कहीं पहुंचने के लिए कहीं से निकलना बहुत जरूरी होता है।
जब भी मैं किसी ऐसी जगह जाती हूँ जहां इतिहास से संबंधित विषय-वस्तु पर नज़र पड़ती है तो सबसे पहला ख्याल मेरे जहन में यही आता है कि कहीं पहुंचने के लिए कहीं से निकलना बहुत जरूरी होता है। ये जो भी चीजें हैं, कभी इतिहास रही होंगी और आज वहां से निकल कर हमारे सामने इन संग्रहालयों तक पहुंची हैं।
बीते दिनों हमारी छुट्टियां चल रही थी तो मैंने सोचा क्यों ना दिल्ली भ्रमण कर लिया जाए और मैं अपनी सहेलियों के साथ निकल गई- राष्ट्रीय शिल्प संग्रहालय और हस्तकला अकादमी।

राष्ट्रीय शिल्प संग्रहालय और हस्तकला अकादमी में हमने न केवल शिल्प और हस्तकला को देखा बल्कि यह एक ऐसा अनुभव था जैसे मानो, हम इतिहास के पन्नों को पलट रहे हों। यहां की मूर्तियां, कपड़े और पुराने दस्तावेज चीख-चीख कर यह बयां कर रहे थे की कुछ चीजें वक्त बीतने के साथ और बेहतर हो जाती हैं। जैसे उनकी कीमत थोड़ी और बढ़ जाती है। राष्ट्रीय शिल्प संग्रहालय और हस्तकला अकादमी में मैंने ऐसे बहुत-सी चीजें देखीं, जिन्हें देखकर मैं चकित हो उठी।
क्या बीते समय में भी ऐसी कारीगरी की जा सकती थी? आखिर कपड़ा कैसे बनता है? चरखा कैसे चलता है? और ऐसे तमाम सवाल जो मेरे मन में एक बच्ची होने के तौर पर चलते थे, यहां मुझे कुछ ऐसे सवालों के जवाब जरूर मिल गए।
मेरी हर मनमानी बस तुम तक
तेरी सूरत से किसी की नहीं मिलती सूरत
हम जहाँ में तिरी तस्वीर लिए फिरते हैं
~इमाम बख़्श नासिख़

अगर मैं यह कहूं कि मेरी ली हुई किसी भी तस्वीर में मेरी बहन का ज़िक्र होने पर उसमें चार चांद लग जाते हैं, तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। जब इस सुंदर जगह पर कला और शिल्प की वस्तुओं के मध्य है मैंने उस कली को देखा, तो अनायास ही मस्तिष्क में घंटी बजी कि तस्वीर जरूर लेनी चाहिए। मेरा मोबाइल निकला और यह हुआ क्लिक! और फिर जो कैमरे में कैद हुआ, उसने तो मेरा दिल ही जीत लिया। बाकि तस्वीर आपके सामने है।
दीवार पर बालकनी?
यूँ ही चलते चलते हमारी नज़र एक दीवार पर पड़ी। मगर ये कोई ऐसी-वैसी दीवार नहीं थी। इस दीवार पर तो राजशाही सी दिखने वाली एक विशाल कृति लगी हुयी थी। मुझे समझ तो नहीं आया था कि यह क्या था पर देखने से लग रहा था कि जैसे दीवार पर किसी नवाब की बालकनी टांग दी गयी हो।

मिट्टी की मादकता कभी समाप्त नहीं होती..
संग्रहालय में अंदर जाते हुए मैंने मिट्टी की ऐतिहासिक मूर्ति देखी और संग्रहालय से बाहर निकलते हुए मिट्टी के चाक पर कार्य करता हुआ है व्यक्ति। यह देखकर एहसास हुआ कि मिट्टी की मादकता कभी समाप्त नहीं होती। पीढियां बदल सकती हैं, लोग बदल सकते हैं तौर तरीके बदल सकते हैं लेकिन वह मिट्टी कभी नहीं बदल सकती जिससे हम पनपे हैं और जो हमें सींच रही है।


अब तो देख ही लिया कि कपड़ा कैसे बनता है!
इस संग्रहालय में मुझे जो सबसे अधिक रोचक लगा वह था कपड़ा बनने की प्रक्रिया को जानना। यहां पर चरखा भी था और चरखा कैसे काम करता है वह समझने के लिए तमाम चीजें उपलब्ध थीं।
और सबसे अच्छी बात तो यह कि यहां पर वीडियो के माध्यम से हम विजुअल देखकर भी सारी प्रक्रियाओं को समझ सकते थे।


यहां पर भिन्न-भिन्न प्रकार की साड़ियां और कपड़े भी देखने को मिले। कितनी बड़ी कारीगरी की जा सकती है किस तरह से छपाई की जा सकती है यह सब कुछ देखकर हम विस्मित हो उठे।



ये नवाबों के ठाठ
नवाबों की नवाबी के बारे में हमने सुना तो बहुत है और किताबों में पढ़ा है। किताबों में पढ़ी हुई सामग्री को प्रत्यक्ष रूप से देखना बड़ा ही रोचक था। वह शाही अंदाज के बिस्तर-तकिया और पोशाकें देखने लायक थीं।

निकलते हुए एक ख्याल आया
वहां से निकलते हुए हमें लगभग शाम हो चुकी थी। मौसम थोड़ा और शांत हो चुका था। और इन सब पर वहाँ जगमगाती रौशनी। ये झिलमिल करती झालरें मुझे और आनंदित अनुभव करवा रही थीं। ऐसा लग रहा था मानो उस दृश्य को देख रही हूँ जिसके लिए हम यहाँ रुके थे। हालांकि हमने किसी का इंतज़ार नहीं किया था। पर ये बस हो गया। और ये देखकर ख़याल आया कि वाकई कुछ चीजें जैसे अपने आप हो जाती हैं। जैसे कभी कभी हमें केवल वेग के साथ बहना होता है।


आप जब राष्ट्रीय शिल्प संग्रहालय जाएं तो केवल ये न सोचें, कि आपको यहाँ केवल कला और शिल्प के आधार पर देखे जाने वाले हस्त निर्मित वस्तु में ही मिलेंगी। क्योंकि यहाँ आपको इतिहास से वर्तमान तक बहुत-सी ऎसी चीजें देखने को मिलेंगी, जिन्हें देखकर आपको एक नवीन अनुभव होगा और ये अनुभव यकीनन लाभकारी होगा।
मेरा सफरनामा- नंदनी वार्ष्णेय

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