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Kurukshetra – शेख चिल्ली का मकबरा

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Kurukshetra – शेख चिल्ली का मकबरा: हरियाणा का ताज महल कुरुक्षेत्र को कौन नहीं जानता। मगर कुरुक्षेत्र को लोग जानते भी हैं तो केवल महाभारत के युद्ध की वजह से। शायद ही कोई जानता होगा कि यहां पर मिनी ताजमहल भी है। अब आप सोच रहे होंगे कि ताज महल तो आगरा में है फिर कुरुक्षेत्र में कहां से आ गया। इतना सोचने की जरूरत नहीं है इसे केवल हरियाणा का मिनी ताजमहल कहा जाता है। अपने नए सफर में फाइव कलर्स ऑफ ट्रैवल की टीम आज आपको ऐसी ही जगह का दीदार करवाएगी जो देखने में सैंकड़ों सालों बाद भी आगरा के ताज महल की तरह आकर्षक दिखता है। (Sheikh Chilli Tomb, Kurukshetra) पवित्र गीता की जन्मस्थली कुरुक्षेत्र सिर्फ महाभारत, शक्तिपीठों ओर दूसरे हिंदू धर्म स्थलों के लिए ही नहीं, शेख चिल्ली के मकबरे के लिए भी प्रसिद्ध है। यही कारण है कि शेख चिल्ली के मकबरे को देश के प्रमुख राष्ट्रीय स्मारकों में शुमार हरियाणा का ताजमहल भी कहा जाता है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि राजधानी दिल्ली से अमृतसर के बीच इसके अलावा कोई भी ऐसा स्मारक नहीं है जिसमें शाहजहां के समकालीन संगमरमर का प्रयोग किया गया हो। शेख चिल्ली के कार्टून और चुटकुले तो बचपन में बहुत सुने थे। मगर मकबरे के बारे में पहली बार सुना था। शेख चिल्ली के मकबरे का नाम सुनते ही वहां पर जाने को लेकर मन में खलबली मचना स्वाभाविक है।  शेख चिल्ली का मकबरा कुरुक्षेत्र के थानेसर में स्थित है। शेख चिल्ली के मकबरे तक पहुंचने के लिए आपको कड़ी मशक्कत करने की जरूरत नहीं है। किसी भी ऑटो चालक से बात करके वहां पर आसानी से पहुंच सकते हैं। बाहर से देखने पर मकबरा महल लग रहा था। क्योंकि मकबरे की दीवारें बहुत बड़ी-बड़ी थी, लग ही नही रहा था कि यहां पर किसी सूफी संत का मकबरा है। पार्किंग की सुविधा की बात करें तो वहां पर पार्किंग की सुविधा बहुत अच्छी है। गेट के अंदर प्रवेश होते ही सबसे पहले टिकट लेनी होती है। आप टिकट कैश से भी प्राप्त कर सकते हैं और ऑनलाइन पेमेंट के माध्यम से भी टिकट ले सकते हैं। टिकट का मूल्य ज्यादा नहीं है, मात्र 25 रूपये ही टिकट का मूल्य है। हालांकि विदेशी पर्यटकों  के लिए 100 रुपए इसका मूल्य रखा गया है।  आप टिकट लेकर जैसे ही अंदर प्रवेश करेंगे सामने ही खूबसूरत सा पार्क और वहां का मनमोहक वातावरण एक बार तो आपके दिल को छू लेगा। हालांकि शेख चिल्ली का मकबरा अंदर से बहुत ज्यादा बड़ा नहीं था, मगर फिर भी  दिल को सुकून दे रहा था। शेख चिल्ली का इतिहास दारा शिकोह अपने अध्यात्मिक गुरु शेखचिल्ली का बहुत सम्मान करते थे। उनके सम्मान में यह मकबरा बनवाया गया था। सूफी संत शेख चिल्ली का असली नाम सूफी अब्द उर रज्जाक था। वह शेख चिल्ली के नाम से अधिक लोकप्रिय थे। वह अपनी बुद्धिमत्ता और उदारता के लिए जाने जाते थे। शेख चिल्ली मुगल राजकुमार दारा शिकोह  के गुरु थे। शाहजहाँ खुद उनका बहुत सम्मान करते थे। कहा जाता है कि मुगल बादशाह शाहजहां के बेटे शिकोह शेख चिल्ली के बहुत बड़े प्रशसंक थे। उनसे उन्होंने कई महत्वपूर्ण बातें सीखीं। उन्हें अब्द उर रहीम, अलैस अब्द उई करीम, अलैस अब्द उर रज्जाक के नाम से भी जाना जाता था। उस समय के लोगों का मानना था कि वह एक महान दरवेश था। ऐसा माना जाता है कि शेख चिल्ली का जन्म बलूचिस्तान की एक खानाबदोश जनजाति में हुआ था। यही घुमक्कड़ पन उन्हे भारत ले आया। वैसे शेख चिल्ली ऐसी कहानियों के नायक हैं, जो बार-बार आम लोक जीवन के संघर्षों पर विजय प्राप्त करती हैं। मकबरे को देखने के लिए  आम तौर पर बहुत ज्यादा भीड़ नहीं होती, लेकिन फिर भी देखने वालों की संख्या बहुत कम भी नहीं कह सकते। यहाँ पर असली नजारा तो ऊपर की ओर जाने के बाद मिलता है। महान संत की कब्र मकबरे के निचले सदन में बिल्कुल केंद्र में स्थित है। इस मकबरे के ठीक बगल में संत की पत्नी की भी कब्र है। मकबरे के प्रत्येक ओर प्रवेश द्वार के भांति मेहराब बना है जो संगमरमर निर्मित जालियों से सुसज्जित है। मकबरे की चारों दिशाओं में बाहर की और छतरिया बनी है जिसके गुंबद पर हरे, पीले, नीले ओर जामुनी रंग की चमकदार टाइल्स से निर्मित विभिन्न प्रकार की ज्यामिति आकृतियां देखी जा सकती हैं। मकबरे के पीछे नजर घुमाने के बाद  एक बड़ा सा हरा भरा ग्राउंड खूबसूरती का एक अलग ही नज़ारा पेश कर अपनी और आकर्षित करता है। अभी मकबरे के अंदर बने म्यूजियम में घूमना बाकी था। (Sheikh Chilli Tomb) अगर आप इतिहास के प्रेमी हैं और प्राचीन चीजों को देखने में दिलचस्पी रखते हैं तो आपके लिए यह मकबरा सोने पर सुहागा है, क्योंकि इस मकबरे के म्यूजियम के अंदर आपको पहली शताब्दी से लेकर 19वीं शताब्दी तक की काफी पुरानी चीजें देखने को मिलेंगी। (Sheikh Chilli Tomb) राहत वाली बात यह है कि म्यूजियम के अंदर जाने के लिए किसी भी तरह की टिकट नहीं लगती है। आप म्यूजियम के अंदर जितना चाहे उतना समय बिता सकते हैं। मगर म्यूजियम के अंदर की चीजों को आप बिल्कुल भी छू कर नहीं देख सकते। चारों तरफ गार्ड का पहरा होता है। गार्ड आप पर नजर गड़ाय रहते हैं ताकि कोई किसी भी तरह का नुकसान ना पहुंचा सके। आप चाहो तो कैमरे में सभी खूबसूरत नजारों को कैद कर सकते हैं। म्यूजियम के अंदर आपको कुषाण,  गुप्त,  उत्तर गुप्त या वर्धन, राजपूत, सल्तनत और मुगल काल की प्राचीन वस्तुएं देखने को मिलेंगी। मात्र 25 रूपये में प्राचीन चीजों को देखना साथ में मकबरे में घूमना, किसी सपने से कम नहीं। राजा हर्ष का टीला आपको बिल्कुल मकबरे के साथ ही राजा हर्ष का टीला भी देखने को मिलेगा। हालांकि राजा हर्ष के टीले में अंदर जाने की अनुमति नहीं है। मगर आप शेख चिल्ली के मकबरे के ऊपर से ही राजा हर्ष के टीले का नजारा देख सकते हैं। अगर आप कुरुक्षेत्र के 200  किलोमीटर के दायरे में हैं  तो आप एक दिन में आना जाना कर सकते हैं। यदि आप 200 किलोमीटर के दायरे से बाहर हैं

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Jama Masjid Street Food: जामा मस्जिद के सामने बरसों पुरानी गली के इन प्रसिद्ध लज़ीज व्यंजनों का जायका कभी नहीं भूल पाएंगे by Pardeep Kumar दिल्ली ज़ायकों का शहर है।  दिल्ली के हर कोने में आपको खाने के शौक़ीन लोगों के लिए कोई न कोई ज़ायका ऐसा जरूर मिल जाएगा जो मुद्दतों  से यहां के लोगों के ज़ेहन में अवश्य बसा होगा।(Jama Masjid Street Food) मुकम्मल तहज़ीब की सबसे खास जगह लगभग 3000 साल पुरानी दिल्ली की पेचीदा तारीखों में गोते लगाने के बजाए ग़ालिब के दौर से दिल्ली को समझने की कोशिश करते हैं। दरअसल यही वह दौर था जिसकी निशानियां दिल्ली के मिज़ाज की छोटी-मोटी गवाहियां देती आज भी दिखाई देती हैं और इन्हीं  झरोखों से देखते हैं,  बरसों  से फलते फूलते आ रहे बाजार जामा मस्जिद को। जी हां, दिल्ली का सबसे मोहब्बत भरा बाजार। हम बात कर रहे हैं जामा मस्जिद के गेट न. एक के सामने बने पुराने बाजार की जो सिर्फ एक बाजार नहीं बल्कि मुकम्मल तहज़ीब की सबसे खास जगह है।  जहां का ज़ायका सैकड़ों सालों से खाने के शौकीन लोगो के जेहन में मिठास घोल रहा है।(Jama Masjid Strrt Food) इस ब्लॉग में हम आपको बताएंगे अपने नए डेस्टीनेशन जामा मस्जिद के बिल्कुल सामने बने इसी बाजार के बारे में। जहां की पुरानी और तंग गलियों में तबीयत को खुश कर देने वाला मुगलाई ज़ायका पैदा होता है। और यह ज़ायका किसी त्यौहार या विशेष दिनों में नहीं बल्कि सारा साल आपको जश्न में डुबोए रखता है। खाने के शौकीन लोग यहां तमाम तरह की बिरयानी, कबाब, कोरमा, शिरमा, जर्दा, और रोटियों का लुत्फ उठा सकते हैं। तो चलिए अपने फूड ब्लॉग की शुरुआत करते हैं और निकलते हैं एक ऐसे सफर पर जहां आपको रूबरू करवाएंगे कुछ ऐसे ही मशहूर पुश्तैनी और लजीज जायकों से। दोस्तों अगर खाने में ज़ायके की बात करें और वो भी दिल वालों के दिल्ली की, तो चांदनी चौक और जामा मस्जिद का नाम सबसे पहले लिया जाता है। चांदनी चौक में जहां अधिकतर आपको शाकाहारी खाना दिखाई देगा, तो वही जामा मस्जिद के सामने पुरानी गली में आपको अधिकतर नॉन वेज फ़ूड दिखाए देगा जो दुनिया भर में मशहूर है। आज हम आपको लेकर आए हैं देश की सबसे बड़ी और सबसे प्रसिद्ध मस्जिदों में से एक जामा मस्जिद के सामने सदियों से अपने स्वाद के लिए मशहूर बाजार में। और किस्मत से इस बार हमारा सफर पूरा हुआ रमजान के पाक महीने में, जब सारा जामा मस्जिद एरिया खूबसूरती से सजा हुआ दिखाई दिया। दिल्ली के स्वाद की बात जामा मस्जिद एरिया के बगैर अधूरी है। स्ट्रीट फूड और खास करके चिकन- मटन के शौकीन हो तो आप एक बार यहां जरूर आइए। जामा मस्जिद के पास में नॉन वेज की कुछ ऐसी दुकानें हैं जो अपने लजीज व्यंजनो के लिए खूब जानी जाती है। जामा मस्जिद के गेट नंबर दो के बिल्कुल सामने सैंकड़ों बरसों  से लग रहे मीना बाजार के शोरगुल और भीड़-भाड़ वाले माहौल से गुजरते हुए हमारे कदम बढ़ चले थे उस बेहद खास गली की तरफ जहां खाने के मुरीदों  के चेहरों पर एक अलग ही रौनक दिखाई देती है। कैसे पहुंचे आप यहां मेट्रो, बस या कैब से भी आ सकते हैं। लाल किले के बिल्कुल सामने आपको जायकों का यह ठिकाना आसानी से मिल जाएगा। एमसीडी  की पार्किंग में आप अपनी कार को पार्क कीजिए और पैदल ही निकल पड़िए पुरानी दिल्ली की गलियों का आनंद लेते हुए। जामा मस्जिद के गेट नंबर 1 के सामने बरसों से अपने मुगलाई ज़ायकों के लिए मशहूर यह गली बाहें फैलाए आपका इस्तकबाल करती है।  और अगर किस्मत से रमजान का पाक महीना हो तो समझ लीजिए आप जन्नत में हैं। सबसे पहले गली में एंट्री करते ही हमें दिखाई दिया मोहब्बत का शरबत। मोहब्बत का शरबत अमूल प्योर दूध में गुलाब जल, रूह अफ़ज़ा और तरबूज के बारीक-बारीक पीस मिलाकर बना यह शरबत सच में आपको मोहब्बत का रूहानी एहसास करा देगा। जामा मस्जिद का दीदार करने आने वाले यहां आकर मोहब्बत का शरबत अवश्य चखते हैं। तरबूज के बारीक पीस शरबत को जायकेदार बनाने का बाखूबी काम करते हैं। मजहब चाहे कोई भी हो हर किसी को यहां का यह मोहब्बत का शरबत अपना मुरीद बना ही लेता है। जामा मस्जिद एरिया की शान- शाही टुकड़ा आप इसी गली में एक दो दुकानें छोड़कर आगे बढ़ेंगे तो आपका दशकों से जामा मस्जिद एरिया की शान- शाही टुकड़ा भी दिखाई देगा। हमें एक बेहद तरतीब और स्वच्छता से अपनी ओर खींचती दुकान दिखाई दी और हमारे कदम बढ़ चले शाही टुकडे की ओर। वहां जो शख्स दिखाई दिए उन्होंने अपना नाम तशनीन  बताया। उन्हीं से बातचीत के सिलसिले में हमें पता चला शाही टुकडे की बनावट के बारे में। प्योर दूध, खोए और ड्राई फ्रूट से बना यह स्पेशल फूड सही मायने में शाही कहलाने लायक लगा। उन्होंने हमसे ₹60 लिए और बड़ी ही मोहब्बत के साथ शाही टुकडे की एक प्लेट हमें दी। साथ में शाही टुकडे के साथ रबड़ी भी जायके को और स्वादिष्ट बनाने के लिए अपनी ओर से कंप्लीमेंट्री तौर पर ऑफर की।  रबड़ी के साथ शाही टुकडे का स्वाद लाज़वाब लगा। रमजान के महीने में यह शाही टुकड़ा खाने दूर-दूर से लोग यहां आते हैं, वैसे यह गली मशहूर है अपने नॉनवेज फूड के लिए, अगर आप नॉनवेज खाने के शौकीन हैं तो समझ लीजिए आप बिल्कुल मुकम्मल जगह पर हैं। जैसे-जैसे आप इस गली में आगे बढ़ेंगे आपको हर दूसरी दुकान पर कुछ पुराना और नायाब दिखाई देगा। कहीं लॉन्ग चुरी के शाकाहारी पकोड़े तो कहीं मुगलई चिकन आपको दिखाई देगा।  क्योंकि यह रमजान का महीना है इसलिए आपको यहां पर बहुत सारी दुकानों पर फेनी खरीदते हुए भी लोग दिखाई देंगे। असलम का बटर चिकन शाम का समय हो रहा था इसलिए गली में भीड़ भी लगातार बढ़ रही थी।  इसी भीड़ में हम अपने अगले पड़ाव पर पहुंचे, जो था असलम चिकन। दुकान के बाहर बार-बी- क्यू  की खुशबू फैली हुई थी, जहां कबाब के साथ चिकन भी रोस्ट हो रहा था।  असलम चिकन की शोहरत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है की बीसीयों किलो चिकन हमारे

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Garh Mukteshwar

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Garh Mukteshwar – गढ़मुक्तेश्वर: जहाँ कौरवों और पांडवों का पिंडदान हुआ था By Pardeep Kumar नमस्कार, आदाब, सत श्री अकाल दोस्तों आपका स्वागत है आज के नए ब्लॉग में, फाइव कलर्स ऑफ ट्रेवल की टीम पहुंची है एक ऐसी डेस्टिनेशन को एक्सप्लोर करने जो पिकनिक स्पॉट होने से पहले एक मशहूर धार्मिक स्थल भी है। जी हां, दोस्तों हम बात कर रहे हैं दिल्ली के नज़दीक उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले में स्थित गढ़मुक्तेश्वर की। (Garh Mukteshwar) हिन्दुओं के लिए प्राचीन तीर्थ स्थल गढ़मुक्तेश्वर हिन्दुओं के लिए प्राचीन तीर्थ स्थल है। इस स्थान को गढ़मुक्तेश्वर इसलिए कहा जाता है क्योंकि कहते हैं यहीं भगवान शिव के गणों को पिशाच योनि से मुक्ति मिली थी। ग्रह मुक्तेश्वर गंगा नदी के किनारे स्थित है। यह स्थान हिन्दुओं के लिए संास्कृतिक व धार्मिक दृष्टि से बेहद महत्त्वपूर्ण है। आपको बता दे गढ़मुक्तेश्वर आम तौर पर पितरों के पिंडदान के लिए प्रसिद्ध है। यहीं गढ़मुक्तेश्वर में कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर गंगा स्नान पर्व उत्तर भारत का सबसे बड़ा धार्मिक मेला आयोजित किया जाता है। दिल्‍ली मुरादाबाद नेशनल हाईवे 24 पर हापुड से लगभग 35 कि0मी0 की दूरी पर प्रसिद्ध तीर्थ स्थल गढमुक्‍तेश्‍वर से 05 किमी दूरी पर गंगा नदी के किनारे बृजघाट स्‍थल स्थित है। आपको बता दें पिछले कई सालों से गढ़ मुक्तेश्वर को एक नए तीर्थ स्‍थल के रूप में बहुत तेजी से डेवेलोप करने के प्रयास किये जा रहे हैं। कैसे पहुंचे यह जगह दिल्ली से लगभग 119 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। हम सुबह 8 बजे दिल्ली से गढ़मुक्तेश्वर की ओर रवाना हुए। अभी एक दिन पहले ही बारिश हुई थी इसलिए मौसम ज्यादा गर्म नहीं था। इसलिए दो ढाई घंटे के सफर में कोई थकावट महसूस नहीं हुई। लेकिन फिर भी हम हापुड़ से निकलकर एक जगह चाय के लिए रुके। जब भी आप दिल्ली से हापुड़-मेरठ की तरफ जाते हैं तो हाईवे पर आपको शिवा ढाबा नाम से कई सारे ढाबे दिखाई देते हैं हमने भी एक ऐसे ही ढाबे पर रुक  गर्मा गरम अदरक वाली चाय और ग्रिल्ड सेंडविच का आनंद लिया। कुछ भी हो सफर में चाय मिल जाये तो यात्रा वसूल सी हो जाती है।(Garh Mukteshwar) सरकंडों से बने मूढ़े और फर्नीचर आइटम गढ़मुक्तेश्वर से थोड़ा पहले ही  सड़क के  दोनों और काफी संख्या में मूढ़े और सरकंडों से बने ऐसे ही अलग-अलग फर्नीचर आइटम दिखाई दिए। अगर आप  परम्परागत चीजों के शौक़ीन हैं तो आपको यहाँ घर के लिए खूब सारे वैरायटी में मूढ़े मिल जायेंगे। कीमत पांच सौ से शुरू होकर तीन चार हज़ार तक। आप थोड़ी बार्गेनिंग करेंगे तो आसानी से सही दाम में भी खरीद सकते हैं। आम के बाग और मुक़म्मल सफर वहीँ  थोड़ा आगे चलने पर  हमें आम के बाग दिखाई दिए। सैंकड़ों आम हमारे सामने पेड़ों पर लदे हुए थे, मन कर रहा था कि बस इन सुंदर रसीले आमो को तोड़ कर खा ले। सफर में जब अचानक इस तरह की चीजे मिल जाएँ तो समझ लीजिये आपका सफर मुकम्मल। हमने बाग में बहुत सारे फोटोज क्लिक करवाएं और वीडियो भी बनाई। इसके बाद हम अपने सफ़र पर वापस निकल पड़े। कार पार्किंग लगभग 3 घंटे सफर के बाद हम गढ़मुक्तेश्वर पहुंचे। उससे थोड़ी दूर पहले ही हमने अपनी कार पार्क की। यहा कार पार्किंग का चार्ज 60 रुपए था। अमृत परिसर धर्मशाला थोड़ा पैदल चलते ही हम पहुंचे अपनी डेएस्टिनेशन पर। जहा सबसे पहले हमें दिखाई दी अमृत परिसर धर्मशाला। आपको बता दें कि यह गढ़मुक्तेश्वर की एकमात्र धर्मशाला है और इसे धर्मशाला ना कहकर एक अच्छा होटल कहे तो भी बेहतर होगा। क्योंकि यहां के संचालक से  बात करने पर पता चला कि यहां नॉर्मल रूम्स के अलावा ए सी रूम भी शामिल हैं जिनका किराया ₹1400 है। हमने यहां के संचालक से बात की और बातचीत में उन्होंने हमें कर गढ़मुक्तेश्वर के इतिहास ,उसकी पुरानी स्थिति और वहां के सौंदर्यीकरण के बारे में बताया। इसी धर्मशाला के ठीक दाहिनी ओर स्थित है गढ़ मुक्तेश्वर के सबसे पुराने मंदिरों में से एक अमृत परिसर मंदिर। अगर आप यहाँ आते हैं तो यह मंदिर अवश्य देखिये, तीन मंजिला इस मंदिर में आप धार्मिकता और पौराणिकता दोनों के दर्शन कर लेंगे। हमने वहां के पुजारी से भी बात की और उन्होंने हमें मंदिर के इतिहास के बारे में विस्तार से बताया। ब्रजघाट प्रसाद लेने के बाद हम निकले ब्रिज घाट की ओर। गढ़मुक्तेश्वर का सबसे प्रसिद्ध घाट है- ब्रजघाट। ब्रजघाट घाट हिन्दू धर्म में उतना ही पवित्र माना जाता है जितना कि हरिद्वार में हर की पौड़ी, वाराणसी के घाट, प्रयागराज के घाट, अयोध्या और ऋषिकेश के घाटआदि। इसलिए गढ़मुक्तेश्वर का नाम हिन्दू धर्म के प्रसिद्ध तीर्थ स्थलों में आता है। आपको बता दे की गढ़मुक्तेश्वर के सौंदर्यीकरण का कार्य काफी अच्छी तरह से चल रहा है गढ़मुक्तेश्वर को हरिद्वार जैसा रूप देने की कोशिश की जा रही है और इसी को देखते हुए यहां घाट पर एक घंटा घर भी बनाया गया है जो कि देखने में हूबहू हरिद्वार में बने घंटाघर के जैसा दिखाई देता है। गढ़मुक्तेश्वर अधिक प्रसिद्ध नहीं है उसके बावजूद भी यहां हमें काफी संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ दिखाई दी। कोई पिंडदान करने, कोई गंगा माता का आशीर्वाद लेने तो कोई अपने पाप धुलने यहां बड़ी श्रद्धा के साथ पहुंचा हुआ था। बोटिंग करने की सुविधा यहां नदी में बोटिंग करने की सुविधा भी है आप नाव में बैठकर नदी के बीच में बने टापू पर जा सकते हैं। और वहां चाय कॉफी या कोल्ड ड्रिंक पीते हुए नदी के मनोहर दृश्य का आनंद ले सकते हैं। वास्तव में गंगा नदी के एक छोर से दूसरे छोर तक नाव में जाना हमारे लिए बिलकुल खास अनुभव था। शांत बहती गंगा नदी और आसमान में छाए हल्के नीले बादल आपको एकबारगी ऐसा फील करवाएंगे जैसे कि आप  जन्नत में आ गए हो। हमारी नाव  ब्रिज के नीचे एक सेल्फी प्वाइंट पर रुकी और हमने वहां पर कई सारी फोटोस और वीडियो ली। वहीँ बहुत सारे बच्चे ब्रिज के ऊपर से नदी में छलांग मार रहे थे। छोटे-छोटे बच्चों का यह करतब वाकई में अद्भुत था। गढ़मुक्तेश्वर का विवरण हिन्दुओं के पुराणों जैसे भागवत पुराण, शिवपुराण और महाभारत जैसे ग्रथों

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Chail- Amazing places to visit in Chail

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चंडीगढ़ से महज 110 किमी की दूरी पर है खूबसूरत चैल हिल स्टेशन by Pardeep Kumar मैं प्रदीप कुमार फाइव कलर्स ऑफ ट्रैवल के इस नए ब्लॉग में आप सभी का स्वागत करता हूं। इस ब्लॉग में मैं आपको हिमाचल प्रदेश के शिमला के पास ही स्थित एक बेहद खूबसूरत हिल स्टेशन चैल की हाल ही की यात्रा के बारे में बताऊंगा। You can also watch our vlog- Delhi to chail with all information. dont forget to subscribe the channel ठंडी हवाओं को ख़ुद में समेटे चैल की मीठी सुबह ने जैसे हमारे मिज़ाज को तरोताज़ा कर दिया। जून के महीने में भी चैल का मौसम बेहद सुहाना लग रहा था, और ऐसे सुहाने मौसम में जो कि हिल स्टेशन के लिए पीक का समय माना जाता है एक अच्छा रिसाॅर्ट मिलना हमारे लिए क़ाफ़ी क़िफ़ायती साबित हुआ। (Chail, Solan) बलखाती नागिन जैसी सड़कों पर जब हिचकोले लेती हमारी गाड़ी दौड़ रही थी तो एक अलग ही रोमांच का एहसास हो रहा था। चायल में एंट्री के दौरान हमें महादेव के दर्शन हुए मानो जैसे भगवान का आशीर्वाद भी हमें मिल गया हो। दरअसल चायल (चैल) में प्रवेश करते समय हमें भगवान शिव का मंदिर दिखाई दिया, यहाँ हम थोड़ी देर रुके और फिर आगे चल पड़े अपने रिज़ॉर्ट की और। एक तरफ़ पहाड़ और दूसरी ओर गहरी खाई से जबरदस्त रोमांच में जैसे डर का हल्का तड़का लग गया हो। यक़ीनन अब सफ़र और भी ज़्यादा हसीं और दिलचस्प होने वाला है। होटल्स, रिजोर्ट्स और होम स्टे दोस्तों, आप जब पहाड़ों में घूमने आते हैं तो आपको ठहरने के लिए दो से तीन अच्छे विकल्प मिल जाते हैं जैसे होटल्स, रिजोर्ट्स और होम स्टे, तीनों में अच्छा ख़ासा फ़र्क़ होता है जो आपकी सहूलियत और बजट पर असर डाल सकता है। जैसे होटल्स की बात की जाए तो वो आपको नार्मल दिनों में 1500/- तक में मिल जाते हैं वहीं पीक टाइम में इन्हीं होटलों के रेट तीन गुणा बढ़ जाते हैं। होम स्टे की बात करें तो नार्मल दिनों में 1000/- तक और पीक टाइम में 2000-2500/- तक रेट बढ़ जाते हैं। लेकिन होम स्टे के कुछ फायदे भी हैं जनाब अगर आप घर से दूर रहकर भी घर जैसा माहौल चाहते हैं तो होम स्टे को आजमा सकते हैं । रिजोर्ट्स की जहाँ तक बात आती है तो रिज़ॉर्ट में आपको ढेरों विकल्प मिल जाते हैं थ्री स्टार से लेकर फाइव स्टार तक या इससे भी ऊपर जो पूरी तरह से आप पर निर्भर करता है क्योंकि इनके शुरूआती रेट  2500/- से लेकर ज़्यादा से ज्यादा कितने भी हो सकते हैं। ये सब जानकारी देने का मक़सद बस इतना है कि ट्रिप प्लान करते समय आप अपना बजट सही तरीक़े से मैनेज कर सकें। पर एक बात का ज़रूर ध्यान रखें कि बुकिंग आप एडवांस में ही करें क्यूँकि ऑन द  स्पॉट बुकिंग करने पर आपका वक्त ज़ाया होने की संभावना बढ़ जाती है, ज़ाहिर है पहाड़ों और वादियों के ख़ूबसूरत ट्रिप की शुरुआत आप ऐसे तो नहीं करना चाहेंगे। खै़र हमने भी अपना रिज़ॉर्ट एडवांस में बुक कर लिया था। जिससे जून के महीने में बेवजह की भागा दौड़ी से बच गए। यह समर वेकेशन का वो टाइम होता है जहाँ किसी भी हिल स्टेशन में पैर रखने की भी जगह नहीं होती। अगर आप अच्छा क्वालिटी टाइम बिताना चाहते हैं तो होटल या रिज़ॉर्ट थोड़ा सा रिसर्च करके ही बुक करें। मद्धम धूप में सराबोर देवदार के पेड़ों की चादर ओढ़े ये ऊँची-ऊँची पहाडियाँ ग़ज़ब लग रही हैं। बहरहाल, हम सुबह दस बजे के क़रीब अपने रिज़ॉर्ट में दाख़िल हुए, जो मुख्य सड़क से थोड़ी ढ़लान पर बना हुआ था, बिल्कुल हिमालय की गोद में, जिसकी बदौलत हमने हर तरफ़ पहाड़ों के शानदार नज़ारों का खूब आनंद लिया। नाश्ता करने के बाद हम घंटों तक पहाड़ों में खोए रहे, उसके बाद हमने थोड़ा आराम किया जो उस वक़्त एनर्जी और रोमांच को बरक़रार रखने के लिये बेहद ज़रूरी था। अब तक़रीबन साढ़े बारह बजे हमने चैल की नई जगहों को एक्स्प्लोर करने का प्लान बनाया और बस फिर क्या अगले ही पल हमने ख़ुद को उन्हीं नागिन सी बलखाती सड़कों पर पाया। घुमावदार रास्तों से होते हुए हम अपनी धुन में खोए ही थे कि चैल के मेन बाज़ार ने हमारा ध्यान अपनी ओर खींचा,  चैल बाज़ार और चैल पैलेस पहाड़ी जगह पर बने बाज़ार को घूमने का अपना ही मजा है क्योंकि यहां पर ज़रूरत की हर चीज़ मौजूद है। बाज़ार में हमने थोड़ा ही समय बिताया क्योंकि हमारा मुख्य लक्ष्य था उस जगह घूमना जहाँ के बारे में लोग इतना अवगत नहीं है। इसके अलावा आप चैल में सेल्फी पॉइंट, काली का टिब्बा मंदिर और चैल पैलेस भी घूम सकते हैं। बताते हैं लोर्ड़ किच्नर के आदेशानुसार पटियाला के राजा भूपिंदर सिंह को शिमला से निकाल दिया गया था, इसका बदला लेने के लिए उन्होंने शिमला के पास ही खूबसूरत चैल को अपनी गीष्मकालीन राजधानी बना कर यहाँ सुंदर चैल पैलेस का निर्माण करवाया। चैल पैलेस को 1891 में बनवाया गया था और यह चैल की शाही वीरासत मानी जाती है जिसे आज एक शानदार होटल में बदल दिया गया है। यहाँ पर्यटकों को घूमने के लिए सौ रुपए का टिकट लेना पड़ता है।  टूरिस्ट चाहे तो यहाँ रूम बुक करके भी रह सकते हैं। जिसके रूम की सुविधाओं के हिसाब से अलग-अलग चार्ज हैं। यहाँ से आप चैल के पहाड़ों और वादियों के शानदार नज़ारों का आनंद ले सकते हैं। अश्विनी खड़ अच्छा ख़ासा रास्ता तय करके हम अपनी डेस्टिनेशन पर आख़िरकार पहुँच ही गए। हिमाचल प्रदेश एक ऐसी जगह है जो हमें कभी निराश नहीं करती और हमेशा कुछ न कुछ नए और खूबसूरत मंजर देखने पर मजबूर करती है, एक ऐसी जगह जहां बहुत सारी अनछुई या यूँ कह लीजिये कि बहुत सारे छिपे हुए रत्न हैं।  इन्हीं हिडेन जेम्स में से एक जगह है अश्विनी खड़। चायल से तकरीबन 33 km दूर अश्वनी खड़ में है पहाड़ों के बीच छिपा बहुत सुंदर वाटरफॉल, जहां आप ठंडे पानी में पैर रखके तरोताजा हो सकते हैं, लेकिन हमने समय बिताया नदी के पानी में जो झरने से होते हुए इस विशाल