केरल Kerala के पालक्कड़ ज़िले के वल्लुवनाड क्षेत्र में प्रसिद्ध वल्लुवनाडन पूरम उत्सव की शुरुआत हो चुकी है। यह उत्सव केरल की धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक विरासत और पारंपरिक जीवनशैली को जीवंत रूप में प्रस्तुत करता है। इन दिनों पूरे इलाके में मंदिर उत्सवों की रौनक देखने को मिल रही है।

चेरपुलस्सेरी देवी मंदिर से हुई शुरुआत Kerala
वल्लुवनाडन पूरम की शुरुआत चेरपुलस्सेरी पुथनकल देवी मंदिर से हुई। यह उत्सव वल्लुवनाड क्षेत्र के लगभग 100 मंदिरों में मनाया जाता है और हर साल मई महीने तक चलता है। इस दौरान आसपास के गांवों और कस्बों में उत्सव का माहौल बना रहता है।
सजे-धजे हाथी बने मुख्य आकर्षण
इस उत्सव की सबसे खास पहचान हैं भव्य रूप से सजाए गए हाथी। मान्यता है कि देवी-देवताओं की प्रतीकात्मक उपस्थिति इन हाथियों पर होती है, जो शोभायात्रा के रूप में मंदिरों तक पहुंचते हैं। सुनहरी सजावट, पारंपरिक छत्र और अनुशासित कतार में चलते हाथी श्रद्धालुओं को विशेष रूप से आकर्षित करते हैं।

पारंपरिक संगीत से गूंजता माहौल
पूरम के दौरान केरल के प्रसिद्ध पारंपरिक वाद्ययंत्र-पंचवाद्यम और कावड़ी-बजाए जाते हैं। ढोल, नगाड़े और शंख की गूंज से पूरा इलाका भक्तिमय वातावरण में बदल जाता है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक इस अनोखे दृश्य को देखने पहुंचते हैं।
फसल कटाई के बाद मनाया जाने वाला पर्व
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, वल्लुवनाडन पूरम फसल कटाई के बाद देवी-देवताओं के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए मनाया जाता है। विश्वास है कि इस दिन क्षेत्र के सभी देवी-देवता हाथियों पर सवार होकर मुख्य मंदिरों में दर्शन देने आते हैं।
केरल की संस्कृति की जीवंत झलक
वल्लुवनाडन पूरम केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि यह केरल की सांस्कृतिक पहचान, परंपरा और सामूहिक आस्था का प्रतीक भी है। यही कारण है कि हर साल यह उत्सव स्थानीय लोगों के साथ-साथ पर्यटकों को भी अपनी ओर आकर्षित करता है। (Kerala)

Five Colors of Travel भारत का एक भरोसेमंद Hindi Travel Blog है जहां आप ऑफबीट डेस्टिनेशन, culture, food, lifestyle और travel tips की authentic जानकारी पढ़ते हैं









