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Travel News-PM Modi ने Sant Ravidas Express को दिखाई हरी झंडी, Varanasi से Amritsar तक आसान होगा सफर

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अगर आप Spiritual Travel के शौकीन हैं या North India में आरामदायक Train Journey का इंतज़ार कर रहे थे, तो आपके लिए बड़ी खुशखबरी है। PM Narendra Modi ने नई Sant Ravidas Express को हरी झंडी दिखाई है, जो Varanasi और Chheharta (Amritsar) के बीच सीधी कनेक्टिविटी देगी। इस नई Overnight Train से न सिर्फ़ सफर ज़्यादा Comfortable होगा, बल्कि Religious Tourism, Family Travel और Business Travel को भी बड़ा Boost मिलने की उम्मीद है। क्या है Sant Ravidas Express? Sant Ravidas Express एक नई Premium Sleeper Train है, जो उत्तर प्रदेश के Varanasi और पंजाब के Chheharta (Amritsar) के बीच चलेगी। यह Train दोनों राज्यों के लाखों यात्रियों के लिए बेहतर Connectivity लेकर आएगी और खासतौर पर उन लोगों के लिए फ़ायदेमंद होगी जो धार्मिक स्थलों की यात्रा करते हैं। Train Route और Major Stops यह Train अपने सफर के दौरान कई अहम शहरों से होकर गुज़रेगी। Varanasi Jaunpur City Sultanpur Lucknow Shahjahanpur Bareilly Moradabad Saharanpur Ambala Cantt Ludhiana Jalandhar City Amritsar Chheharta इन स्टेशनों की वजह से उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब के यात्रियों को Direct Rail Connectivity मिलेगी। Train Schedule Varanasi से Chheharta Departure – 7:05 PM Arrival – अगले दिन 5:10 PM Chheharta से Varanasi Departure – 2:05 PM Arrival – अगले दिन 12:15 PM यह Train फिलहाल सप्ताह में तीन दिन चलेगी, जिससे यात्रियों को बेहतर Travel Planning का मौका मिलेगा। Passengers को क्या-क्या मिलेगा? नई Sant Ravidas Express में कई Modern Features दिए गए हैं। Fully Air-Conditioned Sleeper Coaches आरामदायक Berths Bio-Vacuum Toilets CCTV Surveillance Automatic Doors Passenger Information System बेहतर Safety Features इन सुविधाओं का मक़सद Overnight Journey को ज़्यादा Safe और Comfortable बनाना है। Religious Tourism को मिलेगा बड़ा Boost यह Train दो बेहद अहम धार्मिक शहरों को जोड़ती है। Varanasi – Kashi Vishwanath Temple, Ganga Ghats और शाम की Ganga Aarti के लिए दुनियाभर में मशहूर। Amritsar – Golden Temple, Jallianwala Bagh और Wagah Border Ceremony के लिए जाना जाता है। नई Direct Connectivity की वजह से Weekend Pilgrimage और Family Trips पहले से कहीं ज़्यादा आसान हो जाएंगी। किन लोगों को होगा सबसे ज़्यादा फायदा? Pilgrimage करने वाले श्रद्धालु। Family Vacation प्लान करने वाले यात्री। Business Travellers। Students और Regular Passengers। उत्तर प्रदेश और पंजाब के बीच आने-जाने वाले लोग। Five Colors of Travel Tips अगर आप Varanasi जा रहे हैं, तो सुबह की Ganga Aarti और Kashi Vishwanath Corridor को अपनी Itinerary में ज़रूर शामिल करें। Amritsar पहुँचकर Golden Temple में सुबह या रात का वक़्त चुनें, उस समय का माहौल सबसे ज़्यादा सुकूनभरा होता है। Peak Season में Travel कर रहे हैं तो अपनी Train Tickets पहले से Book कर लें। Overnight Journey के लिए हल्का सामान और ज़रूरी Documents हमेशा साथ रखें। अगर समय हो, तो Amritsar में Jallianwala Bagh और Wagah Border Ceremony भी ज़रूर Explore करें। Sant Ravidas Express सिर्फ़ एक नई Train नहीं, बल्कि North India के दो बड़े धार्मिक और सांस्कृतिक शहरों के बीच एक मज़बूत कड़ी है। इससे लाखों यात्रियों का सफर आसान होगा, Tourism को नई रफ़्तार मिलेगी और Comfortable Rail Travel का Experience भी बेहतर बनेगा। अगर आपकी Next Trip Varanasi या Amritsar की है, तो यह नई Train आपके Travel Plan को और भी Smooth बना सकती है।

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7 Highway Dhabas जो Food Lovers के Favourite हैं

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अगर आपके लिए सफर सिर्फ मंज़िल तक पहुंचना नहीं बल्कि रास्ते का हर लम्हा जीना है, तो यकीन मानिए एक अच्छा Highway dhaba उस ट्रिप को यादगार बना देता है। India के Highway सिर्फ लंबी सड़कें नहीं हैं, बल्कि यहां आपको ऐसा देसी स्वाद मिलता है जो बड़े-बड़े Restaurants भी कई बार नहीं दे पाते। ताज़ा तंदूरी रोटियां, मक्खन से लबालब दाल, गरमा-गरम परांठे, लस्सी का बड़ा ग्लास और मिट्टी की खुशबू… यही तो असली Highway वाली फील है। अगर आप भी Road Trip के दौरान बढ़िया Food की तलाश में रहते हैं, तो ये लिस्ट आपके लिए है। यहां हम बात करेंगे India के उन 7 Highway dhabas की, जहां सिर्फ Truck Drivers ही नहीं बल्कि Families, Bikers, Travel Vloggers और Food Lovers भी बार-बार पहुंचते हैं। 1. Amrik Sukhdev Dhaba, Murthal (Haryana) Murthal का नाम सुनते ही सबसे पहले दिमाग में आता है Amrik Sukhdev Dhaba। Delhi से Chandigarh जाने वाले Highway पर मौजूद ये dhaba सालों से Food Lovers का Favourite बना हुआ है। सुबह हो या आधी रात, यहां हमेशा रौनक देखने को मिलती है। क्या खास है? यहां के Stuffed Parathas पूरी India में मशहूर हैं। White Butter, Curd और Pickle के साथ मिलने वाला Combination लोगों को बार-बार यहां खींच लाता है। Family Seating, Parking और साफ-सफाई इसे Road Trips के लिए Perfect बनाती है। यहां क्या देखें? Live Tandoor Giant Lassi Glass Murthal का Highway Vibe घूमने का सबसे अच्छा समय सुबह 6 बजे से 10 बजे तक या फिर Winter Season में यहां का मज़ा दोगुना हो जाता है। कैसे पहुंचे? Delhi-Chandigarh NH-44 पर Murthal पहुंचकर आसानी से यहां पहुंच सकते हैं। 2. Cheetal Grand Dhaba, Khatauli (Uttar Pradesh) Delhi-Dehradun Highway पर मौजूद Cheetal Grand Dhaba सिर्फ खाने के लिए नहीं बल्कि पूरे Travel Experience के लिए जाना जाता है। यहां Food Court जैसा माहौल मिलता है लेकिन स्वाद पूरी तरह देसी है। क्या खास है? Crispy Jalebi और Kachori। South Indian से लेकर North Indian तक कई Options। Clean Washrooms और Family Friendly माहौल। यहां क्या देखें? Beautiful Garden Area Food Plaza Local Sweets Section घूमने का सबसे अच्छा समय सुबह का Breakfast या शाम की Tea Break। कैसे पहुंचे? Delhi-Dehradun Highway पर Khatauli में स्थित है। 3. Pahalwan Dhaba, Murthal (Haryana) Murthal सिर्फ एक Dhaba के लिए नहीं जाना जाता। Pahalwan Dhaba भी उतना ही Famous है और खासकर उसके देसी खाने की वजह से लोगों की पहली पसंद है। क्या खास है? Paneer Paratha Dal Makhani Fresh Butter और Sweet Lassi यहां क्या देखें? Traditional Tandoor Open Seating Punjabi Hospitality घूमने का सबसे अच्छा समय October से March तक। कैसे पहुंचे? NH-44 पर Murthal के पास। 4. Karnal Haveli Dhaba, Karnal (Haryana) अगर आपको Punjabi Culture और Authentic Food दोनों एक साथ चाहिए तो Karnal Haveli Dhaba शानदार जगह है। यहां का पूरा Setup किसी पुराने Punjabi Village जैसा लगता है। क्या खास है? Sarson Ka Saag और Makki Ki Roti। Punjabi Theme। Traditional Music और Village Decor। यहां क्या देखें? Village Style Architecture Cultural Decor Local Food Counter घूमने का सबसे अच्छा समय Winter Season। कैसे पहुंचे? NH-44 पर Karnal के पास। 5. JhilMil Dhaba, Zirakpur (Punjab) Punjab की तरफ जाते वक्त अगर आपको Authentic Punjabi Food चाहिए तो JhilMil Dhaba जरूर ट्राय करें। यहां का स्वाद और Portion Size दोनों शानदार माने जाते हैं। क्या खास है? Butter Chicken Tandoori Roti Creamy Dal Makhani यहां क्या देखें? Open Dining Punjabi Decor Live Kitchen घूमने का सबसे अच्छा समय शाम के समय। कैसे पहुंचे? Zirakpur Highway से आसानी से पहुंच सकते हैं। 6. Hotel Shere Punjab Dhaba, Behror (Rajasthan) Delhi-Jaipur Highway पर सफर करने वालों के बीच Hotel Shere Punjab Dhaba काफी Popular है। यहां का खाना स्वाद के साथ Quantity के लिए भी जाना जाता है। क्या खास है? Tandoori Platter Butter Naan Special Paneer Curry यहां क्या देखें? Spacious Seating Highway View Family Dining Area घूमने का सबसे अच्छा समय Lunch Time या Evening। कैसे पहुंचे? NH-48 पर Behror के पास। 7. Sardar Ji Dhaba, Ambala (Haryana) अगर आपका Route Chandigarh या Himachal की तरफ है तो Sardar Ji Dhaba एक शानदार Stop बन सकता है। यहां का खाना पूरी तरह Punjabi Style में तैयार किया जाता है। क्या खास है? Chole Kulche Rajma Chawal Tandoori Chai यहां क्या देखें? Traditional Punjabi Ambience Fresh Food Counter Local Dessert Section घूमने का सबसे अच्छा समय सुबह का Breakfast या Evening Snacks। कैसे पहुंचे? Ambala Highway पर आसानी से पहुंच सकते हैं। FIVE कलर्स ऑफ ट्रैवल की तरफ से कुछ सुझाव Highway Trip पर निकलने से पहले अपनी Car या Bike की Basic Checking जरूर कर लें। किसी भी dhaba पर हमेशा Fresh और Hot Food Order करें। ज्यादा Heavy Meal खाने के बाद तुरंत Driving करने से बचें। Cash के साथ UPI भी Ready रखें क्योंकि कुछ जगह Network थोड़ा Weak हो सकता है। अगर Weekend पर जा रहे हैं तो थोड़ा Extra Time लेकर निकलें क्योंकि Famous dhabas पर अच्छी-खासी भीड़ रहती है। Local Special Dish जरूर Try करें। हर dhaba की अपनी Signature Recipe होती है। सफर के दौरान Hydrated रहें और जरूरत पड़ने पर छोटे-छोटे Break लेते रहें। India के Highway dhabas सिर्फ खाने की जगह नहीं बल्कि सफर का एक अहम हिस्सा हैं। यहां मिलने वाला देसी स्वाद, लोगों की मेहमाननवाज़ी और Highway का खुला माहौल Road Trip को एक अलग ही याद बना देता है। अगली बार जब भी Delhi, Punjab, Rajasthan या Uttar Pradesh की तरफ निकलें, तो इन Famous dhabas में से किसी एक पर जरूर रुकिए। हो सकता है आपकी Trip की सबसे बेहतरीन Memory किसी Tourist Spot से नहीं, बल्कि एक गरमा-गरम परांठे और मिट्टी की खुशबू वाले dhaba से जुड़ जाए। तो अब अपनी Playlist Ready कीजिए, Tank Full कराइए और निकल पड़िए एक ऐसे सफर पर जहां मंज़िल से ज्यादा मज़ा रास्ते और Highway dhabas में मिलने वाला लज़ीज़ खाना देगा।

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Indian Railway वाराणसी-साबरमती सुपरफास्ट ट्रेन को मंजूरी!

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अगर आप उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल और गुजरात के बीच अक्सर travel करते हैं, तो आपके लिए बड़ी खुशखबरी है। Indian Railway ने यात्रियों की बढ़ती मांग को देखते हुए वाराणसी और साबरमती (अहमदाबाद) के बीच नई सुपरफास्ट एक्सप्रेस ट्रेन को मंजूरी दे दी है। इस नई ट्रेन सेवा के शुरू होने से दोनों राज्यों के बीच रेल कनेक्टिविटी और मजबूत होगी और यात्रियों को एक सीधा, सुविधाजनक और आरामदायक travel विकल्प मिलेगा। काफी समय से इस रूट पर नई ट्रेन चलाने की मांग की जा रही थी। अब रेलवे के इस फैसले से व्यापारियों, छात्रों, नौकरीपेशा लोगों और श्रद्धालुओं को काफी राहत मिलने की उम्मीद है। Indian Railway का नया तोहफा, बढ़ेगी कनेक्टिविटी Indian Railway की यह नई पहल वाराणसी और साबरमती के बीच यात्रा को पहले से ज्यादा आसान बनाने वाली है। दोनों शहर धार्मिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण माने जाते हैं। हर साल हजारों लोग इन दोनों शहरों के बीच travel करते हैं, लेकिन सीमित ट्रेन विकल्पों की वजह से यात्रियों को अक्सर लंबा इंतजार करना पड़ता था। रेलवे बोर्ड ने यात्रियों की इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए नई सुपरफास्ट ट्रेन को मंजूरी दी है। उम्मीद की जा रही है कि नई सेवा शुरू होने के बाद यात्रियों को कन्फर्म सीट मिलने की संभावना भी बढ़ेगी और सफर पहले से ज्यादा सुविधाजनक होगा। (Indian Railway) शाम को निकलें और अगले दिन पहुंचें साबरमती रेलवे द्वारा जारी शेड्यूल के अनुसार, यह नई सुपरफास्ट ट्रेन वाराणसी जंक्शन से शाम 5:10 बजे रवाना होगी और अगले दिन रात 8:15 बजे साबरमती पहुंचेगी। वहीं वापसी में यह ट्रेन साबरमती से सुबह 5:20 बजे चलेगी और अगले दिन सुबह 6:30 बजे वाराणसी पहुंचेगी। (Indian Railway) ट्रेन की टाइमिंग को इस तरह तैयार किया गया है कि यात्री रात के समय आराम कर सकें और दिन के दौरान अपने जरूरी काम भी आसानी से निपटा सकें। लंबी दूरी के travel के लिए यह शेड्यूल काफी सुविधाजनक माना जा रहा है। इन प्रमुख स्टेशनों से होकर गुजरेगी ट्रेन यह नई सुपरफास्ट एक्सप्रेस उत्तर प्रदेश, राजस्थान और गुजरात के कई महत्वपूर्ण शहरों को आपस में जोड़ेगी। रेलवे के अनुसार, ट्रेन का रूट कई बड़े जंक्शनों से होकर गुजरेगा। इसमें गोविंदपुरी, आगरा, भरतपुर, जयपुर, अजमेर, मारवाड़ और आबू रोड जैसे प्रमुख स्टेशन शामिल हैं। इसके अलावा बांदीकुई जंक्शन, पालनपुर जंक्शन और वीआईआईके जैसे महत्वपूर्ण स्टेशनों पर भी ट्रेन का ठहराव रहेगा। (Indian Railway) इस रूट से छोटे शहरों के यात्रियों को भी बेहतर travel सुविधा मिलेगी और उन्हें देश के अलग-अलग हिस्सों को explore करने का नया अवसर मिलेगा। इस रूट पर पहले से चल रही हैं ये ट्रेनें- Indian Railway वाराणसी और अहमदाबाद के बीच पहले से भी कुछ ट्रेन सेवाएं उपलब्ध हैं। इनमें साबरमती एक्सप्रेस (19168) यात्रियों के बीच काफी लोकप्रिय है। यह ट्रेन वाराणसी सिटी से दोपहर 2:00 बजे अपनी यात्रा शुरू करती है और लगभग 34 घंटे 55 मिनट का सफर तय करके तीसरे दिन अहमदाबाद जंक्शन पहुंचती है। इस ट्रेन में फर्स्ट एसी, एसी थ्री टियर, स्लीपर और जनरल कोच सहित कई श्रेणियों की सुविधाएं उपलब्ध हैं। इसके अलावा इस रूट पर साप्ताहिक सुपरफास्ट एक्सप्रेस (20964) भी संचालित होती है, जो प्रत्येक शनिवार को चलती है और वाराणसी से साबरमती की दूरी लगभग 29 घंटे 45 मिनट में पूरी करती है। (Indian Railway) नई सुपरफास्ट ट्रेन शुरू होने के बाद यात्रियों को travel के लिए एक और बेहतर विकल्प मिलने वाला है। पर्यटन और व्यापार को मिलेगा बढ़ावा नई ट्रेन सेवा का फायदा केवल यात्रियों तक सीमित नहीं रहेगा। इससे उत्तर प्रदेश और गुजरात के बीच पर्यटन और व्यापारिक गतिविधियों को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। अब लोग वाराणसी की प्रसिद्ध गंगा आरती, मंदिरों और सांस्कृतिक धरोहरों को आसानी से explore कर सकेंगे। वहीं गुजरात जाने वाले यात्रियों के लिए साबरमती आश्रम और अहमदाबाद के ऐतिहासिक स्थलों तक पहुंचना पहले से ज्यादा आसान हो जाएगा। रेलवे का मानना है कि बेहतर travel सुविधाओं से दोनों राज्यों के बीच लोगों की आवाजाही बढ़ेगी, जिससे आर्थिक गतिविधियों को भी मजबूती मिलेगी। Five Colors of Travel की ओर से आपके लिए 5 खास सुझाव नई ट्रेन शुरू होने के बाद शुरुआती दिनों में सीटों की मांग ज्यादा रह सकती है, इसलिए अपना travel प्लान पहले से तैयार रखें। अगर आप बीच के किसी स्टेशन से यात्रा करने वाले हैं, तो बोर्डिंग और आगमन का समय पहले ही देख लें। खाना, पानी, मोबाइल चार्जर और जरूरी दवाइयां अपने travel बैग में जरूर रखें। स्टेशन के लिए निकलने से पहले NTES या रेलवे की आधिकारिक जानकारी जरूर चेक करें। इस रूट पर कई खूबसूरत शहर आते हैं, इसलिए अपने travel के दौरान आसपास की जगहों को भी explore करने का मौका जरूर लें। वाराणसी और साबरमती के बीच नई सुपरफास्ट ट्रेन की मंजूरी यात्रियों के लिए एक बड़ी राहत की खबर है। इससे दोनों शहरों के बीच रेल कनेक्टिविटी मजबूत होगी और लंबी दूरी का travel पहले से ज्यादा आसान, सुविधाजनक और आरामदायक बन सकेगा। आने वाले समय में यह नई सेवा पर्यटन, व्यापार और लोगों की आवाजाही को नई रफ्तार देने में अहम भूमिका निभा सकती है। (Indian Railway)

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सोरों- क्या वाक़ई धरती का केंद्र है ये मंदिरों की नगरी, मेरा सफरनामा

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मेरे पिता जी का जन्म स्थान सोरों शूकरक्षेत्र, उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले में स्थित गंगा नदी के समीप एक सतयुगीन तीर्थस्थल और वराह भगवान की अवतार भूमि के रूप में जाना जाता है। इस स्थान को तुलसीदास जी की जन्मभूमि भी माना जाता है। आज भी जब मैं वहाँ जाती हूँ तो पुराने दरवाज़े, मकान, मंदिर और खंडहर देखकर विस्मित हो उठती हूँ उसपर भी जब सब बड़े हमें बताते है कि कैसे कारीगरी करके इन्हें बनाया गया था, तो सुनकर और भी अच्छा लगता है। हालाँकि, आज उन मकानों में कोई रहता तो नहीं है और आधुनिकीकरण के चलते बहुत से बदलाव आए हैं पर सोरों जाकर लगता है कि आज भी कुछ पुराने वक़्त के लम्हों को जी रही हूँ। मैं अच्छी साँस ले रही हूँ और एक ऐसा सुकून महसूस कर रही हूँ जो मुझे अपने जन्म स्थान दिल्ली में नहीं मिलता है। शायद इसीलिए वहाँ जाने पर मन करता है कि वहीं बस जाऊं। मंदिरों की नगरी, मेरा गाँव सोरों सोरों जी एक तीर्थ स्थल है। ये जगह मंदिरों से घिरी हुई है। पग पग पर यहाँ मंदिरों की खूबसूरत शृंखलाएँ हैं। हर रास्ते से गुजरते हुए आपको एक न एक नया-पुराना मंदिर जरूर दिखेगा। और बल्कि यहाँ तो कुछ ऐसे पुराने मकान भी मौजूद हैं जो किसी मंदिर से कम मालूम नहीं होते। यहाँ की गलियों से गुजरते हुए आप ऐसा अनुभव करते हैं जैसे आप किसी पुरानी दुनिया में आ गए हों और जहाँ आप पौराणिकता को भी महसूस करने लग जाएं। यहाँ मंदिरों की बात ही कुछ और है। क्योंकि कुछ विकसित शहरों की तरह यहाँ के मंदिरों में लोग आपको केवल तस्वीरें खींचते या खिंचवाते नहीं मिलेंगे बल्कि शांति से बैठे या भजन कीर्तन में संलग्न दिखेंगे। जब मैं थोड़ी और छोटी थी और अपने गांव जाती थी, तो हमारे बाबा हमें गंगाजी की एक परिक्रमा लगवाते थे जिसमें न जाने कितने मंदिर आते थे। और ये मंदिर आज भी उतने ही जीवंत लगते हैं। कुछ मंदिरों का जीर्णोद्धार हो गया है लेकिन ज्यादातर मंदिरों में आज भी वो पारंपरिक और सांस्कृतिक झलक देखने को मिलती है जो केवल यहीं मिल सकती है। मानो तो सब सच है.. जब भी मैं सोरों जाती हूंँ वहाँ पर मुझे लोगों से एक बात अक्सर सुनने को मिलती है कि यह नगरी नदियों की गोद में एक पावन तीर्थ स्थल होने के साथ संसार का केंद्र भी है। मान्यताओं के अनुसार पृथ्वी के प्रलय में डूबने के समय भगवान वराह ने अपनी नाक पर पृथ्वी को रखकर इसकी रक्षा की थी। कुछ दिनों पहले जब हम यहाँ जा रहे थे तो बस में बैठे एक अनजान अंकल से मेरे पापा की बात होने लगी। वे दोनों एक दूजे को इस स्थान की पारंपरिक और सांस्कृतिक सुंदरता का बखान करने लगे। मैं उन दोनों की बातें सुन रही थी और सोच रही थी क्या वाकई गंगा की उपनदियों से घिरा ये छोटा सा गांव, इतने बड़े संसार का केंद्र हो सकता है। क्योंकि पृथ्वी तो गोल है और इसका कोई छोर नहीं। सोरों में गंगा आरती की बेला जब हम यहाँ अपने पुराने घर पहुंचे तो हमारे घर से कुछ ही कदम की दूरी पर स्थित चारों ओर से घिरी गंगा जी की परिक्रमा के लिए गए। ऐसा मनोरम दृश्य मैंने उसे दिन से पहले कभी नहीं देखा था। गंगा आरती शुरू हुई और हम पुजारी के हाथ में जल रही, दिये की लौ को देखकर उसमें खो गए। हमें इस बात का बिल्कुल आभास नहीं था कि आगे क्या होने वाला है, लेकिन जब वह हुआ तो यह पल मेरे लिए पूरी जिंदगी की याद बन गया। अचानक हल्की-हल्की बूंदा-बांदी शुरू हो गई। और कब ये बूंदा-बांदी बारिश में तब्दील हो गई हमें पता भी नहीं चला। और फिर शाम का वक्त हो चला था तो पूरे क्षेत्र में रंग बिरंगी चमचमाती लाइटें जला दी गईं। बारिश की गिरती बूंदों के साथ उन चमचमाती रंग बिरंगी लाइट का जो प्रतिबिंब गंगा की धारा में दिख रहा था वह मेरे दिल को एक ऐसा सुकून दे रहा था जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी।‎उस दिन मैंने जाना कि कभी-कभी हम बिना बोले भी बहुत सारी बातें कर जाते हैं। जो उस दिन मैंने उस नदी से और अपने दिल से की। ‎नाव तो सिर्फ तस्वीर के लिए थी अपने घर के पास वाली गंगा नदी से दूर हम एक प्रचलित नदी, कछला पहुंचे। हम खूब नहाए और हमने बहुत सारे मजे किए। लेकिन जैसे ही मैंने नाव देखी मेरा मन उसमें बैठने को कर गया। मैंने अपने पिताजी से कहा कि मुझे इस नाव में बैठना है पर उन्होंने साफ इनकार कर दिया। मन थोड़ा दुखी हुआ पर सोचा, कि चलो यह सब तो जिंदगी का हिस्सा है। लेकिन मैंने हार नहीं मानी अगर मैं उसमें बैठकर नहीं घूम पाई तब भी मैंने उसमें बैठकर एक तस्वीर जरूर ली। और वह तस्वीर इतनी सुंदर आई कि आज तक मेरे ज़हन और मेरी इंस्टाग्राम की पोस्ट में छपी हुई है। कभी कभी मेरे दिल में ख़्याल आता है..एकान्त ही शोर से बेहतर है। शान्त ही शोख से बेहतर है। जब भी मैं यहाँ जाती हूँ, यह ख्याल मेरे जहन में जरूर उमड़ता है कि शांति कितनी अच्छी हो सकती है और एकांत में रहना आपके दिल को कितना सुकून दे सकता है। भले ही, आप उत्तर प्रदेश में रहते हैं या दिल्ली में या फिर भारत के किसी और कोने में। आपको एक बार इस शांति का अनुभव करने के लिए और इस पौराणिकता को महसूस करने के लिए यहाँ जरूर जाना चाहिए। मेरा सफरनामा- नंदनी वार्ष्णेय

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सिर्फ कत्थक ही नहीं और भी कई प्रकार के नृत्य कलाओं का उद्गम स्थल है उत्तर प्रदेश

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जब भी हम इंडियन क्लासिकल डांसिंग की बात करते हैं तो हमारे जहन में जो डांस फॉर्म सबसे पहले आता है उसका नाम है- कत्थक!जी हाँ! कत्थक नृत्य का एक ऐसा प्रकार है इसके बारे में शायद हीं किसी भारतीय को पता ना हो। लेकिन क्या आपको पता है कि कत्थक का इतिहास क्या है? कत्थक नृत्य की परंपरा किस राज्य से जुड़ी हुई है? अगर नहीं पता है तो कोई चिंता की बात नहीं है। क्योंकि आज के इस ब्लॉग में हम आपको बताने वाले हैं उत्तर प्रदेश के प्रसिद्ध नृत्य कलाओं (Cultural Dances of Uttarpradesh) के बारे में। और इस क्रम में आपको आपके सवालों के जवाब भी जरूर मिल जाएंगे। तो जुड़े रहिए हमारे साथ फाइव कलर्स ऑफ़ ट्रैवल (Five colors of travel) के इस ब्लॉग में। कथक कथक भारतीय शास्त्रीय नृत्यों में से एक है, जो मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के लखनऊ और वाराणसी क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। यह नृत्य अपनी गहरी गाहक के साथ कहानी का प्रस्तुतिकरण करता है और इसमें ताल, तालिका, भाव, अभिनय, और तकनीकी पहलुओं का मिश्रण होता है। कथक का इतिहास बहुत पुराना है और इसे मुग़ल शासकों के दरबारों में विकसित किया गया था। इसका नाम “कथा” (कहानी) और “कथा वाचन” (कहानी का पाठ) से आया है, क्योंकि यह नृत्य कहानी का प्रस्तुतिकरण करता है। कथक के विशेषताएँ इस प्रकार हैं: गहरा भावनात्मक संवाद: कथक में भाव का महत्वपूर्ण स्थान है। नृत्यांग (दिल, हृदय) के माध्यम से नायक-नायिका के भावों का प्रस्तुतिकरण किया जाता है। ताल, तालिका, और लय: कथक में ताल, तालिका (बोल) और लय की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। ये सभी तत्व एक सही तरीके से प्रदर्शित किए जाते हैं और उन्हें सही समय पर और सही ढंग से उपयोग किया जाता है। चौक, तारीक, अमाद, अवर्तन: कथक के लिए चार प्रमुख नृत्यांग होते हैं – चौक, तारीक, अमाद, और अवर्तन। इन्हें प्रकट करने के लिए विभिन्न तकनीकी चालें और पद्धतियाँ होती हैं। अभिनय: कथक में अभिनय की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। नृत्य के माध्यम से भाव, भावनाएँ, और कहानी का प्रस्तुतिकरण किया जाता है। तकनीकी पहलू: कथक में तकनीकी पहलू का महत्वपूर्ण स्थान है। यह नृत्य की गतिशीलता, तरलता, और समता को संरक्षित करता है। कथक एक बहुत ही सुंदर, गहरा, और उत्तेजक नृत्य है जो भारतीय सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह विभिन्न सांस्कृतिक उत्सवों, धार्मिक पाठ्यक्रमों, और समारोहों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कथक नृत्य कई सामाजिक और राजनीतिक संदेशों को बताता है। इसके माध्यम से जाति, धर्म, और समाज के महत्वपूर्ण मुद्दे उजागर किए जाते हैं। कथक नृत्य को आधुनिक संगीत, चित्रकला, और टेक्नोलॉजी के साथ मिलाकर नवीनता और उत्थान में मदद मिलती है, जिससे यह आधुनिक युग में भी आधिकारिक रूप से महत्वपूर्ण रहता है। कथक नृत्य न केवल एक कला है, बल्कि एक धार्मिक, सामाजिक, और सांस्कृतिक अनुभव का सदुपयोग करने का एक माध्यम भी है। इसका महत्व उसकी गंभीरता और उदारता में निहित है, जो भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर का हिस्सा बनाता है। रासलीला रासलीला एक प्रसिद्ध पारंपरिक नृत्य शैली है जो भगवान कृष्ण और उनकी प्रिय गोपियों के प्रेम की कथा को दर्शाता है। इस नृत्य के माध्यम से, लोग भगवान कृष्ण की लीलाओं को याद करते हैं और उनके प्रेम के रस का आनंद लेते हैं। रासलीला के बारे में विस्तार से जानकारी: कथा: रासलीला का मुख्य विषय भगवान कृष्ण की ब्रज की गोपियों के साथ रास लीला है। इसमें भगवान कृष्ण गोपियों के साथ गोपिका वस्त्राहरण, माखन चोरी, गोपियों के साथ गोपीका हरण आदि के लीलाओं का नृत्य किया जाता है। अभिनय: रासलीला में अभिनय की बड़ी महत्वपूर्णता होती है। नृत्यांगों के माध्यम से कथा के विभिन्न पलों का अभिनय किया जाता है। रस: यह नृत्य रस के महत्व को प्रकट करता है। गोपियों के प्रेम और भगवान कृष्ण के साथ उनकी भावनाओं को प्रस्तुत करने के माध्यम से, इस नृत्य में भक्ति और प्रेम का अभिव्यक्ति किया जाता है। संगीत: रासलीला के नृत्य के साथ-साथ संगीत भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। श्रीकृष्ण की लीलाओं को संगीत के माध्यम से व्यक्त किया जाता है। परंपरा: रासलीला का अंदाज़ और परंपरा भारतीय सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह हर्षोत्सवों और विशेष अवसरों पर खास रूप से प्रदर्शित किया जाता है। रासलीला एक सुंदर और प्रसिद्ध नृत्य शैली है जो भारतीय संस्कृति के अनमोल भाग को प्रस्तुत करता है। रासलीला नृत्य भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का महत्वपूर्ण प्रस्तुतिकरण है और इसका मुख्य उद्देश्य धार्मिक भावनाओं को संबोधित करना है। यह हिन्दू धर्म में भक्ति और प्रेम का प्रतीक है। रासलीला नृत्य कलात्मक रूप से भी महत्वपूर्ण है, जो नृत्य कला के उदात्ततम रूपों में से एक है। इसमें गायन, नृत्य, और अभिनय का सहयोग होता है और एक साहित्यिक कहानी का अद्वितीय रूपांतरण किया जाता है। रासलीला नृत्य के द्वारा समाज में एकता, सहयोग और सामूहिक भावनाओं को प्रोत्साहित किया जाता है। इसका प्रयोग सामाजिक समूहों के साथ बोंडिंग के लिए भी किया जाता है। रासलीला नृत्य भारतीय संस्कृति में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है और इसका महत्व विभिन्न आयामों में है। यह प्रक्रिया महाभारत और भागवत पुराण की अद्वितीय कहानी “कृष्ण लीला” से प्रेरित है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण के विभिन्न लीलाओं का वर्णन किया गया है। ठुमरी ठुमरी एक उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत की गायन प्रणाली है, जो अधिकतर उत्तर प्रदेश के अवध क्षेत्र के साथ जुड़ी हुई है। इसे अवधी भाषा में गाया जाता है और इसमें प्रेम, विरह, लोभ, और भक्ति जैसे विविध भावों का अभिव्यक्ति किया जाता है। ठुमरी के विशेषताएँ: गायन शैली: ठुमरी का गायन संगीत की लयबद्धता और भावपूर्णता को ध्यान में रखता है। इसमें आवाज की मधुरता और अभिनय की विशेषता होती है। भावप्रद गान: ठुमरी गाने में भावप्रदता को महत्व दिया जाता है। गायक अपनी आवाज़ के माध्यम से विविध भावों को प्रकट करता है, जो सुनने वालों के दिलों को छू लेते हैं। गायन तत्व: ठुमरी में विभिन्न संगीत तत्वों का समाहार होता है, जैसे कि ताल, लय, स्वर, और राग। गायन के माध्यम से भावनाओं का संवेदनशील अभिव्यक्ति किया जाता है। कहानी की भावना: ठुमरी गानों में कहानी की भावना को बहुत महत्व दिया जाता है। गायक अपनी आवाज़ के माध्यम से कहानी के प्रमुख अंशों

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लखनऊ के नवाबी शान के प्रतीक हैं ये नवाबी स्मारक

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नवाबों के शहर के नाम से मशहूर शहर लखनऊ (Lucknow) को अपने नजाकत और तहजीब से भरी संस्कृति के लिए जाना जाता है। अगर इतिहास की बात करें तो लखनऊ प्राचीन काल के अवध क्षेत्र का हिस्सा माना जाता है। लखनऊ हमेशा से हीं एक बहुरंगी संस्कृतियों वाला शहर रहा है। यहां के नवाबों के तमीज, तहजीब और उनके कविता, संगीत और शाही व्यंजनों के प्रति प्रेम के कारण लखनऊ को नबाबी ठाठ बाठ का प्रतीक माना जाता है। इस शहर का इतिहास जितना खूबसूरत रहा है, इसका वर्तमान भी उतना ही खूबसूरत और प्रगतिशील है। आज के समय में इस शहर का काफी तेजी से विकास हो रहा है। लेकिन इस शहर की एक खासियत जो इसे दूसरे शहरों से अलग बनाती है वह यह है कि, इस शहर ने विकास की राह पर चलते हुए भी अपनी संस्कृति को अपने अंदर सहेज कर रखा है। इस शहर के अंदर बहुत से ऐसे पर्यटन स्थल हैं जो देश हीं नहीं बल्कि दुनिया भर से लोगों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। आइए जानते हैं लखनऊ के उन्हीं पर्यटन स्थलों (Tourist places) के बारे में जो इस शहर की पहचान है। (Places to visit in Lucknow) 1. बड़ा इमाम बाड़ा (Bada Imam Bada)लखनऊ के सबसे फेमस टूरिस्ट स्पॉट (Famous Tourist Spot) में से एक बड़ा इमामबाड़ा का निर्माण नवाब आसफ़उद्दौला ने करवाया था। इसीलिए इस इमामबाड़े का दूसरा नाम आसफी इमामबाड़ा (Aasfi Imambada) भी है। इसी इमामबाड़े के अंदर लखनऊ की सबसे प्रसिद्ध भूल भुलैया और बावड़ी भी है, जो पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हैं। कहा जाता है कि इमामबाड़े के भीतर बने इस भूलभुलैया के अंदर जाने के बाद सेम गेट (Same gate) से वापस आना बहुत हीं मुश्किल है। यहां के बावड़ी के बारे में बताया जाता है कि इस बावड़ी के अंदर बहुत सारा खजाना छुपा हुआ है। इस इमामबाड़े को बनाने का काम 1780 में शुरू हुआ और 1784 में जाकर इसका निर्माण कार्य पूरा हुआ। यह जगह कोई मकबरा या मस्जिद नहीं है, लेकिन फिर भी लखनऊ के सबसे फेमस बिल्डिंग्स (Famous buildings) में से एक है। आप जब इमामबाड़े के भीतर जाएंगे तो यहां के आर्किटेक्चर (Architecture) को देखकर मंत्रमुग्ध हो जाएंगे। इमामबाड़े में 489 एक जैसे दिखने वाले दरवाजे हैं, जिनकी नक्काशी और खूबसूरती देखकर एक बार को आप भी ख्यालों की दुनिया में खो जायेंगे। बड़ा इमामबाड़ा मुगल आर्किटेक्चर का एक बेहतरीन उदाहरण है। 2. ब्रिटिश रेजीडेंसी (British Residency) अंग्रेजों के जमाने में बनाई गई इस रेजीडेंसी में ईस्ट इंडिया कंपनी के ब्रिटिश एंप्लॉय (British Employees of East India Company) रहा करते थे। यह रेजीडेंसी 35 एकड़ में फैली हुई है। जहां बहुत सारे बिल्डिंग्स हैं। जिसे पूरा मिला करके रेजीडेंसी का नाम दिया गया है। कहते हैं कि 1857 के विद्रोह में भारतीय लोगों ने इस रेजीडेंसी पर हमला कर दिया था। जिसमें 2000 अंग्रेजी सैनिक मारे गए थे। जिनकी कब्र इस रेजीडेंसी के अंदर बनवायी गई है। रेजीडेंसी के अंदर आपको रेजीडेंसी कंपलेक्स (Residency Complex), ट्रेजरी बिल्डिंग, रेजीडेंसी का म्यूजियम (Musuem of residency), किचन (Kitchen) और रेजीडेंसी का मस्जिद देखने को मिलेगा। इस बिल्डिंग का निर्माण भी आसफ़उद्दौला ने करवाया था। आज के समय में यह बिल्डिंग लखनऊ के प्रसिद्ध दार्शनिक स्थलों (Famous visiting places) में से एक है। 3. छोटा इमामबाड़ा (Chhota Imambara) लखनऊ शहर में एक छोटा इमामबाड़ा भी है। जिसका निर्माण नवाब मोहम्मद अली ने करवाया था। जो उस समय अवध के नवाब थे। इस जगह को इमामबाड़ा हुसैनाबाद मुबारक के नाम से भी जाना जाता है। इस जगह पर आप को ताजमहल के दो प्रतिरूप देखने को मिलेंगे। जिनमें से पहला नवाब मोहम्मद अली की याद में बनवाया गया था और दूसरा उनकी बेटी प्रिंसेस जीनत के याद में बनवाया गया था। यह जगह एक धार्मिक जगह मानी जाती है। इसलिए यहां लड़कियों को अपना सर ढक कर रखना होता है और विजिटर्स को यहां अपने जूते उतार कर जाना होता है। छोटा इमामबाड़ा एक बेहतरीन आर्किटेक्चर वाला जगह है। इस जगह को पैलेस ऑफ़ लाइट (Palace of Light) के नाम से भी जाना जाता है। इसके अंदर शीशे की नक्काशी की गई है और जिसके कारण यहां एक दिया जलाने पर भी यहाँ चारों ओर सौ दिया के बराबर की रोशनी फैल जाती है। इस इमामबाड़े के भीतर लगे झूमरों को नवाब ने बेल्जियम से मंगवाए थे। इस इमामबाड़े की वास्तुकला भारतीय इस्लामिक और फारसी वास्तु कलाओं से मिलती-जुलती है। 4. रूमी दरवाजा (Rumi Darwaza) छोटा इमामबाड़ा और बड़े इमामबाड़े के बीच में स्थित इस दरवाजे को हम लखनऊ शहर का शान (Pride of lucknow) कह सकते हैं। यह दरवाजा 60 फीट ऊंचा है और इसकी निर्माण शैली अवधि वास्तु कला पर आधारित है। इस दरवाजे का निर्माण भी आसफ़उद्दौला ने करवाया था और इस दरवाजे को तुर्किश गेटवे के नाम से भी जाना जाता है। क्योंकि यह दरवाजा तुर्की के बाव-ए-हुमायूं गेटवे (जो कि इस्तानबुल में है) से मिलता जुलता है।रूमी दरवाजा को गौर से देखने पर इसमें दरवाजे के चारों ओर फूलों की नक्काशी देखने को मिलेगी। इस दरवाजे के ऊपर तक पहुंचने के लिए सीढ़ियां भी हैं, जिससे पता चलता है कि इस दरवाजे का निर्माण नजर रखने के लिए भी करवया गया था। दरवाजे के ऊपर एक छोटा सा गुंबद है जहां से आप चारों ओर झांक सकते हैं। 5. हुसैनाबाद क्लॉक टावर (Hussainabad Clock Tower) लखनऊ के प्रसिद्ध पर्यटक स्थलों के लिस्ट में अगला नाम है हुसैनाबाद क्लॉक टावर का। जोकि इंडिया के सबसे लंबे क्लॉक टावरों में से एक है। कहते हैं इस क्लॉक टावर के घंटे और सुईयों को बनवाने के लिए लंदन से सामग्रियां मंगवाई गई थीं। इस क्लॉक टावर के पेंडुलम (Pendulam) की लंबाई 14 फिट है। इस क्लॉक टावर का निर्माण रिचर्ड रॉक्सेल बेन (Rechard Rockcell ben) ने करवाया था। इस क्लॉक टावर की ऊंचाई लगभग 67 मीटर है। यह क्लॉक टावर भारत में विक्टोरियन गोथिक स्टाइल आर्किटेक्चर (Victorian gothic style architecture) का एक बेहतरीन उदाहरण है। इस क्लॉक टावर को बनवाने में लगभग ₹175000 का खर्च आया था और इसे हुसैनाबाद ट्रस्ट ने 1881 में बनवाया था। 6. दिलखुश कोठी (Dilkhush Kothi) लखनऊ की फेमस दिलखुश कोठी को लाल ईंटों

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Places to Visit in Mathura and Vrindavan

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मथुरा और वृंदावन को कृष्ण की भूमि कहे या फिर यह कहे कि ये मंदिरों के शहर हैं। दोनों ही नाम इस शहर के परिचायक हैं और पर्यटकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने में सक्षम हैं। कहते हैं यह वह भूमि है, जहां दुनिया को गीता का ज्ञान देने वाले श्री कृष्ण ने जन्म लिया था। यह शहर ना सिर्फ़ आस्था के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है बल्कि प्रेम के दृष्टिकोण से भी समृद्ध है। यहीं वजह है कि मथुरा और वृन्दावन दोनों ही युवाओं का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते हैं। आइए जानते हैं मथुरा और वृंदावन के बारे में वो तमाम बातें जो इन्हें सिर्फ श्रद्धा और आस्था के केंद्र के तौर पर ही नहीं बल्कि फेमस पर्यटन स्थल के रूप में भी मशहूर बनाते हैं – मथुरा वृंदावन को कृष्ण की भूमि और मंदिरों के शहर के नाम से भी जाना जाता है। क्योंकि पुराणों के अनुसार यहां भगवान विष्णु ने कृष्ण अवतार में जन्म लिया था। इस शहर के हर गली में कोई ना कोई मंदिर देखने को मिल जाता है। वृंदावन के उन सैकड़ों हजारों मंदिरों में से कुछ मंदिर ऐसे भी हैं जो विशेष महत्व रखते हैं और जिनका श्री कृष्ण से सीधा संबंध माना जाता है। इन मंदिरों की प्रसिद्धि इतनी है कि दूर दूर से लोग यहां भगवान के दर्शन करने आते हैं। इस शहर की लोकप्रियता का एकमात्र कारण ये मंदिर हीं हैं। आज के दौर में विज्ञान भी यह मानता है कि मंदिर के परिसर में पहुंचते ही लोगों में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है और मन बिल्कुल शांत हो जाता है। यहीं वजह है कि तनाव के इस दौर में वृंदावन जाना पर्यटकों के लिए एक अच्छा विकल्प है। इन मंदिरों के नाम और उनसे जुड़ी जानकारियां नीचे दिए गए हैं : यह पढ़ना न भूलें : Garh Mukteshwar – गढ़मुक्तेश्वर: जहाँ कौरवों और पांडवों का पिंडदान हुआ था श्री कृष्ण जन्मभूमि : यह मंदिर मूलतः मंदिर नहीं बल्कि एक कारावास है। कहते हैं कि यह वहीं कारावास है जहां, कंस ने श्री कृष्ण के माता पिता ‘देवकी और वासुदेव’ को कैद करके रखा था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, श्री कृष्ण का जन्म इसी कारावास में हुआ था। बाद में उसी कारावास के जगह मंदिर बना दिया गया। जहां दूर-दूर से भक्तगण पूजा करने आते हैं। यहां वह स्थान भी है जहां, देवकी के पहले 7 संतानों की बलि दी गई थी। यह मंदिर मथुरा रेलवे स्टेशन से लगभग 4 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। श्री बांके बिहारी मंदिर : वृंदावन स्थित श्री बांके बिहारी मंदिर मथुरा जंक्शन से लगभग 13 किलोमीटर की दूरी पर स्थित बिहारीपुरा में है। जहां श्री कृष्ण की काली पत्थर से बनी प्रतिमा विराजमान है। इस मंदिर का निर्माण स्वामी हरिदास द्वारा करवाया गया था। इस मंदिर में पर्दा प्रथा को माना जाता है और यह प्रथा इस मंदिर को वृंदावन के बाकी मंदिरों से अलग बनाती है। इस प्रथा के तहत श्री कृष्ण की मूर्ति के आगे हर कुछ मिनट में पर्दा गिरा दिया जाता है। माना यह जाता है कि ऐसा करने से श्री कृष्ण किसी भक्त पर मोहित होकर उनके साथ कहीं और नहीं जाएंगे और वहीं विराजमान रहेंगे। इस मंदिर से जुड़ी एक और खास बात यह है कि इस मंदिर को सुबह सवेरे मंगला आरती के लिए नहीं खोला जाता है। कहा जाता है कि, भगवान रात को गोपियों के साथ रासलीला करते हैं। ऐसे में सुबह सवेरे आरती करके उन्हें जगा कर उनकी नींद को खराब नहीं किया जाता है। प्रेम मंदिर इस मंदिर को सफेद संगमरमर से बनाया गया है और इसके दीवारों पर श्री कृष्ण के जीवन के महत्वपूर्ण कहानियों को कलाकृतियों में उकेरा गया है। जो इस मंदिर को और भी खूबसूरत बनाता है। चारों ओर सफेद संगमरमर और मार्बल से बनाए गए इस मंदिर के परिसर में छोटी-छोटी वाटिकाऐं भी हैं। जहां कहीं कृष्ण के बचपन की झांकियां मिलती हैं, तो कहीं श्री कृष्ण अर्जुन को गीता का उपदेश देते हुए मिलते हैं। यहां कृष्ण की गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा उंगली पर उठाने की मुद्रा में भी मूर्ति स्थापित है। वृंदावन स्थित इस मंदिर की आधारशिला 2001 में रखी गई थी और इसे तैयार होने में 12 वर्षों का समय लग गया। इस मंदिर की आधारशिला जगतगुरु कृपाल आचार्य ने रखी थी। यहीं वजह है कि इस मंदिर के परिसर में उनके स्मृतियों को भी सहेज कर रखा गया है। प्रेम मंदिर आने का सबसे उचित समय शाम का होता है। क्योंकि शाम ढलते हीं यहां लाइटिंग शो शुरू हो जाते हैं, जो इस मंदिर की खूबसूरती में चार चांद लगाने का काम करते हैं। यह पढ़ना न भूलें : Gorakhnath Temple: गोरखपुर के गोरखनाथ बाबा का प्रसिद्ध मंदिर -जहाँ मिलता हैं हर दिल को सुकून इस्कॉन मंदिर इस्कॉन का फुल फॉर्म इंटरनेशनल सोसायटी फॉर कृष्णा कॉन्शियसनेस होता है। इस मंदिर की स्थापना 1966 में स्वामी प्रभुपाद ने की थी। भारत की शानदार स्थापत्य कला का एक बेहतरीन उदाहरण है मथुरा स्थित इस्कॉन मंदिर। इसकी भव्यता और विशालता किसी भी शख्स को अपने में बांध लेने में सक्षम है। इस्कॉन मंदिर का बड़ा सा द्वार और उस द्वार से दिखता अंदर के मंदिर परिसर का झलक किसी को भी मंत्रमुग्ध कर सकती है। इस्कॉन मंदिर भगवान श्री कृष्ण और उनके भाई श्री बलराम को समर्पित है, इसीलिए इसे कृष्ण बलराम मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। इस्कॉन को वृंदावन के सबसे भव्य मंदिर के रूप में भी जाना जाता है। मंदिर के सफेद संगमरमर पत्थर से बने दीवारों पर की गई नक्काशी और चित्रकारी में भगवान श्री कृष्ण के जीवन के विभिन्न पहलुओं के झलक देखने को मिलते हैं। जिन्हें देखना बेहद मनमोहक होता है और यह पर्यटकों को अपनी ओर काफी आकर्षित करता है। निधिवन निधिवन का हिंदू धर्म में विशेष स्थान रहा है। निधिवन देखने में जितना सरल है, उतना ही रहस्यमयी भी। इस वन में स्थित सभी पेड़ की शाखाएं साधारण पेड़ों से काफी अलग और जटिल होते हैं। निधिवन का अर्थ होता है, तुलसी का वन। पौराणिक कथाओं के अनुसार यह वहीं वन है जहां, श्री कृष्ण गोपियों के साथ रासलीला रचाते थे। यह माना

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Fatehpur Sikri

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Fatehpur Sikri – ऐतिहासिक शहर फतेहपुर सीकरी में देखने के लिए बहुत कुछ है खास by Pardeep Kumar भारतीय सभ्यता दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक है। राजा, नवाबों और यहां के दूसरे शासकों ने यहां एक से एक बेहतरीन महल बनवाए, इमारतें बनवाई और आलीशान किले बनवाए और कुछ राजा ऐसे भी हुए जिन्होंने पूरे शहर बसाये। ये शहर और उनमें स्थित ऐतिहासिक इमारतें कई राजवंशों के उत्थान और पतन के जीते-जागते उदाहरण हैं। और उन्हीं उदाहरणों में से एक है फतेहपुर सीकरी। आज के इस ब्लॉग में हम आपको बता रहें हैं फतेहपुर सीकरी शहर के बारे में। you can watch Fatehpur sikri fort video with all information on Five Colors of Travel Vlog यह शहर आगरा से लगभग 36 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। आगरा तक आप अपने बजट के अनुसार किसी भी मार्ग का चुनाव कर सकते हैं। आगरा शहर बड़े-बड़े शहरों से हवाई मार्ग, रेलवे लाइंस और नेशनल हाईवे से जुड़ा हुआ है। आगरा से फतेहपुर सीकरी का सफर आप किसी स्थानीय बस, टैक्सी या कैब से भी कर सकते हैं। जानिए फतेहपुर सीकरी का इतिहास मुगल सम्राट अकबर ने 1569 में शहर की स्थापना की और 1571 से 1585 तक इसे अपनी राजधानी बनाया। शहर के निर्माण में लगभग 15 साल लगे जहां अदालतों, महलों, मस्जिदों और अन्य संरचनाओं का निर्माण किया गया। पहले इसका नाम फतेहाबाद था जहां फतेह का मतलब जीत होता है। बाद में इसका नाम बदलकर फतेहपुर सीकरी कर दिया गया। यहां उनके दरबारियों से नौ रत्नों का चयन किया गया था। आपकी जानकारी के लिए बता दें फतेहपुर और सीकरी दो अलग-अलग जगह हैं। फतेहपुर में आपको बुलंद दरवाज़ा, शैख़ सलीम चिश्ती की दरगाह और जामा मस्जिद जैसी खूबसूरत जगह देखने को मिलेंगी। वहीं सीकरी अकबर का किला था जिसमें अकबर लगभग पंद्रह वर्षों तक रहा। यही वह जगह है जहाँ अकबर ने दीन-ए-इलाही धर्म की बुनियाद रखी। लेकिन पानी की भारी किल्लत के कारण अकबर ने फतेहपुर सीकरी को छोड़कर आगरा को अपनी राजधानी बनाया। अकबर ने चित्तौड़ और रणथंभौर को जीतकर 1569 में शहर की स्थापना की थी। शहर का निर्माण लगभग 15 वर्षों में पूरा हुआ और इसमें महल, हरम, कोर्ट और अन्य संरचनाएं शामिल थीं। आप देखेंगे कि शहर में इमारतों का निर्माण लाल बलुआ पत्थर से किया गया था। शाही महल के मंडप ज्यामितीय रूप से अरब वास्तुकला से बनाये गए  हैं। पानी की कमी और मुगलों और राजपूतों के बीच लगातार युद्धों के कारण अकबर ने यह शहर छोड़ दिया। फतेहपुर सीकरी तीन तरफ से दीवार और चौथी तरफ से एक झील से घिरा हुआ है। इमारतों की वास्तुकला मुगल और भारतीय खासकर हिंदू और जैन वास्तुकला पर आधारित थी। यहां कई उम्दा और खूबसूरत संरचनाएं जैसे मस्जिद, महल, मकबरे आदि हैं, जिन्हें टूरिस्ट देख सकते हैं। उनमें से कुछ के नाम हैं – बुलंद दरवाजा, जामा मस्जिद, इबादत खाना, जमात खाना, सलीम चिश्ती का मकबरा, दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, जोधा बाई पैलेस, पंच महल, बीरबल का घर, अनूप तलाओ, हुजरा-ए-अनूप तलाओ, नौबत खाना, पचीसी कोर्ट। जब भी आप यहाँ घूमने आएं, अगर आप कपल्स हैं तब एक बात का अवश्य ख्याल रखिये शहर में एंट्री करते ही यहाँ के कुछ लोग आपको गाइड के रूप में बार्गेनिंग करते मिल जायेंगे, जो आपको अलग-अलग तरीके से चादर या कुछ अन्य चीजें खरीदने के लिए ठगने का प्रयास करेंगे। इन सबसे बचने के एक ही तरीका है आप सिर्फ ऑथोराइजड गाइड से बात करें। जोधा बाई पैलेस आप जैसे ही किले में एंट्री करेंगे बाईं तरफ आपको सबसे पहले जोधा बाई का महल दिखाई देगा। जोधा बाई का यह महल  रानीवास और जेनानी द्योढ़ी के नाम से भी जाना जाता है। महल विशाल है और दो मंजिला है।  महल का प्रवेश द्वार पूर्व दिशा में स्थित है और बहुत ही शानदार है। वैसे तो यह महल अकबर का हरम था जिसमें अकबर अपनी शाही बेगमों के साथ रहता था लेकिन  महल के निर्माण में प्रयुक्त हिंदू रूपांकनों से पता चलता है कि महल एक हिंदू महिला के लिए बनाया गया था। इसलिए शायद इसे जोधा बाई का महल समझा गया। इस शानदार इमारत निर्माण में  नीले  रंग के टाइलों का प्रयोग किया गया था, जो कि मुल्तान से लाये गये थे। फ़तेहपुर सीकरी में जितने भी भवन थे उन भवनों के आकार में यह महल सबसे बड़ा है। अकबर ने जोधाबाई को ही मरियम-उज्जमानी का नाम दिया था। जहांगीर जोधा बाई के बेटा था। जोधा बाई का यह महल गर्मी और सर्दी दोनों मौसमों के अनुकूल बनाया गया था। पंच महल पंच महल का निर्माण अकबर ने करवाया था। महल महिलाओं के हरम के पास था और इसे इस तरह से बनाया गया है कि यह गर्मियों के दौरान आराम प्रदान करता है। पंच महल एक पांच मंजिला महलनुमा संरचना है जिसमें हर मंजिल धीरे-धीरे आकार में घटती जाती  है। नीचे से ऊपर की ओर जाने पर प्रत्येक मंजिल दूसरी से छोटी होती है।  प्रत्येक स्तंभ में एक जाली थी जहां से महिलाएं शहर में होने वाली घटनाओं को आसानी से देख सकती थी। इसमें कुल 176 स्तंभ हैं। बीरबल का महल बीरबल न केवल अकबर के नौ रत्नों में से एक था और बल्कि उसके सब मंत्रियों में सबसे खास भी था। इसलिए बादशाह अकबर ने बीरबल के लिए महल बनवाया। यह महल अकबर की बड़ी रानियों- रुकैया बेगम तथा सलमा बेगम का निवास स्थान के रूप में भी इस्तेमाल किया गया था। यह दो मंजिला महल मुगल और फारसी वास्तुकला के आधार पर बनाया गया था। खास महल देखने में बेहद सुन्दर यह खास महल मुगल बादशाह अकबर का महल था। भूतल में दो कमरे हैं और पहली मंजिल में ख्वाबगाह है। भूतल के एक कमरे का उपयोग भोजन कक्ष के रूप में और दूसरे का उपयोग पुस्तकालय के रूप में किया जाता था। एक झरोखा है जहां से अकबर आम जनता से संपर्क करता था। ख्वाबगाह महिलाओं के हरम से जुड़ा था और जाली से ढका हुआ था। इसी ख्वाबगाह के सामने अनूप तालाब भी बना है। यहाँ की छते अन्य महलों के अपेक्षाकृत नीची हैं। अनूप तलाब अनूप तलाव ख्वाबगाह के सामने बना एक तालाब है। टैंक लाल