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बटेश्वर धाम– शिव की तपोभूमि और इतिहास का सुंदर संग, मेरा सफरनामा

हमारे देश भर में देवों के देव महादेव के बहुत सारे मंदिर हैं और इन सभी के पीछे एक दिलचस्प कहानी है। इन्हीं मंदिरों में एक बटेश्वर नाथ मंदिर है, जो उत्तर प्रदेश के आगरा से 70 किलोमीटर दूर यमुना तट पर स्थित है। बटेश्वर धाम का नाम ‘वट’ (बरगद का पेड़) और ‘ईश्वर’ (भगवान शिव) से मिलकर बना है। मान्यता है कि भगवान शिव ने यहाँ वटवृक्ष के नीचे तपस्या की थी। इसलिए इस स्थान को ‘बटेश्वर’ कहा गया। यह भी माना जाता है कि भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय का जन्म भी यहीं हुआ था।

बटेश्वर धाम

इस मंदिर में शिव को मूंछों और बड़ी-बड़ी आंखों के साथ दिखाया गया है। यहाँ शिव और पार्वती सेठ-सेठानी की मुद्रा में बैठे हैं। शिव की यह मूर्ति दुनिया में इकलौती मूर्ति है। शिव को समर्पित इस विशाल मंदिर की दीवारों पर ऊँची गुंबददार छत है तथा इसका गर्भगृह रंगीन चित्रों से सुसज्जित है।

बटेश्वर धाम

गर्भगृह के सामने एक कलात्मक मंडप है। इस मंदिर में एक हजार मिट्टी के दीपकों का स्तंभ है, जिसे ‘सहस्र दीपक स्तंभ’ कहा जाता है। यह 101 शिव मंदिरों की श्रृंखला के लिए जाना जाता है, जिसे राजा बदन सिंह भदौरिया द्वारा बनवाया गया था। सावन माह का आगमन होने वाला है, तो शिव के इस मंदिर से जुड़ी कथा को विस्तार से जानते हैं।

पुराणों में एक उल्लेख के अनुसार, यहाँ पर भगवान श्री कृष्ण के पितामह राजा शूरसेन की राजधानी थी। महाभारत काल के दौरान वासुदेव की बारात बटेश्वर से मथुरा गई थी। जब जरासंध ने मथुरा पर आक्रमण किया तो यह स्थान भी नष्ट-भ्रष्ट हो गया। बटेश्वर-महात्म्य के अनुसार महाभारत युद्ध के समय बलभद्र विरक्त होकर इस स्थान पर तीर्थ यात्रा के लिए आए थे। यह भी लोकश्रुति है कि कंस का मृत शरीर बहते हुए बटेश्वर में आकर ‘कंस किनारा’ नामक स्थान पर ठहर गया था।

बटेश्वर धाम

बटेश्वर शेरशाह सूरी का भी आक्रमण केंद्र रहा है। उसने यहाँ पर किले भी बनवाए थे। पानीपत के तीसरे युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए हजारों मराठों की स्मृति में मराठा सम्राट मारू शंकर ने बटेश्वर में एक विशाल मंदिर बनवाया था, जो उनकी वीरगाथा अब भी सुना रहा है। इस मंदिर में वीर योद्धाओं को दीप जलाकर श्रद्धांजलि दी जाती थी। दीपक रखने के निशान आज भी यहाँ देखे जा सकते हैं।

कहा जाता है कि भदावर के राजा बदन सिंह भदौरिया और मैनपुरी के राजा के बीच हमेशा युद्ध होते रहते थे। राजा बदन सिंह भदौरिया और तत्कालीन राजा परमार, दोनों की रानियाँ गर्भवती थीं। दोनों मित्रों ने आपस में समझौता किया कि जिसके भी कन्या होगी, वह दूसरे के पुत्र से शादी करेंगे। दोनों राजाओं के यहाँ पुत्री ही हुईं, परंतु राजा बदन सिंह ने राजा परमार के पास झूठी खबर भिजवा दी कि उनको पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई है। समय बीतता गया, राजा परमार अपनी कन्या के विवाह के लिए राजा बदन सिंह के पुत्र का इंतजार करते रहे।

बटेश्वर धाम

एक दिन बदन सिंह भदौरिया की बेटी को पता चला कि उसके पिता ने राजा परमार से झूठ बोला है तथा अपने लड़के से शादी करने का वचन दिया है। पिता के वचन को पूरा करने के लिए वह बटेश्वर नामक स्थान पर शिव की कठोर तपस्या करने लगी। पिता की लाज और विनती न सुने जाने के कारण उसने आत्महत्या के लिए यमुना में छलांग लगा दी। भगवान शिव की तपस्या का चमत्कार हुआ — वह कन्या उसी जगह पर पुरुष रूप में उत्पन्न हुई। इस खुशी के कारण राजा बदन सिंह भदौरिया ने बटेश्वर में एक सौ एक मंदिरों का निर्माण करवाया, जो बटेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हुए। जिनमें से अभी 51 मंदिर अस्तित्व में हैं।

यहाँ यमुना नदी पश्चिम से पूरब दिशा की ओर बहती है, लेकिन इस पवित्र धाम में यह पूरब से पश्चिम दिशा की ओर बहती हुई बटेश्वर का चक्कर लगाती है। यह आकृति अर्धचंद्राकार का रूप लेती हुई बह रही है। जानकारी के लिए बता दें कि भगवान शिव और माता पार्वती यहाँ सेठ-सेठानी की मुद्रा में विराजमान हैं।

बटेश्वर मेला यहाँ हर साल एक बड़ा पशु मेला अक्टूबर और नवंबर के महीने में (प्रतिवर्ष कार्तिक मास) आयोजित किया जाता है। शिव का एक नाम पशुपति भी है, बटेश्वर का पशु मेला इसे सार्थक करता है। बटेश्वर का पशुओं का मेला पूरे भारत में प्रसिद्ध है तथा इस मेले का आनंद लेने के लिए देश-विदेश से पर्यटक आते हैं।

यह मेला तीन चरणों में पूरा होता है: पहले चरण में ऊँट, घोड़े और गधों की बिक्री होती है, दूसरे चरण में गाय आदि अन्य पशुओं की तथा अंतिम चरण में सांस्कृतिक रंगारंग कार्यक्रम होते हैं। मेला शुरू होने के एक सप्ताह पहले से ही पशु-व्यापारी अपने पशु लेकर यहाँ पहुँचने लगते हैं। मेले में पशुओं की विभिन्न प्रकार की दौड़ों का आयोजन भी किया जाता है। बटेश्वर का यह छोटा सा शहर अब भी शहर के व्यस्त जीवन से मन की शांति प्रदान करता है, जो हिन्दुओं और जैनियों के लिए पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख स्थान है।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का बटेश्वर से गहरा संबंध है। वे मूल रूप से बटेश्वर, उत्तर प्रदेश के रहने वाले थे। वायु सेना प्रमुख आर. के. एस. भदौरिया का जन्म भी यहीं हुआ है। कारगिल में शहीद हुए कई जवान यहीं के थे।

बटेश्वर धाम से कुछ दूरी पर 22वें जैन तीर्थंकर भगवान नेमिनाथ की जन्मस्थली भी है। जैन परंपराओं के अनुसार मुनि गर्भकल्याणक तथा जन्मकल्याणक का निर्वाण इसी स्थान पर हुआ था, जिनका भव्य मंदिर आज पर्यटक केंद्र बना हुआ है।

जैन मंदिरों की स्थापत्य शैली गुप्त काल और मध्यकालीन भारतीय शिल्पकला का अद्भुत उदाहरण है। इन मंदिरों में सुंदर तोरणद्वार (अर्च), उत्कीर्ण स्तंभ, और ध्यानमग्न तीर्थंकरों की मूर्तियाँ विशेष रूप से देखने लायक हैं। मंदिरों के गर्भगृह में श्वेत संगमरमर से निर्मित तीर्थंकरों की प्रतिमाएं प्रतिष्ठित हैं, जिनमें नेमिनाथ, पार्श्वनाथ और महावीर स्वामी प्रमुख हैं।

बटेश्वर धाम की यात्रा किसी ध्यानस्थ योगी के सान्निध्य जैसी होती है। शांत वातावरण, मंदिरों की घंटियों की ध्वनि, यमुना की कलकल करती धाराएँ और श्रद्धालुओं की आस्था – सब मिलकर मन को शांति प्रदान करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि यहाँ पर लाखों लोगों की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। राजनीति से लेकर देश के जवानों तक, इस मिट्टी ने देश को अनमोल रत्न दिए हैं।

बटेश्वर धाम एक ऐसा स्थान है जहाँ आध्यात्म और इतिहास एक साथ टकराते हैं। यहाँ की प्राकृतिक सादगी, मंदिरों की सांस्कृतिक महत्वता और घटनाओं की जीवंतता यात्रियों को अपनी ओर आकर्षित करती है। अगर आप उत्तर भारत में धार्मिक या ऐतिहासिक पर्यटन की योजना बना रहे हैं — तो हमेशा बटेश्वर धाम को अपनी सूची में शामिल करें

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