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New Tehri – Uttarakhand Tourism

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Tehri Uttarakhand- टिहरी: एक ऐसा शहर जिसे कभी डूबा दिया गया था by Pardeep Kumar धनौल्टी में नेचर व्यू, एडवेंचर स्पॉट्स, ईको पार्क, सुरकंडा देवी मंदिर और स्थानीय गांव और बाजार देखने के बाद शेड्यूल के अनुसार अगले दिन हमारा प्रोग्राम था चम्बा और टिहरी बांध और शहर देखने का। जिसके बारें में हमने काफी सुना था। धनौल्टी से टिहरी टिहरी जाने का खास मकसद था एक ऐसे शहर को देखना, समझना जिसे डूबा कर उस पर बांध बना दिया गया था। सम्भवतः जिसकी गिनती देश के सबसे बड़े बांधों में की जाती है। सुबह नाश्ते में मिक्स वेज परांठे लिए वो भी ताजा मक्खन और गरमा-गर्म चाय के साथ। पहाड़ों की सर्दियों में चाय आपको अवश्य रास आएगी। धनौल्टी से टिहरी लगभग ढाई-तीन घंटे का सफर था। चम्बा शहर के बाजार होते हुए हम तकरीबन एक बजे टिहरी झील पहुंचे। जिसे आज सुमन सागर के नाम से जाना जाता है। जहाँ आज लगभग बयालीस किलोमीटर लम्बी झील दिखाई देती है वहां कभी भरा-पूरा टिहरी शहर था। बताते हैं यह टिहरी शहर दो सौ साल से भी ज्यादा समय तक आबाद रहा। (Tehri, Uttarakhand) आज भी जब गर्मियों में झील के पानी का लेवल कम हो जाता है तब आप आसानी से इस शहर के राजमहल के कुछ हिस्से इस विशाल झील में देख सकते हैं। आज इस पूरे क्षेत्र को एक सुन्दर टूरिस्ट स्पॉट के रूप में डेवेलप किया गया है। झील के किनारे पर बहुत सारे छोटे-छोटे फ़ूड स्टाल बनाये गए हैं जहाँ पर पर्यटक जलपान करते हुए पहाड़ों की तलहटी में दूर-दूर तक फैली झील को निहार सकते हैं, प्राकृतिक दृश्यों का आनंद ले सकते हैं। जब विकास की भेंट चढ़ा एक भरा पूरा आबाद शहर हमने वहां पहुँच कर सबसे पहले मैगी आर्डर की और चाय पीते हुए इत्मीनान से अपनी थकान उतारी। चाय के शौकीन लोगों के लिए इससे बेहतर तो क्या ही होगा। नीला आसमान और सर्द तेज हवाएं बड़े मेट्रो शहर और पहाड़ों के दरमियान जो बड़ा अंतर् है उसे बयान कर रही थी। वही चाय पीते हुए पता चला कि सिर्फ एक बांध बनाने के लिए एक पूरे टिहरी शहर को डूबा दिया गया। एक पूरा शहर विकास की भेंट चढ़कर सदा के लिये पानी में समा गया। बताते हैं इस बांध के निर्माण से यहाँ के लगभग 125 गांवों पर असर पड़ा था। इस दौरान 37 गांव पूरी तरह से डूब गए थे जबकि 88 गांव आंशिक रूप से प्रभावित हुए थे। और फिर नए टिहरी शहर को बनाने के लिए पहाड़ और असंख्य पेड़ों को अपनी कुबानी देनी पड़ी। यह नया टिहरी शहर वहां से लगभग चौदह-पंद्रह किलोमीटर दूर थोड़ी ऊंचाई पर बनाया गया। वाटर स्पोर्ट्स और एक्टिविटीज का हब – टिहरी झील यह बांध और झील जहाँ पर तरह-तरह के वाटर स्पोर्ट्स, जेट स्कीइंग से हॉट एयर बैलून सवारी तक कई अलग-अलग एक्टिविटीज शामिल हैं, और शायद वहां के बहुत सारे स्थानीय लोगों के लिए रोजगार का अवसर भी। टिहरी झील आकर पर्यटक नौका विहार, जेट स्पीड बोट सवारी, वाटर स्कीइंग, जोर्बिंग, बनाना वोट सवारी, बैंडवेगन वोट सवारी, हॉटडॉग सवारी और पैराग्लाइडिंग जैसे स्पोर्ट्स एडवेंचर्स कर सकते हैं। वहीं टिहरी झील के किनारे एक जगह वाटर एक्टिविटीज के लिए टिकट काउंटर था जहाँ से हमने बोटिंग करने के लिए टिकट लिया और खूबसूरत पहाड़ों के बीच दूर तक फैली टिहरी झील का लगभग 4० मिनट जी भर कर आनंद लिया। आप एक लम्बा सफर तय करने के बाद जब इस झील में एक शिकारे टाइप बोट से प्राकृतिक दृश्यों का आनंद लेते हैं तब ऐसा लगेगा कि इतनी दूरी तय करके यहाँ आना किसी भी तरह घाटे का सौदा नहीं है। झील के पास पहुँचते ही आपका हाथ अपने आप कैमरे या फोन तक जायेगा और आप स्वयं को यहाँ के खूबसूरत लम्हों को कैद करने से बिलकुल भी नहीं रोक पाओगे। मन करेगा यहाँ से सब कुछ समेट ले जाओ। आपको यहाँ अनगिनत नेचुरल सेल्फी पॉइंट मिल जायेंगे जहाँ आप जी भर कर फोटो ले सकते हैं। दरअसल हिल स्टेशन अपने दृश्यों के लिए जाने जाते हैं ऐसे में वहां अगर आपको नेचुरल व्यूज के अलावा झील और एडवेंचर स्पॉट मिल जाये तो समझ लीजिए यात्रा सफल। इसी मनभावन सौदर्यता से परिपूर्ण टिहरी शहर में और इसके आसपास की खूबसूरत जगहों पर बॉलीवुड स्टार शाहीद कपूर और श्रद्धा कपूर की फिल्म बत्ती गुल मीटर चालू की लगभग सारी शूटिंग हुयी है। हमने टिहरी में अच्छा-खासा समय व्यतीत किया। और शाम तक नए टिहरी शहर और चम्बा होते हुए वापिस धनौल्टी अपने रिज़ोर्ट पहुँच गए। अगले दिन वापिसी तय थी और फिर शामिल हो जाना था उसी भीड़ भाड़ और व्यस्तता भरी दुनिया में जहाँ लौटना हमारी मजबूरी थी।  (Tehri, Uttarakhand) Written by Pardeep Kumar some glimpse of Tehri Lake….

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Safdarjung Tomb – History, Facts & Architecture

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Safdarjung Tomb: दिल्ली के किसी बादशाह के नहीं बल्कि प्रधानमंत्री के नाम पर बना है यह मकबरा Five Colors of Travel आपने दिल्ली की जानी-मानी जगहें तो बहुत घूमी होंगी पर अब वक्त है एक अनजान और नए सफर पर ले चलने का। हम निकले हैं दिल्ली की कुछ नायाब इमारतों की खोज में, जिनका महत्व तो बहुत है पर प्रचार और इतिहास में जगह न मिल पाने के कारण आज ये स्थान पर्यटकों की नजरों में या तो नहीं हैं या बहुत कम हैं। लम्बे रिसर्च और ढेरों जानकारियां निकालने के बाद फैसला किया सफदरजंग का मकबरा देखने का। गूगल मैप पर अपनी अन्य खोजों के दौरान कई बार मकबरे के नाम पर नजर पड़ी पर अनजान और अनसुने नाम के कारण कभी गौर नहीं किया था। इस बात की भी कोई जानकारी नहीं थी कि मकबरा हुमायूं के मकबरे जैसी ही सुंदरता समेटे हुए है भले ही वह बहुत विशाल और विस्तृत न हो। गूगल पर कुछ तस्वीरें देखीं और मन बनाया सफदरजंग का मकबरा देखने का। सफर का मकसद दुनिया को दिल्ली की अनछुई, अनदेखी लेकिन खूबसूरत जगहों से रु-ब-रु कराना है। Safdarjung Tomb निकटतम मेट्रो स्टेशन सफदरजंग मकबरे के लिए सबसे निकटतम मेट्रो स्टेशन येलो लाइन पर स्थित जोर बाग है। इस स्टेशन से मकबरा लगभग चार सौ मीटर की दूरी पर है। मेट्रो स्टेशन से मकबरे तक जाने के लिए आप या तो बैटरी रिक्शा किराये पर ले सकते हैं या फिर मकबरे तक आराम से पैदल यात्रा भी कर सकते हैं। मकबरे के मुख्य द्वार पर पहुँच कर लगा जैसे हम किसी राजस्थानी महल के सामने विराजमान हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि मक़बरा बेहद सुन्दर लग रहा था। बिलकुल ऐसे कि बाहर से देखकर कोई भी अंदर खिंचा चला जाए। रुख किया टिकटघर की तरफ 25 रुपये के मामूली दाम का टिकट कटाया और चल पड़े दूर से दिख रहे खूबसूरत से मकबरे की तरफ। मुख्य द्वार (जो एक समय पर मदरसा हुआ करता था) से निकल ही रहे थे कि आवाज़ आई- रुकिए! एंट्री तो कर दीजिए। आवाज़ चौकीदार साहब की थी। एंट्री रजिस्टर देखा तो आश्चर्य से आँखें बड़ी हो गई। केवल 20 लोगों की एंट्री। परिसर में ऐसे तो दूर-दूर तक कोई नहीं दिखा पर थोड़ा आगे चलते ही कुछ प्रेमी परिंदे दिखने लगे तब कुछ राहत मिली। सुनसान और एकांत सा देखकर एक पल थोड़ी घबराहट लाज़िमी है लेकिन थोड़ा आगे बढ़ने पर कुछ ही पलों में यह घबराहट उत्साह में बदल जाती है।(Safdarjung Tomb) सफदरजंग का मकबरा सामने सफदरजंग का मकबरा था और उसके आगे बड़ा-सा फव्वारा जो मकबरे की सुंदरता में स्वर्ग-सा तेज प्रदान कर रहा था। फव्वारे के जल में मकबरे का अक्स और भी खूबसूरत लग रहा था, भला कोई कैसे इसकी तस्वीर अपने कैमरे में कैद किए बिना रह सकता था। मकबरे की स्थापत्य शैली बहुत सहज पर शोभनीय लगी। चार बाग शैली इसे और भी आकर्षक बनाती है। कुतुब मीनार, लाल किला के अपने सफर में हम आपको चार बाग शैली के बारे में बता ही चुके हैं। मुगल कालीन इमारतों में ये शैली बहुत प्रसिद्ध रही है। परिसर में बीचों-बीच सफदरजंग मकबरा है और मकबरे के तीन तरफ एक जैसे दिखने वाले तीन अलग-अलग महल हैं- जंगली महल, बादशाह पसन्द और मोती महल। तीनों महल उत्तर मुगलकालीन वास्तुशैली में बने हैं। मेहराबयुक्त मण्डप जैसे सफेद महल परिसर की सुंदरता बढ़ाते हैं। अब मकबरे के अंदर पहुंचने की जल्दी थी। एक खास बात ये थी बाहर से देखने पर मकबरा चारों तरफ से एक जैसा ही दिखता था। चारों ओर एक ही शैली में फ़व्वारे बने हैं। एक पल को ये मकबरा हुमायूं के मकबरे जैसा ही दिखता है। मकबरे के अंदर की खूबसूरती का क्या ही बखान करें। इसे देखना भर ही इसका जवाब है। चारों ओर से सूर्य की किरणें छनकर मकबरे को रोशन करती हैं। मकबरे के बीचों-बीच सफदरजंग की मजार सूर्य की किरणों से चमकती नजर आती है। मकबरे की पहली मंजिल से परिसर में बने तीनों महल और परिसर की मस्जिद भी साफ नजर आती है। यहाँ आकर एक बात जो साफ़ नज़र आयी वो ये कि भले ही यह मकबरा ताज या हुमायूँ के मकबरे की तरह भव्य और आलीशान  न हो लेकिन इसकी सादगी और बनावट मन को खूब भाती है, वाकई में ऐसा नजारा देखना जन्नत से कम नहीं। न जाने क्यों दुनिया इतनी हसीन और खूबसूरत जगह से वाकिफ़ नहीं है, ये किसी बदनसीबी से कम नहीं।  एक प्रधानमंत्री के नाम पर बना है यह मकबरा अक्सर नाम को लेकर यह भ्रम हो ही जाता है कि सफरदजंग कोई बादशाह था, क्योंकि देश भर में अधिकतर मकबरें तो राजा या किसी बादशाह के ही बने हुए हैं। लेकिन सफदरजंग मकबरे के बारें में यह सोचना गलत है। दरअसल, वह मुगल बादशाह मुहम्मद शाह का प्रधानमंत्री था। 1753-54 में नवाब शुजाउद्दीला ने अपने पिता मिर्जा मुकीम अबुल मंसूर खान जिनकी उपाधि सफदरजंग थी, की स्मृति में सफदरजंग मकबरे का निर्माण करवाया था। सफदरजंग मुगल बादशाह मुहम्मद शाह के शासन काल में अवध के सूबेदार और प्रधानमंत्री रहे। लाल बलुआ पत्थर से बना भव्य मकबरा वाकई सुंदरता की मिसाल है। मकबरे के गार्ड साहब से बात करने पर इसके अलग-अलग महलों की जानकारी हुई। परिसर की पूरी जानकारी उन्होंने एक गाइड की भांति मुझे दी। ऐसे किसी स्मारक स्थल पर लम्बे समय तक रहते-रहते कोई भी कर्मचारी एक समय के बाद गाइड हो ही जाता है। बातचीत में गार्ड साहब ने ये भी कहा- ‘ये जगह बहुत खूबसूरत है पर लोग कम ही आते हैं। आए दिन लोग इसके ऊपर वीडियो बनाने आते हैं ताकि लोग इस जगह को जान सके। जबसे इसका जीर्णोद्धार हुआ है तबसे पहले से कुछ ज्यादा लोग यहाँ आने भी लगे हैं। बाकी हमारा अनुभव शानदार रहा। और हम वहां से यह सोचकर विदा हुए कि जल्द ही सर्दियों में इस मकबरे का दोबारा दीदार हो। यही सुझाव है कि दिल्ली आए तो एक बार सफदरजंग का मकबरा जरूर घूमें और दिल्ली के ही हैं तो एक बार इस खूबसूरती पर भी अपनी निगाहें अवश्य डालें। क्यों देखें सफदरजंग मकबरा ? Five reasons to visit this place- 1. मेट्रो

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Murthal ke Paranthe

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Murthal ke Paranthe: मुरथल के परांठे वाले ढाबे -जहाँ रोजाना लगभग 40-50 हजार से अधिक लोग खाने का लुत्फ उठाते हैं by Pardeep Kumar अगर आप परांठे खाने के शौक़ीन हैं तो आज हम आपको अपने इस ब्लॉग में रू-ब-रू करवाएंगे तकरीबन देश भर में प्रसिद्ध मुरथल के मशहूर परांठों के स्वाद से। वैसे तो मुरथल के परांठे पूरे देश में फेमस हैं लेकिन फिर भी दिल्ली से लगते सात राज्यों में अपने पराठों के स्वाद के लिए प्रसिद्ध मुरथल के ढाबों का कोई सानी नहीं। पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, राजस्थान, उत्तराखंड, दिल्ली और उत्तर प्रदेश से भी लोग यहाँ आकर परांठों का लुत्फ़ उठाते हैं। खासकर शनिवार और रविवार को यहां दिल्ली-एनसीआर से परांठों के शौकीनों की भारी भीड़ उमड़ती है। अगर आप दिल्ली से चंडीगढ़ जा रहे हैं तो एन एच 1 पर सोनीपत के नजदीक और दिल्ली से तकरीबन घंटे भर के सफर पर एक छोटे से कस्बे मुरथल में यह ढ़ाबे मौजूद हैं। (Murthal ke Paranthe) किसान आंदोलन और दिल्ली से मुरथल का सफर काफी दिनों से मुरथल का प्लान बनाया जा रहा था। क्योंकि आजकल किसान आंदोलन के कारण दिल्ली से मुरथल पहुंचना थोड़ा मुश्किल हो गया था इसलिए कई बार प्रोग्राम बना और बिगड़ भी गया। लेकिन इस बार वीकेंड पर हमने ठान लिया था कि कैसे भी करके मुरथल के परांठे खाने ही हैं। सो दिल्ली से हमने औचंदी बॉर्डर का रास्ता लिया और अंदर अलग-अलग गांव से होते हुए सोनीपत शहर से गुजरते हुए तकरीबन दोपहर के 3 बजे मुरथल पहुंचे। और जब आप इस तरह का सफर तय करते हैं तब भूख कुछ ज्यादा ही लग जाती है और मैं हमेशा कहता हूँ खाने का असली मजा तब है जब आपको जोर की भूख लगी हो। और ऊपर से मुरथल के विख्यात परांठे हो वो भी ताजा मक्खन के साथ तो बस समझ लीजिये आपका दिन बन गया। वैसे तो मेरा सारा बचपन सोनीपत शहर में ही गुजरा है। 12वीं कक्षा तक मेरी स्कूली एजुकेशन इसी शहर में हुयी और इसी कारण जब भी मेरा और मेरे कुछ दोस्तों का मन करता तब हम सोनीपत से मुरथल आ जाते थे परांठे खाने। सोनीपत से मुरथल यही 6-7 किलोमीटर है और आजकल तो ऐसा लगता है कि मुरथल सोनीपत शहर में ही मिल गया है। वो नब्बें का दशक था। यही 1997-98 का समय। स्कूल टाइम की यादें और मुरथल के परांठे मुझे अच्छे से याद है तब मुरथल बस स्टॉप से पानीपत की तरफ थोड़ा आगे निकल कर गुलशन का ढ़ाबा ही फेमस हुआ करता था और उसके आसपास एक दो ढ़ाबे और थे। तब परांठे का साइज आज के परांठों के साइज से बड़ा होता था। तब मुरथल के ढाबों पर सिर्फ दाल मखनी, परांठे, खूब सारा मक्खन और मीठे में खीर ही मिलती थी लेकिन आज यहां पर हर प्रकार के शाकाहारी स्वादिष्ट व्यंजन मिलते हैं। नब्बे के दशक में हम देखते थे कि पहले सिर्फ ट्रक चालक यहां से गुजरते हुए रुककर खाना खाते थे, या फिर सोनीपत के युवाओं की टोलियां जिनका कभी-कभार बाहर खाने का मन करता। लेकिन आज यहाँ का मंज़र बिलकुल बदल चुका है, अब आपको इन फुली एयर कंडीशंड ढाबों की पार्किंग में सैंकड़ों लक्ज़री कार दिखाई देंगी और कई बार तो भीड़ इतनी बढ़ जाती है कि सैंकड़ों गाड़ियों की पार्किंग की जगह होने के बाद भी यहाँ आपको अपनी कार पार्क करने की जगह नहीं मिलती। Murthal Ke Paranthe आजकल लोग यहां अपने परिवार के साथ पार्टी व अन्य पारिवारिक कार्यक्रम आयोजित करने आते हैं, मैंने आपको पहले ही बताया कि दिल्ली से महज घंटा भर की ड्राइव कर यहां आसानी से पहुंचा जा सकता है। यही बड़ी वजह है कि दिल्ली और एनसीआर के लोग खासकर युवा यहाँ अक्सर देर रात या वीकेंड पर पराठे खाने के लिए आते हैं। बताते हैं मुरथल के ढाबों की शुरुआत 1950-60 के दशक में हुई थी। बेहद परम्परागत ढाबों के तौर पर शुरू हुए यह ढाबे आज अपनी अलग ही क्रेज बना चुके हैं। एक अनुमान के अनुसार रोजाना लगभग 40-50 हजार से अधिक लोग यहां आकर खाने का लुत्फ उठाते हैं। यह वास्तव में एक अद्भुत संख्या है। वैसे तो यहाँ जितने भी ढाबे हैं चाहे काफी पुराना पहलवान ढाबा हो, आहूजा हो या फिर झिलमिल उन सभी में परांठों का स्वाद लाजवाब है लेकिन फिर भी अमरीक सुखदेव का पिछले एक दशक से यहाँ एक तरफा राज है। शायद यही वजह है अगर आप वीकेंड पर यहाँ आएंगे तो हो सकता है लगभग 20-25 मिनट आपको बैठने के लिए सीट भी न मिले। लेकिन कहते हैं न कि इंतज़ार का फल मीठा होता है, बस यहाँ इंतज़ार का फल बेहद स्वादिष्ट मिलेगा। सुपर स्टार धर्मेंद्र का गरम-धरम ढाबा अमरीक सुखदेव के बिलकुल साथ लगता और कुछ साल पहले बना गरम-धरम ढ़ाबा भी है, जोकि अपनी बनावट के कारण लोगों में काफी पॉपुलर भी हो रहा है। इस ढ़ाबे की पूरी थीम बॉलीवुड सुपरस्टार धर्मेंद्र की फिल्मों पर बेस्ड है। पूरे ढ़ाबे को धर्मेंद्र की फिल्मों के अनुसार डिज़ाइन किया गया है। ढ़ाबे के बाहर मेन गेट पर आपको शोले फिल्म की मशहूर पानी की टंकी दिखाई देगी जिस पर चढ़कर धर्मेंद्र फिल्म की नायिका हेमा मालिनी को परपोज करता है। अंदर ढ़ाबे में आप ऑटो रिक्शा, ट्रक और धर्मेंद्र की फिल्मों के पोस्टरों के बीच में इस ढाबे पर बनने वाले फेमस फ्रूट परांठे का स्वाद भी ले सकते हैं। हम अमरीक सुखदेव के परांठे कई बार खा चुके थे इसलिए इस बार हमने गरम-धरम ढ़ाबे के परांठे खाने का निर्णय लिया। एंट्री गेट पर ही गार्ड ने हैंड सेनिटाइज करवाए। अंदर वातानुकूलित हॉल में एक अच्छा-सा कार्नर देखकर हमने आसन जमा लिया। भूख लगी थी इसलिए तुरंत चाय और मिक्स वेज परांठे आर्डर किये। तकरीबन 10 मिनट के इंतज़ार के बाद परांठे की थाली आ चुकी थी। कड़क चाय, दो-तीन तरह का अचार, हरी मिर्च और ताजे मक्खन की भरी कटोरी और गरमा-गर्म परांठे। बिना तले स्वादिष्ट परांठे अगले कुछ लम्हें सब कुछ भूल कर हमने सिर्फ परांठों पर ही फोकस किया। स्वादिष्ट और एकदम फ्रेश। पराठे खाते वक्त हमने देखा कि यहाँ के परांठों की फिलिंग में ज्यादा चीजें

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Brahma Sarovar Kurukshetra – Best Place to Visit in Haryana 

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कुरुक्षेत्र का ब्रह्मसरोवर – एशिया का सबसे बड़ा मानव निर्मित सरोवर हमारे देश में बहुत-सी ऐसी जगह हैं जिनका जिक्र हमारे धार्मिक ग्रंथों में भी किया गया है। और यह स्थान कई हजार साल पुराने हैं। यही कारण है कि लोग उन जगहों पर घूमना बहुत पसंद करते हैं,जो बहुत प्राचीन हैं और हमारी आस्था के साथ भी जुड़े हुए हैं। महाभारत के युध्द को कौन नहीं जानता, महाभारत के सभी मुख्य किरदार आज भी हमारे दिलों दिमाग में बैठे हुए हैं। महाभारत का युद्ध कुरुक्षेत्र में हुआ था यह बात तो सभी जानते हैं, मगर बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो कुरुक्षेत्र से ज्यादा दूरी होने की वजह से वहां पर नहीं जा पाते हैं। और कुरुक्षेत्र में कौन-सी जगह क्यों प्रसिद्ध है, इसकी भी जानकारी उन्हें नहीं है। अगर आप  कुरुक्षेत्र जाने की प्लानिंग कर रहे हैं  तो यह ब्लॉग आपके लिए बहुत फायदेमंद हो सकता है। स्टेशन से ब्रह्मसरोवर आप जैसे ही कुरुक्षेत्र रेलवे स्टेशन के बाहर निकलेंगे तो आपको यह रेलवे स्टेशन किसी राजमहल से कम नहीं लगेगा। आप स्टेशन की डेकोरेशन देखकर ही अनुमान लगा लेंगे कि जरूर इस शहर में कोई ना कोई खास बात है। स्टेशन के बाहर कई ऑटो वाले खड़े होते हैं आप चाहे तो ऑटो स्पेशल रिजर्व करा कर भी जा सकते हैं या सवारी के हिसाब से भी सफर कर सकते हैं। ब्रह्मसरोवर जाने का किराया प्रति सवारी मात्र 20 रुपये है। स्टेशन से ब्रह्मसरोवर की दूरी 3.5 किलोमीटर की है। ब्रह्मसरोवर की ओर जाते  हुए छठी पातशाही गुरुद्वारा, सन्निहित सरोवर, पैनारोमा एवं विज्ञान केंद्र, श्री कृष्ण संग्रहालय इसी मार्ग में मिलेंगे। लेकिन आज इस ब्लॉग में हम आपको रूबरू करवाएंगे कुरुक्षेत्र के प्रसिद्ध ब्रह्म सरोवर से। जानिए ब्रह्मसरोवर का इतिहास सबसे पहले समझते हैं ब्रह्म सरोवर के इतिहास को, यह जगह क्यों फेमस है और क्यों यहाँ देश के दक्षिणी राज्यों केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और कर्नाटका तक से श्रद्धालु आते हैं। जिन लोगों की धर्म में अटूट आस्था है वो साल भर यहाँ बड़े श्रद्धा भाव से आते हैं। बाकी बहुत से लोग विशेष अवसरों पर जैसे सोमवती अमावस्या, सूर्य ग्रहण पर यहाँ आते हैं। दरअसल ब्रह्मसरोवर का संबंध सृष्टिकर्ता ब्रह्मा से माना गया है। भगवान विष्णु के अवतार भगवान परशुराम का इस सरोवर से विशेष संम्बंध रहा है। पौराणिक अध्ययनों के अनुसार इस सरोवर की सर्वप्रथम खुदाई राजा कुरु ने करवाई थी इन्ही के नाम पर इस स्थान का नाम कुरुक्षेत्र पड़ा। इसी स्थल पर प्रजापति ब्रह्मा ने सबसे पहले युद्ध किया था। द्रोपदी कूप सूर्य ग्रहण के अवसर पर ब्रह्म सरोवर में लाखों की संख्या में श्रद्धालु स्नान कर पुण्य अर्जित करते हैं। पौने चार किलोमीटर में फैला यह प्राचीन सरोवर भारत के मानव निर्मित सरोवरों में से सबसे बड़ा सरोवर है। इसी स्थान पर सरोवर के मध्य भाग में प्राचीन द्रोपदी कूप भी है जिसे चंद्रकूप कहा जाता है। ब्रह्म सरोवर आने वाले श्रृद्धालु सरोवर में स्नान करने के उपरांत इस कूप के दर्शन अवश्य करते है, जिसे बहुत शुभ माना जाता है। इस सरोवर की विशालता को देखते हुए अकबर के कवि अबुल फजल ने इसे लघु समुद्र की संज्ञा दी थी। इस सरोवर में स्नान करना हजारों अश्वमेध यज्ञ करने के बराबर माना जाता है। महाभारत का युद्ध जीतने के बाद युधिष्ठिर ने इस के मध्य भाग में विजय स्तंभ निर्माण करवाया। महाभारत में भी ब्रह्म सरोवर का जिक्र है कि महाभारत युद्ध के अंतिम दिन, युद्ध में हार जाने के बाद, दुर्योधन इसी सरोवर में आकर छुप गया था। आप को ब्रह्मसरोवर के मुख्य द्वार के सामने, बाहर की और कई तरह की दुकानें दिखाई देंगी, जहाँ आपको हर तरह के सजावट और वुडेन क्राफ्ट का सामान मिल जायेगा। यहाँ से आप हल्की फुलकी शॉपिंग कर सकते हैं। बाहर काफी सारे भोजनालय भी आपको आसानी से मिल जायेंगे लेकिन यहाँ खाने से पहले थोड़ा क्वालिटी रिसर्च कर लें तो बेहतर होगा।  यहां पर रविवार के दिन काफी संख्या में श्रद्धालुओं की भीड़ देखने को मिलती है। बाकी सप्ताह में भीड़ इतनी ज्यादा नहीं होती। हां, अगर कोई पर्व या त्यौहार हो तो यहां पर अच्छी खासी भक्तों की भीड़ देखने को मिल सकती है। ब्रह्मसरोवर में प्रवेश करते ही आपको शानदार नजारा देखने को मिलता है जो सामान्यतः किसी सरोवर को देखने पर नहीं मिलता। एकबारगी यह सरोवर किसी लघु समुंदर से कम नही लगता। इसकी विशालता और भव्यता को देखकर आप मनमोहित हो जाओगे। सरोवर के बीचोबीच पुल बना हुआ है जहाँ खड़े होकर आप सरोवर की ख़ूबसूरती का आनंद ले सकते हैं। साथ ही यहां पर आप प्राचीन ऐतिहासिक और हस्तशिल्प की कलाओं से परिचित होंगे। सरोवर के पास बनी दीवारों पर आपको कई तरह के चित्र देखने को मिलेंगे। सरोवर के चारो और अलग अलग पौराणिक दैवीय पात्रों के नाम पर स्नान घाट बने हुए हैं जो सूर्यास्त के समय या संध्या के समय एक अलग ही छटा बिखेरते हैं। इन घाट पर बैठकर आप आसानी से योग, अध्यात्म और ध्यान कर सकते हैं। सुबह शाम यहाँ आपको मंदिर की आरती और घंटियों की आवाज़ सुनाई देती है। ऐतिहासिक शिव महादेव मंदिर श्रीकृष्ण की अर्जुन को उपदेश देते हुए  विराट प्रतिमा सरोवर के बीच में ऐतिहासिक शिव महादेव मंदिर भी है जहाँ काफी संख्या में श्रद्धालु आते हैं और वहीँ मंदिर के किनारे सीढ़ियों पर बैठकर मछलियों को आटा दाना खिलाते हैं। कहते हैं यहाँ मछलियों को भोजन कराने से पुण्य की प्राप्ति होती है। यह मंदिर एक छोटे से पुल द्वारा सरोवर के किनारे से जुडा हुआ है।  नवंबर दिसंबर के महीने में गीता जयंती के अवसर पर देश भर से श्रद्धालु ब्रह्म सरोवर में स्नान करने आते हैं।  साथ ही गीता जयंती के उपलक्ष्य में हरियाणा सरकार द्वारा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मेले का भव्य आयोजन किया जाता है जिसमें देश विदेश से कलाकार भाग लेते हैं। ब्रह्म सरोवर में श्रीकृष्ण की अर्जुन को उपदेश देते हुए  विराट प्रतिमा भी विशेष आकर्षण का केंद्र है। अगर आप श्रद्धा और आस्था के अलावा परिवार या दोस्तों के साथ क्वालिटी टाइम बिताना चाहते हैं तो भी यह बेस्ट डेस्टिनेशन है। अगर आप इस  सरोवर को पूरा और अच्छे से घूमना चाहते हैं तो उसके लिए आपको थोड़े

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Jim Corbett National Park – The First Tiger Reserve of India

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Jim Corbett National Park Ramnagar- जंगल सफारी और प्रकृति प्रेमियों के लिए बेस्ट डेस्टिनेशन by Pardeep Kumar वन्य जीव प्रेमियों के लिए स्वर्ग समझा जाने वाला और देश का सबसे पुराना राष्ट्रीय उद्यान जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क उत्तराखंड के रामनगर में स्थित है। जहाँ दिल्ली से आप आराम से पांच से छह घंटे का सफर तय करके पहुंच सकते हैं। थोड़ा अतिरिक्त  समय लगता भी है तो सिर्फ मुरादाबाद से काशीपुर तक जहाँ सड़क थोड़ी जर्जर हालत में है। इसके अलावा पूरा रास्ता दिल्ली-लखनऊ हाईवे-24 ही है। हम सुबह तकरीबन 5 बजे दिल्ली से निकले थे और ग्यारह-साढ़े ग्यारह तक रामनगर पहुंच गए थे। रास्ते में गढ़ मुक्तेश्वर से थोड़ा आगे निकल कर आपको कुछ बेहतरीन ढाबे और मेक्डोनाल्ड, बर्गर किंग, बीकानेरवाला, केएफसी और स्टारबक्स आदि  मिल जायेंगे जहाँ रूक कर आप ब्रेकफास्ट लंच या चाय वगैरह ले सकते हैं। Jim Corbett National Park होटल और रिज़ॉर्ट ठहरने के लिए आपको रामनगर में बहुत-सी जगह मिल जाएँगी। कॉर्बेट पार्क के आसपास बहुत सारे होटल और रिज़ॉर्ट बजट के अनुसार पर्यटकों के लिए उपलब्ध हैं। लेकिन मैं राय दूंगा अगर आप प्रकृति प्रेमी हैं और दो-तीन दिन दुनिया के शोर शराबे से दूर बेहद इत्मीनान से बिताना चाहते हैं तो आप कोई अच्छा-सा रिवर व्यू रिज़ॉर्ट पहले से बुक कर लें। जहाँ आप बहुत सारे एडवेंचर्स के बाद भी कम्फर्ट महसूस करेंगे।  इसके अलावा जंगल में भी रात्रि ठहराव के लिए रेस्ट हाउस बनाये गए हैं जिनकी ऑनलाइन बुकिंग आपको काफी पहले से करनी पड़ती है। इसके लिए और अधिक जानकारी के लिए आप उत्तराखंड टूरिज्म की वेबसाइट पर सर्च कर सकते हैं। नेशनल पार्क का इतिहास और नामकरण आपकी जानकारी के लिए बता दूं 1936 में ब्रिटिश शासन के दौरान संयुक्त प्रांत के गवर्नर मैल्कम हेली के नाम पर इस पार्क का नाम हेली नेशनल पार्क रखा गया था। देश के आज़ाद होने के बाद इस पार्क का नाम बदलकर रामगंगा नेशनल पार्क रख दिया गया। सके बाद 1957 में एक बार फिर इस पार्क का नाम जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क कर दिया गया था। जिम कॉर्बेट एक प्रसिद्ध ब्रिटिश शिकारी, प्रकृतिवादी और फोटोग्राफर था। बताते हैं जिम कॉर्बेट ने उस बाघ का शिकार किया था जिसने कथित तौर पर बेहरमी से 400 लोगों की जान ले ली थी। साल 1907 से 1929 के वर्षों के दौरान कार्बेट ने अनेक नरभक्षियों को मारा जिनसे स्थानीय निवासी बेहद ख़ौफ़ज़दा थे। कार्बेट भारत से बहुत प्यार करते थे और उन्होंने इस पर काफी किताबें भी लिखी। कार्बेट ने यहीं पर रहकर मानवाधिकारों के लिए भी आवाज़ उठाई और संरक्षित जीवों के लिए आंदोलन आरम्भ किया। कार्बेट ने अपने करियर के आखिरी दौर में नैनीताल जिले के कालाढूंगी में रहना शुरू किया, यहाँ छोटी हल्द्वानी गांव से उन्हें वन्य जीवों की समझ हुई जिसे अब पर्यटन गांव के रूप में बनाया गया है। यहाँ कार्बेट की छवि ब्रिटिश शोषकों की बजाय स्थानीय निवासियों के हितैषी, मानवीय मूल्यों से ओतप्रोत और प्रकृतिविद के रुप में स्थापित है। बताते हैं जब वो देश छोड़ कर गए तब उन्होंने अपनी सैंकड़ों एकड़ जमीन छोटे हल्द्वानी के ग्रामीणों को दान स्वरुप दे दी थी। प्रकृति प्रेमियों के लिए जन्नत दरअसल यह कॉर्बेट पार्क उन सभी लोगों के लिए जन्नत है जो प्रकृति की गोद में थोड़ा क्वालिटी टाइम बिताना चाहते हैं। इस पार्क में बंगाल टाइगर, तेंदुए, हाथी, जंगली सुअर, बारहसिंगा, हिरण और मगरमच्छ जैसे अनेक जानवर हैं। हमनें एक सप्ताह पहले ही थोड़ा रिसर्च करके एक अच्छा-सा रिज़ॉर्ट बुक कर लिया था, इसलिए रिज़ॉर्ट पहुँचते ही सबसे पहले तरो ताज़ा हुए, चाय पी, उसके बाद थोड़ा आराम किया। मुख्य सेंटर पॉइंट- जंगल सफारी क्योंकि जंगल सफारी के लिए जीप पहले से ही बुक थी और उसे दो बजे के करीब रिज़ॉर्ट से हमें पिक करना था इसलिए हमनें डेढ़ बजे के करीब लंच कर लिया था और हम तैयार थे जंगल सफारी के लिए। मेरे लिए यह जंगल सफारी का पहला अवसर था इसलिए रोमांच का चर्म पर होना स्वाभाविक था। तय समय पर हमें जिप्सी के ड्राइवर वसीम ने रिज़ॉर्ट से पिक किया और हम बढ़ चले ढेला जोन की तरफ जो हमारे रिज़ॉर्ट से लगभग 16 किलोमीटर दूर था। एक बात का ध्यान रहे कि जिम कॉर्बेट में सिर्फ जिप्सी सफारी ही वो मुख्य सेंटर पॉइंट है जो आपकी पूरी यात्रा को हमेशा के लिए यादगार बना सकता है। इसलिए अगर कॉर्बेट पार्क जा रहे हैं तो जिप्सी सफारी भूल कर भी मिस न करें। वैसे इन दिनों एक जिप्सी का किराया 4200 रुपए है जिसमें से  700 रुपए गाइड के होते हैं। हर जिप्सी में प्रशासन के आदेशानुसार एक गाइड का होना जरूरी है। आप ये जिप्सी सफारी ऑनलाइन बुक करवा सकते हैं या फिर आप जो भी होटल या रिज़ॉर्ट बुक करें वो भी आपके लिए जिप्सी सफारी बुक कर देंगे। हाँ, किराया जरूर थोड़ा ऊपर नीचे हो सकता है। बस ध्यान रखिये कि मध्य जून से सितम्बर  के बीच कॉर्बेट भ्रमण की योजना न बनायें तो बेहतर होगा, क्योंकि बरसात में  पर्यटकों के लिए यह बन्द रहता है। यह कॉर्बेट पार्क जंगल सफारी के लिए एक दिन में दो बार खुलता है। सुबह 6 बजे से लेकर 11 बजे तक और दोपहर में 2.30 से लेकर 5.30 बजे तक। हालाँकि मौसम के अनुसार समय में बदलाव होता रहता है। यह नेशनल पार्क जंगल सफारी के लिए पांच जोन में बांटा गया है – ढिकाला, झिरना, ढेला, बिजरानी और दुर्गा देवी। अभी कोरोना गाइड लाइन के कारण ढेला और झिरना ज़ोन ही खुले थे। बाकि 15 नवंबर के आसपास खुलते हैं ऐसा हमें हमारे जंगल सफारी के गाइड महेंद्र प्रताप ने बताया। लेकिन फिर भी सुंदरता में आपको हर ज़ोन में लैंडस्केप और वाइल्ड लाइफ के अद्भुत दृश्य दिखाई देंगे। तकरीबन ढाई बजे के करीब हमने गेट पर सभी औपचारिकता पूरी करके ढेला ज़ोन में एंट्री की। मैं पहली बार किसी जंगल सफारी का अनुभव कर रहा था इसलिए रोमांच सातवें आसमान पर था साथ ही एक अजनबी सा डर भी। प्राकृतिक ख़ूबसूरती यहाँ एक बात और आपसे शेयर करना जरूरी है वो ये कि जब भी आप कॉर्बेट पार्क  घूमने की योजना बनायें तो टाइगर देखने की लालसा या इच्छा

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Best Places to Visit in Mount Abu

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Mount Abu- राजस्थान का एक मात्र हिल स्टेशन Five Colors of Travel जब भी हमारे जेहन में राजस्‍थान का नाम आता है तो स्वतः ही दूर-दूर तक फैले रेत के धोरे, तेज गर्म हवाएं, कीकर के झाड़, भव्य हवेलियां या गर्वीले इतिहास की विरासत को अपने अंदर संजोए  रजवाड़ों के किले और महल तैरने लगते हैं या फिर राजपूताना शान के प्रतीक अनेक रंगों को अपनी पहचान बनाए यहाँ के शहर लेकिन अलग-अलग रंगों को अपने में संजोए इस राजस्‍थान का एक खूबसूरत रंग ऐसा भी है जिसकी पहचान एक शानदार हिल स्टेशन के तौर पर दुनिया भर में है और वो है माउंट आबू। यह खूबसूरत जगह किसी जमाने में राजस्थान की जबरदस्त गरमी से बदहाल राजघरानों के शाही लोगो का ‘समर-रिज़ॉर्ट’ हुआ करता था। (Mount Abu) धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक केंद्र के रूप में क्योंकि इस शहर के साथ अनेक धार्मिक और सामाजिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं इसलिए भी माउंट आबू धार्मिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक केंद्र के रूप में भी अच्छा खासा प्रसिद्ध है। यहां की चटटानों एवं जंगलों में ऋषियों, मुनियों और साधकों की आज भी अनेकों गुफाएं आसानी से देखने को मिल जाती हैं जो प्राचीन भारतीय संस्कृति और अध्यात्म की याद को तरोताजा कर देती हैं। बेइंतहा तेजी से भागती-दौड़ती जिन्दगी में सुकून के पलों की तलाश करते आदमी को सच्चे सुख और अदद शान्ति का अहसास कराने में सक्षम है राजस्थान के कश्मीर के रूप में प्रसिद्ध- माउंट आबू। कैसे पहुंचे माउन्ट आबू आप यहाँ सड़क मार्ग के अलावा रेल मार्ग से भी यहाँ आसानी से पहुँच सकते हैं। माउन्ट आबू के पास में आबू रोड रेलवे स्टेशन है जो लगभग सभी बड़े शहरों से कनेक्ट है। हवाई मार्ग द्वारा माउंट आबू पहुँचने के लिए आप उदयपुर की उड़ान ले सकते हैं जो माउंट आबू का निकटतम हवाई अड्डा है। उदयपुर हवाई अड्डा इस शहर से लगभग 185 किमी. की दूरी पर स्थित है। मेरी ये दूसरी माउन्ट आबू यात्रा थी। हम देर रात यहाँ पहुंचे थे, होटल पहले से बुक था। आबू रोड से माउंट आबू तक पहुँचने के लिए लगभग 30 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है। अरावली शृंखला के सर्पीले रास्तों से गुजरते हुए जब आप चढ़ाई चढ़ते हैं तब थोड़ी थकान लाज़िमी है, लेकिन ऐसी यात्रायें रोमांचक भी होती हैं अगर वो दिन में हो। रात का सफर अक्सर थका देता है, सो होटल पहुंचे, डिनर किया और बिस्तर पर लेटते ही कब नींद आ गई पता ही नहीं चला।  अगले दिन सुबह नाश्ता किया और निकल पड़े माउंट आबू की हृदयस्थली नक्की झील की और। माउंट आबू बाजार और गुजराती टच चारों और पहाड़ों से घिरी इस झील की ख़ूबसूरती ही यही है कि यहां आने वाले पर्यटक झील में बोटिंग किए बिना वापसी का रूख नहीं करते। झील के पास स्थित बाजार में आपको  गुजराती संस्कृति का ज्यादा बोलबाला दिखाई देगा वजह शायद यही कि यह जगह बिलकुल गुजरात की सीमा से सटी हुई है। आपको यहाँ के खाने में मीठेपन के साथ ही गुजराती टच का अहसास हो जायेगा। इस बाजार में  हस्तकला निर्मित सामग्री जैसे- वस्त्र, चादरें, पर्स, गहने, चप्पलें, खिलौने आदि मिलते हैं। माउंट आबू का हार्ट – नक्की झील नक्की झील के बारे में हिन्दू पौराणिक मान्यता है कि इसे देवताओं द्वारा राक्षसों से बचाने के लिए अपने नाखूनों से खोदा गया था। पहले इसे नख की झील ही कहा जाता था, बाद में इसका नाम  नक्की झील पड़ गया। नक्की झील में आपको बोटिंग के अलावा कुछ वाटर स्पोर्ट्स एक्टिविटीज भी दिखाई देंगी जहाँ आप अपनी पसंद के अनुसार उन एक्टिविटीज का आनंद ले सकते हैं। झील के किनारे पर एक खूबसूरत रेस्तरां बना हुआ है जहाँ आप चाय कॉफी के साथ प्राकृतिक नज़ारों से घिरी झील की ख़ूबसूरती का रसपान कर सकते हैं। यहाँ पैडल और शिकारा बोट दोनों ही उपलब्ध हैं। हमने पहले बोटिंग की और फिर इत्मीनान से खाया-पिया। जहाँ हम बैठे कॉफी पी रहे थे वहीं से सामने झील के किनारे भारत माता का भव्य मंदिर भी दिखाई दे रहा था। इस तरह के मंदिर आपको कुछ चुनिंदा जगहों पर ही मिलेंगे। (Mount Abu) जब आप पार्किंग से झील की तरफ जाते हैं तब रास्ते में आपको घुड़सवारी और ऊंट सवारी  का विकल्प भी मिलता है। आपको आसानी से बच्चे और कुछ न्यू  मैरिड कपल वहां सवारी करते और फोटोग्राफी करते दिख जायेंगे। यह झील नेचर लवर्स और फोटोग्राफी के शौकीनों के लिए एक बेहद पॉपुलर जगह है। हमने यहाँ फुरसत से अच्छा-खासा समय बिताया। दिलवाड़ा के प्रसिद्ध जैन मंदिर और फिर शेड्यूल के अनुसार निकल पड़े अगले पड़ाव दिलवाड़ा के प्रसिद्ध जैन मंदिर की और। अगर कहें कि दिलवाड़ा जैन मंदिर जैनियों के सबसे सुंदर तीर्थ स्थलों में से एक है तो बिलकुल भी गलत नहीं होगा। इस मंदिर का निर्माण 11वीं और 13वीं शताब्दी के बीच चालुक्य राजाओं वास्तुपाल और तेजपाल द्वारा किया गया था। यह मंदिर अपनी अद्भुत नक्काशी और  संगमरमर से सजे होने के लिए प्रसिद्ध है। बाहर से देखने पर भले ही यह मंदिर सामान्य दिखाई दे लेकिन जैसे ही आप मंदिर के अंदर प्रवेश करते हैं आप यहाँ की छत, मेहराबों, दीवारों और स्तंभों पर करीने से बनाये गए डिजाइनों को देखकर हैरत में पड़ जायेंगे। क्योंकि मंदिर के अंदर फोटोग्राफी मना है इसलिए बहुत से लोग इसकी सुंदरता से महरूम हैं। लेकिन फिर भी गूगल करने पर आपको दिलवाड़ा मन्दिर की बहुत सारी फ़ोटोज़ मिल जाएँगी, जिसे देखकर आप इसकी अद्भुत नक्काशी और सुन्दरता का अंदाजा लगा सकते हैं। यहाँ की मूर्तियों पर पॉलिशिंग इतनी चमकदार है कि सैकड़ों वर्ष पुरानी होने के बाद भी बिलकुल नई-सी लगती है। यहाँ की सभी मूर्तियां संगमरमर की है और उन पर बेहद फाइन कारीगरी की गई है। बताते हैं ये मन्दिर बनाने में लगभग 1500 शिल्पकार और 1200 श्रमिकों की कड़ी मेहनत लगी है। अपनी महीन नक्काशी और बनावट के लिए दुनिया भर में फेमस दिलवाड़ा मन्दिर बनने में 14 साल लगे और करीब 18 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। जैन मंदिर जैन भक्तों के लिए सुबह 6 बजे से शाम 6 बजे तक खुला रहता है और अन्य धर्म के लोगो के लिए यह दोपहर 12 से शाम 6 बजे तक

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Bangla Sahib Gurudwara Delhi

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गुरुद्वारा बंगला साहिब- दिल्ली का गोल्डन टेम्पल Five Colors of Travel दिल्ली के केंद्र में बसे कनॉट प्लेस में स्थित बंगला साहिब गुरुद्वारा यूँ तो कई मायनों में खास है। पर इसकी सबसे बड़ी खासियत है इसका उदार स्वभाव। जी हां, करीब साढ़े तीन सौ साल पुराना ये गुरुद्वारा सभी धर्मों के लोगों का खुले दिल और गर्मजोशी से स्वागत सत्कार करता है। इसका परिसर 24 घण्टे मुसाफिरों के लिए किसी घर की तरह खुला रहता है। संगमरमर ओर सोने के गुबंद से बनी गुरुद्वारे की अनोखी शैली, 24 घण्टे सेवा देने वाली भव्य रसोई, पवित्र जलाशय ये सब मिलकर इस गुरुद्वारे को और भी खास बनाते हैं। Gurudwara Bangla Sahib बंगला साहिब गुरुद्वारा परिसर गुरुद्वारे के परिसर में जाते ही सीढ़ियों के नीचे बनी नलियों से निकलता पानी खुद ही पैरों को साफ करने की क्षमता रखता है। सीढ़ियों पर चढ़ते हुए सामने अरदास स्थल है। शर्त बस इतनी है अंदर प्रवेश करने के बाद आपका सर ढका होना चाहिए वरना जगह-जगह खड़े सेवादारों की डांट आपको इत्मीनान से झेलनी पड़ सकती है। अरदास स्थल की भव्यता और शांति मोहित कर देने वाली है। सामने गुरु ग्रन्थ साहिब और उसके ऊपर लगा बड़ा-सा शाही झूमर अलौकिक अनुभव देता है और लगता है वाकई ये स्थल एक वक्त पर किसी राजा का महल रहा होगा। गुरु ग्रन्थ साहिब की परिक्रमा करते ही पिछले दरवाजे से हम बाहर निकले। एक तरफ कुंड का पवित्र जल दर्शनार्थियों को दिया जा रहा था तो दूसरी तरफ घी से बना हलवे का प्रसाद। सामने ही सुंदर जल कुंड है जो किसी भी श्रद्धालु को अपनी तरफ आने का आमन्त्रण देता है। तालाब के अंदर रंग-बिरंगी मछलियां इस तालाब की सुंदरता में चार चांद लगा देती हैं और हां, खास बात ये यहां तस्वीरें खींचना सख्त मना है। अगर आप यहाँ गलती से तस्वीर लेते मिल गए तो सेवादारों के गुस्से का शिकार हो सकते हैं और मोबाइल छीनने का भी खतरा हो सकता है, तो सावधान रहिएगा। 24 घंटे लंगर सेवा परिसर में आगे बढ़ने पर लंगर सेवा दिखी। इस लंगर के निस्वार्थ भाव से आसपास के सैंकड़ों-हज़ारों जरूरतमन्दों का पेट पलता है। श्रद्धालु भले ही इसे गुरु का प्रसाद समझते हों पर गरीब बेसहारा लोगों के लिए ये पोष्टिक भोजन किसी वरदान से कम नहीं। दाल और रोटी के इस लंगर में ज़ायक़ा उतना ही है जितना किसी मां के हाथ में होता है। आश्चर्य की बात तो ये है कि ये लंगर सेवा 24 घण्टे चलती है और तो और इसे बनाने के लिए किसी खास रसोइए को नहीं रखा गया है बल्कि सेवा भाव रखने वाले लोग खुद से पूरा भोजन तैयार करते हैं और परोसते भी हैं। यहाँ की सबसे खास बात यही कि किसी काम के लिए कोई किसी को आदेश नहीं देता बल्कि सब अपने इच्छा भाव से काम करते हैं। यही तो इस गुरुद्वारे को और भी अनोखा बनाता है। इस तरह का मैनेजमेंट बिना किसी नियंत्रण के, ये देखना हमारे लिए भी आश्चर्य से कम नहीं था। Gurudwara Bangla Sahib बंगला साहिब का इतिहास बंगला साहिब का इतिहास इसे और भी समृद्ध बनाता है। ऐसे तो दिल्ली में कई जाने पहचाने नामी गुरुद्वारे हैं लेकिन इनमें से सबसे खास है सिखों के आठवें गुरु श्री गुरु हरिकृष्ण जी से सम्बंधित ये स्थल। आज सिखों में बेहद पवित्र माने जाने वाला ये गुरुद्वारा बंगला साहिब 1664 के दौर में मिर्जा राजा जय सिंह का बंगला हुआ करता था। बात उन दिनों की है जब दिल्ली शहर में हैजा और चेचक की महामारी फैली हुई थी। तब गुरु साहिब ने यहां आकर हजारों लोगों की सेवा-सत्कार किया था। ऐसा माना जाता है कुंड के जल में अपने चरण डाल कर गुरु हरिकृष्ण ने जल को आरोग्य बनाया जिसके बाद इस जल को पीकर लोग रोगमुक्त होने लगे। मान्यता है कि गुरु साहिब ने ही यहां इस प्याऊ की शुरुआत की थी, जिसका जल आज लोग विदेशों तक ले जाते हैं। गुरुद्वारे के दूसरे छोर पर हमें एक म्यूजियम दिखा जो फिलहाल बन रहा है। कुछ समय बाद सिख धर्म को प्रदर्शित करने वाला ये म्यूजियम आम जनता के लिए भी खुल जाएगा। कहा जाता है यदि आप अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर को नहीं देख पाए तो इस गुरुद्वारे को देख लीजिए ये स्वर्ण मंदिर की एक छवि माना जाता है। इसे दिल्ली का गोल्डन टेम्पल भी कहा जाता है। इसके प्याज जैसे आकार के सोने के गुबंद और संगमरमर का परिसर आँखों को अपनी ओर खींच ही लेता है। दिल्ली में रह कर इस जगह नहीं आये तो क्या ही दिल्ली में रहना। बंगला साहिब गुरुद्वारा सिर्फ एक गुरुद्वारा नहीं बल्कि दिल्ली का एक प्रमुख टूरिस्ट स्पॉट भी है। सेन्ट्रल दिल्ली का ये मशहूर गुरुद्वारा काफी बड़े एरिये में फैला हुआ है। यहां आने के लिए राजीव चौक मेट्रो सबसे पास पड़ेगा। मेट्रो से रिक्शा लेकर आसानी से बंगला साहिब गुरुद्वारे तक पहुंचा जा सकता है। इस गुरुद्वारे की सुंदर बनावट आपको दूर से ही नजर आने लगेगी। लेकिन जब भी यहाँ यहां आएं तो लंगर का लुत्फ़ जरूर उठाएं। Research by Nikki Rai Edited by Pardeep Kumar

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BEST Places to Visit in Kurukshetra

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Kurukshetra: नवंबर के महीने में गीता जयंती उत्सव का लुत्फ़ उठाते हुए घूमिए कुरुक्षेत्र की ये खास जगह Five Colors Of Travel अधिकांश भारत में सर्दियों की शुरुआत नवंबर महीने से होती है। यह महीना देश भर में फेस्टिवल सीजन का महीना भी होता है। यात्रा के लिहाज से देश भर में मौसम और उत्सव नवंबर को आदर्श बनाते हैं, खासकर उन जगहों पर जहां विशेष पर्व, उत्सव और त्यौहार होते हैं, आप सच में उन रंगों, प्रेम और आनंद से भर जाते हैं। ऐसी ही एक जगह है जहाँ आस्था और श्रद्धा दोनों ही आपको बेशुमार मिलेगी, जी हाँ, हम बात कर रहे हैं पावन धरती कुरुक्षेत्र की। जहाँ नवंबर महीने में धूमधाम से अंतर्राष्ट्रीय गीता जयंती उत्सव मनाया जाता है। तो आइये इस ऐतिहासिक शहर की कुछ खूबसूरत जगहों का अवलोकन करते हैं, शायद आपका मन कर जाए वहां जाने का। हम इस ब्लॉग में आपको कुरुक्षेत्र की कुछ बेहद खास जगह  के बारे में बता रहे हैं। कुरुक्षेत्र जा रहे हैं तो इन जगहों पर घूमना मत भूलना । ब्रह्म सरोवर का हमने विस्तारपूर्वक वर्णन पिछले ब्लॉग में किया था। नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके आप इसे पढ़ सकते हैं। ब्रह्मसरोवर घूमने के बाद स्टेशन की ओर जब आप जाते हैं तो रास्ते में आपको छठी पातशाही गुरुद्वारा, सन्नहित सरोवर, श्री कृष्ण संग्रहालय, पैनोरमा विज्ञान केंद्र, यह सभी स्थान लगभग कुछ ही कदम की दूरी पर आपको मिल जाएंगे। सन्नहित सरोवर ब्रह्मसरोवर से 500 मीटर की दूरी पर  सन्नहित  सरोवर स्थित है। मात्र 5 मिनट पैदल चलने पर आसानी से सन्नहित सरोवर पहुंच जायेंगे। हालांकि ब्रह्मसरोवर और इस सरोवर में फर्क सिर्फ विशालता का है। जहां ब्रह्मसरोवर विशालता के लिए जाना जाता है। वही सन्नहित सरोवर अपनी सुंदरता के लिए जाना जाता है। सरोवर के मुख्य द्वार पर सामने की तरफ आपको छठी पातशाही गुरुद्वारा भी दिख जाएगा। हमारे प्राचीन ग्रंथों में इस सरोवर का अपना महत्वपूर्ण स्थान है। सरोवर की गणना कुरुक्षेत्र के सबसे प्राचीन सरोवरों में की जाती है। इस सरोवर को ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव का निवास स्थान भी कहा गया है। श्रीमद भगवत पुराण के अनुसार पूर्ण सूर्य ग्रहण के दिन श्री कृष्ण अपने सगे संबंधियों के साथ  इस सरोवर में स्नान करने आए थे। साथ ही महाभारत के युद्ध के बाद पांडव यहीं पर पिंडदान करने के लिए आए थे। सरोवर के तट पर सूर्य नारायण, लक्ष्मी नारायण, धुर्व नारायण के मंदिर स्थित हैं। सिख गुरु भी अपने समय पर यहां स्नान करने आए थे। अमावस्या के दिन और सूर्य ग्रहण के दिन यहां पर हजारों की संख्या में लोग स्नान करने के लिए आते हैं। छठी पातशाही गुरुद्वारा सन्नहित सरोवर के ठीक सामने छठी पातशाही गुरुद्वारा दिखाई देता है। सरोवर के मुख्य द्वार से 10 कदम की दूरी पर यह गुरुद्वारा स्थित है। सिख धर्म के अनुसार सिखों के पहले गुरु श्री गुरु नानक देव जी अमावस वाले दिन कुरुक्षेत्र पधारे थे और सन्नहित सरोवर के सामने डेरा लगाया था। इस दौरान गुरु नानक देव जी ने हिंदुओं के प्रसिद्ध नियम जिसमे सूर्य ग्रहण के समय आग नहीं जलाने का नियम होता है, उस नियम को तोड़ते हुए गुरु का लंगर चालू किया। यहां पर सिखों के लगभग अधिकतर गुरु समय-समय पर आते जाते रहे हैं। गुरु श्री हरगोबिंद सिंह जी यहां पर दो बार पधारे थे। Kurukshetra गुरुद्वारे के अंदर मुंह हाथ धोने के बाद सर पर कपड़ा बांधे प्रवेश किया, आपकी जानकारी के लिए बता दूँ  कि किसी भी गुरुद्वारे में बिना सर पर कपड़ा बांधे प्रवेश की  इजाजत नहीं मिलती है। सबसे पहले नजर सामने सरोवर पर पड़ी, सरोवर बिलकुल साफ सुथरा था, आसपास किसी भी तरह की गंदगी नहीं थी। फिलहाल गुरुद्वारे का मरम्मत का कार्य चल रहा है, मगर दर्शन करने के लिए कोई मनाही नहीं। श्री कृष्ण संग्रहालय और पैनोरमा विज्ञान केंद्र गुरुद्वारे से निकलने के मात्र कुछ कदम की दूरी पर ही आपको पैनोरमा विज्ञान केंद्र और श्री कृष्ण संग्रहालय दिख जाएगा। आप पैदल ही वहां पर आसानी से पहुंच सकते हैं। कुरुक्षेत्र में पैनोरमा और विज्ञान केंद्र की एक सुंदर बेलनाकार इमारत है, कुरुक्षेत्र पैनोरमा और विज्ञान केंद्र  दोनों में ही ग्राउंड फ्लोर और पहली मंजिल पर बेलनाकार दीवारों के साथ दो अलग-अलग प्रकार के एक्ज़ीबिशन देखने को मिलेंगी। पैनोरमा में बहुत सी  वैज्ञानिक वस्तुओं को भी प्रदर्शित किया गया है। ग्राउंड फ्लोर पर लगी एक्ज़ीबिशन में  परमाणु संरचना, ज्यामिति, खगोल विज्ञान और सर्जरी की प्राचीन भारतीय अवधारणा पर अंकगणितीय नियम, काम और इंटरैक्टिव शामिल हैं। यहाँ आपको अधिकतर युवा खासकर स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थी दिखाई देंगे। बाकि यहाँ सभी आयु वर्ग के लोग आते हैं। पैनोरमा के साथ ही एक और सुंदर  इमारत श्री कृष्ण संग्रहालय स्थित है, यहाँ प्रवेश करते ही आपको अपने सुरुचिपूर्ण वास्तुकला और वातावरण के साथ, केंद्र का मुख्य आकर्षण कुरुक्षेत्र के महाकाव्य युद्ध का सजीव चित्रण दिखाई देगा। यहाँ आपको पूरी महाभारत एक ही जगह दिखाई देगी।  जिसका साउंड सच में अद्भुत है और सच में पांडवों और कौरवों के बीच महाभारत का टकराव उनकी आंखों के सामने जीवित हो जाता है। Research by Pravesh Chauhan Edited by Pardeep Kumar Click the link and  You Can Join Our YouTube Channel Like and Subscribe

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Khari Baoli Market: Asia’s Largest Spice Market

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Khari Baoli: एशिया की सबसे बड़ी मसाला मार्किट जब भी किसी बाजार का नाम आता है तो स्वतः ही कपड़े और खानपान हमारे ज़ेहन में घूम जाते हैं। आमतौर पर जब भी हम चाँदनी चौक का नाम सुनते हैं तब हमें वहाँ बिकने वाले शानदार मैरिड क्लॉथ खासकर सूट और शानदार लहंगों की याद आती है, पर चाँदनी चौक में एक ऐसा बाज़ार भी है जहाँ वस्त्र, ज्वेलरी और चप्पल-जूतों से कुछ अलग मिलता है। जी हाँ, चाँदनी चौक के बीचों बीच बनी है खारी बावली जो एशिया की सबसे बड़ी मसाला मार्किट है। (Khari Baoli: Asia’s Largest Spice Market) चावड़ी बाज़ार मेट्रो स्टेशन से खारी बावली सबसे पास पड़ती है, अब ये आप पर निर्भर करता है कि आप बाज़ार तक पैदल जाना चाहे या ई रिक्शा से। फतेहपुरी मज्सिद से सीधे हाथ पर खारी बावली की शुरुवात हो जाती है। आगे बढ़ते ही आपको खुद-ब-खुद महसूस हो जाएगा कि आप खारी बावली में कदम रख चुके हैं क्योंकि चारों ओर से आ रही मसालों की खुशबू सब बयान कर देती है। ये है खारी बावली का इतिहास खारी बावली को 1650 में मुगल सम्राट शाहजहाँ की पत्नी फतहपुरी बेगम ने बनवाया था। खारी बावली शब्द सुनने में जितना दिलचस्प लगता है उतना ही उम्दा ये बाज़ार हकीकत में भी है। खारी का अर्थ नमकीन है वहीं बावली से मतलब सीढ़ीनुमा कुआँ से है। यहाँ बनी बावड़ियों का प्रयोग जानवरों के स्नान के प्रयोग में लाया जाता था। समय और विकास के साथ बावड़िया कहीं गायब हो गयीं हैं अब उस जगह इतिहास समेटे खारी बावली मौजूद है। आपकी रसोई में प्रयोग होने वाला दुर्लभ से दुर्लभ मसाला और ड्राई फ्रूट आपको खारी बावली में चुटकीयों में उपलब्ध हो जाएगा। हर प्रकार का ड्राई फ्रूट जैसे-फ्रूटबादाम, किशमिश मखाना, काजू, अखरोट, अंजीर, केसर, पिस्ता, खजूर, मूंगफली और न जाने कितने प्रकार के सूखे मेवे खारी बावली में आँख मूँद कर मिल जाते हैं। आपके ज़ेहन में ये सवाल जरूर आएगा कि ड्राई फ्रूट खरीदने के लिए खारी बावली जाने की जरूरत क्या है, वह तो कहीं से भी ले सकते हैं? पर आपको बता दें खारी बावली में आपको असली और बढ़िया गुणवत्ता का मेवा मिलेगा। कहीं और मेवा आसानी से उपलब्ध तो हो सकता है लेकिन खारी बावली का मेवा सबसे उम्दा और विश्वसनीय माना जाता है। इसके अलावा खारी बावली मसालों को लेकर भी बहुत प्रसिद्ध है। हल्दी, धनिया पाउडर, काली-लाल मिर्च, जीरा, काला जीरा अमचूर पाउडर, हींग, जायफल और हर वह नायाब और दुर्लभ मसाला जिसका प्रयोग रसोई में किया जाता है वह खारी बावली में उत्तम गुणवत्ता के साथ मिल जाएगा। आप यहाँ अपने बालों को चमकदार बनाने के लिए रीठा और अन्य प्रकार की जड़ी बूटीयाँ आदि भी खरीद सकते हैं। 400 साल पुरानी है दुकानें पूरी खारी बावली मार्किट में आपको दुकानों के नाम भी बेहद दिलचस्प मिलेंगे। यहाँ स्थित कुछ दुकानों के नाम आज भी, चावल वाले 13, 21 नंबर की दुकान, 15 नंबर की दुकान आदि है। इस ऐतिहासिक और पुराने बाज़ार को लगभग 400 वर्ष हो चुके हैं इसलिए यहाँ अधिकतर दुकानें खानदानी हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी यूँ ही चली आ रही है। दिल्ली के आसपास और दूरवर्ती इलाकों से शायद ही कोई किराने की दुकान वाला हो जो खारी बावली से सामान न खरीदता हो। देश की विभिन्न उत्पादक मंडियों जैसे निजामाबाद से हल्दी, कोटा से धनिया, ऊंझा से जीरा, गुंटूर से लाल मिर्च, कोच्चि या मंगलूर से इलायची खारी बावली में उपलब्ध होती है। यहाँ न सिर्फ देशी बल्कि अमेरिका, अफगानिस्तान जैसे देशों का भी ड्राई फ्रूट आसानी से मिल जाता है। दिन का चाहे कोई भी समय हो यहाँ आपको हर वक़्त लोगो की भीड़ आसानी से मिल जाएगी। दीपावली जैसे त्यौहार के समय तो आप को यहाँ पैर रखने की भी जगह नहीं मिलेगी। फेस्टिवल के समय यहाँ तरह-तरह ड्राई फ्रूट की भारी डिमांड होती है। आपको अपनी आँखों के सामने जितना बाज़ार दिखेगा वह असल में यह बाज़ार उससे कही ज़्यादा बड़ा है। यहीं दुकानों के ऊपर अलग-अलग मसालों और मेवे के गोदाम भी  बने हुए हैं। हर बाज़ार की अपनी अलग विशेषता होती है ठीक उसी प्रकार खारी बावली की विशेषता यहाँ मिलने वाले ख़ास मसालें और मेवे हैं। इसलिए जब भी उम्दा और कुछ खास मेवे और मसालों की इच्छा हो तो पुरानी दिल्ली में खारी बावली एक बेहतरीन विकल्प है। Five Colors of Travel

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Fatehpuri Masjid, Chandni Chowk, Delhi

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Fatehpuri Masjid – दिल्ली की एक ऐसी मस्जिद जिसे कभी अंग्रेजों ने नीलाम कर दिया था यूँ तो हमारे देश की पुरानी इमारतों और धरोहरों की अनगिनत खासियत हैं लेकिन एक चीज जो उन्हें बाकी सबसे अलग करती है वो है इनकी वास्तुकला।  कितने शासक आये और कितने गए लेकिन कुछ नहीं गया तो वो है यहाँ की इमारतों की अनूठी वास्तुकला  बनावट।  आज आपको हम इस ब्लॉग में ऐसी एक इमारत की वास्तुकला के दर्शन कराएंगे, जिसका नाम है फतेहपुरी मस्जिद। यह मस्जिद भले ही देश की अन्य जानी-पहचानी  और बड़ी मस्जिदों की तरह लाइम लाइट में न हो पर वक़्त के थपेड़े और बहुत से उतार-चढाव से गुजरी चाँदनी चौक की रौनक बढ़ाती फतेहपुरी मस्जिद  अपने आप में लाजवाब निर्माण कला की मिसाल है। सड़क के एक छोर पर बना है लाल किला और पश्चिम छोर पर फतेहपुरी मस्जिद। भीड़भाड़ वाली सड़कें पार करके जैसे ही आप फतेहपुरी मस्जिद के सामने पहुंचेंगे आपको ऐसा आभास होगा मानो सारी भागमदौड़ और शोर कहीं पीछे छूट गया हो।  380 साल पुरानी मस्जिद अपने अंदर न जाने कितने शासकों का इतिहास समेटे  हुए है जो इसे और भी अधिक दर्शनीय बनाता है। ये है फ़तेहपुरी मस्जिद का इतिहास चाँदनी चौक मेट्रो स्टेशन से 2 किलोमीटर दूर बनी फतेहपुरी मस्जिद का निर्माण 1650 में हुआ था। मस्जिद का निर्माण मुगल बादशाह की बेगम फतेहपुरी द्वारा करवाया गया था।  इसलिए मस्जिद का नाम फतेहपुरी मस्जिद पड़ा। आपको बता दें मस्जिद के पास ही एशिया का सबसे बड़े मसालों का बाजार- खारी बावली भी है। मस्जिद के इतिहास को लेकर विभिन्न कथाएँ हैं लेकिन माना जाता है कि 1857 में प्रथम भारतीय संग्राम के बाद अंग्रेजों ने मस्जिद को नीलाम कर दिया था।  उस समय राय लाला चुन्नामल ने मस्जिद को मात्र 11000 रुपय में खरीदा था।  जिनके वंशज आज भी चाँदनी चौक में चुन्नामल हवेली में रहते हैं।  1877 में लॉर्ड लिटन ने मस्जिद को वक्फ बोर्ड को सौंप दिया और यही बोर्ड आज तक मस्जिद संभाल रहा है। जानिए मस्जिद की बनावट की खासियत फतेहपुरी मस्जिद की खूबसूरती का मुख्य कारण है उसकी बनावट में इस्तेमाल लाल पत्थर। दिल्ली के लालकिला और जामा मस्जिद की तरह इसका निर्माण भी लाल पत्थरों से किया गया है। मस्जिद परंपरागत डिजाइन में है लेकिन इबादत हॉल की आकृति धनुषाकार है।  मस्जिद के बड़े  दरवाज़े से आप जैसे ही अंदर प्रवेश करेंगे विशाल परिसर आपका दिल जीत लेगा। परिसर के बीच इस्लामी विद्वानों की  20 से अधिक कब्र हैं।  हजरत नानू शाह, मुफ्ती मोहम्मद, मज़हर उल्लाह शाह, मौलाना मोहम्मद आदि की कब्र मस्जिद में मौजूद है। आपको बता दें मस्जिद में तीन विशाल दरवाजे हैं, जिसमें से 2 दरवाजे उत्तर में हैं और एक दक्षिण में।  आगे बढ़ते ही आपकी नजर सफेद संगमरमर से बने  एक पानी के कुंड पर जाएगी।  मस्जिद के दोनों तरफ लाल पत्थर से बने स्तंभों की कतारें हैं जो बिल्कुल बराबर संतुलन में बनी हुई हैं।  दो मंजिला मस्जिद में सात विशाल मेहराब बने हैं और यह दिल्ली की अकेली एकल गुंबददार मस्जिद है। इस्लाम धर्म के अनुयायी और लोग आज भी अपने दो प्रमुख त्योहारों ईद-उल-फितर और ईद-उल-जुहा ने बड़ी संख्या में फतेहपुरी मस्जिद पहुंचते हैं। मस्जिद में बैठे एक मौलवी ने बताया की मस्जिद की बहुत मान्यता है, जिन लोगों पर अल्लाह का मेहरबानी होती है वही इस मस्जिद में प्रवेश कर पाते हैं और जो प्रवेश करता है अल्लाह उसे सारे दुखों से दूर रखते हैं। लेकिन अगर मस्जिद के रख रखाव की और थोड़ा विशेष ध्यान दिया जाए तो यह और भी सुन्दर  दिखाई दे। लगभग 380 साल पुरानी धरोहर होने के बावजूद भी फतेहपुरी मस्जिद आज भी उतनी दमदार है जितनी अपनी शुरुवाती दौर में रही होगी। मस्जिद के अंदर हर दीवार पर उर्दू में अलग-अलग कलमें लिखें हुए हैं। और कुरान की करीब 100 प्रतियाँ रखी हुई हैं। मस्जिद तो पुरानी दिल्ली की शान दुगनी करती ही है लेकिन मस्जिद आये लोगों के लिए बोनस है मस्जिद के बाहर मिलने वाला बढ़िया समान और स्वादिष्ट भोजन। क्योंकि देश के सबसे पुराने और प्रसिद्ध बाज़ारों में से एक में यह मस्जिद स्थित है। निकटतम मेट्रो स्टेशन यहाँ आने के लिए निकटतम मेट्रो स्टेशन चांदनी चौक है। धर्म और मज़हब से ऊपर उठ कर अगर आप एक शानदार शांतचित और अपनी बनावट और वास्तुकला के लिए प्रसिद्ध ईमारत का दीदार करना चाहते हैं तो आपके  लिए फतेहपुरी मस्जिद परफेक्ट है। Research by Geetu Katyal Edited by Pardeep Kumar