Harela: उत्तराखंड की मिट्टी में रचे-बसे त्यौहारों की खुशबू इतनी खास है कि हर रस्म में पहाड़ की आत्मीयता और प्रकृति का सम्मान झलकता है। इन्हीं में से एक अनोखी और दिल को छू लेने वाली परंपरा है हरेला, जिसे हर साल पौष, चैत्र और सावन में बड़े प्यार और श्रद्धा से मनाया जाता है। खासकर कुमाऊं क्षेत्र में। हरेला का अर्थ ही है हरियाली, प्रकृति का आशीर्वाद और उमंग से भरा नया आरंभ। यह पर्व सिर्फ एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति के संरक्षण का संदेश भी देता है। लोक धुनों, पूजन, गीतों और रिश्तों की मिठास के साथ यह त्यौहार पहाड़ी समाज के जीवन को एक सुंदर सांस्कृतिक रंग में रंग देता है। जिस समय चारों ओर बारिश की बूंदें वातावरण को ताजगी देती हैं, उस मौसम में हरेला इंसान और प्रकृति के रिश्ते को और गहरा कर देता है।

हरेला कैसे मनाया जाता है?
हरेला मनाने की शुरुआत बीज बोने की रस्म से होती है। त्यौहार से नौ दिन पहले परिवार के बुजुर्ग मिट्टी की थाली या पत्तल में जौ, धान, मक्का, गेहूं या सरसों के बीज बोते हैं। रोज सुबह इन पर पानी डाला जाता है और नौ दिनों में इनमें से निकलती हरी-हरी कोमल पत्तियां जैसे सुख-दुख के बीच पनपती उम्मीद का प्रतीक होती हैं। हरेला के दिन इन पत्तों को काटकर भगवान शिव, माता पार्वती, गौरा और गणेश जी को अर्पित किया जाता है। माना जाता है कि इससे जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आती है। पर्व के दिन रिश्तेदारों और बच्चों के सिर पर हरेला रखकर जीव जांद रहो, खुश रहो, बढ़ो-फलो-फूलो जैसे आशीर्वाद दिए जाते हैं। यह परंपरा परिवारिक प्रेम और अपनापन जताने का खूबसूरत तरीका है।

प्रकृति और पर्यावरण का संदेश
हरेला उत्तराखंड के लोगों की प्रकृति के प्रति गहरी संवेदनशीलता का प्रतीक है। जिस पहाड़ को बचाए रखने की जिम्मेदारी हर पीढ़ी निभाती आई है, उसी भावना का जीवित रूप है हरेला। इस दिन गांव और शहरों में सामूहिक रूप से पेड़ लगाए जाते हैं, नदियों और जंगलों की सफाई होती है, लोगों को पर्यावरण बचाने की शपथ दिलाई जाती है। स्कूलों में बच्चों को पौधे उपहार में दिए जाते हैं ताकि वे प्रकृति से जुड़ना सीखें। आज जब दुनिया ग्लोबल वार्मिंग और जंगल कटाई के संकट से जूझ रही है, हरेला का संदेश और भी ज़रूरी हो जाता है। यह त्यौहार हमें ये याद दिलाता है कि अगर धरती हरी रहेगी, तभी जीवन सुरक्षित रह पाएगा।( यह परंपरा परिवारिक प्रेम और अपनापन जताने का खूबसूरत तरीका है।)

खान-पान और संस्कृति का उत्सव
हरेला सिर्फ पूजा या पौधा रोपण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लोक कला और संस्कृति का भी अनोखा पर्व है। लोग पारंपरिक गीत गाते हैं, ढोल-दमाऊ बजते हैं, और महिलाएं सामूहिक नृत्य करती हैं। घरों में काफल, भटवा, झंगोरा, पहाड़ी आलू और गहत की दाल जैसे पहाड़ी व्यंजन बनाए जाते हैं। कई जगह गौरा-महेश्वर की झांकी भी निकाली जाती है, जिसमें विवाह समारोह की तरह पूरी तैयारियां होती हैं। यह पर्व गांवों में भाई-चारे और सौहार्द का ऐसा अद्भुत रंग भरता है, जो पूरे साल याद रह जाता है। हरेला सच में यह सिखाता है कि त्यौहार सिर्फ दिखावा नहीं, बल्कि जीवन की सीख और मन की सुंदरता होते हैं।

हरेला कैसे मनाया जाता है?
इसे उत्तराखंड में बहुत ही श्रद्धा और उमंग के साथ मनाया जाता है। त्यौहार से 9 दिन पहले घरों में मिट्टी की थाली या पत्तल में जौ, गेहूं, धान, मक्का या सरसों के बीज बोए जाते हैं। रोज सुबह इन पर पानी डाला जाता है और नौवें दिन उगे हुए हरे अंकुर यानी हरेला काटकर भगवान शिव-पार्वती और गणेश को अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद परिवार के बड़े बुज़ुर्ग बच्चों और रिश्तेदारों के सिर पर हरेला रखकर आशीर्वाद देते हैं जीव जांद रहो, खुश रहो। इस दिन पौधा रोपण, पूजा, लोकगीत, नृत्य और पारंपरिक भोजन का भी आयोजन होता है।

हरेला कैसे बोया जाता है?
बोने की प्रक्रिया बेहद सरल और पारंपरिक होती है। त्यौहार से 9 दिन पहले घर में मिट्टी की साफ की हुई थाली, लकड़ी की टोकरी या पत्तल तैयार की जाती है। इसमें अच्छी गुणवत्ता वाली मिट्टी भरकर जौ, धान, गेहूं, मक्का या सरसों के बीज समान रूप से छिड़के जाते हैं। फिर उन बीजों पर हल्की मिट्टी की परत डालकर थोड़ा-सा पानी दिया जाता है। रोज सुबह इन्हें साफ पानी से सिंचा जाता है और ध्यान रखा जाता है कि ज़्यादा पानी से बीज सड़ें नहीं। नौवें दिन हरे अंकुर तैयार हो जाते हैं, जिन्हें काटकर भगवान को चढ़ाया जाता है और आशीर्वाद के रूप में वितरित किया जाता है।
