दिल्ली का नाम आते ही ज़हन में आमतौर पर लाल किला, क़ुतुब मीनार और हुमायूँ का मक़बरा जैसे भव्य स्मारक उभर आते हैं। यही वजह है कि ज़्यादातर पर्यटक इन्हीं जगहों तक अपनी यात्रा सीमित कर लेते हैं। लेकिन भारत की राजधानी दिल्ली की असली पहचान सिर्फ इन मशहूर इमारतों तक सिमटी नहीं है। दिल्ली की गलियों, रिहायशी इलाकों, पार्कों और हरियाली के बीच ऐसे कई ऐतिहासिक स्मारक छिपे हुए हैं, जो सदियों पुराने अतीत की कहानियां अपने भीतर समेटे हुए हैं। ये कम चर्चित धरोहरें न सिर्फ इतिहास की गवाही देती हैं, बल्कि यह भी बताती हैं कि दिल्ली कैसे अलग-अलग कालखंडों में बसती, उजड़ती और फिर संवरती रही है।
हौज़ खास का मदरसा- दिल्ली
दिल्ली का हौज खास मदरसा, जिसे ‘मदरसा-ए-फिरोज शाही’ भी कहा जाता है, 14वीं सदी (1351 ईस्वी) में सुल्तान फिरोज शाह तुगलक द्वारा बनवाया गया था। यह ऐतिहासिक इमारत अलाउद्दीन खिलजी के बनवाए गए शाही तालाब (हौज-ए-अलाई) के किनारे ‘L’ आकार में स्थित है, जिसकी मरम्मत फिरोज शाह ने करवाई थी। उस दौर में यह मदरसा दुनिया में ऊँची तालीम का एक बड़ा मरकज़ (केंद्र) था, जहाँ बग़दाद जैसे सुदूर इलाकों से बड़े-बड़े विद्वान और विद्यार्थी पढ़ने आते थे। यहाँ के उस्ताद विद्यार्थियों को सिर्फ कुरआन और इस्लामी कानून ही नहीं, बल्कि गणित (mathematics), खगोल विज्ञान (astronomy), चिकित्सा (medicine) और व्याकरण जैसे विषयों की भी शिक्षा देते थे।

इस इमारत की बनावट में ऊपरी मंज़िल पर स्तंभों वाले कमरे (क्लासरूम) थे, जबकि निचली मंज़िल पर विद्यार्थियों के रहने के लिए छोटी कोठरियाँ (cells) बनाई गई थीं। इस परिसर के मुख्य बिंदु पर सुल्तान फिरोज शाह का मक़बरा स्थित है, और इसकी वास्तुकला इतनी प्रभावशाली थी कि 1398 में आक्रमणकारी तैमूर लंग भी इसे देखकर दंग रह गया था।
जमाली कमाली मस्जिद और मकबरा- दिल्ली
जमाली कमाली मस्जिद और मकबरा दिल्ली के महरौली पुरातत्व पार्क में स्थित एक ऐतिहासिक स्मारक है, जिसका निर्माण 1528-1529 के दौरान मुगल सम्राट बाबर और हुमायूँ के शासनकाल में हुआ था। यह स्थल शेख फजलुल्लाह (जिन्हें ‘जमाली’ के नाम से जाना जाता था) को समर्पित है, जो लोधी और मुगल काल के एक प्रसिद्ध सूफी संत और दरबारी कवि थे। उनके बगल में कमाली नाम के एक रहस्यमयी व्यक्ति की कब्र है, जिनकी पहचान को लेकर इतिहासकार बंटे हुए हैं; कुछ उन्हें जमाली का शिष्य या भाई मानते हैं, तो कुछ लोक कथाएँ उन्हें प्रेमी के रूप में देखती हैं, जिस कारण इसे कभी-कभी ‘गे ताज महल’ भी कहा जाता है।

मस्जिद की वास्तुकला लोधी शैली से मुगल शैली की ओर बदलाव का एक सुंदर उदाहरण है, जबकि मकबरे का आंतरिक हिस्सा रंगीन टाइलों, बारीक नक्काशी और जमाली की कविताओं से इतना सजा हुआ है कि इसे ‘ज्वेल बॉक्स’ की संज्ञा दी गई है। इसके शांत वातावरण के साथ-साथ यहाँ जिन्नातों के होने और रात में दुआओं की आवाज़ें आने जैसी डरावनी कहानियाँ भी मशहूर हैं।
बिजय मंडल
बिजय मंडल (या विजय मंडल) शब्द के कई प्रमुख सन्दर्भ मिलते हैं। सबसे पहले, यह दक्षिण दिल्ली के कालू सराय में स्थित 14वीं सदी का एक ऐतिहासिक स्मारक है, जिसे सुल्तान मोहम्मद बिन तुगलक ने अपने शहर जहाँपनाह के हिस्से के रूप में बनवाया था; इसे एक महल, वॉच टावर या शाही निवास माना जाता है।

दूसरा, 2008 के नोएडा दोहरे हत्याकांड (आरुषि-हेमराज केस) में विजय मंडल नाम के एक व्यक्ति को संदिग्ध के रूप में सीबीआई ने गिरफ्तार किया था, जिसे बाद में सबूतों की कमी के कारण रिहा कर दिया गया। तीसरा, विजय कुमार मंडल बिहार के एक प्रमुख राजनीतिज्ञ और विधायक हैं, जो हाल ही में मंत्री भी बनाए गए हैं। इसके अतिरिक्त, मध्य प्रदेश के खजुराहो और विदिशा में ‘बीजामंडल’ नाम के प्राचीन और विशाल मंदिरों के अवशेष भी स्थित हैं, जिन्हें विजय मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।
राजों की बावली
राजों की बावली दिल्ली के मेहरौली आर्कियोलॉजिकल पार्क में स्थित एक शानदार चार-मंजिला ऐतिहासिक बावड़ी है, जिसका निर्माण 1506 ईस्वी में लोदी वंश के दौरान दौलत खान द्वारा करवाया गया था। इसका नाम ‘राजों’ किसी राजा के लिए नहीं, बल्कि उन राजमिस्त्रियों (masons) के नाम पर पड़ा है जो यहाँ रहा करते थे या इसका उपयोग करते थे। यह बावड़ी लगभग 13.4 मीटर गहरी है और इसकी इंडो-इस्लामिक वास्तुकला में खूबसूरत मेहराबदार गलियारे, नक्काशीदार पत्थर और प्लास्टर के पदक (medallions) देखने को मिलते हैं। इसके परिसर में एक मस्जिद और एक गुमनाम मकबरा भी शामिल है।

हाल ही में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और अन्य संस्थाओं द्वारा इसके जीर्णोद्धार (restoration) का कार्य पूरा किया गया है, जिसके तहत पानी की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए इसमें मछलियाँ भी छोड़ी गई हैं। आज यह स्थल न केवल ऐतिहासिक जल प्रबंधन का एक बेहतरीन उदाहरण है, बल्कि भीड़भाड़ से दूर एक शांत पर्यटन स्थल भी है।
क्यों ज़रूरी है इन स्मारकों को जानना?
दिल्ली केवल वर्तमान की राजधानी नहीं, बल्कि हज़ारों साल की सभ्यताओं का साक्षी भी रही है। यहां सल्तनत काल, मुगल शासन और अंग्रेज़ी दौर—तीनों की छाप साफ़ दिखाई देती है। कम-प्रसिद्ध स्मारकों को जानना और समझना इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि यही स्थल हमें इतिहास की उन कहानियों से जोड़ते हैं, जो किताबों में अक्सर छूट जाती हैं।
अगर आप अगली बार दिल्ली घूमने का मन बनाएं, तो सिर्फ मशहूर पर्यटन स्थलों तक खुद को सीमित न रखें। इन छिपी हुई ऐतिहासिक धरोहरों को भी अपनी यात्रा सूची में शामिल करें। यहां आपको न सिर्फ इतिहास की गहराई मिलेगी, बल्कि भीड़-भाड़ से दूर एक शांत और अलग तरह का अनुभव भी हासिल होगा।

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