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Stepwells in India: धरती के गर्भ में उतरती बावडियों की एक शानदार यात्रा

जब मैंने पहली बार राजस्थान की एक बावड़ी की सीढ़ियों पर कदम रखा, तो लगा जैसे मैं समय की गहरी सुरंग में उतर रहा हूँ। ऊपर तपती धूप थी, लेकिन जैसे-जैसे मैं नीचे उतरता गया, हवा ठंडी होती गई। एक अलग ही तरह का अनुभव था. पत्थरों पर उकेरी गई मूर्तियाँ, स्तंभों की परछाइयाँ और गहराई में झिलमिलाता पानी — यह केवल एक स्टेपवेल नहीं, बल्कि धरती के गर्भ में छिपा हुआ एक बेहतरीन आर्किटेक्चर चमत्कार था (Stepwells in India)

गुजरात में इन्हें ‘वाव’ कहा जाता है, उत्तर भारत में ‘बाओली’ और राजस्थान में बावड़ी। लेकिन नाम चाहे जो हो, इनकी कहानी भारत की सभ्यता जितनी ही पुरानी और गहरी है। और अगर आप थोड़े भी इतिहास पसंद व्यक्ति हैं तो यह तो आपके लिए अद्भुत अनुभव होगा.

बावड़ी क्या है? – धरती के भीतर बना जल महल

आइये समझते हैं बावड़ी है क्या – बावड़ी दरअसल एक मल्टी स्टोरी भूमिगत जलाशय है, जहाँ भूजल स्तर तक पहुँचने के लिए लंबी सीढ़ियाँ बनाई जाती थीं। इसका स्ट्रक्चर दो मुख्य हिस्सों में बंटा होता है:

  • Vertical Shaft – जहाँ से पानी निकाला जाता था
  • Stepped Corridor – जो लोगों को धीरे-धीरे पानी तक ले जाता था

यह संरचना एक अद्भुत सिद्धांत पर आधारित थी —Hierarchical Access. मानसून में ये बावड़ियाँ पानी से लबालब भर जातीं और गर्मियों में लोग सीढ़ियाँ उतरकर गहराई में बचा हुआ पानी प्राप्त करते। अगर पोएटिक भाषा में कहूं तो मानो धरती स्वयं अपने भीतर पानी का खजाना सहेजकर बैठी हो।

5000 साल पुराना सफर – सिंधु घाटी से मुगल काल तक

बावड़ियों की कहानी आज से नहीं, बल्कि लगभग 5000 वर्ष पहले शुरू होती है। सिंधु घाटी सभ्यता के धौलावीरा और मोहनजो-दड़ो में उन्नत जलाशय और ‘ग्रेट बाथ’ के अवशेष बताते हैं कि उस समय भी जल प्रबंधन की अद्भुत समझ थी। सम्राट अशोक के शिलालेखों में हर 8 कोस पर कुएँ और सीढ़ियाँ बनवाने का उल्लेख मिलता है — यानी यात्रियों और पशुओं के लिए जल की व्यवस्था एक राजकीय दायित्व था। लेकिन बावड़ियों का गोल्डन एरा 11वीं से 16वीं शताब्दी के बीच आया, जब सोलंकी और मुगल शासकों ने इन्हें कला और आस्था से जोड़ दिया।

वास्तुकला की भाषा – नंदा से विजया तक

अगर आप बावडियों की संरचना को अच्छे से समझना चाहते हैं तो सबसे पहले यह जानिए कि प्राचीन ग्रंथों में बावड़ियों को उनके प्रवेश द्वारों के आधार पर चार प्रकारों में बांटा गया है: 1. नंदा – एक प्रवेश द्वार 2. भद्रा – दो विपरीत प्रवेश द्वार 3. जया – तीन दिशाओं से प्रवेश 4. विजया – चारों दिशाओं से प्रवेश, सबसे जटिल संरचना. देश के अलग अलग हिस्सों में बनी बावड़ी इन्हीं संरचनाओं पर आधारित हैं.

दरअसल यह बावड़ियाँ हर प्रकार से अपने आप में जल, दिशा और ज्यामिति का बैलेंस्ड कम्युनिकेशन है।

बावड़ियाँ सिर्फ पानी नहीं, एक पूरी ज़िन्दगी की कहानी रही है

आप जब राजस्थान की चाँद बावड़ी के तल तक पहुँचोगे, तो महसूस होगा कि यह केवल प्यास बुझाने की जगह नहीं थी। यह वाटर मैनेजमेंट की बेहद सफल योजना रही है.  इनकी गहराई और संरचना ऐसी थी कि वाष्पीकरण कम हो और भूजल रिचार्ज होता रहे। यह पूरी तरह नेचुरल एसी की व्यवस्था थी जिसमें भीषण गर्मी में भी नीचे का तापमान सतह से 5-6 डिग्री कम होता था। यह सामाजिक केंद्र के रूप में बेस्ट मोड्यूल रहा है क्योंकि गाँव की महिलाएँ यहाँ पानी भरने आतीं और यही सामाजिक मेलजोल का स्थान बन जाता।

देश की प्रमुख बावड़ियाँ – जहाँ होता है इतिहास से सीधा साक्षात्कार

1. रानी की वाव, पाटन (गुजरात)

जब आप रानी की वाव में उतरोगे, तो लगेगा जैसे आप एक उल्टे मंदिर में प्रवेश कर रहे हो. 11वीं शताब्दी में रानी उदयामति ने इसे अपने पति भीमदेव प्रथम की स्मृति में बनवाया। सात मंजिला यह संरचना 64 मीटर लंबी है और इसमें 500 से अधिक मुख्य मूर्तियाँ हैं। यहाँ आकर आप यहीं के हो जाते हैं।

Bernard Gagnon -Stepwells in India- बावड़ियों का इतिहास, वास्तुकला की यात्रा

2. चाँद बावड़ी, आभानेरी (राजस्थान)

13 मंजिलें, 3,500 संकरी सीढ़ियाँ और लगभग 100 फीट की गहराई। ऊपर से देखने पर इसकी ज्यामिति किसी रहस्यमयी भूलभुलैया जैसी लगती है। लोककथाएँ कहती हैं कि इसे एक रात में भूतों ने बनाया था। इसके पास में स्थित हर्षत माता का मंदिर इसे आध्यात्मिक लुक देता है। यह बावड़ी भी architecture के हिसाब से बेहद खूबसूरत लगती है.

By Chainwit. -Stepwells in India- बावड़ियों का इतिहास, वास्तुकला की यात्रा

4. अग्रसेन की बावड़ी, दिल्ली

कनॉट प्लेस की भीड़ से कुछ ही कदम दूर, अचानक इतिहास की खामोशी मिलती है। मुगल शैली की मेहराबें और 100 से अधिक सीढ़ियाँ — आज यह सूखी है, लेकिन इसकी गूंज अब भी जीवित है। फिल्म ‘पीके’ ने इसे नई पहचान दी और भी कई फिल्मों की शूटिंग यहाँ हुई है जो इसे बेहद खास बनाती है. माना जाता है कि इस बावड़ी का निर्माण महाभारत काल के राजा अग्रसेन ने करवाया था। हालांकि, जो संरचना आज दिखाई देती है, उसे 14वीं शताब्दी में अग्रवाल समुदाय द्वारा दोबारा बनवाया गया था। हालाँकि इसका इतिहास पूरी तरह स्पष्ट नहीं है, लेकिन यह जगह सदियों पुरानी मानी जाती है। आज यह एक Protected Monument है। लोग यहाँ घूमने, फोटोग्राफी करने और थोड़ी शांति पाने के लिए आते हैं। लेकिन शनिवार और रविवार को यहाँ जायेंगे तो अशांति के खूब दर्शन हो जायेंगे क्योंकि वीकेंड पर शांति की तलाश में यहाँ कुछ ज्यादा ही लोग आ जाते हैं.

Stepwells in India- बावड़ियों का इतिहास, वास्तुकला की यात्रा

5. पन्ना मीणा का कुंड, आमेर (राजस्थान)

आमेर किले के पीछे, भीड़ से थोड़ा हटकर एक शांत और खूबसूरत जगह है — पन्ना मीणा का कुंड। पहली नज़र में यह साधारण लगता है, लेकिन जैसे ही आप इसकी सीढ़ियों को ध्यान से देखते हैं, इसकी अनोखी बनावट आपको हैरान कर देगी। यहाँ सीढ़ियाँ अंकगणितीय स्टाइल में बढ़ती जाती हैं। पर्यटक अक्सर इसे अनदेखा कर देते हैं, लेकिन इसकी शांति मन मोह लेती है और बनावट यहाँ रुकने पर मजबूर कर देती है. माना जाता है कि यह कुंड लगभग 16वीं शताब्दी (करीब 450 साल पुराना) है। इसका उपयोग पहले स्थानीय लोग पानी जमा करने और रोजमर्रा की जरूरतों के लिए करते थे।

Stepwells in India- बावड़ियों का इतिहास, वास्तुकला की यात्रा

ब्रिटिश काल में इन बावडियों को अस्वच्छ मानकर उपेक्षित कर दिया गया। आधुनिक पाइपलाइन सिस्टम आने के बाद ये धीरे-धीरे सूखती चली गईं। लेकिन आज जब जल संकट बढ़ रहा है, तब इन्हें फिर से जीवित करने की कोशिशें हो रही हैं।

जब आप किसी बावड़ी की अंतिम सीढ़ी तक पहुँचते हैं और किसी ठंडे पत्थर को छूते हैं, तो एहसास होता है कि यह केवल पत्थरों का ढांचा नहीं है बल्कि यह हमारी महान सभ्यता का आइना है। वास्तव में यह इंजीनियरिंग, कला और आस्था का बेहद खूबसूरत गठजोड़ है।
या यूँ कह लीजिये यह धरती के भीतर उतरती हुई एक आध्यात्मिक यात्रा है, जिसे मैं तो मजे से जी रहा हूँ…..

अगर आप अगली बार गुजरात या राजस्थान जाएँ, तो किसी बावड़ी की सीढ़ियाँ जरुर उतरकर देखें। शायद आपको वहाँ सिर्फ पानी नहीं, बल्कि इतिहास की गहराई भी मिल जाए।

By Dr. Pardeep Kumar

डॉ. प्रदीप कुमार को मीडिया इंडस्ट्री में सोलह वर्षों से अधिक का अनुभव है। उन्होंने डिजिटल मीडिया के साथ-साथ प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भी सक्रिय रूप से कार्य किया है। वे एक अनुभवी पत्रकार होने के साथ-साथ शिक्षक, लेखक, फोटोग्राफर और डॉक्यूमेंट्री फिल्म मेकर भी हैं। ग्राउंड लेवल की कहानियों को कैमरे और कलम के ज़रिए लोगों तक पहुँचाना उन्हें विशेष रूप से पसंद है। उनकी डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘चाय-चाय’ को इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में बेस्ट डॉक्यूमेंट्री फिल्म अवॉर्ड से सम्मानित किया जा चुका है।
अब तक उनके द्वारा विभिन्न विषयों पर पाँच पुस्तकें प्रकाशित की जा चुकी हैं। यात्रा करना, नई जगहों को खोजना, वहाँ की संस्कृति को समझना और परंपरागत व स्थानीय स्वादिष्ट व्यंजनों का अनुभव लेना उनकी खास रुचियों में शामिल है।

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