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भारत के सबसे बड़े किलों में शामिल है ग्वालियर किला

क्या आपको पता है कि भारत में एक ऐसा किला है जिसे मुगल बादशाह बाबर ने “हिंद के किलों में मोती” कहा था? जी हाँ, ये है ग्वालियर किला- मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर की शान। इस किले को “भारत का जिब्राल्टर” भी कहा जाता है, क्योंकि ये एक ऊँची, बड़ी और बेहद मजबूत चट्टान पर बना है, जिसे गोपाचल या गोपगिरी कहते हैं। छठी शताब्दी ईसा पूर्व से खड़ा ये किला कई राजाओं और राजवंशों जैसे कुषाण, हूण, तोमर, मुगल और सिंधिया के शासन और बदलावों को देख चुका है। इसलिए इसे इतिहास का जिंदा गवाह भी कहा जाता है। फाइव कलर्स ऑफ़ ट्रेवल के इस ब्लॉग में आपको रूबरू करवाते हैं इस किले की शानदार इमारतों से –

भारत के सबसे बड़े किलों में शामिल है ग्वालियर किला

ग्वालियर किला सिर्फ एक किला नहीं, बल्कि महलों, मंदिरों और पुराने जमाने की इंजीनियरिंग का शानदार मिश्रण है। यहाँ आपको मान सिंह तोमर द्वारा बनवाया गया खूबसूरत मान सिंह महल, अनोखी शैली वाला तेली का मंदिर, और असली नाम सहस्रबाहु वाला प्रसिद्ध सास-बहू मंदिर देखने को मिलता है। इसके अलावा किले की पहाड़ियों पर बनी 14वीं–15वीं शताब्दी की विशाल जैन मूर्तियाँ भी बेहद प्रभावशाली हैं, जिनमें 58 फीट ऊँची आदिनाथ की प्रतिमा सबसे खास है। और साथ ही किले का जल प्रबंधन भी अपने समय से आगे था। यहाँ बड़े-बड़े तालाब, बावड़ियाँ और कुंड बनाए गए थे, जिनकी वजह से दुश्मन कभी पानी की कमी करके किला नहीं जीत सके। सूरज कुंड, अस्सी खंभा की बावड़ी और जोहर ताल जैसी जगहों का अपना अनूठा इतिहास है।  कुल मिलाकर, ग्वालियर किला इतिहास, कला, संस्कृति और इंजीनियरिंग इन सबका शानदार संगम है। अगर आप इतिहास या वास्तुकला में दिलचस्पी रखते हैं, तो यह किला आपके देखने लायक जगह है।

 मान सिंह महल

भारत के सबसे बड़े किलों में शामिल है ग्वालियर किला

मान सिंह महल ग्वालियर किले का सबसे खूबसूरत हिस्सा माना जाता है। इसे राजा मान सिंह तोमर ने 1508 में बनवाया था। यह महल कुल चार मंजिलों का है, जिनमें से दो मंजिलें नीचे की ओर बनी हैं, जिससे वे जमीन के अंदर हो, जैसी लगती हैं। इसकी बनावट में भारतीय और मुस्लिम शैली दोनों का मेल देखने को मिलता है। महल की दीवारों पर नीले और पीले रंग की चमकीली टाइलें लगी हैं, जिन पर बत्तख, मोर, हाथी, सिंह और फूलों जैसी आकृतियाँ बनाई गई हैं, जो इसे और भी मनमोहक बनाती हैं। महल के अंदर एक कमरा “फांसी-घर” के नाम से जाना जाता था, जहाँ पहले राजनीतिक कैदियों को सज़ा दी जाती थी। साथ ही इस महल के अंदर आपको बहुत सी खास कलाकृतिया भी देखने को मिलेगी , जिसे देख के आपका मन खुश हो जाएगा|

 तेली का मंदिर

तेली का मंदिर ग्वालियर किले की सबसे ऊँची इमारतों में से एक है, जिसकी ऊँचाई करीब 25 मीटर है। यह 8वीं–9वीं शताब्दी के समय का बेहद पुराना हिंदू मंदिर है, जिसे प्रतिहार सम्राट मिहिर भोज ने बनवाया था। इसकी डिज़ाइन और मंदिरों से काफी अलग है, क्योंकि इसमें उत्तर भारत की नागर शैली और दक्षिण भारत के गोपुरम जैसी छत—जो बैरल की तरह थोड़ी गोल होती है इन दोनों का सुंदर मेल दिखाई देता है। यह मंदिर भगवान शिव, विष्णु और मातृका देवियों को समर्पित था।

भारत के सबसे बड़े किलों में शामिल है ग्वालियर किला

 सास बहू मंदिर

भारत के सबसे बड़े किलों में शामिल है ग्वालियर किला

सास-बहू मंदिर असल में दो जुड़े हुए मंदिर हैं, जिनका असली नाम सहस्रबाहु मंदिर था, जिसका मतलब होता है “हज़ार भुजाओं वाले विष्णु जी का मंदिर।” वक्त के साथ लोग इसे आसान भाषा में सास-बहू मंदिर कहने लगे। ये दोनों मंदिर 1092–93 ईस्वी में कछवाहा शासकों द्वारा बनाए गए थे और ये पूरी तरह से विष्णु भगवान को समर्पित थे।

 जैन स्मारकों की भव्यता गोपाचल पर्वत

ग्वालियर किला जिस गोपाचल पहाड़ी पर बना है, उसके आसपास की चट्टानों में 14वीं–15वीं शताब्दी के समय की विशाल जैन मूर्तियाँ खुदी हुई हैं। ये मूर्तियाँ पत्थर को काटकर बनाई गई हैं और इनमें जैन तीर्थंकरों को पद्मासन में बैठे हुए और सीधे खड़े हुए रूप में दिखाया गया है। यहां आदिनाथ की सबसे ऊँची मूर्ति भी है, जिसकी ऊँचाई करीब 58 फीट 4 इंच है। 1527 ईस्वी में बादशाह बाबर के समय इन मूर्तियों को काफी नुकसान पहुँचाया गया था, लेकिन बाद में स्थानीय जैन समुदाय ने इन्हें फिर से ठीक करवाया। जिससे इन मूर्तियों को आज भी देखा जा सकता है हालांकि जदातार मूर्तियों के सिर टूट चुके है|

 इंजीनियरिंग चमत्कार है यहाँ का जल प्रबंधन

ग्वालियर किले की सबसे खास बातों में से एक इसका शानदार जल प्रबंधन था। कहा जाता है कि यहाँ बने बड़े-बड़े जलाशयों की वजह से किले में कभी पानी की कमी नहीं होती थी, इसलिए दुश्मन चाहकर भी  बावड़ियाँ और कुंड शामिल थे। इनमें सूरज कुंड और अस्सी खंभा की बावड़ी सबसे प्रसिद्ध हैं—अस्सी खंभा वाली बावड़ी एक ऐसा सीढ़ीदार कुआँ है जिसमें लगभग 80 खंभे हैं। वहीं, जोहर ताल का नाम एक दुखद घटना से जुड़ा है, क्योंकि 1232 ईस्वी में किला गिरने पर यहाँ महिलाओं ने जौहर किया था, उसी वजह से इसका नाम जोहर ताल पड़ा।

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Hello! I Pardeep Kumar

मुख्यतः मैं एक मीडिया शिक्षक हूँ, लेकिन हमेशा कुछ नया और रचनात्मक करने की फ़िराक में रहता हूं।

लम्बे सफर पर चलते-चलते बीच राह किसी ढ़ाबे पर कड़क चाय पीने की तलब हमेशा मुझे ज़िंदा बनाये रखती
है।

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