मैं हूँ आंचल पांधी! दिल्ली में अच्छी खासी जॉब है और जिंदगी में है घुमक्कड़ी। यूं तो देश दुनिया में हर जगह जाने का मौका मिला परन्तु इस बार सितम्बर में वृन्दावन जाने का निर्णय लिया। जी हाँ, उत्तर प्रदेश के मथुरा में है वृंदावन धाम। यहीं श्री कृष्ण ने बाल लीलाएं रची थीं और भक्ति का संदेश दिया था। मथुरा और वृंदावन तरह-तरह के सुंदर मंदिरों से सुसज्जित है। सुंदरता की छटा तो जैसे अलग ही रंग बिखेरती है। ~ मेरा सफरनामा


मथुरा जाने के लिए हम बस, कार या ट्रेन में सफ़र कर सकते हैं। मथुरा से वृंदावन की दूरी केवल १२ किलोमीटर है। रहने के लिए यहां काफी अच्छे होटल रूम मिल जाएंगे जिनका रेट भी सही है। पर मैंने चुना एक बड़ा सा होटल रूम जो कि प्रेम मंदिर से बिल्कुल पास ही था। प्रेम मंदिर पैदल जाया जा सकता था। परन्तु वहां पहुंच कर थकान बहुत ज्यादा थी इसलिए कोई प्रोग्राम नहीं बनाया।
अगला दिन था बांके बिहारी मंदिर के नाम
हम यात्रा शुरू कर ही रहे थे कि हमने देखा प्रेमानंद महाराज की सवारी को। नए दिन की शुरुआत इससे अच्छी क्या होगी? अभी तक सिर्फ उनको टीवी पर ही देखा था। मगर यूं आँखों से देखने की तो बात ही अलग है। यहां से आगे फिर हम मंदिर तक पहुंचे। यहां आपको बंदरों से थोड़ा सावधान रहना होगा।
यह मंदिर १२ से ५ बजे तक बंद रहता है अतः आपको दर्शन के लिए सवेरे या सायं का समय ही उचित रहेगा। कथित तौर पर १८६४ में हरिदास जी ने इस मंदिर का शुभ निर्माण करवाया। यहां गर्भगृह में आपको श्री कृष्ण और राधे जी के दर्शन होंगे।


हम साइकिल रिक्शा या बैटरी रिक्शा से किसी से भी मंदिर जा सकते हैं। लेकिन हमने निधिवन के बारे में बहुत कुछ सुना था। तो फिर हम चल दिए निधिवन। कहा जाता है कि १६८०१ रूप लेकर तुलसी वन या निधि वन में श्री कृष्ण ने महा रास रचाया था। आज भी लोग यह मानते हैं कि श्री कृष्ण राधे जी के साथ यहां विचरते हैं और इसलिए सायंकाल में निधिवन में जाना मना होता है। किंवदंती है कि यदि कोई श्रीकृष्ण और राधे जी की रास लीला को देख लेता है तो वो या तो मृत्यु को प्राप्त हो जाता है और या पागल होकर लौटता है। सनातन धर्म ऐसे ही चमत्कारिक मान्यताओं से परिपूर्ण है।
राधारमण जी के मंदिर को प्रस्थान..
माना जाता है कि ५०० वर्ष पहले श्री गोपाल भट्ट जी १२ शालिग्राम लिए नेपाल से वृंदावन सिधार रहे थे, जब वो उनकी पूजा करने लगे तो एक १२वीं मूर्ती के श्याम जी ने श्री श्यामल रूप ले लिया जो कि आज भी इस मंदिर में प्रतिष्ठित है। वृन्दावन में रंगनाथ मंदिर का भी बहुत नाम है। रंगनाथ जी का मंदिर एक हीरा व्यापारी ने बनवाया था। ये दक्षिण भारतीय शैली में बना है। यहां एक सोने का खंभा और शीशमहल भी है।
इसके अलावा यहां एक संग्रहालय भी है जिसमें श्री कृष्ण की लीलाएं बड़ी सुघड़ता से चित्रित की गई हैं। इसके बाद हमने देखा गोपेश्वर महादेव जी मंदिर और हनुमान गढ़ी मंदिर। भगवान शिव की पूजा महादेव मंदिर में स्त्री रूप में की जाती है। मान्यता है कि श्री महादेव यहां गोपी रूप में प्रतिष्ठित हैं और यदि हम यहां न जाएं तो वृंदावन की यात्रा को अधूरा माना जाता है।


चलिए अब गोविंद देव जी के मंदिर चलते हैं। इस मंदिर को देख कर प्रतीत होता है जैसे कोई किला हो। इस का निर्माण राजा मानसिंह ने १५९० ने करवाया था। माना जाता है कि तब इसके सात तल थे (seven floors) लेकिन औरंगज़ेब ने इसको तुड़वा दिया था अतः एक ही तल बाकी रहा।
अब आपको ले चलते हैं प्रेम मंदिर!


भारत के उत्तर प्रदेश राज्य में, मथुरा जिले के निकट यह वृंदावन में स्थित बहुत मशहूर मंदिर है। यह जगद्गुरु कृपालु महाराज द्वारा निर्मित भगवान श्री कृष्ण और राधा रानी के प्रेम का सुंदर प्रतीक माना जाता है और एक प्रख्यात मंदिर है। यहां जा कर लगने लगा कि तन मन पूरी तरह से भक्ति में सराबोर है और निधि वन को देख कर एक सिहरन बदन में दौड़ पड़ती है कि हमारा सनातन धर्म कितना खूबसूरत है और साइंस से भी परे चमत्कारों से भरा हुआ है।


मुझे यात्राओं का बहुत शौक है और कहीं भी जाने से पहले मैं उस जगह के बारे में खूब पढ़ती हूं और वहां के अप्रतिम रहस्यों और विशेषताओं के बारे में खूब जानकारी इकट्ठा करती हूं। आशा करती हूँ कि भागवत गीता के ज्ञान को जीवन के भीतर उतार पाऊं। ईश्वरीय सत्ता और धर्म के गूढ़ रहस्यों के बारे में मैं अपनी जानकारी और विश्वास को अचूक मानती हूँ।









