैं। इतिहास (History)बांधवगढ़ का यह इलाका आजादी से पहले राजा महाराजाओं के लिए शिकार का स्थान हुआ करता था। लेकिन आजादी के बाद यहां के महाराज मार्तंड सिंह के अनुरोध पर सरकार ने इस क्षेत्र को बंधवगढ़ अभ्यारण घोषित कर दिया।इसके बाद 1968 में बांधवगढ़ अभयारण्य क्षेत्र को नेशनल पार्क की उपाधि दे दी गई और 1993 में इसे टाइगर रिजर्व घोषित कर दिया गया।इस क्षेत्र का नाम विंध्याचल के पहाड़ी पर बने हुए बांधवगढ़ किले के नाम पर बांधवगढ़ रखा गया। वैसे तो आज के समय में बांधवगढ़ किला सिर्फ खंडहर के रूप में बच गया है लेकिन यह आज भी विंध्याचल के गौरवशाली इतिहास की गवाही देता है। बांधवगढ़ में जंगल सफारी के लिए दो तरह के टूर पैकेज उपलब्ध हैं। पहला टूर पैकेज दो रातों और तीन दिनों का है। वही दूसरा टूर पैकेज तीन रातों और चार दिनों का है। पहले टूर पैकेज के तहत आपका टूर प्लान कुछ इस प्रकार का होगा : पहले दिन आप बांधवगढ़ पहुंचेंगे जहां आपको रिजॉर्ट में रुकने के लिए दिया जाएगा। इसके बाद आपको दिन का लंच दिया जाएगा। लंच करने के बाद आप शाम को अपने रिजॉर्ट के आसपास के इलाकों में टहल सकते हैं और फिर रात को डिनर करके आप रिजॉर्ट में ही आराम करेंगे।पैकेज के दूसरे दिन आप सुबह-सुबह जिप्सी में सवार होकर जंगल सफारी के लिए निकल जाएंगे। रास्ते में ही आपको ब्रेकफास्ट दिया जाएगा। जंगल सफारी के बाद आप वापस लौटेंगे और लंच करेंगे। लंच करने के बाद आप फिर से जंगल सफारी के लिए निकल जाएंगे। शाम को जंगल सफारी करके लौटेंगे और रिजॉर्ट में रात का भोजन करके आराम करेंगे।तीसरा दिन आपके टूर पैकेज का आखिरी दिन होगा जिसमें आप सुबह नाश्ता करके आप अपने स्टेशन के लिए चेक आउट कर जाएंगे। दूसरे टूर पैकेज के तहत भी आपका टूर प्लान कुछ इसी प्रकार का होगा। आप पहले दिन बांधवगढ़ नेशनल पार्क पहुंचेंगे और वहीं के रिजॉर्ट में ठहरेंगे।दूसरे और तीसरे दिन जंगल सफारी पर जाएंगे। जिसमें दोनों दिन आप दो-दो जंगल सफारी करेंगे। एक लंच से पहले और एक लंच के बाद। चौथे दिन आप अपने घर के लिए वापस लौट जाएंगे। बांधवगढ़ नेशनल पार्क जाने का सबसे सही समय (Best time to visit Bandhavgarh National Park) अगर आप भी बांधवगढ़ नेशनल पार्क जाना चाहते हैं तो इसके लिए सबसे सही समय ठंड के मौसम में होता है। इसलिए आप अक्टूबर से मार्च तक के बीच कभी भी यहाँ जंगल सफारी के लिए जा सकते हैं। इस समय टेंपरेचर बहुत ज्यादा नहीं होता है। जिसके कारण जंगल सफारी करना आसान हो जाता है। बांधवगढ़ नेशनल पार्क कैसे पहुंचे (How to reach Bandhavgarh National Park)? अगर आप हवाई मार्ग से बांधवगढ़ नेशनल पार्क पहुंचाना चाहते हैं तो आपको जबलपुर हवाई अड्डा के लिए फ्लाइट की टिकट बुक करवानी होगी। जबलपुर हवाई अड्डा पहुंचकर वहां से आपको बांधवगढ़ नेशनल पार्क के लिए बाय रोड जाना होगा। जबलपुर हवाई अड्डा से बांधवगढ़ नेशनल पार्क की दूरी लगभग 200 किलोमीटर है। इसे आप अपनी सुविधा अनुसार लोकल ट्रांसपोर्ट या फिर कैब के द्वारा तय कर सकते हैं।अगर आप रेल मार्ग के द्वारा बांधवगढ़ पहुंचाना चाहते हैं तो बांधवगढ़ नेशनल पार्क से सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन उमरिया रेलवे स्टेशन और कटनी रेलवे स्टेशन हैं। बांधवगढ़ नेशनल पार्क से उमरिया रेलवे स्टेशन की दूरी लगभग 35 किलोमीटर है। वहीं कटनी रेलवे स्टेशन की दूरी लगभग 100 किलोमीटर की है।आप बाय रोड भी बांधवगढ़ नेशनल पार्क पहुंच सकते हैं।

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सतपुड़ा की रानी पंचमढ़ी की खूबसूरती है देखने लायक

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“पंचमढ़ी मध्य प्रदेश के सतपुड़ा पहाड़ियों के क्षेत्र में आता है और इसकी खूबसूरती के कारण इसे “सतपुड़ा की रानी” के नाम से जाना जाता है। पंचमढ़ी को मध्य प्रदेश का सबसे प्रसिद्ध हिल स्टेशन माना जाता है। आज के इस ब्लॉग में हम आपको बताएंगे पचमढ़ी के फेमस टूरिस्ट स्पॉट्स के बारे में । इसके साथ हीं मैं आपको यह भी बताऊंगी कि पंचमढ़ी का इतिहास क्या रहा है और यहां आप किस तरह से अपना टूर प्लान कर सकते हैं।” पंचमढ़ी का इतिहास (History of panchmarhi) अगर पंचमढ़ी के इतिहास की बात की जाए तो सबसे पहले इसके नाम के बारे में जानते हैं। पंचमढ़ी का नाम पंचमढ़ी पड़ने के पीछे का कारण यह है कि यहाँ पांडवों ने अपने वनवास के समय पांच गुफाओं का निर्माण करवाया था। जो यहां एक ऊंचे पर्वत के शिखर पर मौजूद है। आजादी के बाद 1955 तक पंचमढ़ी मध्य प्रदेश की समर कैपिटल हुआ करती थी। यहां अभी भी कई सारे प्रशासनिक भवन बने हुए हैं और कई मंत्रियों के आवास स्थल भी यही मौजूद हैं। ये हैं पंचमढ़ी के मुख्य आकर्षण (These are the main attractions of Panchmarhi) बी फॉल वॉटरफॉल (Bee waterfall) पंचमढ़ी में कई वॉटरफाल्स भी हैं जहां लगभग 150 फीट ऊपर से पानी गिरता है। इतनी ऊंचाई से पानी गिरने के कारण जब आप इस वॉटरफॉल के नीचे खड़े होंगे तो पानी के दबाव के कारण आपको ऐसा महसूस होगा कि कई सारी मधुमक्खियां मिलकर आपको काट रही हैं। इसीलिए इस वॉटरफॉल का नाम बी वॉटरफॉल रखा गया है। इस वॉटरफॉल का नामकरण अंग्रेजों द्वारा ही किया गया था और आज के समय में यह वॉटरफॉल पंचमढ़ी के सबसे मुख्य आकर्षणों में से एक है। इसके अलावा पंचमढ़ी में अप्सरा फॉल्स और सिल्वर फॉल्स भी है। जो अपनी अप्रतिम खूबसूरती के कारण लोगों का ध्यान अपनी और आकर्षित करती हैं। धूपगढ़ सनराइज एंड सनसेट पॉइंट (Dhupgarh sunrise and sunset point) धूपगढ़ पचमढ़ी के सबसे प्रसिद्ध टूरिस्ट अट्रैक्शन में से एक है। धूपगढ़ में एक पिक्चर गैलरी भी है। जहां पहुंचकर आपको पता लगेगा की सतपुड़ा के पंचमढ़ी में देखने के लिए क्या क्या है? धूपगढ़ का नाम धूपगढ़ इसलिए रखा गया क्योंकि पचमढ़ी में जब सूरज की पहली किरण पड़ती है तो वह इसी जगह पर पड़ती है और सूर्यास्त के समय सूरज की आखिरी किरण भी यही से विदा लेती है। इस पॉइंट से सूरज को सुबह के समय उगते हुए देखना और शाम के समय आकाश में लालिमा बिखेरते हुए धीरे धीरे अस्त होते देखना वाकई एक मनोरम दृश्य होता है। धूपगढ़ के इस बिंदु से दिखने वाले व्यू भी इतनी खूबसूरत होते हैं कि आप इस मूमेंट अपने लाइफ में कभी नहीं भूल पाएंगे। चारों ओर सतपुड़ा की हरी भरी पहाड़ियां, बादलों से भरा हुआ आकाश और उन बादलों को चीरते हुए निकल रही धूप की किरणें आपका मन मोह लेने में सक्षम होते हैं। बड़ा महादेव टेंपल (Bada Mahadev temple) पचमढ़ी के मेन मार्केट से बड़ा महादेव टेंपल की दूरी लगभग 10 किलोमीटर की है। इसके रास्ते में आपको कुछ व्यु पॉइंट्स भी देखने को मिलेंगे। जिनमें हांडी खोह, इको पॉइंट और प्रियदर्शनी व्यू पॉइंट प्रमुख हैं। जंगल के खूबसूरत नजारों का लुफ्त उठाते हुए जब आप बड़ा महादेव टेंपल के लिए आगे बढ़ेंगे तो कुछ दूर आपको पैदल भी चलना पड़ेगा। बड़ा महादेव मंदिर तक जाने वाला यह पैदल रास्ता बहुत ही खूबसूरत है। आप लगभग 2 मिनट तक इस रास्ते पर चलते हुए बड़ा महादेव मंदिर तक पहुंच जाएंगे। हमारी ओर से सुझाव रहेगा कि आप अपने साथ खाने का समान ना रखें। क्योंकि यहां बंदरों की बहुत ज्यादा आवाजाही है। इसलिए आप बंदरों से बच कर रहे। बड़ा महादेव टेंपल में भी बहुत सारे झरने हैं। जिन्हें देखना बहुत ही खूबसूरत सा एहसास होता है। बड़ा महादेव टेंपल पहुंच कर आपको स्पिरिचुएलिटी का सही अर्थ समझ में आएगा। क्योंकि यहां नेचर की गोद में बैठकर आप भगवान की पूजा अर्चना कर सकते हैं और ध्यान में मग्न हो सकते हैं। बड़ा महादेव टेंपल के बारे में बताया जाता है कि जब महादेव ने भस्मासुर को वरदान दिया कि वह जिसके भी सिर पर हाथ रखेगा वह भस्म हो जाएगा तब भस्मासुर अपनी शक्ति के घमंड में चूर होकर शिवजी को ही भस्म करने के लिए चल पड़ा। जिससे बचने के लिए महादेव इस गुफा में जाकर छुप गए थे। फिर विष्णु जी ने मोहिनी का रूप धारण करके भस्मासुर का वध किया। जिसके बाद महादेव यहां से बाहर आए। इस समय से इस गुफा में शिवलिंग स्थापित है और दूर-दूर से भक्त यहां पूजा करने के लिए आते हैं। खास कर नाग पंचमी के समय में आपके पूरे पंचमढ़ी में अलग ही दृश्य देखने को मिलेगा और इस मंदिर में भी नाग पंचमी के समय आपको बहुत ही भीड़ देखने को मिलेगी। पंचमढ़ी से बड़ा महादेव मंदिर के लिए आप अपनी गाड़ी से भी आ सकते हैं। इसके अलावा पचमढ़ी में गुप्त महादेव के दर्शन करने के लिए भी जा सकते हैं। पचमढ़ी के मार्केट से लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर ही आपको जटाशंकर महादेव टेंपल भी देखने को मिलेगा। जटाशंकर महादेव टेंपल के आसपास भी बहुत सारी गुफाएं हैं। पंचमढ़ी में करने लायक एक्टिविटीज (Things to do in panchmarhi) पंचमढ़ी में आप पैरासेलिंग, हॉर्स राइडिंग और बोटिंग जैसे कई एडवेंचरस एक्टिविटीज कर सकते हैं। पंचमढ़ी में नाइट सफारी की भी सुविधा उपलब्ध है। लेकिन इस समय आपको एनिमल्स दिखेंगे कि नहीं यह आपकी किस्मत पर डिपेंड करेगा। वैसे तो डे सफारी में भी एनिमल्स के दिखने के चांसेस बहुत ज्यादा नहीं होते हैं, लेकिन फिर भी डे सफारी में आप व्यूज का बहुत ही अच्छे से लुप्त उठा सकते हैं। लेकिन नाइट सफारी में व्यूज उतने क्लियर नहीं होते हैं। पंचमढ़ी कैसे पहुंचे (How to reach panchmadhi)? अगर आप पंचमढ़ी आना चाहते हैं तो इसके लिए आपको सबसे पहले भोपाल से 150 किलोमीटर दूर स्थित पिपरिया पहुंचना पड़ेगा। पिपरिया में एक रेलवे स्टेशन भी है। इसलिए आप पिपरिया बाय ट्रेन भी पहुंच सकते हैं। पिपरिया पहुंचने के बाद आप बस के द्वारा पंचमढ़ी के लिए निकल सकते हैं। जिसके लिए आपको ₹100 से ₹150 रुपए तक का

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पर्यटकों का आकर्षण है सह्याद्री की पहाड़ियों में स्थित भैरवगढ़ ट्रेक

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सह्याद्री की पहाड़ियों की खूबसूरती के बारे में तो आपने बहुत कुछ सुन रखा होगा। लेकिन आज हम आपको ले जाने वाले हैं सह्याद्री की पहाड़ियों के सबसे खतरनाक ट्रेक के सफर पर। भारत में कई ट्रैकिंग डेस्टिनेशंस हैं, जो पर्यटकों का ध्यान अपनी और आकर्षित करते हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि भारत में एक ऐसा ट्रैकिंग डेस्टिनेशन भी है जिसकी चढ़ाई करने से पहले एक एक सामान्य पर्यटक को सौ बार सोचना पड़ता है? भारत के इस खतरनाक ट्रेक का नाम है- “भैरवगढ़ ट्रेक” (Bhairavgarh Treck) महाराष्ट्र के जंगलों में बहुत से ऐसे ट्रेक हैं जो पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हैं, उन्हीं में से एक ट्रेक भैरवगढ़ भी है। लेकिन भैरवगढ़ ट्रेक पर चढ़ाई इतनी भी आसान नहीं! क्योंकि यहां सीधे 90 डिग्री ढलान पर आपको ट्रैकिंग करनी होती है। कई जगह तो आपको रैपलिंग करने की भी जरूरत पड़ेगी। यह सुनने में जितना एडवेंचरस है उतना ही ज्यादा खतरनाक ट्रेक भी है। क्योंकि इस ट्रेक पर आपको एक तरफ गहरी हजारों फीट की खाई और दूसरी तरफ ऊंचे पहाड़ देखने को मिलेंगे। इस ट्रेक पर चढ़ाई के लिए सीढियाँ बनाई गई है लेकिन कुछ जगहों पर तो यह सीढियाँ एक फीट से भी कम चौड़ाई वाली हैं। ऐसे में इतनी पतली सीढियों और एक ओर दिखने वाली सैकडों फीट गहरी खाई को देखकर किसी भी इंसान का दिल एक बार को थम जाता है। आज हम आपको इसी ट्रेक के बारे में बताएंगे। कैसे पहुंचे भैरवगढ़ (How to reach Bhairavgarh) अगर आप ट्रैकिंग को पसंद करते हैं और इस तरह के एडवेंचरस ट्रेक पर जाना चाहते हैं तो आपको सबसे पहले मोरोशी गांव पहुंचना होगा। भैरवगढ़ मुंबई से लगभग 100 किलोमीटर और पुणे से लगभग 140 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। भैरवगढ़ की चढ़ाई शुरू करने के लिए आपको मोरोशी गांव तक पहुंचना होगा जो की मालशेज घाट रीजन में एक छोटा सा गांव है। मोरोशी गांव से भैरवगढ़ तक का ट्रेक लगभग 3.5 किलोमीटर लंबा ट्रेक है। कैसे करें ट्रेकिंग (How to do trekking) भैरवगढ़ ट्रेक के दो भाग हैं। पहले पथरीले रास्तों से ट्रैकिंग करते हुए और घने जंगलों से गुजरते हुए आपको भैरवगढ़ ट्रेक के एक्चुअल बेस तक पहुंचना होगा। जहां से सीधे 90 डिग्री की ढलान की चढ़ाई शुरू होगी। मरोशी से भैरवगढ़ तक आपको लगभग 3.5 किलोमीटर की ट्रैकिंग करनी होगी। यह ट्रैकिंग इतनी आसान नहीं होगी क्योंकि कई जगह आपको घने जंगलों से होकर गुजरना होगा। इस ट्रेक के रास्ते में कई जगह ऐसे भी हैं जहां झाड़ियां दिखाई पड़ती हैं, लेकिन झाड़ियों के तुरंत बाद सैकड़ों फीट गहरी खाई होती है। इसीलिए आपको इस ट्रेक पर संभाल कर चलना होगा। भैरवगढ़ फोर्ट से मिलने वाला व्यू बहुत ही खूबसूरत होता है। जब आप घंटों की ट्रैकिंग के बाद भैरवगढ़ के पीक पर पहुंचेंगे तो आप अपनी सारी थकान को भूलकर उसे मूमेंट को एंजॉय करने में लग जाएंगे। भैरवगढ़ फोर्ट के पिक से आपके आसपास के पहाड़ियों का बहुत ही क्लियर व्यू देखने को मिलेगा। अगर आप साफ वेदर वाले दिन चढ़ाई कर रहे हैं तो आप अपने आसपास गोकन कड़ा, तारामती पिक और अजोबा फोर्ट का क्लियर व्यू देख पाएंगे। भैरवगढ़ पिक का उपयोग ओल्ड मालशेज घाट के ट्रेड रूट पर नजर रखने के लिए किया जाता था। यहां से मालशेज घाट के ट्रेड रूट पर आने जाने वाले व्यापारियों और सामानों की देखरेख की जाती थी। इस ट्रैकिंग के दौरान इन बातों का रखें ख्याल :

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एडवेंचर से भरपूर है नासिक के हरिहर फोर्ट की चढ़ाई

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क्या आप एडवेंचर के शौकीन हैं और क्या आपको ट्रैकिंग पसंद है? अगर हाँ तो जरा दिल थाम लीजिये! क्योंकि आज हम जिस ट्रैक की बात कर रहे हैं उस ट्रेक को भारत के सबसे खतरनाक ट्रकों के लिस्ट में में गिना जाता है। इस ट्रैक में आपको 30-45 डिग्री नहीं बल्कि सीधे 80 डिग्री वर्टिकल ढलान की चढ़ाई करनी होगी। सोच के ही डर लग रहा है ना? लेकिन डरिये मत क्योंकि यहां हर रोज कई ऐसे विजिटर्स भी ट्रैकिंग करने आते हैं जो ट्रैकिंग के एक्सपर्ट नहीं होते हैं। अब आप सोच रहे होंगे कि इतनी खतरनाक ट्रैक पर लोग क्यों आना चाहते हैं? आपके इस सवाल का जवाब यह है कि इस जगह ट्रैकिंग करके आने के लिए लोगों की दीवानगी के पीछे का कारण यहाँ की प्राकृतिक खूबसूरती है। यह जगह इतनी खूबसूरत है कि आपको लगेगा ही नहीं कि आप इस दुनिया में हैं। यह जगह आपको बताएगी की प्रकृति कितनी खूबसूरत हो सकती है। इस जगह को देखकर कोई भी नेचर लवर अपने आप को यहां जाने से रोक नहीं सकता और अगर बरसात के सीजन या फिर विंटर की बात की जाए तो इस समय अगर आप इस ट्रैकिंग प्वाइंट के टॉप पर जाएंगे तो यहां आपको आज मैं ऊपर आसमां नीचे का एहसास होगा। हम बात कर रहे हैं हरिहर फोर्ट की! जो भारत के सबसे खतरनाक ट्रैकों में से एक है और लगभग 75 डिग्री की ढलान वाली पहाड़ी पर स्थित है। हरिहर फोर्ट की ऊंचाई को देखकर एक बार को धड़कनें थम जाती हैं, लेकिन दिल रुकना भी नहीं चाहता है। क्योंकि इसके टॉप पॉइंट से मिलने वाले व्यू का इमेजिनेशन करते हीं शरीर में एक नई ऊर्जा का संचार होता है। जिसके कारण आप भी अपने आप को इस ट्रैक को पूरा करने से रोक नहीं पाएंगे।यह किला दूर से देखने पर चकोर प्रतीत होता है, लेकिन असल में यह पहाड़ी प्रिज्म के आकार की है। हरिहर फोर्ट कैसे पहुंचे (How to visit)? हरिहर फोर्ट पहुंचने के लिए आपको सबसे पहले महाराष्ट्र के नासिक पहुंचना होगा। नासिक शहर से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर है हरिहर फोर्ट। जिसके लिए आपको सबसे पहले नासिक से 40 किलोमीटर की दूरी पर स्थित निर्गुणपाड़ा गांव पहुंचाना पड़ेगा। जहां से इस किले की ट्रैकिंग शुरू होती है। इस ट्रैक पर जाते वक्त निम्नलिखित बातों का रखें ध्यान (keep these things in your mind while treckking)

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महाकालेश्वर की नगरी -उज्जैन

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उज्जैन~ इस शहर को महाकाल की नगरी के नाम से भी जाना जाता है। मध्य प्रदेश के इस शहर को पहले पूरे भारतवर्ष में अवंतिका नगरी कहा जाता था। यह शहर महाकालेश्वर महादेव मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। भारत के कोने-कोने से लोग यहां महाकालेश्वर महादेव के दर्शन करने और उनकी पूजा अर्चना करने के लिए आते हैं। इस शहर में इसके अलावा और भी कई पर्यटन स्थल हैं, जिनमें काल भैरव मंदिर और मंगलनाथ मंदिर प्रमुख हैं। जिनके बारे में हम आपको इस ब्लॉ में बताएंगे हम आपको यह भी बताएंगे कि इस शहर तक कैसे पहुंच जाए और आप इस शहर में कहां ठहर सकते हैं। महाकालेश्वर मंदिर उज्जैन (Mahakaleshwara Temple Ujjain) इस मंदिर में देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग की पूजा की जाती है। इस मंदिर में दर्शन के लिए आपको दो तरह की टिकटें मिल जाएंगी। पहला ₹250 का और दूसरा ₹750 का। ₹250 के टिकट से आप भगवान महाकाल के दूर से दर्शन कर सकते हैं। जबकि 750 के टिकट से आप महाकाल मंदिर के गर्भ गृह में जाकर शिवलिंग के नजदीक से पूजा अर्चना कर सकते हैं। इस मंदिर में आप फ्री में भी महाकालेश्वर महादेव के दर्शन कर सकते हैं। मंदिर में फ्री एंट्री की टाइमिंग 1:00 से 4:00 बजे तक की होती है। हालांकि इस समय आपको भीड़ का सामना करना पड़ सकता है। लेकिन अगर आप वीक डेज में 1:00 बजे से 4:00 बजे के बीच आएंगे तो आप बहुत हीं आसानी से महाकाल के दर्शन बिना किसी टिकट के कर पाएंगे। वीकेंड पर यहां बहुत ज्यादा भीड़ होती है। ऐसे में आप कोशिश करें कि आप वीक डेज में आए और अगर आपका बजट न अलाव करें तो आप 1:00 बजे से 4:00 बजे के बीच दर्शन करने के लिए जाए। 750 रुपए की टिकट लेकर मंदिर के गृह गर्भ गृह में जाने वाले पुरुषों को धोती पहनना पड़ता है। जो कि आपको मंदिर में हीं उपलब्ध हो जाएगा। वहीं गर्भ गृह में जाने वाली महिलाओं को साड़ी पहनना पड़ता है। तो अगर आप महिला हैं और गर्भ में जाकर महाकालेश्वर महादेव के दर्शन करना चाहती हैं तो आप घर से हीं साड़ी पहन कर जाएं। यह आपके लिए बेहतर होगा। काल भैरव मंदिर (Kaal Bhairav Temple) इस शहर में महाकालेश्वर मंदिर के अलावा और भी कई मंदिर हैं, जिनमें से एक प्रसिद्ध मंदिर काल भैरव मंदिर भी है। काल भैरव मंदिर पहुंचने के लिए आप महाकालेश्वर मंदिर से ₹200 से ₹250 रुपए में ऑटो ले सकते हैं। यह ऑटो महाकालेश्वर मंदिर से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर स्थित काल भैरव मंदिर तक आपको पहुंचा देगा। काल भैरव मंदिर में वीक डेज पर आप बिना किसी भीड़ के बहुत ही आसानी से काल भैरव के दर्शन कर लेंगे। काल भैरव मंदिर (Kaal Bhairav Temple) के प्रांगण में तीन मंदिर हैं। जिनमें एक काल भैरव का मंदिर है, दूसरा शिव मंदिर (Shiva Temple) है और तीसरा दत्तात्रेय मंदिर (Dattatreya Temple) है। मंगलनाथ मंदिर (Mangal Nath Temple) महाकालेश्वर मंदिर से काल भैरव मंदिर के रास्ते में हीं मंगल नाथ मंदिर पड़ता है। जहां आप किसी भी प्रकार के दोष के निवारण के लिए पूजा अर्चना करवा सकते हैं। मंगलनाथ टेंपल में आप भगवान के दर्शन और भात पूजा कर सकते हैं। इसके अलावा आप यहां अपने कुंडली के किसी भी दोष के निवारण के लिए पूजा अर्चना करवा सकते हैं। सस्ते में कैसे घूम उज्जैन (How to explore Ujjain in cheapest way)? अगर आप उज्जैन नगरी को पूरी तरह से एक्सप्लोर करना चाहते हैं तो इसके लिए आप उज्जैन दर्शन बस का भी उपयोग कर सकते हैं। जो आपको सिर्फ ₹100 में उज्जैन के सभी प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों का भ्रमण करवाएगी। कैसे पहुंचे उज्जैन (How to reach Ujjain)? उज्जैन पहुंचाना बहुत हीं आसान है, क्योंकि शहर का अपना रेलवे स्टेशन भी है। जहां देश के अलग-अलग राज्यों से ट्रेनें आती हैं। इसके अलावा अगर आप फ्लाइट से उज्जैन पहुंचाना चाहते हैं तो आप इंदौर एयरपोर्ट के लिए फ्लाइट ले सकते हैं। इंदौर उज्जैन से लगभग 50 किलोमीटर की ही दूरी पर स्थित है। इसलिए आप बहुत ही आसानी से इंदौर से उज्जैन पहुंच सकते हैं। उज्जैन शहर सड़क मार्ग के द्वारा भी देश के अन्य राज्यों से बहुत अच्छे से जुड़ा हुआ है। आप उज्जैन अपनी गाड़ी से भी आ सकते हैं। उज्जैन में कहां ठहरे (Where to stay in Ujjain)? उज्जैन में ठहरने के लिए आपको हर तरह के होटल अवेलेबल हो जाएंगे। सिंगल ऑक्युपेंसी के लिए यहां आपको 700 से 1000 के बीच अच्छे होटल मिल जाएंगे। वहीं अगर आप डबल बेड ऑक्युपेंसी वाला होटल लेंगे तो आपको इसके लिए लगभग 1200 से ₹1500 का खर्च आएगा। अगर आप धर्मशाला में रुकना चाहते हैं तो वह भी यहां एक अच्छा ऑप्शन हो सकता है। उसके लिए आपको लगभग 400 से 500 के भीतर धर्मशालाएं भी मिल जाएंगी। उज्जैन किस समय आए (Best time to visit Ujjain)? अगर आप उज्जैन आना चाहते हैं तो आप साल के किसी भी समय उज्जैन का रुख कर सकते हैं। लेकिन उज्जैन आने का सबसे सही समय मॉनसून या उसके बाद का माना जाता है। क्योंकि गर्मी के समय इस शहर में गर्मी ज्यादा होती है। ऐसे में शायद आप इस शहर को अच्छे से एक्सप्लोर नहीं कर पाएं। मॉनसून के समय में इस शहर में काफी ग्रीनरी भी देखने को मिलती है। साथ ही साथ मॉनसून में यहाँ का टेंपरेचर भी सामान्य हो जाता है। जिससे घूमने में भी बहुत ही आसानी होती है और इस समय आप पूरे इंटरेस्ट के साथ इस शहर को बहुत हीं अच्छे से एक्सप्लोर भी कर पाएंगे।

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MP के इन जगहों पर भारतीय स्थापत्य कला और प्राकृतिक खूबसूरती की दिखती है झलक

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मध्य प्रदेश में भारत के कई ऐसे ऐतिहासिक स्थल हैं जो न सिर्फ आर्कियोलॉजिस्ट को अपनी ओर आकर्षित करते हैं, बल्कि सामान्य पर्यटकों का भी ध्यान अपनी ओर खींचते हैं। सबसे अधिक क्षेत्रफल पर वन होने के कारण मध्य प्रदेश में कई सारे नेशनल पार्क्स भी हैं। इसी वजह से यह राज्य प्राकृतिक रूप से भी सुंदर और मनमोहक है। अगर आप भी मध्य प्रदेश घूमना चाहते हैं तो हम आपको बताने वाले हैं मध्य प्रदेश के कुछ ऐसे जगहों के बारे में जहाँ एक बार जाना तो बनता है। 1. उज्जैन (Ujjain) इस शहर को महाकाल की नगरी के नाम से भी जाना जाता है। मध्य प्रदेश के इस शहर को पहले पूरे भारतवर्ष में अवंतिका नगरी कहा जाता था। यह शहर महाकालेश्वर महादेव मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। भारत के कोने-कोने से लोग यहां महाकालेश्वर महादेव के दर्शन करने और उनकी पूजा अर्चना करने के लिए आते हैं। इस शहर में इसके अलावा और भी कई पर्यटन स्थल हैं। जिनमें रामघाट, काल भैरव मंदिर और मंगलनाथ मंदिर प्रमुख हैं। कैसे पहुंचे उज्जैन (How to reach Ujjain) : उज्जैन पहुंचाना बहुत हीं आसान है, क्योंकि शहर का अपना रेलवे स्टेशन भी है। जहां देश के अलग-अलग राज्यों से ट्रेनें आती हैं। इसके अलावा अगर आप फ्लाइट से उज्जैन पहुंचाना चाहते हैं तो आप इंदौर एयरपोर्ट के लिए फ्लाइट ले सकते हैं। इंदौर उज्जैन से लगभग 50 किलोमीटर की ही दूरी पर स्थित है। इसलिए आप बहुत ही आसानी से इंदौर से उज्जैन पहुंच सकते हैं। उज्जैन शहर सड़क मार्ग के द्वारा भी देश के अन्य राज्यों से बहुत अच्छे से जुड़ा हुआ है। आप उज्जैन अपनी गाड़ी से भी आ सकते हैं। 2. मैहर माता मंदिर सतना (Maihar Mata Temple Satna) त्रिकूट पर्वत की ऊंचाइयों पर स्थित मैहर मंदिर की कहानी आदिशक्ति सती के आत्मदाह से जुड़ी हुई है। देश के 108 शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ (Shaktipeeth) त्रिकूट पर्वत के इस पहाड़ी पर भी स्थित है। जिस स्थान पर इस मंदिर का निर्माण करवाया गया है। बताया जाता है कि इस स्थान पर माता का हार टूट कर गिरा था, इसलिए इस जगह को मैहर का नाम दिया गया। यह मंदिर मध्य प्रदेश के सतना जिला के त्रिकूट पहाड़ी पर स्थित है। जहां तक पहुंचाने के लिए भक्तों को पहाड़ी पर चढ़ाई करनी होती है। आपको जानकर हैरानी होगी कि पूरे भारत में माता शारदा का यह इकलौता मंदिर है। इस मंदिर में माता शारदा के साथ ही अन्य देवी देवताओं की पूजा भी की जाती है। 3. खजुराहो (Khajuraho) इस स्थान को मध्य प्रदेश का सम्मान माना जाता है। यह वही स्थान है जहां आपको विभिन्न प्रकार की कलाकृतियों से समृद्ध मंदिरों का समूह देखने को मिलता है। मध्य प्रदेश का खजुराहो भारत के प्राचीन कालीन इतिहास को बखूबी बयां करता है। खजुराहो के मंदिरों के समूह का निर्माण आज से लगभग 1300 साल पहले हुआ था। मंदिरों पर बनाई गई कलाकृतियां यह दर्शाती हैं कि हमारा भारत आज से हजार साल पहले भी कितना मॉडर्न (modern) था।खजुराहो में आर्कियोलॉजिकल म्यूजियम (Archaeological Museum) है, जहां आपको कई सारे छोटे बड़े मंदिरों का समूह देखने को मिलेंगे। आर्कियोलॉजिकल म्यूजियम के इस एरिया को पश्चिमी मंदिर समूह के नाम से भी जाना जाता है। आर्कियोलॉजिकल म्यूजियम में जैसे ही आप इंटर करेंगे आपको बहुत ही खूबसूरत से गार्डन से होकर गुजर कर जाना होगा। यहाँ के मंदिरों में कंदरिया मंदिर, मतंगेश्वर मंदिर, लक्ष्मण मन्दिर, विश्वनाथ मंदिर, चित्रगुप्त मंदिर और विष्णु गुप्त मंदिर प्रमुख हैं। 4. भोपाल (Bhopal) इस शहर को महाराजा भोज की नगरी के नाम से जाना जाता है। यह शहर आज के समय में मध्य प्रदेश की राजधानी है और इस शहर को एक अच्छा टूरिस्ट डेस्टिनेशन माना जाता है। क्योंकि यहां के टूरिस्ट प्लेसेस इतने बेहतरीन हैं कि यहां आने वाले लोगों को यही का हो कर रह जाने का मन करने लगता है। अगर आपको भी कभी मौका मिले मध्य प्रदेश जाने का तो आप एक बार भोपाल जरुर विजिट करें। (Visiting places of Bhopal) भोपाल की घूमने लायक जगहों की सूची में अपर लेक (Upper Lake), वन विहार (Van Vihar), सैर सपाटा (Sair Sapata), गौहर महल (Gauhar Mahal), मध्य प्रदेश ट्राईबल म्यूजियम (Madhya Pradesh Tribal Museum), पीपल्स मॉल (People’s Mall), भीमबेटका की गुफ़ाएँ (Bhimvetka caves), ताज उल मस्जिद (Taj ul Masjid) और सांची स्तूप (Sanchi Stupa) का नाम आता है। 5. कूनो राष्ट्रीय उद्यान (Kuno National Park) देश के सबसे प्रसिद्ध नेशनल पार्क में से एक कूनो नेशनल पार्क हाल में ही काफी चर्चा का विषय रहा था। यहां कुछ दिनों पहले नामीबिया से 8 चीतों को ला कर रखा गया था। मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले में स्थित इस नेशनल पार्क में आकर आपको एक अलग ही अनुभूति होगी। चारों ओर घने जंगल और बेफिक्र घूम रहे जंगली जानवर किसी अलग ही दुनिया का आभास करा देते हैं। यह नेशनल पार्क कूनो नदी के तट पर स्थित है। यह कह सकते हैं कि कूनो नदी यहां की जीवन रेखा है। यहां के जंगली जानवरों को गर्मी के समय सिर्फ इसी नदी का सहारा होता है। बात करें अगर इस पार्क के फैलाव की तो यह नेशनल पार्क 415 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला हुआ है और हजारों जानवरों का आसरा है। कूनो राष्ट्रीय उद्यान कैसे पहुंचे (How to reach Kuno National Park) ग्वालियर एयरपोर्ट कूनो नेशनल पार्क के सबसे नजदीक स्थित एयरपोर्ट है। यह एयरपोर्ट देश के अन्य शहरों जैसे दिल्ली, कोटा, पटना, जयपुर आदि से भली भांति जुड़ा हुआ है। दिल्ली एयरपोर्ट से ग्वालियर के लिए फ्लाइट लगभग ₹2000 से ₹3000 तक की आती है। आप नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से ट्रेन के माध्यम से भी ग्वालियर पहुंच सकते हैं। इसके अलावा आप बाय रोड भी कूनो नेशनल पार्क पहुंच सकते हैं।

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मध्य प्रदेश के सतना में स्थित है एक ऐसा शक्तिपीठ, जहां गिरा था माता सती का हार

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त्रिकूट पर्वत की ऊंचाइयों पर स्थित मैहर मंदिर की कहानी आदिशक्ति सती के आत्मदाह से जुड़ी हुई है। देश के 108 शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ (Shaktipeeth) त्रिकूट पर्वत के इस पहाड़ी पर भी स्थित है। जिस स्थान पर इस मंदिर का निर्माण करवाया गया है। बताया जाता है कि इस स्थान पर माता का हार टूट कर गिरा था, इसलिए इस जगह को मैहर का नाम दिया गया। यह मंदिर मध्य प्रदेश के सतना जिला के त्रिकूट पहाड़ी पर स्थित है। जहां तक पहुंचाने के लिए भक्तों को पहाड़ी पर चढ़ाई करनी होती है। आपको जानकर हैरानी होगी कि पूरे भारत में माता शारदा का यह इकलौता मंदिर है। इस मंदिर में माता शारदा के साथ ही अन्य देवी देवताओं की पूजा भी की जाती है। क्या है पूजा की विधि व्यवस्था? (What are the rituals of worship?) जब आप त्रिकूट पहाड़ी के गेट पर जाएंगे तो वहीं आपको ढेर सारे पूजा के समान बिकते हुए नजर आएंगे। आप वहां से माता के लिए चुनरी, फुल और प्रसाद खरीद सकते हैं। पूजा के लिए आवश्यक सामग्रियों को खरीदने के बाद आप आगे की ओर बढ़ सकते हैं। जहां से मंदिर के लिए चढ़ाई शुरू होती है। त्रिकूट पहाड़ी के शीर्ष तक पहुंचाने के लिए सीढ़ियों का निर्माण करवाया गया है। साथ ही दंडवत प्रणाम करते हुए माता तक पहुंचने की अभिलाषा (Desire) रखने वाले भक्तों के लिए भी रास्ता बनवाया गया है। अगर बात करें सीढ़ियों के संख्या की तो मैहर माता मंदिर पहुंचने के लिए आपको 1000 से भी ज्यादा सीढ़ियों की चढ़ाई करनी पड़ेगी। मंदिर पहुंचकर आपको पूजा करने में कितने घंटे का समय लगेगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस समय यहां माता के दर्शन के लिए जाते हैं और आए हुए श्रद्धालुओं की संख्या कितनी है। मैहर माता मंदिर में दूर-दूर से भक्तजन (Devotees) पूजा करने के लिए आते हैं। इसलिए यहां श्रद्धालुओं (devotees) की संख्या हमेशा ही अधिक होती है। लेकिन साल के दोनों ही नवरात्रियों में यहां भक्तों की संख्या लगभग दोगुनी हो जाती है। अगर आप शांति से पूजा अर्चना करना चाहते हैं तो आप त्यौहार के दिनों में यहां जाना अवॉयड (avoid) कर सकते हैं।मंदिर से नीचे उतरने के बाद आप वहीं कहीं आसपास खाना खा सकते हैं। क्योंकि पहाड़ी के तलहटी में बहुत सारे खाने की दुकान भी लगे हुए हैं। जहां लगभग डेढ़ सौ रुपए में एक आदमी बहुत ही अच्छे से खाना खा सकता है। घूमने में कितना समय लगेगा? (How much time will it take to travel?) इस मंदिर के लिए चढ़ाई में आपको लगभग 2 से 3 घंटे का समय लग सकता है। वहां पूजा करने में आपको एक से डेढ़ घंटे का समय लग सकता है। साथ ही पहाड़ी से नीचे उतरने में आपको डेढ़ से 2 घंटे का समय लग सकता है। अगर मोटे तौर पर कहा जाए तो आपको पूरे मंदिर घूमने और पूजा करने में लगभग 6 से 7 घंटे का समय लग सकता है। कैसे पहुंचे? (How to reach?) यह मंदिर मध्य प्रदेश राज्य के सतना जिले के त्रिकूट पहाड़ी पर स्थित है। जहां तक आप बाय रोड बहुत ही आसानी से पहुंच सकते हैं। रेल मार्ग से भी मैहर आसानी से पहुंचा जा सकता है। अगर आप दिल्ली से मैहर के लिए जाना चाहते हैं तो दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन से आपको ट्रेन मिल जाएगी।हवाई मार्ग द्वारा मैहर पहुंचने के लिए आपको सबसे पहले मध्य प्रदेश के जबलपुर हवाई अड्डे तक पहुंचना होगा। मध्य प्रदेश का जबलपुर हवाई अड्डा देश के अन्य हवाई अड्डों से अच्छे तरीके से कनेक्टेड है। जबलपुर हवाई अड्डा पहुंचकर आपको 165 किलोमीटर दूरी तय करके मैहर पहुंचना होगा। जिसके लिए आप किसी भी टैक्सी या फिर बस का सहारा ले सकते हैं।