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Humayun’s Tomb, Delhi

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Humayun’s Tomb- हुमायूँ का मकबरा : मुग़ल वास्तुकला का बेहतरीन नमूना मुगलों ने अपने शासन के दौरान मकबरों का निर्माण करते वक़्त शायद यही सोचा होगा की एक दिन वे दुनिया से चले जाएंगे, लेकिन उनके बनाए गए ये मकबरें उन्हें हमेशा जिंदा रखेंगे। क्योंकि मुगलों द्वारा बनाई हर विरासत बेहद भव्य और आकर्षक है और ऐसे ही एक उत्कृष्ट विरासत की बात आज हम अपनी इस यात्रा में करेंगे। बाबर के सबसे बड़े बेटे हुमायूँ को हम सभी ने इतिहास की पुस्तकों में पढ़ा है। लेकिन क्या आपने हुमायूँ का मकबरा देखा है? अगर अब आप ये सोच रहे हैं कि हुमायूँ का मकबरा भी इतिहास के अध्याय की तरह उबाऊ है तो आप गलत हैं, क्योंकि हुमायूँ का मकबरा भारत का पहला उद्यान-मकबरा है जो मुगल स्थापत्य के बेहतरीन उदहारणों में से एक है जिसे 1993 में यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज के रूप में घोषित किया गया था।(Humayun’s Tomb) दिलवालों की दिल्ली में 1565 ई. में बना हुमायूँ का मकबरा मथुरा रोड़ पर स्थित है। एक बात गौर करने वाली है कि हर हेरिटेज की तरह हुमायूँ का मकबरा किसी बादशाह द्वारा नहीं बल्कि हुमायूँ की बेगम रानी हमीदा बानो ने अपने शोहर की याद में बनवाया था। साथ ही आपको बता दें ताजमहल का निर्माण इसी मकबरे से प्रभावित होकर किया गया था।(Humayun Tomb) टिकट घर और यहाँ कैसे पहुंचे जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम मेट्रो स्टेशन से हुमायूँ का मकबरा लगभग 2 किलोमीटर दूर है. अब 2 किलोमीटर का रास्ता आपको 11 नंबर गाड़ी से पार करना है या ऑटो से, ये आप पर और आपकी जेब पर निर्भर करता है।  मकबरे में एंट्री के लिए भारतीय नागरिक की 35 रुपये  और विदेशी सैलानियों के लिए 550 रुपए की टिकट लगती है. टिकट खरीदने के लिए कैशलेस माध्यम अपनाना पड़ता है क्यूंकि नकद भुगतान का विकल्प फिलहाल कोरोना काल के कारण मौजूद नहीं है। टिकट लेते ही सफर शुरू हो जाता है, जिसमें मुसाफिर होते हैं हम, आप और हमारी दिलचस्पी।(Humayun’s Tomb) किस समय यहाँ आना सबसे बेहतर वैसे तो साल भर यहाँ पर्यटकों  का आना लगा रहता है लेकिन फिर भी अक्टूबर से मार्च का महीना यहाँ आने के लिए बेस्ट रहता है। सर्दियों में ऐतिहासिक इमारतों का दीदार मन को भाता है। ईसा खान का मकबरा To watch video of this blog, you can visit our YouTube channel- Five colors of travel – Like & Subscribe हुमायूँ के मकबरे तक पहुंचने की शुरुवात ईसा खान के मकबरें और मस्ज़िद के साथ होती है जो हुमायूँ के मकबरे से 20 साल पहले बनाया गया था। ईसा खान शेरशाह सूरी के दरबार में एक अफगान रईस था। यह मकबरा अष्टकोणीय मकबरा है जो अपनी आकर्षक वास्तुकला से किसी को भी अपना दीवाना बना सकता है।  इसमें लगी छतरियां, चमकदार टाइल्स और जालीदार जालियां इसकी खूबसूरती  को और अधिक  बढ़ाती हैं। ईसा खान के मकबरे के बाहर लगे एक सूचना बोर्ड को पढ़ने के बाद पता चला कि 20वी शताब्दी में यहां पूरा एक गांव आबाद था। वास्तुकला का बेहतरीन उदाहरण देखने के बाद अब हम आगे बढ़ें।  चारों तरफ बस हरियाली ही हरियाली पसरी हुई थी जो पूरी धरोहर को चार-चाँद लगा रही थी। बू हतीमा गेट ईसा खान के मकबरे के बाद आता है बू हतीमा गेट। यह विशाल दरवाजा बू हतीमा के मकबरे-बगीचे तक जाता है। रास्ते का अग्रभाग कत्तलदार है और टाइल कार्य के अवशेष अभी भी देखे जा सकते हैं। बगीचे की दीवार के दो उत्तरी बुर्ज़ गुम्बदी छतरियों से सुसज्जित हैं। 19वीं शताब्दी में बगीचे की पश्चिमी दीवार के कुछ हिस्से को तोड़कर प्रवेश द्वार बनाया गया था। अरब सराय दरवाज़ा बू हतीमा गेट पार करते ही दाएं हाथ पर अरब सराय दरवाज़ा दिखता है जो लगभग 14 मीटर बड़ा है। इस दरवाज़े को देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो हम इतिहास के पन्नो पर वापस लौट गए हों। यह दरवाज़ा हुमायूँ के मकबरे के निर्माण के लिए शिल्पकारों के अहाते की ओर जाता है। लाल पत्थर, सफ़ेद सांगमंरमर, झरोखें और चमक़दार टाइलों के अवशेष से बना ये दरवाज़ा पर्यटकों  को खूब आकर्षित करता है। थोड़ा आगे चलने पर एक और दरवाज़ा आता है।  जिसमें घुसते ही दोनों तरफ हुमायूँ के मकबरे से जुड़े इतिहास के बोर्ड और पुस्तकें देखने को मिलती है। इसी दरवाज़े से सामने देखने पर खूबसूरती के सारे पैमाने लांघता हुमायूँ का मकबरा दिखाई देता है। हुमायूँ का मकबरा यकीन मानिये, हुमायूँ का मकबरा तस्वीरों में जितना खूबसूरत लगता है वास्तव में उससे कही ज्यादा है। इतना की शायद ही कोई इसकी ख़ूबसूरती बखान कर पाए।  लाल और सफ़ेद सेंड स्टोन से बनी ये इमारत उतनी ही नायाब है जितना आगरा में बना ताजमहल।  मकबरे के सामने बने फव्वारे की ठंडक को महसूस करते हुए आप जैसे-जैसे आगे बढ़ेंगें, आपका मन इसकी सुंदरता के वश में कैद होता चला जाएगा।  इस दो मंजिला स्मारक की सीढ़ियां चढ़ते-चढ़ते आप महसूस करेंगे की मकबरा पहले से दुगना आकर्षक होता जा रहा है। आपकी जानकारी के लिए बता दूं फारसी और तुर्की स्थापत्य शैली के मिश्रण से बना हुआ ये मकबरा लगभग 27 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है। हुमायूँ के मकबरे को मुगलों का ‘शयनागार’ भी कहा जाता है। सच मानिए लाल और काले बलुआ पत्थर से बना ये मकबरा बहुत उम्दा विरासत है जिसे आप सभी को देखना चाहिए। आप इस मकबरे के सामने बने उद्यान में बैठकर अपनी थकान मिटाते हुए इसकी मोहकता का रसपान कर सकते हैं। मन ऐसा हो रहा था मानो इस अद्भुत विरासत को एक बार शुरू से दुबारा घूमूँ।लेकिन 3 घंटे होने में बस 5 मिनट ही बाकी थे जिसके कारण मुझे न चाहते हुए भी मकबरे को अलविदा कहना पड़ा। आपको बता दूं इन दिनों शायद कोरोना महामारी की वजह से एंट्री के बाद मकबरे में 3 घंटे तक ही रहने की अनुमति है। शायद मकबरें में ज्यादा भीड़ न हो इस वजह से। बाहर निकलते ही चटनी और भुट्टे की ख़ुश्बू आ रही थी। मैंने भुट्टा लिया और मकबरे को अलविदा कह अपने कदम बढ़ा दिए घर की तरफ। (Humayun’s Tomb) Written & Edited by Pardeep Kumar glimpse of Humayun Tomb…best monument of Mughals. The world heritage

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Lodhi Garden Delhi

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Lodhi Garden: लोधी गार्डन- मकबरों और बागों का स्वर्ग हम दिल्ली वालों के लिए बारिश किसी वरदान से कम नहीं है। खासतौर पर तब जब हद से ज्यादा गर्मी पड़ रही हो। जून हो या जुलाई, दिल्ली की झुलसा देने वाली गर्मी घर से बाहर निकलने नहीं देती। ऐसे में बारिश का सुहावना मौसम बन जाए तो फिर दिल्ली दर्शन की बात ही क्या। समझ लीजिए आनंद के सागर में डुबकी लगा ली। पिछले दो दिनों से लगातार हो रही बारिश अब थम चुकी थी। मौसम को देखते हुए योजना बनी लोधी गार्डन घूमने की।(Lodhi Garden) watch Vlog of Lodhi Garden. Like and subscribe अब आप सोचेंगे इसमें ऐसा क्या खास है तो बता दें ये केवल एक गार्डन नहीं बल्कि मकबरों से सुसज्जित एक परिसर है, जिसे पर्यटन के लिहाज से गार्डन का नाम दे दिया गया है। प्रकृति प्रेमी बंधुओं के लिए यह जगह स्वर्ग से कम नहीं। इसकी खूबसूरती और इतिहास इतना खास है जिसे जानने के बाद आप खुद को इस जगह जाने से रोक नहीं पाएंगे। कैसे पहुंचे लोधी गार्डन लोधी गार्डन मेन लोधी रोड, इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के पास स्थित है। लोधी गार्डन जेएनएल मेट्रो स्टेशन से चंद कदम की दूरी पर ही है। खास बात ये कि लोधी गार्डन की एंट्री बिलकुल फ्री है। बड़ा गुबंद जैसे ही हमनें गार्डन में प्रवेश किया अंदर जाते हुए केवल पेड़ पौधे ही नजर आ रहे थे। कुछ कदम आगे बढ़ते ही एक बेहद आकर्षक इमारत दिखी। ये था बड़ा गुबंद। सबसे जरूरी बात ये पूरा परिसर लोधियों के अंतर्गत हुआ करता था। आज इस परिसर में लोधी वंश से सम्बन्ध रखने वालों की कब्रें हैं जिनपर मकबरे बने हुए हैं। ये मकबरे ही आज यहाँ आने वाले सैलानियों के आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें लोधी वंशज सुल्तानों के राज्यकाल (1454-1526) में दो प्रकार के मकबरों का निर्माण हुआ एक चौकोर और दूसरा अठपहलू। बड़ा गुबंद चौकोर मकबरे का उदाहरण है। इस मकबरे के बिल्कुल साथ में एक मस्जिद बनी हुई है जिसे बड़ा गुबंद मस्जिद कहा जाता है। कुछ विद्वान मानते हैं बड़ा गुबंद मकबरा इस मस्जिद का प्रवेश द्वार है परंतु ये एक अलग मकबरा ही है। इस मकबरे में दफनाये गए व्यक्ति की पहचान नहीं कि जा सकी है पर माना जाता है ये व्यक्ति सिकन्दर लोधी के राज्य में किसी विशिष्ट पद पर रहा होगा। बगल में ही बड़ा गुबंद नाम की मस्जिद भी है जो मेहराबों जैसे आकार की है। स्तम्भों पर स्थित ये मस्जिद सन 1494 के आस पास की है। इसके अंदर की खूबसूरती देखकर कोई भी दंग रह जायेगा। सफेद चूना पत्थर और लाल बलुआ पत्थरों से बनी ये मस्जिद अद्भुत वास्तुशैली की मिसाल है। एक बार जो इसे देख ले उसका मुंह खुला का खुला रह जाए। अरबी शैली में बनी ये मस्जिद पूरी तरह से कुरान की आयतों और रंगीन बेलबूटों से सजी हुई है। हम तो पूरी तरह इसकी सुंदरता के कायल हो गए। शीश गुबंद मस्जिद के सामने खड़े होने पर सामने ही एक और अनोखा मकबरा नजर आ रहा था। ये था शीश गुबंद। हम सुंदर बाग और फूलों की महक लेते हुए सामने के मकबरे यानी शीश गुबंद पहुँचे। शीश-गुबंद अन्य इमारतों से कुछ अलग लगा। इसके ऊपरी भाग पर नीले रंग की टाइलें इसे अलग ही चमक दे रही थी। इस्लामिक शैली से बना ये मकबरा आज भी खूबसूरती में किसी से कम नहीं। यह मकबरा प्रथम लोधी बादशाह बहलोल लोधी का है। मकबरे की छत पर उकेरी गई कलाकृतियां और डिज़ाइन अद्भुत थे। बारीक कारीगरी देखकर नजरें हटने का नाम नहीं ले रही थीं। अठपुला दूर-दूर तक देखने पर बाग में बस हरियाली ही हरियाली नजर आ रही थी पर वहां लगा परिसर का नक्शा आगे बहुत कुछ होने की सूचना दे रहा था। कुछ दूरी पर एक मानवनिर्मित झील दिखी जिस पर एक पुल बना हुआ है जिसे अठपुला कहा जाता है। सिकंदर लोधी के मकबरे से थोड़ी ही दूर सात मेहरावों वाला एक पुल है जिसे नाले पर बनाया गया है। सूचना बोर्ड की जानकारी कह रही थी यह मेहराबी पुल अकबर के शासन काल में बनवाया गया जो कि नाले के पानी को यमुना नदी तक पहुँचाने का काम करता था। सिकन्दर लोधी का मकबरा लोधी गार्डन की खास बात यही है कि ये पूरा परिसर ही सुंदरता लिए हुए है आप जितना आगे चलते जायेंगे आपको यहाँ उतना ही अच्छा फील होगा। आगे चलते हुए हमें दिखाई दी यहाँ की मुख्य इमारत यानी सिकन्दर लोधी का मकबरा। अठपहलू शैली का ये मकबरा अन्य सब मकबरों से अलग भी था और भव्य भी। सिकन्दर लोधी, लोधी वंश का द्वितीय शासक था। मकबरा ऊंचाई पर बनाया गया है जिसमें मकबरे का एक अलग बाग भी है। यहाँ जितने भी मकबरें दिखाई दिए उन सबकी संरचना एक जैसी ही थी। इसकी खासियत ये है ये मकबरा पूरे परिसर के बीचों-बीच है। ये मकबरा अष्टभुजाकार है जो चारों ओर से देखने पर एक समान दिखता है। लोधी गार्डन ऐसी जगह है जहाँ आप घंटों प्रकृति का आनंद ले सकते हैं। ज़िंदगी की भागम-भाग से दूर किसी अपने के साथ यहाँ क्वालिटी टाइम बिता सकते हैं। सब कुछ है यहाँ पुरानी इमारतें, मकबरें और पानी की झीलें भी। मुहम्मद शाह सय्यिद मकबरा अब वक्त हो चला था घर लौटने का, बस बाहर निकलने के लिए चले ही थे कि अचानक बारिश अपने पूरे शबाब के साथ बरसने लगी, मानो बादलों का सारा गुस्सा आज ही फूट पड़ा हो। निकलते हुए लोधी गार्डन का एक आखिरी मकबरा जो हमसे छूट रहा था सामने नजर आया। बारिश से बचने के लिए हम भागे मकबरे की ओर। ये था मुहम्मद शाह सय्यिद मकबरा। ये गोलाकार मकबरा दूर से किसी महल के बैठकघर जैसा लगता है। अगर मुझसे पूछा जाए तो पूरे परिसर में सबसे अनोखा मकबरा यही लगा। बारिश से बचते कई लोग इस मकबरे की सीढ़ियों पर बारिश का सुखद आनंद लेते दिखे। और मुझे याद आया क़तील शिफ़ाई का एक मशहूर शेर- दूर तक छाए थे बादल और कहीं साया न था इस तरह बरसात का मौसम कभी आया न था बारिश के ऐसे

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Dariba Kalan in Chandni Chowk

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Dariba Kalan : चाँदनी चौक के मशहूर दरीबा कलां और किनारी बाज़ार Five Colors of Travel देश भर में प्रसिद्ध चाँदनी चौक में जान डालते हैं वहाँ के कई छोटे-बड़े बाज़ार। हर एक मील पर एक नया बाज़ार शुरू हो जाता है और बाज़ार भी कुछ ऐसे जहाँ हर नुक्कड़ और चौराहे पर कुछ अलग व उम्दा दिखना बड़ी बात नहीं। चाँदनी चौक के ऐतिहासिक और बेहद पुराने बाजारों की सूची में शुमार दरीबा कलां और किनारी बाज़ार की भी अपनी अलग खासियत है। यही कारण है कि वहाँ बने बाज़ार पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी पहचान बनाये हुए हैं।( Dariba Kalan, Chandni Chowk) दरीबा कलां ज्वेलरी हब दरीबा कलां केवल एक बाज़ार तक सीमित न होकर ज्वेलरी की एक पूरी अलग दुनिया है। जहाँ हीरे जवाहरात, सोना, चांदी, सिल्वर, एथनिक और वेस्टर्न हर तरह का ज्वेलरी पीस आसानी से उपलब्ध हो जाता है। 17वीं शताब्दी से चल रही ये मार्किट लाल किले से सिर्फ 5 मिनट की दूरी पर स्थित है। लगभग 2 किलोमीटर लम्बी सड़क पर बनी इस मार्किट में घुसते ही आपके चारों ओर अगर कुछ है तो वह है सोना, चांदी और ज्वेलरी के उम्दा डिज़ाइन। मार्किट की शुरुवात होती है प्रसिद्ध जलेबी वाले की दुकान से जो न जाने कितने सालों से अपनी जलेबी की मिठास से चाँदनी चौक में मिठास घोल रहा है। आगे बढ़ते ही आपको खुद-ब-खुद महसूस हो जाएगा की चाँदनी चौक नाम में चाँदनी शब्द दरीबा कलां से ही लिया गया है। क्योंकि यहां के अधिकतर दुकानदार चाँदी के गहनों के अलावा चाँदी के बर्तन और चाँदी की बनी देवी-देवताओं की मूर्तियाँ भी सैंकड़ों सालों से बेचते आ रहे हैं। पीढ़ियों से चल रहे इस बाज़ार में आपको हर प्रकार की ज्वेलरी के उम्दा डिज़ाइन आसानी से मिल जाएंगे, जिनकी कला और खूबसूरती देख आप असमंजस में पड़ जाएंगे की क्या ले और क्या नहीं। सदियों पुराना शाही बाजार बता दें दरीबा कलां बाज़ार की स्थापना का श्रेय मुगल बादशाह शाहजहाँ को जाता है। माना जाता है कि बाज़ार में बादशाह, उनके परिवार और शाही लोग खरीदारी करने आते थे, खासकर महलों की बेगमों के लिए भी बाजार में गहनों की दुकानें खोली गई। तब से लेकर आज तक यह महिलाओं का पसंदीदा बाजार है। चाँदी के बर्तन बताते हैं यह बाजार कई बार लूटा गया लेकिन हर बार फिर से स्थापित हो गया। आज इस बाज़ार में मीरीमल सुल्तान सिंह जैन, धन्नूमल जगाधर मल, लिली डीयाना, भगवान दास खन्ना, श्रीराम हरि राम, राम स्वरूप जैन, राधे कृष्ण, रत्न चंद जैसे अनेक पुराने जौहरियों के वंशजों के अलावा बहुत से नए जौहरी भी अपना कारोबार कर रहे हैं। इसके अलावा बाज़ार में आपको नेपाली, तिब्बती ज्वेलरी भी आसानी से मिल जाएगी। आपको बता दें बाज़ार में रोज़ाना करोड़ो का कारोबार होता है और त्यौहारों के दिनों में डिमांड दुगनी हो जाती है। कीमत के लिहाज से भी दरीबा कलां परफेक्ट है। किनारी बाज़ार चांदनी चौक के सबसे मशहूर बाज़ारों में से एक किनारी बाज़ार दरीबा कलां के बिलकुल पास में स्थित है। बाज़ार की शुरुवात होती है प्रेम चंद गोटे वाले चौक से। जहाँ लोग शादी से लेकर, दुकानों और घरों का सामान भी खरीदते हैं। इस बाज़ार में फैंसी गोटा पट्टी, लेस, शादी की पगड़ियाँ, शगुन के लिफाफे, शगुन के थाल, ज्वेलरी बॉक्स और न जाने कितने प्रकार की आइटम मिलते हैं। आपको बता दें वैसे तो किनारी बाज़ार में थोक में सामान ज्यादा बिकता है लेकिन कुछ दुकानदार रिटेल में भी अपना सामान बेचते हैं। यहाँ पर बिकने वाला सामान आपको बेहद किफायती दामों में मिल जाता है। बात चाहे शादी में प्रयोग होने वाले सजावट के सामान की हो या अन्य वस्त्रों की किनारी बाज़ार में आपको सब मिलेगा। किनारी बाज़ार का नाम सूट और साड़ी के नीचे लगने वाली किनारी के नाम पर ही रखा गया है। यहाँ आपको हर तरह की किनारी, गोटा और लटकन मिल जाएगी। ये बाजार भले ही संकरी गलियों में बने हुए हैं, भले ही यहाँ की दुकानें छोटी-छोटी हैं लेकिन दुकानें छोटी होने के बावजूद भी यहाँ आने वाले खरीददारों को न केवल बहुत सारी वैरायटी मिल जाती है बल्कि क्वालिटी से भी किसी प्रकार का समझौता नहीं किया जाता। चाँदनी चौक के यह दोनों बाज़ार इसीलिए दिल्ली के सबसे अच्छे बाजारों में गिने जाते हैं। कम कीमत में बढ़िया सामान किसको पसंद नहीं है? ये दोनों ऐतिहासिक बाज़ार अपनी क्वालिटी, प्रोडक्ट के यूनिकनेस और कीमत हर लिहाज़ से परफेक्ट हैं। तो अब जब भी चाँदनी चौक जाएँ दरीबा कलां और किनारी बाज़ार में खरीदारी का लुफ्त जरुर उठाएँ।(Dariba Kalan, Chandni Chowk) Written & Research by Geetu Katyal Edited by Pardeep kumar You can watch video of this blog- Dariba kalan & Kinari Bazar Like & Subscribe

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Jaisalmer: जैसलमेर – रेगिस्तान, शानदार किलों, पुरानी हवेलियों और राजसी ठाठ-बाट का शहर by Pardeep Kumar पिछले काफी अरसे से मैं राजस्थान घूमने का प्लान कर रहा था। क्योंकि राजस्थान शब्द सुनते ही ज़ेहन में खूबसूरत महलों, शानदार किलों और वीरों के इतिहास की झांकी तैरने लगती है। पूरा राजस्थान ऐतिहासिक सांस्कृतिक और प्राकृतिक सौंदर्य से जगमग है। यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज यह “रजवाड़ों की धरती” भारत के सबसे बड़े पर्यटक स्थलों में से एक है। मीलों तक फैली सुनहरी रेत पर अनेक विजय गाथाओं के साक्षी रहे यहाँ के दुर्ग, पिंक सिटी, झीलों का शहर, गोल्डन सिटी, बीकानेरी भुजिया, गजब वास्तुकला, मुँह में पानी लाने वाले व्यंजन, आदिवासी गाँव, तीर्थ स्थल और रंगीन त्यौहार जैसी अनोखी चीज़ें न केवल राजस्थान को दूसरों से अलग करती है बल्कि नायाब भी बनाती हैं।(Jaisalmer) और अगर आपको सोने जैसी रेत वाला रेगिस्तान, शानदार किलें, पुरानी हवेलियां और राजसी ठाठ-बाट की झलक देखनी हो तो हो देश के पश्चिमी कोने में स्थित जैसलमेर से बेहतरीन दूसरा कोई डेस्टिनेशन नहीं। हम दिल्ली से सम्पर्क क्रांति एक्सप्रेस ट्रैन से जैसलमेर के लिए रवाना हुए । लगभग 15 घंटे के सफर के बाद हम जैसलमेर रेलवे स्टेशन पर पहुंचे। शायद उस समय रात के एक बजे थे। होटल बुक था और उन्होंने टैक्सी पहले ही भेज दी थी इसलिए किसी तरह की कोई परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा। जब भी आप ट्रैन से ऐसे किसी भी डेस्टिनेशन पर जाएँ तो होटल और टैक्सी का इंतज़ाम पहले ही कर लें। आजकल सब ऑनलाइन है इसलिए बहुत ज्यादा चिंता की बात है नहीं। मेरे लिए यात्रा का मतलब सिर्फ घूमना कभी नहीं रहा। यात्रा मेरे लिए हमेशा से अपना सर्वोत्तम समय व्यतीत करना रहा है। चाहे जिस भी डेस्टिनेशन की यात्रा का प्रोग्राम बने, वहां के परिवेश को समझना और किस तरह ये रहन-सहन हमारे परिवेश से अलग है, ये भी जानना मुझे हमेशा से ही अच्छा लगता रहा है। बचपन में परिवार के साथ घूमने का कार्यक्रम बनता था, पर वक़्त के साथ जैसे बड़े हुए, कमाने लगे या यूँ कह लीजिये आर्थिक रुप से मजबूत हुए तो यात्रायें करना थोड़ा आसान हो जाता है , फिर तो जब भी मन किया निकल पड़े किसी नई जगह। क्योंकि अगर आप आर्थिक रूप से थोड़े सक्षम हैं तो फिर किसी तरह की कोई टेंशन नहीं रहती आपका जहाँ मन करें उड़ जाइये। खूब घूमिये और खान-पान का आनंद लीजिये। किस समय यहाँ आना सबसे बेहतर वैसे तो साल भर यहाँ पर्यटकों और खरीददारों का आना लगा रहता है लेकिन फिर भी अक्टूबर से मार्च का महीना यहाँ आने के लिए बेस्ट रहता है। क्योंकि देखा जाए तो राजस्थान में साल भर गर्मी ही रहती है। आप जब भी कहीं घूमने जाएँ, किस दिन कहाँ जाना है? क्या देखना है? सब का शेड्यूल पहले ही बना लें। इसका फायदा ये होता है आप बिना किसी फालतू की आपाधापी के इत्मीनान से उस जगह को विजिट कर लेते हैं। इसलिए हमने अगले तीन दिन का पूरा शेड्यूल बना लिया था।(Jaisalmer) गोल्डन फोर्ट (सोनार किला) सुबह हमने नाश्ते में स्वादिष्ट पोहा और कड़क चाय को प्राथमिकता दी। एक प्याला कड़क चाय आपके सफर को ऊर्जामयी बना देता है। अच्छे से नाश्ता किया और निकल पड़े जैसलमेर के किले की तरफ। यहां जाएं तो सबसे पहले दिन के समय में जैसलमेर किला विजिट कर लें। क्योंकि एक तो ये काफी बड़ा है दूसरा बेहद खूबसूरत भी। इसे सोनार किला कहते हैं और यह दुनिया के सर्वश्रेष्ठ रेगिस्तानी किलों में से एक माना जाता है। सुबह-सुबह के समय जब सूरज की चमकीली किरणें इस किले पर पड़ती हैं तो यह पीले रंग से दमक उठता है। यह सोनार किला पीले सेन्ड स्टोन पत्थरों को जोड़कर बनाया गया है। ये किला जितना खूबसूरत है उतने ही रोचक तरीके से इसका निर्माण भी हुआ है। इस किले को राजपूत राजा रावल जैसल ने बनवाया था। इस किले के चारों ओर बनाये गए गढ़ों से आप इसकी विशालता और भव्यता का आंकलन कर सकते हैं। हम जैसे ही किले के मुख्य द्वार पर पहुंचे शानदार नक्काशी और वास्तुकला का नमूना देखने को मिला। यहाँ आने वाले पर्यटकों को लुभाने के लिए जैसे ये मुख्य द्वार ही काफी है। मुख्य द्वार के पास से ही परम्परागत वस्तुओं की खरीददारी के लिए बाजार शुरू हो जाता है। जहाँ से आप ट्रेडिशनल चीजों की शॉपिंग कर सकते हैं। वैसे इस किले में अखे पोल, सूरज पोल, गणेश पोल और हवा पोल नामक चार दरवाजे हैं। किले में अंदर आपको मोती महल, रंग महल और राज विलास जैसे स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूने दिखाई देंगे। किले के अंदर ही खूबसूरत जैन मंदिर भी है। यह किला शहर के बीचों-बीच बना हुआ है। दिन के समय सूरज की रोशनी में इस किले की दीवारे हल्के सुनहरे रंग की दिखती है. इसी कारण इस किलें को सोनार किला या गोल्डन फोर्ट के नाम से भी जाना जाता है। देश भर में अनेक किले ऐसे हैं जिनको आलीशान होटलों में बदल दिया गया है लेकिन जैसलमेर के किले की यही सबसे बड़ी खासियत है कि आज भी यह अपने पुराने स्वरुप में मौज़ूद है। इसलिए शायद इसे लाइव फोर्ट भी कहा जाता है। फिलहाल इस किले के अंदर पांच हजार के लगभग लोग रहते हैं जो यहाँ आने-जाने वाले ट्यूरिस्ट के जरिये ही अपना गुजर बसर कर रहे हैं। अंदर एक चाट पापड़ी वाले ने हमें बताया कि किले में एक हजार से भी अधिक लोग फ्री में रहते हैं वो यहाँ रहने के लिए किसी भी तरह का रेंट नहीं चुकाते। हम ने जब इस बात की तस्दीक की तो हमें यह जानकार हैरानी हुई कि यह बात बिलकुल सही है। कहते हैं राजा रावल जैसल सेवादारों की सेवा से बहुत खुश हुए थे। इसलिये उन्होंने उन सेवादारों को किलें में रहने देने का फैसला किया। तब से आज तक सेवादारों के वंशज इस किले में बिना किराया दिए मुफ्त में रहते हैं। इस किले में रहने वालों की आबादी के हिसाब से यह दुनिया भर के किलों में अलग स्थान रखता है। हम अनेक छोटी-छोटी रिहायशी गलियों से होकर इस किले के ऊपरी हिस्से में पहुंचे जहाँ एक विशाल तोप

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Daryaganj Sunday Book Market In Delhi

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Daryaganj Book Market: दरियागंज – बुक लवर्स का बरसों पुराना ठिकाना कहते हैं किताबों की दुनिया में एक ऐसी कशिश होती है जो आँखों से होते हुए लबों की मुंडेर पार कर हमारी रगों में बहने लगती है और धीरे–धीरे हमारा मिज़ाज उसके अक्स का गवाह बन जाता है। किताब और पाठक का रिश्ता दुनिया के सबसे अटूट रिश्तों में से एक है। जिसे और मजबूत बनाती है देश के सबसे बड़ी पुस्तक मार्किट में से एक दरियागंज बुक मार्किट(Dariya ganj Book Market)। दिल्ली में स्थित दरियागंज मार्किट के बारे में तो आपने सुना ही होगा, जो देश विदेश के फेमस पब्लिशर्स का जाना पहचाना ठिकाना है। लेकिन क्या आपको पता है कि दरियागंज मार्किट में अलग-अलग विषयों पर आधारित किताबें भी मिलती है? जी हाँ, वही सारी किताबें जिनके बारे में हम सुनते और पढ़ते हैं। चाहे फिर वो किताब भारत के किसी भी कोने से प्रकाशित क्यों न हो। पुरानी दिल्ली का प्रसिद्ध इलाका दरियागंज विभिन्न कारणों से फेमस है जिसमें से एक बड़ा कारण वहां किताबों का भंडार होना भी है, जो पाठकों और बुक लवर्स के लिए एक अलग ही दुनिया का आभास कराता है। Daryaganj Book Market दरियागंज बुक मार्किट हाल-फ़िलहाल दरियागंज बुक मार्किट खूब चर्चा में रही, कारण था पिछले 50 वर्ष से भी अधिक समय से लगते आ रहे फेमस संडे बुक बाजार का हटना। संडे बुक बाजार का पूरे उत्तर भारत में नाम है। खासियत ये कि यहां पुस्तकें काफी कम दाम पर मिलती हैं। इसमें राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय लेखकों के साहित्य से लेकर विज्ञान, धर्म, संगीत व पाक कला की पुस्तकें मिल जाती हैं। इसी तरह प्रतियोगी परीक्षाओं तथा पाठ्यक्रमों की पुस्तकें भी सस्ती दर पर उपलब्ध होती हैं। लेकिन देखा जाए तो दरियागंज में किताबें केवल संडे को ही नहीं मिलती, बल्कि देश विदेश से किताबों का मार्किट में आना और पाठकों का इन किताबों को ले जाना पूरे सप्ताह भर लगा रहता है। वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दें दरियागंज की संडे बुक मार्किट अब चांदनी चौक में ब्रॉडवे होटल के सामने महिला हाट मैदान में लगती है। कोरोना के कारण फ़िलहाल यहाँ नियम थोड़े सख्त हैं। लेकिन सप्ताह के बाकी 6 दिन दरियागंज में ही किताबें मिलती हैं। वैसे दिल्ली गेट से थोड़ी ही दूरी पर दरियागंज शुरू हो जाता है। दुकानों के बाहर तक लगी पुस्तकें बुक लवर्स को खूब भाती हैं। जो पुस्तकें कहीं और नहीं मिलेगी वह यहां मिल जाएंगी। यहाँ लगभग पांच सौ बुक सेलर्स हैं। चाहे साहित्य प्रेमी हों, प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे विद्यार्थी हों या फिर स्कूल-कालेजों में पढ़ने वाले छात्र यहाँ सभी बुक्स खरीदने आते हैं। जैसे आप यहाँ की किसी दुकान में घुसते हैं, पुस्तकों के आकर्षित कवर लुभाने लगते हैं। जैसे-जैसे आप अपने मतलब की किताबें ढूंढोगे यहाँ मौजूद हर रेक में कुछ अलग और बढ़िया मिलेगा। आप यकीन नहीं करेंगे यहाँ चार किताबों की क्या कीमत होगी? सिर्फ 200 रुपए। हाँ, सही पढ़ा सिर्फ 200 रुपए। प्रेमचंद, सूरदास, और महादेवी वर्मा से लेकर एलन मस्क, चार्ल्स डिकीन तक सब कुछ जब हम किसी दुकान पर पुस्तकें लेने जाते हैं, तब सबसे बड़ी परेशानी ये आती है कि हमें सारी पुस्तकें एक जगह नहीं मिलती। किताबों के लिए कितने मोहल्ले नापने पड़ते हैं। लेकिन दरियागंज की ये बुक शॉप्स आपको कहीं और नहीं जाने देंगी। सारा किताबी संसार दरियागंज की पुस्तकों की दुकानों में समाया हुआ लगता है, चाहे फिर आपको कुछ भी पढ़ना हो। आप इतिहास, समाजशास्त्र, रचनात्मक, पत्रकारिता विषय से संबंधित कुछ भी पढ़ना चाहें वो सब कुछ यहाँ मिलेगा। प्रेमचंद, सूरदास, और महादेवी वर्मा से लेकर एलन मस्क, चार्ल्स डिकीन तक सब कुछ।  200 रुपए की एक किलो किताबें आपकी जहाँ तक नज़र जाएगी आपको दुकानों के बाहर लगे रंग-बिरंगे बोर्ड दिखाई देंगे, जिन पर लिखा होगा 20 रुपए , 50 या ज्यादा से ज्यादा 100 रुपए। फिर फर्क नहीं पड़ता आप कितनी मोटी और किस लेखक की पुस्तक खरीदें। कई बार यहाँ आने वाले नए नवेले बुक लवर्स असमंजस में पड़ जाते हैं कि हजारों किताबों में से क्या खरीदा जाए और क्या छोड़ा जाए। और हाँ , सस्ती किताबों के अलावा दरियागंज में आपको किलो के भाव से भी किताबें मिल जाएँगी। 200 रुपए की एक किलो किताबें। निर्भर करता है की आपकी पसंद की किताब आपको कितना ढूंढने पर मिलती है। लेकिन फिर भी जो किताबें पढ़ने के लिए अपना बेस बनाना चाहते हैं खासकर नॉवेल पढ़ कर, उनके लिए तो यह जगह जन्नत है। किताबों के अलावा यहाँ आपको स्टेशनरी में भी बहुत साड़ी वैरायटी मिल जाएँगी। चाहे मोटे-मोटे रजिस्टर हों या डायरी जिनकी आमतौर पर कीमत 150 रुपए से भी ज्यादा होती है लेकिन दरियागंज पुस्तक मार्किट में वही आपको 50-70 रुपए में मिल जाएगा। चाहे आप किसी परीक्षा की तैयारी कर रहे हो या आपको साहित्य पढ़ना अच्छा लगता हो, दरियागंज पुस्तक मार्किट में आपको न केवल पुस्तकें बल्कि पढ़ने-लिखने से जुड़ी हर सामग्री मिलेगी, चाहे फिर वो पेन-पेंसिल हो, स्टडी टेबल या परीक्षा का बोर्ड। (Dariya ganj Book Market)। गुलाब के सूखे फूल अब किताबों में नहीं मिलते क्योंकि आज शायद तेजी से भागते वक़्त के साथ किताब पढ़ने वालों का अंदाज़ बदल गया है, उनकी दुनिया बदल गई है। भले ही नए ज़माने की नई तकनीकों के कारण लोग किताबों को अब ऊपर की दराज़ में रखने लगे हैं लेकिन उन्हें पढ़ने वालों की चाहत और मोहब्बत आज भी कम नहीं हुई है। शायद इसलिए दरियागंज में आज भी हज़ारों बुक लवर्स किताबें खरीदने के लिए जाते हैं।  Daryaganj Book Market Delhi क्यों जाएँ दरियागंज बुक हब ? Five Reasons to visit this place- 1.यहाँ लगभग पांच सौ बुक सेलर्स हैं। चाहे साहित्य प्रेमी हों, प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे विद्यार्थी हों या फिर स्कूल-कालेजों में पढ़ने वाले छात्र यह जगह सभी के लिए माकूल है। 2.यह देश विदेश के फेमस पब्लिशर्स का जाना पहचाना ठिकाना है। 3.किताबों के अलावा यहाँ आपको स्टेशनरी में भी बहुत साड़ी वैरायटी मिल जाएँगी। 4.जो किताबें पढ़ने के लिए अपना बेस बनाना चाहते हैं खासकर नॉवेल पढ़ कर, उनके लिए तो यह जगह जन्नत है। 5.आप इतिहास, समाजशास्त्र, रचनात्मक, पत्रकारिता विषय से संबंधित कुछ भी पढ़ना चाहें वो सब

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Udaipur- उदयपुर यात्रा – पार्ट -2 – शिल्प ग्राम, फतेह सागर झील और सज्जनगढ़ फोर्ट by Pardeep Kumar उदयपुर की यात्रा के पहले पार्ट में मैंने आपको उदयपुर शहर के सिटी पैलेस, सहेलियों की बाड़ी और पिछौला झील के बारे में विस्तार से बताया था। आज जुड़िये यात्रा के दूसरे दिन से…. दूसरे दिन हमारा उदयपुर के शिल्पग्राम, सज्जन गढ़ किले और फतेहसागर झील का शेड्यूल था। इसलिए सुबह नाश्ता करने के बाद हम निकल पड़े शिल्पग्राम की और। उदयपुर का शिल्पग्राम- राजस्थानी ग्रामीण कल्चर की शानदार झांकी उदयपुर सिटी से लगभग 6 किलोमीटर दूर शिल्पग्राम, जो एक विस्तृत परिसर में बिलकुल गाँव जैसा वातावरण विकसित करके बनाया गया जीवंत संग्रहालय जैसा है। अंदर प्रवेश करते ही आपको एक बार तो ऐसा लगेगा जैसे किसी राजस्थानी गांव में ही प्रवेश कर गए हो। शिल्पग्राम में पारम्परिक संस्कृति को दर्शाती सात झोपडियां बनाई गयी हैं, जो राजस्थान के अलावा गोवा, गुजरात और महाराष्ट्र के पारंपररिक घरों और अलग-अलग आदिवासी समुदाय के प्रतिरूप को परिभाषित करती हैं। कुल मिलाकर आप जितना भी समय यहाँ गुजारोगे आपको उतना ही आनंद की अनुभूति होगी। जिस समय हमनें शिल्पग्राम में प्रवेश किया तब टिकट काउंटर पर बैठे महाशय ने बताया की दो घंटे बाद ओपन एयर थिएटर में सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू होंगे, आप वहां राजस्थानी लोक गायन और नृत्य दोनों का आनंद ले सकते हैं। तब तक आप मजे से पूरे परिसर को घूमिये, देखिये। हमने दो घंटे में वहां बने हुए अलग-अलग तरह के झूले, शिल्प बाज़ार, मृण कला संग्रहालय, मिटटी और शिल्पकला के बेहतरीन नमूने देखे। यहाँ बनी झोपड़ियों में, आप कढ़ाई का काम, लकड़ी का काम, दर्पण और मनका काम और मिटटी के बर्तन देख सकते हैं। घोड़े व ऊँट की सवारी की भी व्यवस्था थी। देखा जाए तो पूरे शिल्प ग्राम में राजस्थानी ग्रामीण कल्चर की शानदार झांकी देखने को मिली। बाजार से थोड़ी खरीददारी की और चल पड़े सांस्कृतिक कार्यक्रम स्थल की और। ओपन एयर थिएटर में सामने छोटा-सा मंच बना हुआ था जिसमें लोक नृत्यों का रंगा-रंग कार्यक्रम चल रहा था। लगभग एक घंटा हमने जम कर नृत्य और गायन का आनंद लिया। वहां जितनी भी देर रहे ऐसा लगा जैसे थकान को कहीं पीछे ही छोड़ आये हो। आप राजस्थान के किसी भी पर्यटन स्थल पर चले जाएँ वहां आपको राजस्थानी कल्चर के लिए मशहूर चौखी ढाणी मिल ही जाएँगी लेकिन उदयपुर का ये शिल्पग्राम अपनी संजीदगी और अरावली की मनोहर घाटियों के कारण उन सबमें बहुत अलग है। (Udaipur- Shilpgram) हमें शिल्पग्राम में दो बज गए थे। वहां से निकल कर सबसे पहले लंच किया और वहीँ से चल पड़े अगले पड़ाव की और शहर से करीब 8 किलोमीटर दूर एक ऊँची पहाड़ी पर स्थित सज्जनगढ़ का किला देखने जिसे मानसून पैलेस भी कहते हैं। सज्जनगढ़ का किला- मानसून पैलेस ये किला काफी ऊँचाई पर है, उदयपुर सिटी से भी आप इस किले को आसानी से देख सकते हैं। पहाड़ी पर चढ़ते हुए दोनों ओर घने-गहरे जंगल है जिसमें कई बार जंगली जानवर भी दिखाई देते हैं। बरसात के मौसम में बादलों को देखने के लिए मेवाड़ के महाराणा सज्जनसिंह ने यह महल बनवाया था। यह सफ़ेद संगमरमर से बनी सुन्दर इमारत है जो कि उनकी मृत्यु के बाद महाराणा फतहसिंह द्वारा पूरी कराई गयी। ऊपर किले के बिलकुल साथ लगते परिसर में एक शानदार कैफ़े है जहाँ आप कॉफी और स्नैक्स का आनंद ले सकते हैं। यहाँ से सूर्यास्त का दृश्य देखने के लिए पर्यटक शाम ढ़लने का इंतज़ार करते हैं। क्योंकि हमें इसके बाद फ़तेह सागर झील जाना था इसलिए हम तक़रीबन पांच बजे वहां से निकल कर फ़तेह सागर झील पहुंचे। फ़तेह सागर झील क्योंकि फ़तेह सागर झील घूमने और देखने का सबसे उपयुक्त समय शाम का ही रहता है। फतह सागर झील का पुनर्निर्माण महाराणा फतह सिंह द्वारा कराया गया था। यह पिछोला झील से जुडी हुई है और जिसके जल प्रवाह को रोकने के लिए एक छोटा-सा बाँध भी बनाया गया है। हमने वहां जाकर सबसे पहले साइकिल किराये पर ली और चल पड़े एक लम्बी राइडिंग पर बिलकुल झील के किनारे-किनारे। हमारी लगभग तीन किलोमीटर राइडिंग खत्म हुई झील के एक कोने पर बने उस छोटे से बांध पर जाकर, उस जगह से दूर-दूर तक फैली ये झील बेहद शानदार लग रही थी। एक खास बात जो मैंने नोट की वो ये कि फ़तेह सागर झील के आसपास रहने वाले बहुत से लोग शाम की वॉक के लिए यहाँ रोजाना आते हैं। जितनी चहल-पहल सैलानियों की थी, उतनी ही वहां रोजाना वॉक पर आने वालों की भी थी। जैसे-जैसे शाम गहरा रही थी झील की ख़ूबसूरती बढ़ती ही जा रही थी। झील के किनारे आपको बहुत सारे चाय, मैग्गी और समोसे वाले मिल जायेंगे। हमने साइकिलिंग करने के बाद वहीँ झील के किनारे चाय और मैगी का आनंद लिया। यहाँ सूर्यास्त के समय नीले आकाश में आपको बहुत सारे पक्षी भी उड़ते दिखेंगे। ऐसे शानदार दृश्य देखकर आप यहां फोटोग्राफी से अपने आपको रोक ही नहीं पाओगे। एक बात और फतेह सागर झील में बोटिंग करे बिना आपकी यहां की यात्रा पूरी नहीं हो सकती, इसलिए अगर आप इस झील को घूमने के लिए आ रहे हैं तो बोटिंग करते हुए चले जाईये झील के बीचों-बीच बने शानदार उद्यान में। जहाँ सूर्यास्त के समय जाकर आपको ऐसा लगेगा जैसे जन्नत यहीं हैं, यहीं हैं और यहीं हैं। झील के मध्य एक टापू पर बना यह उद्यान अपने शांत वातावरण से यहां आने वाले पर्यटकों को एक अद्भुद शांति का एहसास कराता है। आप जब भी किसी यात्रा पर होते हैं तो यकीनन ऐसी शांति और प्राकृतिक सुंदरता आपकी सारी थकान पल भर में मिटा देती है। यहाँ आकर पहली बार महसूस हुआ क्यों दुनिया भर के शायर अपनी महबूबा की आँखों की ख़ूबसूरती की तुलना झील से करते हैं। सच में ऐसे ही थोड़े उदयपुर को देश के सबसे रोमांटिक शहरों में शुमार किया जाता है। फतेह सागर झील के ऐसे मनमोहक दृश्य आपको लम्बें समय तक अनायास ही याद रहते हैं। क्यों जाएँ उदयपुर? Five Reasons to Visit Udaipur– 1.उदयपुर के शिल्पग्राम में आप पारम्परिक खरीददारी के अलावा राजस्थानी लोक गायन और नृत्य दोनों का आनंद ले सकते हैं।

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Matka Market: Buy Clay Home Decor Items – Delhi

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Matka Market- मटका मार्किट: डेकोरेटिव और ट्रेडिशनल प्रोडक्ट्स का हब Five Colors of Travel मशीनें हमें परफेक्शन तो दें सकती हैं लेकिन इमोशन्स नहीं, क्योंकि मशीनों के हमारी तरह दिल नहीं धड़कते। इमोशन्स को महसूस करने के लिए हम हस्तशिल्प वस्तुओं के पीछे लगी मेहनत को देख सकते हैं। मिट्टी से बना घड़ा भी किसी कला से कम थोड़ी है? हस्तशिल्प की इसी कला को देखने हम पहुंचे दिल्ली के सरोजनी नगर में बनी मटका मार्किट में। कैसे जाएं मटका मार्किट बड़े बाज़ारों के शोरगुल से दूर मटका मार्किट सरोजनी नगर मेट्रो स्टेशन से 1 किलोमीटर की दूरी पर बनी है। आप मेट्रो या बस किसी भी साधन से आसानी से मटका मार्किट पहुँच सकते हैं। डेकोरेटिव और ट्रेडिशनल प्रोडक्ट्स का हब मार्किट की शुरुवात होती है वैगटाइम शॉप से जो पॉट शॉप और डेकोरेटिव आइटम की दुकान है। दुकान के बाहर बेचने के लिए लगे छोटे-छोटे रंग-बिरंगे गमले दुकान को एक अलग ही लुक दे रहे थे। दुकान की बनावट में इस्तमाल वुडेन वर्क भी खूब अट्रैक्ट कर रहा था। दुकान के अंदर जितना अच्छा सामान था उतनी ही दुकान के बाहरी दीवार पर बनी आर्ट अच्छी लग रही थी, लेकिन इस दुकान पर सारा सामान हस्तशिल्प नहीं था। नई जनरेशन को देखते हुए और डिमांड के हिसाब से यहाँ भी कुछ दुकानदार रेडीमेड प्रोडक्ट रखने लगे हैं। वैगटाइम शॉप के बाद सफर शुरू होता है हाथों से बनी मटका मार्किट का। जहाँ तक नज़र जा रही थी मिट्टी से बना सामान दिख रहा था। आपको बता दें मटका मार्किट में काम करते हुए लोगों को 50 वर्ष से अधिक हो गए हैं। एक दुकान के मालिक ने बताया कि हम पीढ़ी दर पीढ़ी यहीं काम करते आ रहे हैं, पहले हमारे दादा, फिर पिता और अब हम इस काम को आगे बढ़ा रहे हैं। वैसे आम ग्राहकों के लिए भले ही यह सिर्फ एक मार्किट हो लेकिन यहाँ के दुकानदारों के लिए यही उनका घर भी है। यहां काम कर रहे बहुत से लोगों ने बताया की वह रहते भी यहीं हैं। देखने पर मार्किट सड़क के एक छोर से शुरू और दूसरे छोर पर खत्म होती दिखती है लेकिन मिट्टी की उम्दा हस्तशिल्प कला देखते-देखते न ही दुकाने खत्म होंगी और न ही उसमें रखा सामान। आपको हर दुकान पर कु  नया और उम्दा देखने को दिखेगा। यहां न सिर्फ दुकानों में रखा सामान बल्कि दुकानें भी बिल्कुल ऑथेंटिक हैं, कुछ दुकानें बांस और छप्पर से बनी हुई हैं जबकि कुछ बिल्कुल कच्ची हैं। दिवाली फेस्टीवल में होती है दुनिया भर की वैरायटी सुबह के 10 बजे से रात के 10 बजे तक लगने वाली मटका मार्किट में मिट्टी से बने जितने प्रकार की चीज़ो का आप अंदाजा लगा सकते हैं वो सब पलक झपकते ही यहां मिल जाएगा। फिर चाहे वो छोटा-सा दिया हो या किसी प्रकार का, डिज़ाइन का बड़ा गमला। दीवाली पर तो यहाँ की रौनक देखते ही बनती है। अगर आप दिवाली फेस्टीवल के समय यहाँ आएंगे तब आपको दुनिया भर की नई वैरायटी भी देखने को मिल जाएँगी। इस मार्किट में हर तरह का मटका, बुद्ध-गणेश से लेकर शिव-पार्वती और सरस्वती की मूर्तियां, फूलदान, गमले, अचार की बरनी, शो-पीस, विभिन्न प्रकार के जानवर के आकार का समान रखने वाला, सुंदर-सी परी और भी न जाने क्या-क्या यहाँ मिलता है। मटका मार्किट में राजस्थान, मणिपुर, बिहार और न जाने भारत के कितने राज्यों से कच्चा सामान आता है और उस कच्चे समान पर काम करके उसे फिनिशिंग मटका मार्किट में दी जाती है. जयपुर ब्लू पॉटरी’, ‘कागज़ी’ और ‘मणिपुर ब्लैक पॉटरी’ कुछ ऐसा है जिसे देख आप ‘वाह’ कहने पर मजबूर हो जाएंगे। (Matka Market, Sarojini Nagar, Delhi) Matka Market, Sarojini Nagar, New Delhi मटका मार्किट में न सिर्फ लोग घरेलू डेकोरेशन के सामान के लिए आते हैं बल्कि दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों के दुकानदार भी यहीं से समान ले जाते हैं। इस मटका मार्किट में बहुत कम और जायज कीमत पर ही सामान मिलता है। एक छोटा सा शो-पीस 10 रूपय में और एक बड़ी और विशाल मूर्ति 1100-1500 तक में मिल जाती है। किस सामान की क्या कीमत होगी ये मौसम और खरीदने की मात्रा पर भी निर्भर करता है। जितनी ज्यादा मात्रा उतनी कम कीमत। बल्क में सामान लेने का फायदा मिलता है। दिल्ली जैसे शहर में इस तरह की मार्किट आपको कम ही दिखाई देंगी। इसलिए घर के डेकोरेशन को नया लुक देने का या कुछ ट्रेडिशनल खरीदने का दिल करे तो मटका मार्किट से बेहतर कुछ नहीं। Research by Geetu Katyal Edited By Pardeep Kumar

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Mirza Ghalib Ki Haveli

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Mirza Ghalib Ki Haveli- मिर्ज़ा ग़ालिब की हवेली: एक शायर की आखिरी विरासत पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है कोई बतलाओ के हम बतलाएं क्या? वैसे तो पुरानी दिल्ली की संकरी गलियां और लोगो के हुजूम से गुलज़ार चाँदनी चौक का हर कोना पुरानी दिल्ली को नायाब बनाता है, लेकिन इन भीड़भाड़ व शोरगुल भरे बाजारों के ठीक बीचो-बीच एक शांत-सी मनमोहक हवेली भी है जो कभी मशहूर शायर मिर्ज़ा ग़ालिब (Mirza Ghalib)  का घर हुआ करती थी। जिन लोगों को शायरी पसंद है उन सभी के लिए  ग़ालिब की इस हवेली का ज़र्रा-ज़र्रा जैसे मोहब्बत की चाशनी में घुला हुआ शरबत है। Mirza Ghalib Ki Haveli कैसे पहुंचे मिर्ज़ा ग़ालिब की हवेली मिर्ज़ा ग़ालिब की यह हवेली चावड़ी बाजार मेट्रो स्टेशन से महज 1 किलोमीटर दूर स्थित बल्लीमारान गली में है। भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा धरोहर घोषित ये हवेली किसी को भी ग़ालिब का दीवाना बना सकती है क्यूंकि हवेली की पूरी सजावट उनकी लिखी शायरियों से ही की गयी है।  आपको बता दें मिर्ज़ा ग़ालिब का पूरा नाम मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ां ग़ालिब है जिन्हें प्यार से “मिर्जा नीता” नाम से भी जाना जाता है।  उनकी पत्नी का नाम उमराव था, विवाह के समय गालिब 13 वर्ष और उमराव 12 वर्ष की थी। मिर्ज़ा ग़ालिब ने लिए थे यहां अंतिम श्वास उत्तर प्रदेश के आगरा में जन्में मिर्जा ग़ालिब शादी के बाद दिल्ली आ गए थे। आगरा से लौटने के बाद गालिब ने 1860-1869 तक इसी हवेली में शरण ली थी और इसी हवेली में बैठकर ग़ालिब ने ऊर्दू और पारसी में ‘दीवान’ की रचना की थी।  यही वो स्थान है जहाँ उन्होंने अपने अंतिम श्वास लिए थे।  ग़ालिब की मौत के बाद साल 1999 तक इस हवेली में दुकानें बननी और बाजार लगना शुरू हो गया था। जिसके कारण हवेली की चमक फीकी पड़ती चली गई। यही कारण है कि 500 एकड़ में बनी ये हवेली अब बस 150 एकड़ की बची है।(Mirza Ghalib ki Haveli) 1999 में सरकार ने इस हवेली को राष्ट्रीय धरोहर घोषित कर दिया। धरोहर घोषित करने के बाद ग़ालिब की हवेली का पुर्ननिर्माण किया गया, मुगल लखोरी, ब्रिक्स, सैंड स्टोन और लकड़ी के दरवाजों का इस्तेमाल कर हवेली को खूबसूरत लुक दिया गया। मुगल वस्तुकला से बनी हवेली के लकड़ी के बड़े से दरवाजे को देखते ही आप ग़ालिब के समय में लौट जाएंगे। हवेली में अंदर घुसते ही सीधे हाथ पर एक बड़ा-सा कमरा है। कमरे में ग़ालिब का अचकन और उनकी बेगम के वस्त्र फ्रेम करके बेहद संजीदगी से लगाए गए हैं।  बीचो-बीच ग़ालिब का स्टैच्यू दिखेगा जिसके दोनों तरफ गालिब की मोटी-मोटी पोथी रखी हुई हैं। आप जैसे-जैसे हवेली में आगे बढ़ेंगे आपको ग़ालिब द्वारा खेलें जाने वाले खेल चौसर, शतरंज की बिसातें, उनके बर्तन और पुरानी पुस्तकें देखने को मिलेंगी। Mirza Ghalib Ki Haveli यहाँ आपको ग़ालिब के अलावा उनके समकालीन शायरों के चित्र भी दिखाई देंगे। हवेली में एक जगह हुक्के के साथ गालिब का एक बिलकुल जीवंत प्रतीत होता स्टैच्यू भी नजर आएगा जो शायद इस बात का प्रतीक है कि वो हुक्के के बेहद शौक़ीन थे। पूरी हवेली की तमाम दीवारों पर ग़ालिब और उनकी शायरी के पोट्रेट बड़े ही तहज़ीब और करीने से लगाए गए हैं। जिनकों देखकर पढ़कर ग़ालिब के तमाम शेर ज़ेहन में अनायास ही घूम जाते हैं…. “उग रहा दर-ओ-दीवार पे सब्ज़ा ग़ालिब हम बयावां में हैं और घर में बहार आई है” फ्री में एंट्री जबसे ग़ालिब की हवेली को राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया गया है तबसे यह हवेली पुरानी दिल्ली का एक प्रमुख आकर्षण  बन चुकी है। सुबह 11 से शाम 6 बजे तक आम दर्शकों के लिए खुलने वाली ये धरोहर हवेली सिर्फ सोमवार के दिन बंद रहती है। आप बिना किसी टिकट के यहाँ फ्री में एंट्री करिये। साथ में आप अपने कैमरे से हवेली की जी भर के तस्वीरें लीजिये। फोटो लेने की यहाँ कोई मनाही नहीं है। ग़ालिब किसी इमारत या चारदीवारी के मोहताज नहीं हैं और न ही उन्हें इन तंग और सौ-डेढ़ सौ एकड़ की हवेलियों में समेटा जा सकता है। लेकिन फिर भी जिनको ग़ालिब से इश्क़ है, शेरो-शायरी पसंद है, जो कवितायेँ लिखते-पढ़ते हैं और जो ग़ालिब को समझना चाहते हैं उनको यहाँ अवश्य आना चाहिए।     क्यों जाएँ मिर्ज़ा ग़ालिब की हवेली ? Five Reasons to Visit Mirza Ghalib ki Haveli-    1.  जिन लोगों को कविताएं -शायरी में दिलचस्पी है उन सभी के लिए  ग़ालिब की यह हवेली एक अच्छा विकल्प है।    2.  मिर्ज़ा ग़ालिब की यह हवेली दिल्ली के चावड़ी बाजार मेट्रो स्टेशन से महज 1 किलोमीटर दूर स्थित बल्लीमारान गली में है, जहाँ आसानी से पहुंचा जा सकता है।    3. राष्ट्रीय धरोहर घोषित इस हवेली में मिर्ज़ा ग़ालिब की जिंदगी से संबंधित काफी पुरानी चीजें हैं, जो ग़ालिब के चाहने वालों के लिए यकीनन किसी तोहफे से कम नहीं।    4. यहाँ आप बिना किसी टिकट के फ्री में एंट्री कर सकते हैं।  5. फोटो लेने की यहाँ कोई मनाही नहीं है। Research by Geetu Katyal Written & Edited by Pardeep Kumar   

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Hauz Khas Village – Best Tourist Attraction in Delhi

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Hauz Khas- हौज़ ख़ास विलेज: दिल्ली के युवाओं की मनपसंद जगह Five Colors of Travel दिल्ली के कल्चर को अच्छे से जानने के लिए सबसे परफेक्ट है हौज़ ख़ास। यही वो जगह है जहाँ आप दिल्ली वालों के स्वैग और स्टाइल दोनों को करीब से देख सकते हैं। कैसे जाएं हौज़ ख़ास हौज़ ख़ास मेट्रो स्टेशन से लगभग 3 किलोमीटर दूर बना हौज़ ख़ास विलेज(Hauz Khas Village) अपनी बनावट के लिए बहुत फेमस है, जहाँ जाते वक्त रास्ते में सबसे पहले आपकी नज़र छोटी गुमटी की तरफ जाएगी। अब आप कहेंगे ये क्या है? छोटी गुमटी एक गुमत है जो चारो तरफ से घिरी हरियाली के बीचों-बीच बनी है। यहाँ इतनी शांति है कि इस गुमटी में जाकर आप अलग-अलग किस्म के पक्षियों की आवाज़ें और यहाँ तक की अपनी धड़कनों को महसूस कर पाएंगे। अगर आपको शांत जगह खूब भाती हैं तब यह जगह आपके लिए बिलकुल अनुकूल रहेगी।(Hauz Khas)         hauz khas vollage- cafe hub हौज़ ख़ास मार्किट छोटी गुमटी के बाद थोड़ा आगे चलने पर आएगा डियर पार्क और उसके बाद शुरू हो जाएगी हौज़ ख़ास मार्किट, जहाँ आपको चारों तरफ क्लब, कैफ़े और गानों की ध्वनि सुनाई देगी। आपको बता दें हौज़ ख़ास मार्किट कुछ खरीदने से ज्यादा पेट पूजा और एन्जॉय करने के मकसद से बनाई गयी है। यही कारण है कि वहां हर वक़्त युवाओं का जमावड़ा लगा रहता है। चाहे आपको किसी से मिलना हो, डेटिंग करनी हो या बर्थडे सेलिब्रेट करना हो, उसके लिए हौज़ ख़ास परफेक्ट प्लेस है। हौज़ ख़ास मार्किट में से गुजरते वक्त आपको फुल बेस में बजते हुए गाने और युवा लड़के-लड़कियों की टोलीयां नज़र आएंगी और बस यही इस मार्किट की खासियत है। हौज़ ख़ास -महक का छोटा किला हौज़ ख़ास मार्किट के बाद शुरू हो जाता है हौज़ ख़ास विलेज जो दूर तक फैला हुआ है। हौज़ ख़ास को महक का छोटा किला भी कहा जाता है। विलेज में एंट्री के लिए 25 रुपय की टिकट लगती है। टिकट लेते ही आपके सामने होगा हौज़ ख़ास विलेज, उसकी अद्भुत बनावट और चारों और फैली हरियाली ही हरियाली।     hauz khas fort वैसे आपको बता दें उर्दू के शब्द हौज़ का अर्थ है पानी की टंकी और ख़ास का अर्थ है राजसी अथार्त राजसी पानी की टंकी। माना जाता है कि इस बड़ी-सी टंकी का निर्माण अल्लाउद्दीन खिलज़ी द्वारा सिरी फ़ोर्ट के निवासियों के लिए करवाया गया था। इस्लामी वास्तुकला से बना ये हेरिटेज हौज़ खास में आकर्षण का मुख्य केंद्र बिंदु है।(Hauz Khas) हौज़ ख़ास विलेज, विलेज बनने से पहले फिरोज शाह का मदरसा था। फिरोज शाह दिल्ली सल्तनत में तुगलक वंश के तीसरे शासक थे जिन्होंने 37 साल राज किया। फिरोज शाह ने ही हौज़ ख़ास विलेज में मदरसा बनवाया था और यहीं उनका मकबरा भी बनाया गया है। इस मकबरे के गुंबद का शीर्ष पूरे परिसर में सबसे ऊंचा है। यह खड़े अष्टकोणीय और वर्गाकार छतरियों को मकबरे के रूप में बनाया गया था। इस इमारत की मरम्मत बादशाह सिकंदर लोदी ने करवाई थी। कक्ष के बीचों-बीच बनी कब्र फिरोज शाह की है, जबकि वहीँ आसपास संगमरमर की कुछ अन्य कब्रें भी बनी हैं। हौज़ ख़ास विलेज फिरोज शाह के मकबरे के पश्चिम में दूर तक फैला है। ऊपरी मंजिल में खुले स्तंभों युक्त कमरे हैं और निचली मंजिल में मेहराबी कमरे हैं। निचली मंजिल में छोटी अंधेरी कोठरियां भी हैं जो शायद छात्रों के लिए बनी होंगी। जिसके अंदर रोशनी और हवा के लिए तंग रोखे हैं, और सामान रखने के लिए छोटे आले बने हैं। कहा जाता है कोठरियों के सामने मेहराबी कमरे थे जो अब ढह चुके हैं। इस हिस्से के पश्चिमी छोर में एक बड़ा गुम्बदनुमा दो मंजिला भवन है।(Hauz Khas) hauz khas fort पिकनिक स्पॉट हौज़ ख़ाज़ के परिसर में प्रवेश करते ही इतनी उम्दा वास्तुकला दिखती है जिसे देख कोई भी असमंजस में पड़ जाए कि पहले दाएं जाया जाए या बाएं। बनावट कुछ इस प्रकार की है जो गर्मी में धूप से बचाए और बरसात में बारिश से। पूरे विलेज में कही भी खड़े होने पर चारों तरफ विलेज के साथ बने डिअर पार्क की झील दिखती है जो आँखों को ठंडक देती और मन को तृप्त करती है। पूरे विलेज का एक-एक कोना इतना शानदार है कि वहां न सिर्फ दोस्तों के साथ मजे से घूमा जा सकता है बल्कि यह जगह क्वालिटी टाइम बिताने के लिए भी शानदार है। selfie time with friends विलेज के शांत माहौल व सुरक्षा के लिहाज़ से भी देखें तो यह जगह बेहतरीन विकल्प है। हमें अनेक जोड़ें यहाँ इत्मीनान से बैठे दिखाई दिए। साथ ही आप परिवार और दोस्तों के साथ पिकनिक के लिए भी यहाँ आ सकते हैं। हौज़ ख़ास विलेज अपनी खूबसूरती और बनावट दोनों के कारण यहाँ आने वाले हर ऐज ग्रुप को अपनी ओर आकर्षित करता है। दौड़ती-भागती जिंदगी में दो पल सुकून से बिताने के लिए ये जगह बिल्कुल फिट बैठती है, ऐसे ही थोड़ी इसे महक का छोटा किला कहा जाता है।(Hauz Khas) Research – Geetu Katyal Written & Edited by Pardeep Kumar You can visit our YouTube Channel to explore more beautiful destination- Like & Subscribe

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Sunder Nursery – Delhi’s Heritage Park

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Sunder Nursery: सुंदर नर्सरी- इतिहास और कुदरत का सुंदर मिलन Five colors of Travel भागते-दौड़ते शहरों के लोगों को सबसे ज्यादा कमी अगर किसी चीज की खलती है, तो वो है प्राकृतिक सौंदर्य की। अगर आप किसी ऐसी जगह की तलाश में हैं तो समझ लीजिये आपकी तलाश आज मुक्कमल हुई। क्योंकि आज हम आपको रू-ब-रू करवाएंगे ऐसी ही एक बेहद खास जगह- सुंदर नर्सरी से। जिसके बारे में भले ही आपने कम सुना होगा या पढ़ा होगा लेकिन यहाँ आने के बाद आप महसूस करेंगे की ये शानदार जगह किसी जन्नत से कम नहीं।(Sunder Nursery) दुनिया की 100 बेहतरीन जगहों में दिल्ली की सुंदर नर्सरी हुमायूं टॉम्ब के ठीक सामने स्थित ये नर्सरी एक नर्सरी के साथ-साथ बायोडायवर्सिटी पार्क, एक ऐतिहासिक विरासत और गार्डन भी है। आप यहाँ 40 रुपये की टिकट लेकर प्रवेश कर सकते हैं। नाम से समझ आता है ये सिर्फ एक गार्डन भर है पर अंदर जाने पर मालूम हुआ यहां तो बहुत कुछ है। परिवार के साथ क्वालिटी टाइम बिताने और नेचर के करीब जाने के लिए ये जगह बिल्कुल परफेक्ट है। टाइम्स मैगज़ीन ने 2018 के अपने सर्वे में सुंदर नर्सरी (Sunder Nursery) को 100 सर्वश्रेष्ठ घूमने लायक जगहों में शामिल किया है। इस नर्सरी का हर ज़र्रा-ज़र्रा इसके बदलाव की तस्वीरों की गवाही देता है। दरअसल ये जगह लगभग पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी थी। आर्किलोजिकल डिपार्टमेंट के मार्गदर्शन में इस जगह पर पुनर्निर्माण कार्य शुरू किया गया। नतीजा आज ये नर्सरी देखने के लिहाज़ से बेहद खूबसूरत लगती है। मुग़ल आर्किटेचर और बाग-बगीचों से सजी ये नर्सरी लगभग 90 एकड़ में फैली हुई है। एंट्री गेट पर नक्शा देखकर ये तो समझ आ गया था कि आज पैरों की अच्छी-खासी कसरत होने वाली है। आप भी यहां आएं तब ये माइंड सेट करके आएं की खूब सारा पैदल चलना पड़ेगा तभी इसकी नायाब खूबसूरती के दीदार कर पाएंगे।(Sunder Nursery) अंदर घुसते ही सबसे पहले एक मकबरा नजर आया। छानबीन से मालूम हुआ ये सुंदर बुर्ज़ है। इस मकबरे की अंदरूनी खूबसूरती का बखान करना मुश्किल है। 16वीं सदी की इस मुगलकालीन इमारत के अंदरूनी हिस्सें में सफेद चूना पत्थर से सजावट की गई है। पूरा मकबरा कुरान की आयतों से सजा है। इस बेहतरीन मकबरें के दीदार से सफर की शुरुआत कुछ ज्यादा ही रोमांचित लगने लगी। खास बात ये थी जगह-जगह इस पूरी नर्सरी की बदलती तस्वीरों को दिखाया गया था। जो इस खूबसूरत क्षेत्र की हर कहानी को दिखाने के लिए जरूरी भी है। लक्कड़वाड़ा बुर्ज चलते-चलते झील के सुंदर नज़ारे भी आराम से देखने मिल रहे थे। यकीन मानिये आपका मन ऐसी खूबसूरती देख उत्साहित हुए बिना रह ही नहीं सकता। कुदरत की ये बेहतरीन नक्काशी किसी कागज पर उतारना कई बार किसी लेखक के बस में भी नहीं होती। रास्ते में एक और ऐतिहासिक विरासत दिखी। ये था 16वीं सदी का लक्कड़वाड़ा बुर्ज। इस बुर्ज की खासियत ये है कि इसे 2017 में इसकी बनावटी खूबसूरती को देखते हुए विश्व विरासत घोषित किया गया। सामने की ओर से ये पूरा बुर्ज गुलाब बाग से सुसज्जित है। इस नर्सरी में जगह-जगह पेड़ों की कई प्रजातियां मौजूद है। हर पेड़ पर उसका नाम देख कर आप उसकी प्रजाति का पता आसानी से लगा सकते हैं। साथ ही साथ यहां पक्षियों की लगभग 80 प्रजातियां संरक्षित हैं। घूमते हुए रास्ते भर तरह-तरह के पक्षियों की आवाज़ें सुनाई दे रहीं थी। यहां ये फैसला करना थोड़ा मुश्किल हो जाता है कि अगली जगह कौन-सी देखी जाए। शानदार पिकनिक स्पॉट चलते हुए एक और खास जगह दिखाई दी जिससे मन आनंदित हो गया। बांस के पेड़ों की ओंट में ठीक झील के सामने एक कैफ़े दिखा। सोचिए कुदरत की गोद में बैठ कर लंच का मज़ा ही कुछ और होगा। इसके दूसरी तरफ ठीक सामने फूलों से भरी रंगीन नर्सरी थी। ऐसे में प्रेमी जोड़े और उनके खिलखिलाते चेहरे देख कर नजारा और भी हसीन लगने लगा। जगह-जगह बच्चों के लिए प्लेइंग जोन मिल जाएंगे। न केवल युवाओं के लिए बल्कि परिवार और बच्चों के साथ भी यहां आ के आपका दिन बन सकता है।(Sunder Nursery) सुन्दरवाला महल बाहर निकलते हुए एक और महल पर नजर पड़ी। ये था सुन्दरवाला महल। जगह-जगह गार्डन और मकबरों का ऐसा मेल आपको बोरियत का एहसास तो बिल्कुल नहीं होने देगा। इस महल में कब्रगाह के चारों तरफ आठ कमरे बने हैं। जो इसे चौकोर मकबरे का आकार देता है। इस महल की हालत बहुत ज्यादा खराब हो चुकी थी जिसे पुनर्निर्माण के जरिये ठीक किया गया। इसके ठीक सामने एक भूमिगत रंगमंच भी है। सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजनों में इसका उपयोग किया जाता है। सफर में आगे बढ़ते हुए तरफ-तरह के पक्षियों और फूलों को देखना लुभाता है। रास्ते में छोटे-छोटे कॉफी पॉइंट नजारों को और भी ज्यादा आकर्षक बना देते हैं। अंतिम पड़ाव में एक और ऐतिहासिक इमारत पर नज़र पड़ी। ये था मिर्जा मुजफ्फर हुसैन का मकबरा। बादशाह अकबर के दामाद का ये मकबरा एक दुर्लभ ढांचा है। इसके अंदर कब्र है जिसे आठ कमरों से घेरा हुआ है। महीन सजावट और आयतों से सजा ये मकबरा देखने के लिहाज से बेहद खास है। इसकी सुंदरता मोहित करती है। (Sunder Nursery) क्यों जाएँ सुन्दर नर्सरी?    Five Reasons to Visit This Place – 1.आप चाहें तो यहाँ घंटों व्यतीत कर सकते हैं क्योंकि इस जगह बोर होने का तो सवाल ही नहीं उठता। 2. जिन प्रकृति प्रेमियों को नई-नई जगह देखने का शौक हो उनके लिए सुन्दर नर्सरी एक उम्दा विकल्प है। 3. वैसे आप यहाँ किसी भी समय आ सकते हैं लेकिन फिर भी जब मौसम थोड़ा ठंडा हो तब यहां आना बेहतर रहता है। 4. यहाँ स्थित झील, सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए ओपन एयर थिएटर, भव्य मकबरें और महल आपको प्रकृति और इतिहास दोनों का अहसास कराएंगे। 5. दिल्ली में क्वालिटी टाइम बिताने के लिए यह बेहद शानदार जगह है।  फ़िलहाल हमारा ये सफर तो यहीं खत्म हुआ पर हम फिर मिलेंगे किसी नए सफर पर। Written & Research – Nikki Rai Edited by Pardeep Kumar some glimpse of Sunder Nursery Garden……