Theyyam: केरल के उत्तरी हिस्से, खासकर कासरगोड और कन्नूर की सांस्कृतिक जमीन पर पनपी एक अद्भुत और रहस्यमयी परंपरा है थेय्यम (Theyyam)। यह सिर्फ एक डांस या आर्ट फॉर्म भर नहीं, बल्कि देवत्व की सजीव अनुभूति है। जब कलाकार चमकदार मुकुट, लाल चेहरे का मेकअप और कई फीट ऊंची पोशाक पहनते हैं, तो उनमें देवी या योद्धा आत्माओं का प्रवेश माना जाता है। ढोल-नगाड़ों की ताल, मंत्रों की गूंज और आग के बीच किया गया उनका प्रदर्शन लोगों को चमत्कृत कर देता है। इस समय पूरा माहौल किसी divine ritual जैसा लगता है, जहां दर्शक अपने दुख-दर्द और परेशानियां भूलकर दैवीय अंदाज में डूब जाते हैं।

थेय्यम में अलग-अलग देवी-देवताओं, वीरों और लोकनायकों की कथाओं को नृत्य और अनुष्ठान के जरिए मंचित किया जाता है। खासकर Vishnumoorthi, Gulikan, Bhagavathy, Nagam और Kandakarnan जैसे रूप दर्शकों में अद्भुत रोमांच पैदा करते हैं। रात भर चलने वाले इन समारोहों में हजारों भक्त शामिल होते हैं, क्योंकि माना जाता है कि थेय्यम कलाकार के शरीर में साक्षात देवता अवतरित हो जाते हैं और उनसे आशीर्वाद लेने पर दुख-दर्द दूर हो जाते हैं। किसान, आम लोग, व्यापारी और यहां तक कि बड़े नेता और अफसर भी बिना किसी भेदभाव के उसके चरणों में नतमस्तक होते हैं यही थेय्यम की असली खूबसूरती है।(किसी भेदभाव के उसके चरणों में नतमस्तक होते हैं यही थेय्यम की असली खूबसूरती है।)

मंदिरों और पवित्र स्थलों पर आयोजित यह अनुष्ठान जनवरी से मई के बीच अपने चरम पर होता है, जब temple ceremonies कई दिनों तक चलते हैं। अग्नि पर चलना, तेज हवा में ऊंची पोशाक संभालना, भाला लेकर नृत्य करना ये सब साधारण इंसान के लिए असंभव है, लेकिन कलाकार महीनों की तपस्या और अनुशासन के बाद ही मंच पर उतरते हैं। उनके लिए थेय्यम सिर्फ एक परफॉर्मेंस नहीं, बल्कि spiritual belief और पीढ़ियों से चला आ रहा कर्तव्य है। आज दुनियाभर के यात्री Kerala culture, ritual art और इस अद्भुत परंपरा को करीब से देखने कासरगोड पहुंचते हैं। सोशल मीडिया पर भी लोग इसकी तस्वीरें, वीडियो और कहानियां खोजते रहते हैं, क्योंकि यह सचमुच भारत की सबसे अनोखी विरासतों में से एक है। थेय्यम हमें सिखाता है कि कला सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि इंसान को देवत्व से जोड़ने का माध्यम भी हो सकती है। अगर कभी मौका मिले, तो इस रहस्यमयी और आध्यात्मिक उत्सव को अपनी आंखों से जरूर देखें, क्योंकि थेय्यम को देखना यानी ईश्वर की ऊर्जा को महसूस करना है।

थेय्यम कब मनाया जाता है?
थेय्यम का पवित्र अनुष्ठान मलयाली कैलेंडर के Thulam महीने की शुरुआत के साथ शुरू होता है, जो आमतौर पर अक्टूबर के अंत या नवंबर की शुरुआत से मेल खाता है। इस दिन को Pathamudayam कहा जाता है, और इसी से पूरे उत्तरी केरल में थेय्यम सीज़न की शुरुआत मानी जाती है। यह उत्सव लगभग सात महीने तक लगातार चलता है और Edavam महीने के मध्य तक समाप्त होता है, जो मई–जून के अंत तक होता है। इस अवधि में कासरगोड और कन्नूर के अनेक मंदिरों में रात-भर चलने वाली थेय्यम प्रस्तुतियां होती हैं, जहां हजारों भक्त दैवीय दर्शन के लिए पहुंचते हैं।