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Gond art: आदिवासियों की वह कला जिसे देश विदेश में पसंद किया जाता है, जानिए क्या है इसकी खासियत!?

Gond art: गोंड आर्ट भारत की उन लोक कलाओं में से एक है, जो चित्रकारी के अलावा जीवन की धड़कन और प्रकृति से जुड़ी संवेदनाओं की बेमिसाल अभिव्यक्ति है। यह कला मुख्य रूप से मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और ओडिशा में बसे गोंड आदिवासी समुदाय की परंपरा से निकली है। माना जाता है कि गोंड शब्द तेलुगू के कोंड से आता है, जिसका अर्थ होता है पहाड़ों पर रहने वाले लोग। गोंड समुदाय प्रकृति को ईश्वर की तरह पूजता है और इसी वजह से उनकी पेंटिंग में पेड़, जानवर, पहाड़, नदी, चांद-सूरज, मछलियां, पक्षी और जंगल की हर छोटी-बड़ी चीज़ को खास जगह मिलती है। इन चित्रों में अलावा आकृतियों के इनके अंदर अनेकानेक कहानियां छिपी होती हैं। गांव की कथाएं, देवताओं के किस्से और लोक विश्वास, जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ते चले आए हैं।

Gond art

गोंड आर्ट की खासियत इसकी अनोखी शैली है, जिसमें रंग भरने के लिए महीन रेखाओं, बिंदुओं और डॉट पैटर्न का इस्तेमाल किया जाता है। कलाकार पहले काली या हल्की रेखाओं से आकृति का ढांचा तैयार करते हैं, फिर उसे रंगों से भरते हैं। परंपरागत रूप से रंग मिट्टी, पत्तों, कोयले, चावल के पाउडर और पौधों से निकाले जाते थे, लेकिन अब समय के साथ कलाकार पोस्टर, ऐक्रेलिक और वाटर कलर का भी उपयोग करने लगे हैं। इन कलाकृतियों का उद्देश्य सिर्फ सुंदरता पैदा करना नहीं होता, बल्कि हर रेखा, हर पैटर्न का अपना विशेष प्रतीकात्मक मतलब होता है। जैसे पेड़ जीवन और संरक्षण का प्रतीक, मछली समृद्धि का चिन्ह, जबकि मोर खुशी का प्रतीक माना जाता है। यही वजह है कि गोंड कला देखने वाले के भीतर भावनाओं और अध्यात्म का एहसास जगाती है।(गांव की कथाएं, देवताओं के किस्से और लोक विश्वास, जो पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ते चले आए हैं।)

Gond art

गोंड कला को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में कई मशहूर कलाकारों का बड़ा योगदान रहा है। सबसे प्रमुख नाम Jangarh Singh Shyam का है, जिन्हें आधुनिक गोंड आर्ट का पिता कहा जाता है। 1980 के दशक में उनकी पेंटिंग्स दिल्ली के भारत भवन में प्रदर्शित हुईं और वहीं से गोंड कला ने पूरी दुनिया में अपनी पहचान बनाई। आज टोक्यो, पेरिस, लंदन और न्यूयॉर्क जैसे देशों में भी गोंड आर्ट की प्रदर्शनियां अक्सर लगती हैं। जंगारह के बाद दुर्गाबाई व्याम, भावना सिंह श्याम, वेरमा व्याम और वेनकट रमन सिंह जैसे कई कलाकारों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया है। आज गोंड कला सिर्फ दीवारों और मंदिरों तक सीमित नहीं रही बल्कि किताबों, टी-शर्ट, फर्नीचर, हैंडबैग, होम डेकोर और बड़े कैनवस पर भी दिखाई देने लगी है

Gond art

आज जब दुनिया आधुनिकता की दौड़ में अपनी जड़ों से दूर होती जा रही है, गोंड कला हमें याद दिलाती है कि प्रकृति और संस्कृति मनुष्य की सबसे बड़ी पूंजी है। यह कला न सिर्फ आर्थिक रूप से आदिवासी समुदाय को मजबूती देती है बल्कि उनकी पहचान, गर्व और परंपरा को भी जीवित रखती है। अगर आप देशी कलाओं से प्यार करते हैं और अपनी संस्कृति को बचाए रखना चाहते हैं, तो गोंड आर्ट को खरीदना, सीखना, या इसके बारे में लोगों को बताना सबसे सुंदर योगदान होगा। आखिरकार, गोंड आर्ट सिर्फ रंगों का खेल नहीं। यह हमारे जंगल, हमारी धरती और हमारी जड़ों की कहानी है।

Gond art

By Five Colors Of Travel

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