भारत के इतिहास में कई रियासतें ऐसी थीं जिनकी शानो-शौकत और नवाबी ठाट-बाट की मिसालें आज भी दी जाती हैं। इन्हीं में से एक है उत्तर प्रदेश की रामपुर रियासत। यह रियासत सिर्फ अपने अदब, कला और संस्कृति के लिए ही नहीं, बल्कि एक और खास वजह से भी जानी जाती है। यहां के नवाब के पास था अपना खुद का एक निजी रेलवे स्टेशन।(Private station owned by Nawab Hamid Ali)

आज के समय में जब हवाई यात्रा या निजी वाहनों की सुविधा आम है, यह कल्पना करना मुश्किल है कि किसी शासक के पास खुद का रेलवे स्टेशन और निजी ट्रेन भी हो सकती थी। लेकिन रामपुर के नवाबी इतिहास में यह सच था। इस स्टेशन को ‘नवाब रेलवे स्टेशन’ के नाम से जाना जाता था, और यह रामपुर के नौवें नवाब, हामिद अली खान, की शान का प्रतीक था।
नवाब की नवाबी सोच
नवाब हामिद अली खान एक दूरदर्शी और आधुनिक सोच वाले शासक थे। उन्हें अपनी रियासत को आधुनिक बनाने और उसे ब्रिटिश भारत के अन्य विकसित क्षेत्रों के बराबर लाने की लगन थी। इसी सोच के तहत उन्होंने 1925 में ब्रिटिश सरकार से विशेष अनुमति लेकर अपने महल से जुड़ा एक रेलवे स्टेशन बनवाया। इस स्टेशन को बनाने का मुख्य उद्देश्य नवाब की यात्रा को और भी आरामदायक और निजी बनाना था। यह स्टेशन सिर्फ एक प्लेटफार्म नहीं था, बल्कि नवाब के निजी आवास का ही एक हिस्सा था। स्टेशन सीधे महल के परिसर में खुलता था, जिससे नवाब को अपनी यात्रा के लिए बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ती थी। नवाब और उनके परिवार के सदस्य यहीं से अपनी खास बोगियों में सवार होते थे, जो पहले से ही ट्रेन में जोड़ दी जाती थीं।

शाही सफर: एक चलती-फिरती रियासत
नवाब की निजी ट्रेन की बोगियां किसी शाही महल से कम नहीं थीं। ये बोगियां विशेष रूप से नवाब और उनके परिवार के लिए डिजाइन की गई थीं, जिनमें हर तरह की सुख-सुविधा मौजूद थी। इनमें आलीशान बेडरूम, एक बड़ा डाइनिंग रूम और एक पूरी तरह से सुसज्जित किचन भी था। नवाब के स्टाफ और कर्मचारियों के लिए भी अलग से बोगियां थीं, ताकि सफर के दौरान उन्हें असुविधा न हो। यह ट्रेन सिर्फ यात्रा का साधन नहीं थी, बल्कि नवाब की चलती-फिरती रियासत थी। नवाब अपनी यात्रा के दौरान भी महत्वपूर्ण सरकारी काम निपटाते थे, मेहमानों से मिलते थे और अपने शाही अंदाज को बरकरार रखते थे। इस निजी ट्रेन के इस्तेमाल से नवाब अपनी रियासत से जुड़े अन्य स्थानों या ब्रिटिश सरकार के अधिकारियों से मिलने के लिए दिल्ली या अन्य बड़े शहरों की यात्रा करते थे। यह सुविधा उन्हें आम लोगों की भीड़ और असुविधा से बचाती थी, जिससे उनकी नवाबी शान कायम रहती थी।


आजादी के बाद का सफर
1947 में भारत को आजादी मिलने के बाद, रामपुर रियासत का भारत में विलय हो गया। विलय के बाद भी, नवाब और उनके परिवार को अपनी निजी ट्रेन का इस्तेमाल करने की अनुमति दी गई। हालांकि, समय के साथ इस ट्रेन का उपयोग कम होता गया। आखिरकार, नवाब के निधन के बाद इस ट्रेन और स्टेशन को भारतीय रेलवे को सौंप दिया गया।
रामपुर की नवाबी विरासतः
वह आलीशान ‘नवाब रेलवे स्टेशन’ अपनी पुरानी शान खो चुका है। यह एक खंडहर में तब्दील हो चुका है, लेकिन रामपुर के इतिहास की एक महत्वपूर्ण निशानी के रूप में मौजूद है। हालांकि, यह स्टेशन अब उपयोग में नहीं है, लेकिन इसकी कहानी रामपुर की उस नवाबी विरासत को दर्शाती है, जो अब सिर्फ किस्सों और तस्वीरों में ही जिंदा है। यह स्टेशन भारतीय रेलवे के इतिहास में भी एक अनूठा अध्याय जोड़ता है, जहां एक रियासत के नवाब ने अपने निजी ठाट-बाट को बनाए रखने के लिए एक पूरा रेलवे स्टेशन ही बनवा दिया था। रामपुर का यह निजी रेलवे स्टेशन सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि एक युग की कहानी कहता है। एक ऐसा युग जब शासकों का जीवन भव्यता और समृद्धि का पर्याय था। यह हमें याद दिलाता है कि भारत का इतिहास सिर्फ राजनीतिक घटनाओं का संग्रह नहीं, बल्कि इसमें ऐसी कई अनसुनी और रोचक कहानियां भी छिपी हैं, जो हमें बीते हुए समय की एक झलक देती हैं। दिल्ली से रामपुर में नवाब रेलवे स्टेशन जाने के लिए आप गाड़ी या ट्रेन से यात्रा कर सकते हैं।

ड्राइविंगः यह लगभग 219 किलोमीटर का रास्ता है और इसमें करीब 4 घंटे का समय लगेगा। आप एनएच-9 (दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे) के रास्ते जा सकते हैं, जो सबसे सीधा मार्ग है।
ट्रेनः आप नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से रामपुर जंक्शन के लिए सीधी ट्रेन ले सकते हैं। रामपुर जंक्शन से नवाब रेलवे स्टेशन बहुत ही पास है, जहां आप स्थानीय परिवहन से पहुंच सकते हैं। ट्रेन से यात्रा में लगभग 6 घंटे लग सकते हैं।
A story by Ajay Raj